मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

शीर्ष कोर्ट ने हिंदी को खाली हाथ लौटाया

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। राष्ट्रभाषा हिंदी के एक पैरोकार बड़े जोश के साथ सुप्रीम कोर्ट आए थे। हिंदी को न्याय दिलाने। लेकिन सोमवार को सिर्फ उन्हें ही नहीं, उनके साथ 'हिंदी' को भी अदालत ने खाली हाथ लौटा दिया। गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ लगाई गई याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि वे अपनी आपत्ति हाईकोर्ट के सामने ही दर्ज कराएं।

मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा व न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की पीठ ने राष्ट्रभाषा हिंदी के संबंध में याचिका लगाने वाले वकील मनोज कुमार मिश्र की याचिका को नकार दिया। मिश्रा ने अदालत को बताया कि वह गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के उस अंश को चुनौती देना चाहते हैं, जिसमें अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 343 को नजरअंदाज करते हुए कह दिया है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के संबंध में रिकार्ड पर कोई आदेश या प्रावधान मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के पूरे आदेश पर ऐतराज नहीं है वे सिर्फ हिंदी पर टिप्पणी करने वाले हिस्से के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट आए हैं।

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर आपत्ति नहीं है, तो उन्होंने अपनी आपत्ति हाईकोर्ट के सामने ही क्यों नहीं जताई? पीठ ने याचिका पर विचार करने से मना करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपनी बात हाईकोर्ट के सामने ही रखें। इससे पूर्व याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट को हाईकोर्ट के फैसले का वह अंश पढ़कर सुनाया, जिस पर उन्हें आपत्ति थी। इसके मुताबिक, 'सामान्यत: भारत में ज्यादातर लोगों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा की तरह स्वीकार किया है और बहुत से लोग हिंदी बोलते हैं तथा देवनागरी में लिखते हैं लेकिन रिकार्ड पर ऐसा कोई आदेश या प्रावधान मौजूद नहीं है जिसमें हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा घोषित किया गया हो।' इस अंश को न्यायमूर्ति दीपक वर्मा ने भी पढ़ा लेकिन वे और उनके साथ अन्य न्यायाधीश याचिकाकर्ता की दलीलों से संतुष्ट नहीं हुए।

source : http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_6331422.html

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित