मंगलवार, 26 अगस्त 2014

संस्कृत से आई 'नमाज़', इसी से मिला 'बग़दाद'

संस्कृत से आई 'नमाज़', इसी से मिला 'बग़दाद'


 शनिवार, 23 अगस्त, 2014 को 15:47 IST तक के समाचार
हाल ही में स्कूलों में संस्कृत सप्ताह मनाने का सीबीएसई का निर्देश अपने साथ प्रतिक्रियाएं भी लेकर आया. कुछ स्वागत में, तो कुछ विरोध में...
हज़ारों साल जनमानस से लेकर साहित्य की भाषा रही संस्कृत कालांतर में क़रीब-क़रीब सुस्ता कर बैठ गई, जिसका एक मुख्य कारण इसे देवत्व का मुकुट पहनाकर पूजाघर में स्थापित कर दिया जाना था.
भाषा को अपने शब्दों की चौकीदारी नहीं सुहाती– यानी भाषा कॉपीराइट में विश्वास नहीं करती, वह तो समाज के आँगन में बसती है.
भाषा तो जिस संस्कृति और परिवेश में जाती है, उसे अपना कुछ न कुछ देकर ही आती है.

वैदिक संस्कृत जिस बेलागपन से अपने समाज के क्रिया-कलापों को परिभाषित करती थी उतने ही अपनेपन के साथ दूरदराज़ के समाजों में भी उसका उठाना बैठना था. जिस जगह विचरती उस स्थान का नामकरण कर देती.

संस्कृत दुनिया की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है
दजला और फ़रात के भूभाग से गुज़री तो उस स्थान का नामकरण ही कर दिया. हरे भरे खुशहाल शहर को ‘भगवान प्रदत्त’ कह डाला. संस्कृत का भगः शब्द फ़ारसी अवेस्ता में “बग” हो गया और दत्त हो गया “दाद” और बन गया बग़दाद.
इसी प्रकार संस्कृत का “अश्वक” प्राकृत में बदला “आवगन” और फ़ारसी में पल्टी मारकर “अफ़ग़ान” हो गया और साथ में स्थान का प्रत्यय “स्तान” में बदलकर मिला दिया और बना दिया हिंद का पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान -यानी निपुण घुडसवारों की निवास-स्थली.
स्थान ही नहीं, संस्कृत तो किसी के भी पूजाघरों में जाने से नहीं कतराती क्योंकि वह तो यह मानती है कि ईश्वर का एक नाम अक्षर भी तो है. अ-क्षर यानी जिसका क्षरण न होता हो.
इस्लाम की पूजा पद्धति का नाम यूँ तो कुरान में सलात है लेकिन मुसलमान इसे नमाज़ के नाम से जानते और अदा भी करते हैं. नमाज़ शब्द संस्कृत धातु नमस् से बना है.
इसका पहला उपयोग ऋगवेद में हुआ है और अर्थ होता है– आदर और भक्ति में झुक जाना. गीता के ग्यारहवें अध्याय के इस श्लोक को देखें – नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते.
इस संस्कृत शब्द नमस् की यात्रा भारत से होती हुई ईरान पहुंची जहाँ प्राचीन फ़ारसी अवेस्ता उसे नमाज़ पुकारने लगी और आख़िरकार तुर्की, आज़रबैजान, तुर्कमानिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, बर्मा, इंडोनेशिया और मलेशिया के मुसलामानों के दिलों में घर कर गई.
संस्कृत ने पछुवा हवा बनकर पश्चिम का ही रुख़ नहीं किया बल्कि यह पुरवाई बनकर भी बही. चीनियों को “मौन” शब्द देकर उनके अंतस को भी “छू” गई.
चीनी भाषा में ध्यानमग्न खामोशी को मौन कहा जाता है और स्पर्श को छू कहकर पुकारा जाता है.
source: http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/08/140818_sanskrit_china_to_iraq_aa.shtml?ocid=socialflow_facebook
http://hn.newsbharati.com//Encyc/2014/8/25/%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E2%80%98%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E2%80%99-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E2%80%98%E0%A4%AC%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E2%80%99.aspx
 

हां, यह हिन्दू राष्ट्र है


आसेतु हिमाचल भूमि एक हिंदू राष्ट्र है, लेकिन इस देश के स्वाधीनता के 68 वर्ष पश्चात भी अगर कोई इस सत्य का उच्चारण करता है तो इस देश का मीडिया ऐसे चिल्लाने लगता है कि जैसे कोई घोर अपराध किया हो। सन 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक को किसी ने पूछा कि, कौन कहता
है कि यह हिंदू राष्ट्र है? तब दृढ़तापूर्ण शब्दों में तुरन्त जवाब आया कि, हां, मैं डा. केशव बलिराम हेडगेवार कहता हूं कि यह हिंदू राष्ट्र है न कि केवल अपना नाम जोड़कर उन्होंने यह सत्य कह दिया, लेकिन अपना सारा जीवन इस सत्य को स्थापित करने हेतु समर्पित कर दिया। हिंदुस्थान को अपनी पहचान दिलाने के लिए एक अलौकिक संगठन और एक असाधारण कार्यप्रणाली को जन्म दिया।

इसके फलस्वरूप उस घटना के लगभग 90 साल बाद अब हिंदू स्थान में गोवा से, कभी नागपुर से, कभी मुंबई से तो कभी दिल्ली से बार-बार बड़े गर्व से डा़ हेडगेवार जी का वह वाक्य पुन: पुन: गूंज रहा है कि, हां यह हिंदूू राष्ट्र है।
हाल ही में सरसंघचालक मोहन भागवत का विश्व हिंदूू परिषद् के स्वर्णजयंती समारोह में मुंबई में आया वक्तव्य चर्चा का विषय बन चुका है। उन्होंने अधिक सरल शब्दों में राष्ट्रवाद का उच्चारण किया था। अगर इंग्लैंड में रहने वाले लोग इंग्लिश हो जातें हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन होते हैं तो हिंदुस्थान में रहने वालों की पहचान हिंदू नाम से क्यों नहीं की जाती? कुछ दिन पहले इसी सत्य को गोवा के उपमुख्यमंत्री फ्रान्सिस डिसूजा ने दो टूक शब्दों में कहा था कि इस देश में रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं चाहे उनका पंथ कोई भी हो। अपने खुद के बारे में उन्होंने कहा था कि मेरा पंथ ईसाई होने के बावजूद मैं हिंदू हूं- ईसाई हिंदू! इस वक्तव्य पर भी कई लोगों ने आपत्ति जताई, खूब चिल्लाए हिंदूू ...हिंदूराष्ट्र, यह नाम सुनते ही चिल्लाना शुरू करने वालों को फ्रान्सिस डिसूजा का यह वक्तव्य तो उनकी नींद उड़ाने वाला था।
वास्तव में डिसूजा ने इस देश के बारे में एक पुरातन, सनातन सत्य को उद्घोषित किया। डिसूजा नामक व्यक्ति ने इसे उद्घोषित किया इसलिए वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि जब जब हिंदूराष्ट्र शब्द का उच्चारण होता है तो इस देश के बहुसांप्रदायिक और हिंदुत्वविरोधी चिल्ला-चिल्लाकर एक सवाल पूछते हैं कि, तुम्हारे इस हिंदूराष्ट्र में अहिंदू का क्या करोगे? इस देश के मुसलमान और ईसाइयों को क्या देश के बाहर खदेड़ दोगे या उन्हे मौत के घाट उतारा जाएगा? इस सवाल को पूछने से हिन्दुत्व की बात करने वाले चूप हो जाएंगे ऐसे मान कर यह सवाल किया जाता है। अहिंदू को मौत के घाट उतार देने की इस कल्पना के साथ आलोचना करने हेतु हिटलर का नाम भी जोडा जाता है। फिर तालिबान से तुलना की जाती है। संघ प्रमुख के वक्तव्य के बाद बड़बोले दिग्विजय ने इसी प्रकार से हिटलर का नाम ले कर ट्विटर पर आपत्तिजनक पोस्ट डाल दी। हिंदूराष्ट्र में अहिंदू के साथक्या करोगे? ऐसा सवालिया निशान लगाने वालों को फ्रान्सिस डिसूजा का वक्तव्य एक करारा जवाब है। अपने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस देश में कुछ भ्रम पहले से तैयार किये गए हैं। जिस में एक भ्रम पंथ और धर्म के बारें में है, दूसरा राज्य और राष्ट्र के बारे में है। उपासना की पद्घति को पंथ कहा जाता है। कोई एक अधिकारी व्यक्ति जब अध्यात्मिक क्षेत्र में निजी उन्नति के लिए उपासना का नया मार्ग दिखाता है तब उस मार्ग पर चलने के लिए कुछ लोग तैयार होते हैं और उनका एक पंथ बन जाता है। पंथ में एक ही गुरु, एक ही ग्रंथ होता है। उपासना की एकही पद्घति का आग्रह होता है। इस्लाम, ईसाई यह ऐसे ही पंथ हैं। लेकिन हिंदू पंथ से उपर उठ कर अलग कल्पना है। हिंदू जीवन पद्घति है। उच्चतम न्यायालय ने भी हिंदूराष्ट्र की परिभाषा करते समय यही कहा है। हिंदू का न तो यीशू या पैगंबर जैसा एक गुरु है न तो बाइविल या कुरान जैसा कोई एक गं्रथ हिंदुस्थान में यह उपासना अपनी-अपनी श्रद्घा के अनुसार करने की स्वतंत्रता है। मूर्तिपूजा का विरोध करने को भी यहां एक नया जीवनदर्शन माना गया है। शैव, वैष्णव लिंगायत, जैन, बौद्घ, सिख ऐसे कई पंथ हिन्दुत्व की परिधि में ही हैं। मूर्ति की पूजा करें या शक्ति की पूजा करें, वेदों को माने या यज्ञ का अनुसरण करें, अस्तिक हों या नास्तिक हों सभी लोग हिन्दुत्व की व्यापक कल्पना में समा जाते हैं। तो ईसाई और मुस्लिम भी इस में अपनी-अपनी उपासना पद्घति और पहचान को कायम रख कर शामिल किए जा सकते हैं। तो किसी के भी मन में यह सवाल आ सकता है कि, यदि ऐसा है तो फिर हिन्दू क्या है? हिंदू एक धर्म है उपासना की पद्घति नहीं। जीवन व्यतीत करने की शैली, जीवन में निहित कर्तव्यों का निर्वहन करने की पद्घति को धर्म कहा गया है।
इसका उपासना से कोई संबंध नहीं है। एक आदर्श नागरिक के नाते, सृष्टि के और परमेष्टी के प्रति उसकी एक बूंद के नाते हर एक व्यक्ति का दायित्व क्या होना चाहिए इस दायित्वबोध के साथ आचरण इसका नाम है हिन्दुत्व। उपासना पद्घति कोई भी होने के बावजूद जो इन मूल्यों को, इस दायित्वबोध को ध्यान में रखते हुए आचरण करता है वह हिंदू है। करनी करें तो नर का नारायण हो जाए इस कहावत में जो करनी अपेक्षित है वह यही है। हिंदुत्व में किसी का द्वेष नहीं, किसी उपासना पद्घति को दूसरे पर थोपना मंजूर नही। जिसको भी अपने निजी कर्तव्यों का बोध हुआ है वह आदमी या कोई भी जीव, जन्तू उसे जो चाहे वह मिले ऐसी कामना हिन्दुत्व श्रेष्ठ विचारधारा में की गयी है। हिंदूराष्ट्र के परमोत्कर्ष का मतलब है मानवता का उत्कर्ष! शिर्डी के साईबाबा जैसे कई उदाहरण इस कड़ी में मौजूद हैं। यहां जैन, बौद्घ, वैष्णव, जैसे ईसाई और मुसलमान भी इसी जीवनदर्शन में अपनी उपासना का मार्गक्रमण कर सकते हैं।
उन्हें हिंदू कहना या ुहदू नाम देना भी आवश्यक नहीं है। उन्हे अहिंदू कह कर अलग थलग कर देना भी उचित नहीं है।
किसी भी मार्ग से उपासना करने को मान्यता देने वाले हिंदुत्व का नाम लेते ही यहाँ के सेक्युलरवादी उन्हे जातीयवादी करार देते हैं। इसके विपरीत जो अपने उपासनामार्ग को ही सही  मान कर अन्य उपासना का विरोध करते हैं उन्हें मान्यता देने को ये लोग सर्वधर्म समभाव का अनुसरण मानते है। यहां की ऐसी राजनीतिक सोच ने संज्ञा और उनके आचरण को एक दूसरे के विपरीत बना दिया है।
हां यह हिंदू राष्ट्र है क्योंकि यहां किसी पर अपनी उपासना पद्घति थोपने की कोशिश नहीं होती या अलग उपासना पद्घति होने से किसी को देश छोड़कर जाने की नौबत नहीं आती। हां यह हिंदूराष्ट्र है क्योंकि यहां किसी ने अलग विचार प्रस्तुत करनेवाली किताब लिखने पर उसकी हत्या करने का फर्मान नहीं निकलता। हां यह हिंदूराष्ट्र है क्योंकि यहां अपने से जादा दूसरे उपासना पद्घति को अपनाने वालों का ज्यादा ख्याल किया जाता है। यहां अतिथि को देवता माना जाता है। यहां सांप, बैल जैसे जानवर और तुलसी, वटवृक्ष जैसे पेड़ की भी पूजा की जाती है। यहां किसी भी मत को स्विकारने का स्वातंत्र्य है, किसी भी देवता की उपासना अपनी अपनी पद्घति से करने की खुली छूट है। सदाचरण, मावनता, प्राणी, जीव-जंतू का कल्याण यही इस हिंदुत्व का दर्शन है। समूचे मानवता को पावन करने वाला यह जीवन दर्शन है। कोई कितना भी दिशाभ्रम करने की चाहे जितनी कोशिशें करें
लेकिन यह हिंदूराष्ट्र है इस सनातन सत्य को नकारा नहीं जा सकता। -दिलीप धारूरकर
source: Panchajany

शनिवार, 23 अगस्त 2014

विविध - संस्कृत में शपथ लेने वाले सांसद सम्मानित

विविध - संस्कृत में शपथ लेने वाले सांसद सम्मानित



 पिछले दिनों नई दिल्ली के रामकृष्णपुरम स्थित विश्व हिन्दू परिषद् के
केन्द्रीय कार्यालय में सोलहवीं लोकसभा में संस्कृत में शपथ लेने वाले
सांसदों का सम्मान किया गया। सम्मानित होने वाले सांसद हैं- श्री वीरेन्द्र
कश्यप (शिमला), श्री भगत सिंह कोश्यारी (नैनीताल), डॉ़ हर्षवर्धन
(दिल्ली), श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत (जोधपुर), स्वामी श्री सुमेधानन्द
सरस्वती (सीकर), श्री चन्द्रप्रकाश जोशी (चित्तौड़गढ़),
श्री राजेश पाण्डेय
(कुशीनगर), श्री अश्वनी कुमार चौबे (बक्सर), डॉ़ महेश शर्मा (गौतमबुद्घ
नगर), श्री राजेन्द्र अग्रवाल (मेरठ), डॉ़ सत्यपाल सिंह (बागपत), डॉ़
रामशंकर कथरिया(आगरा), श्री कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह चन्देल (हमीरपुर), डॉ़
महेन्द्र नाथ पाण्डेय (चन्दौली), श्री वीरेन्द्र सिंह मस्त (भदौही), श्री
भरत सिंह (बलिया),श्री शरद त्रिपाठी (सन्त कबीरनगर),श्री राजेश पाण्डेय
(कुशीनगर) और श्री जगदम्बिका पाल(डुमरियागंज)। कार्यक्रम के प्रारम्भ में
बद्री भगत वेद विद्यालय के ब्रह्मचारियों द्वारा वैदिक मंगलोच्चारण किया
गया। समारोह को सम्बोधित करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ.
हर्षवर्धन ने कहा,'संस्कृत भाषा अत्यधिक सरल भाषा है, थोड़ा-सा प्रयास करने
पर सीखी जा सकती है। मैंने स्वयं कुछ दिनों के अभ्यास से संस्कृत में
बोलना सीखा और संस्कृत में भाषण दिया। विश्व हिन्दू परिषद् के
अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री श्री चम्पत राय ने कहा कि सामाजिक समरसता और
भारतीयता के अस्तित्व की रक्षा के लिए हमें संस्कृत को अपनाना होगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्व हिन्दू परिषद् के केन्द्रीय
उपाध्यक्ष श्री ओमप्रकाश सिंहल ने कहा कि संस्कृत भारत की आत्मा है। भारत
संस्कृत परिषद् के महामंत्री श्री राधाकृष्ण मनोड़ी ने कहा कि संस्कृत
मात्र किसी प्रान्त, क्षेत्र या देश विशेष की भाषा नहीं है, अपितु पूरे
विश्व में इसके लिए समान आदर है। समारोह को परिषद् के संगठन मंत्री श्री
सूर्य प्रकाश सेमवाल, श्री शिवनारायण डा. जीतराम भट्ट, डा. कृष्णचन्द्र
पांडे, प्रो. देवीप्रसाद त्रिपाठी, प्रो. सी. उपेन्द्रराव, दिनेश कामथ और
डा. बलदेवानन्द सागर आदि उपस्थित थे।

source:panchjanya 

मंथन - भारत के वोट गिद्धों की आत्मघाती मानसिकता

मंथन - भारत के वोट गिद्धों की आत्मघाती मानसिकता

बिल्ली के भाग से छींका टूटा', यह कहावत पुरानी होते हुए भी इस समय भारत के वोट गिद्धों पर पूरी तरह लागू होती है। 67 वर्ष से मुस्लिम वोटों को रिझाने के लालच में 'हिन्दू साम्प्रदायिकता' एवं 'बहुसंख्यकवाद' का राग अलापने वाले सत्तालोलुप राजनीतिज्ञ 2014 के चुनाव परिणामों से खुद को मूर्छित स्थिति में पा रहे थे। 'सबका साथ, सबका विकास', 'भारत पहले, पीछे मैं' जैसे सर्वसमावेशी और राष्ट्रवादी उद्घोष के वातावरण में वे अपनी विभाजनकारी राजनीति को खड़ा करने की जगह नहीं ढूंढ पा रहे थे। ऐसी दयनीय स्थिति में उनके कानों पर 'हिन्दू' शब्द पड़ गया और वह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के मुंह से। बस फिर क्या था, उनके मूर्छित प्राणों में चेतना आ गई और वे लोकतांत्रिक पराजय की धूल झाड़कर खड़े हो गए। गुर्राने लगे कि 'संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है, वह सभी भारतीयों को हिन्दू बनाने पर तुला हुआ है। भारत बहुधर्मी देश है। यहां अनेक उपासना पंथों के अनुयायी रहते हैं, उन्हें हिन्दू जैसे मजहबी शब्द से पुकारने का औचित्य क्या है? भागवत जी के भुवनेश्वर भाषण से संघ का छिपा एजेंडा सामने आ गया है।' आदि-आदि।
वैचारिक भटकाव का प्रमाण
हिन्दू विरोधी नेहरू और धर्म विरोधी मार्क्सवादियों के द्वारा उत्पन्न वैचारिक भटकाव की अब तक की दिशा-शून्य यात्रा का यह बोलता प्रमाण है। हिन्दू विरोध नेहरू को संस्कारों में मिला था। नेहरू को न भारतीय राष्ट्रवाद की समझ थी, न मार्क्सवादी विचारधारा की, इस्लाम के इतिहास को भी उन्होंने समझने का प्रयास नहीं किया था। भारतीय मार्क्सवादियों ने उन्हें अपने कंधों पर बैठाकर घुमाया और नेहरू ने गांधी जी की छत्रछाया में अर्जित लोकप्रियता का लाभ उठाकर भारतीय राजनीति में पारिभाषिक शब्दावली को विकृत कर डाला।

उन्होंने पूरे विश्व को 'दारुल इस्लाम' बनाने का सपना देखने वाली असहिष्णु, हिंसा प्रधान व पृथकतावादी इस्लामी विचारधारा को भारत में पंथनिरपेक्षता की कसौटी बना दिया और 'वसुधैव कुटुम्बकम्', 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' तथा 'एकोहम् बहुस्याम:' की दार्शनिक आधारभूमि पर खड़े होकर विविधता में एकता का साक्षात्कार करने वाले, सर्वपंथ समादर भाव पर आधारित पंथनिरपेक्षता के आदर्श में निष्ठा रखने वाले हिन्दू समाज को साम्प्रदायिक व असहिष्णु बहुसंख्यकवादी घोषित कर दिया। मार्क्सवादी कंधों पर सवार नेहरू द्वारा
उत्पन्न यह पारिभाषिक विकृति भारतीय राजनीति और मीडिया पर अब तक छायी रही है, जिसका परिणाम हुआ कि झूठी पंथनिरपेक्षता के आवरण में सत्तालोलुप अवसरवादी राजनीतिक नेतृत्व का उदय हुआ, जिसकी एकमात्र राजनीति भारतीय मुसलमानों के मन में हिन्दू बहुसंख्या का भय पैदा करना बन गई। किसी एक वंश
की जेब में पड़े इन छोटे-छोटे राजनीतिक दलों के बीच स्वयं को पंथनिरपेक्ष सिद्ध करने की होड़ लग गई है और इस होड़ में आगे बढ़ने के लिए संघ व भाजपा का हौवा खड़ा करना उनका शगल बन गया।

तथ्य एवं तर्क से उनकी राजनीति काकुछ लेना-देना नहीं है। उन्होंने यह नहीं सोचा कि यदि सरसंघचालक श्री भागवत भारत के प्रत्येक नागरिक को 'हिन्दू' नाम दे रहे हैं, तो स्पष्ट ही वे 'हिन्दू' शब्द को उपासनावाची अर्थ में नहीं देखते, क्योंकि यदि 'हिन्दू' शब्द उपासनावाची है तो अनेक उपासना पंथों के अनुयायियों पर 'हिन्दू' शब्द कैसे थोप सकते हैं? यह भी स्पष्ट है कि 'हिन्दू' शब्द 'हिन्दुस्तान' शब्द से पहले आया होगा, क्योंकि हिन्दुओं का स्थान होने के कारण 'हिन्दुस्थान' या 'हिन्दुस्तान' नाम प्रचलित हुआ। इतिहास के प्रति पूर्ण अज्ञान तो इस वोट केन्द्रित राजनीति की विशेषता ही है। उन्हें यह जानने की क्या आवश्यकता कि सर सैयद अहमद खान स्वयं को 'हिन्दू' क्यों मानते थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री मुहम्मद करीम छागला अपनी आत्मकथा, 'रोजेज इन डिसेम्बर' में स्वयं को हिन्दू क्यों घोषित करते हैं? क्यों अरब एवं अन्य मुस्लिम देशों में भारतीय मुसलमानों को 'हिन्दू मुसलमान' कहा जाता था। 'हिन्दू' शब्द को उसकी भू-सांस्कृतिक परिभाषा से काटकर इस्लाम और ईसाइयत जैसे सुसंगठित उपासना पंथों के समकक्ष उपासनावाची परिभाषा कब, क्यों और किसने प्रदान की? यदिअपने देश के इतिहास में उनकी रुचि होती, यदि सत्य के अनुशीलन की उनमें भूख होती तो ये राजनीतिज्ञ और उनके बुद्धिजीवी मित्र दिल्ली स्थित राष्ट्रीयअभिलेखागार में बैठकर पुरानी फाइलों की धूल फांकते तब उन्हें पता चलता कि 1857 की क्रांति के पहले की लगभग सभी ब्रिटिश फाइलों में इस देश का नाम'हिन्दुस्तान' लिखा हुआ है, किंतु 1857 के बाद उन्होंने 'इंडिया' शब्द कोप्रचलित किया और 'हिन्दू' शब्द को छोटा करने के लिए 'इंडियन' शब्द को उछाला। अंग्रेजी पढ़े हिन्दुस्तानियों ने कहना शुरू किया कि मैं 'हिन्दू'
नहीं 'इंडियन' हूं। इस प्रकार 'इंडियन' शब्द राष्ट्रवाची बन गया और 'हिन्दू' शब्द उपासनावाची। इस परिभाषा परिवर्तन के रहस्य में प्रवेश करने के लिए ब्रिटिश जनगणना नीति का गहरा अध्ययन आवश्यक है।

ब्रिटिश नीति और हिन्दू
यह कम अर्थपूर्ण नहीं है कि ब्रिटिश जनगणना नीति का विकास 1857 की क्रांति के बाद ही हुआ। 1864-65 में उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी, आगरा व अवध जैसे कुछ क्षेत्रों में व्यवस्थित जनगणना कराई। 1868 में पंजाब में दूसरी जनगणना हुई और 1871 से पूरे भारत में एक साथ दस वार्षिक जनगणना की नीति घोषित की।
इसी समय उन्होंने जनगणना के फॉर्म में उपासना पंथों के कॉलम में 'इस्लाम' और 'ईसाइयत' के साथ-साथ 'हिन्दुइज्म' व 'एनीमिज्म' स्तंभों का भी श्रीगणेश किया। ब्रिटिश जनगणना प्रपत्रों में किसी नए वर्ग का नामोल्लेख करते समय उस नए वर्ग की व्याख्या करना आवश्यक माना जाता था। इसलिए 1871 से 1941 तक प्रत्येक जनगणना रपट में, चाहे वह अखिल भारतीय रपट हो या किसी प्रांत विशेष की रपट 'हिन्दू' शब्द की व्याख्या का प्रयास उपलब्ध है। मैंने कई वर्ष पूर्व इन सब जनगणना रपटों का अध्ययन किया था और उनमें से 'हिन्दू' शब्द की व्याख्या से संबंधित सभी संदर्भों के नोट्स बनाने का प्रयास किया था। ये सभी नोट्स मेरे पास अब भी सुरक्षित हैं। किंतु अपनी अव्यवस्थित एवं अनेक विषयों में बौद्धिक जिज्ञासा के कारण मैं उन्हें पुस्तक रूप नहीं दे पाया। 

पर दु:ख की बात यह है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' नीति की चर्चा तो बहुत हुई, किंतु उसके बौद्धिक उपकरणों में कोई व्यवस्थित शोध नहीं हुआ। कम से कम मेरी जानकारी में तो नहीं आया। जिस संगठन प्रवाह ने 'हिन्दू' शब्द को राष्ट्रवाची अर्थों में पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया, वहां तो यह विचार नहीं हुआ कि लम्बे प्रयोग के कारण किसी शब्द का अर्थान्तरण हो जाने पर उसे उसके पुराने अर्थों पर पुन: प्रतिष्ठित करना सरल कार्य नहीं होता, उसके लिए बौद्धिक आधारभूमि तैयार करके पूरे राष्ट्र के मानस को बदलना पड़ता है। विशेषकर स्वाधीन भारत में जिस ब्रिटिश संवैधानिक रचना को हमने अपनाया उसमें ब्रिटिश जनगणना नीति ने सत्ताकांक्षी राजनेताओं को जाति, क्षेत्र और भाषा की विभाजनकारी राजनीति
खेलने का खुला अवसर प्रदान कर दिया। इस सिद्धांतहीन सत्तालोलुप राजनीति में तथाकथित हिन्दू बहुसंख्या को तो जाति, क्षेत्र व भाषा पर आधारित अनेक छोटे-छोटे दलों में विभाजित कर दिया, जिसके फलस्वरूप वोट राजनीति का 'रिमोट' मजहबी कट्टरता पर पले मुस्लिम वोट बैंक के हाथों में पहुंच गया और उसने उसका पूरा लाभ उठाया। पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में भारत की राष्ट्रवादी चेतना ने आत्मरक्षा की भावना से प्रेरित होकर राष्ट्रवाद की प्रवक्ता भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत दे दिया। किन्तु इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि भाजपा को केवल 31 प्रतिशत मत मिले। 69 प्रतिशत मत इधर-उधर बिखर गए। 2014 की पराजय से आहत मुस्लिम कट्टरवाद बाट जोह रहा है कि कब झूठी पंथनिरपेक्षता के नाम पर जातिवादी, क्षेत्रवादी छोटे-छोटे दलों के हिन्दू राजनेता भाजपा के विरुद्ध गोलबंद हों और कब उनके कंधों पर सवार होकर मुस्लिम कट्टरवाद व पृथकतावाद भारतीय राजनीति पर हावी हो सके।

ये सत्तालोलुप नेता
पीड़ा की बात यह है कि व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा के बंदी हिन्दू राजनेताओं ने न तो इतिहास से कोई सबक सीखा है और न ही वे विश्व राजनीति पर छाए जिहादी खतरे को पहचान रहे हैं, वे केवल सत्ता के अपने खेल में मगन हैं। यही कारण है कि अपनी मुस्लिम वोट बैंक राजनीति के पोषण के लिए संघ के मंच पर 'हिन्दू' शब्द का राष्ट्रवादी अर्थों में उल्लेख होते ही वे संघ और भाजपा पर गुर्राने लगे हैं। खबरिया चैनलों पर इस विषय पर गरमागरम बहस होने लगी है। इराक में जिहादी हिंसा यहूदियों, ईसाइयों और शियाओं पर जो जुल्म ढा रही है उससे इन्हें कोई दर्द नहीं है। सीरिया और इराक में सुन्नी बहुसंख्या शिया अल्पमत पर हिंसा करवा रही है, बगदादी ने स्वयं को नया खलीफा घोषित कर दिया है। 

विश्व राजनीति में सातवीं शताब्दी के खलीफा पद की वापसी, इन सत्तालोलुपों की चिंता का विषय नहीं है। भारत के भीतर भी सपा के आजम खां और शिया नेता कल्बे जावेद के बीच जो गाली-गलौज हो रही है, वह दो व्यक्तियों का झगड़ा नहीं है, अपितु सन् 661 से चले आ रहे शिया-सुन्नी संघर्ष का ही हिस्सा है। 

जो विचारधारा कुरान और पैगम्बर के प्रति आस्था रखने वाले शिया, अहमदी और इब्राहिमी सम्प्रदायों को सहन नहीं कर सकती, उनके कत्लेआम करने पर उतारू है, उस विचारधारा को भारत में पंथनिरपेक्षता की कसौटी मानने वाले इन हिन्दू राजनीतिज्ञों को क्या कहा जाए- मूर्ख या मानवद्रोही स्वार्थी? यदि उनके अंदर शांति और लोकतंत्र के प्रति थोड़ी भी निष्ठा होती तो वे पूरे विश्व पर मंडरा रहे खिलाफत की स्थापना के लिए जिहादी आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक लड़ाई में सम्मिलित होते, किंतु सत्ता के कुछ टुकड़ों से आगे जिनकी दृष्टि
जाती ही नहीं, उनसे ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है। -देवेन्द्र स्वरूप

source:Panchjany

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

संघ प्रमुख के बयान पर इतनी तिलमिलाहट क्यों ?

संघ प्रमुख के बयान पर इतनी तिलमिलाहट क्यों ?


संघ से मतभेद होना एक बात है, लेकिन उसका तालिबान या आतंकवाद फैलाने वाले आईएआईएस, अल कायदा आदि से कैसे तुलना की जा सकती है ? क्या उस विचारधारा में इतने सरेआम विरोध की गुंजाइश है ? अगर संघ इन संगठनों की तरह होता तो विरोधी आज कहां होते इसकी कल्पना करिए और देश अभी किस दशा में होता ? हम भी इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया की स्थिति में पहुंच गए होते।

- अवधेश कुमार
हमारा देश ऐसी अवस्था में पहुंच गया है जहां ऐसा लगता ही नहीं कि किसी के बयान पर शांति और संतुलन से विचार कर प्रतिक्रिया देने की हम आवश्यकता समझते हैं। किसी का एक बयान आया नहीं कि हम उसका परिप्रेक्ष्य, पृष्ठभूमि संदर्भ आदि जाने बिना बयानवीर बन कर खड़े हो जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ.मोहन भागवत के हिन्दू संबंधी बयान पर जो बावेला खड़ा करने की कोशिशें हो रहीं हैं वे इसी श्रेणी की हैं। अगर कटु सच कहा जाए तो जिस ढंग से विरोधी नेताओं और मीडिया के एक धड़े ने इसे महाविवाद का मुद्दा बनाया वह हास्यास्पद है। इसलिए नहीं कि उनको असहमति व्यक्त करने का अधिकार नहीं है, बल्कि इसलिए कि इनने इसे इस तरह प्रस्तुत किया मानो पहली बार और कोई अजूबी बात मोहन भागवत ने कही है।
संघ के विचारों से मतभेद होना अपनी जगह है, पर जिन्होंने संघ के विचारों को पढ़ा है, संघ नेताओं के भाषणों को सुना है, वे नि:संकोच कहेंगे कि भागवत ने कोई नई बात नहीं कह रही है। संघ की मान्यता है कि किसी व्यक्ति का मजहब कुछ भी हो सकता है, उसकी उपासना पद्धत्ति कोई भी हो सकती है, पर हिन्दुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। हिन्दू विशेषण संघ राष्ट्रीयता के तौर पर प्रयोग करता है। संघ का कोई सरसंघचालक, कोई ऐसा पदाधिकारी नहीं होगा जो यह बात बार-बार बोला नहीं होगा।
किंतु खबर यह दी गई कि उड़िया भाषा के एक साप्ताहिक पत्रिका के स्वर्ण जयंती समारोह में संघ प्रमुख ने ऐसा बयान दिया है जिससे विवाद पैदा हो गया है। असल में यही संघ की मूल विचारधारा है। वे हिन्दू राष्ट्र शब्द का प्रयोग इसी संदर्भ में करते हैं। इसलिए मोहन भागवत ने कटक की सभा में जो कहा वह उनकी परंपरागत सोच और पहले से कही जा रही बातों की पुनरावृत्ति भर है। लेकिन हमारी मीडिया की कृपा और कुछ नेताओं की शब्दवीरता से ऐसा संदेश निकला मानो मोहन भागवत ने ऐसा बयान दिया है जो पहले कभी आया नहीं और इस कारण इतना बड़ा विवाद खड़ा हो रहा है। आइए, यह देखें कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा क्या है। इन पंक्तियों पर दृष्टिपात करिए, ‘अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो फिर हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिंदू क्यों नहीं हो सकते ?...सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश में रहने वाले इस महान संस्कृति के वंशज हैं।...हिंदुत्व एक जीवनशैली है और किसी भी ईश्वर की उपासना करने वाला अथवा किसी की उपासना नहीं करने वाला भी हिंदू हो सकता है।...दुनिया अब मान चुकी है कि हिंदुत्व ही एकमात्र ऐसा आधार है, जिसने भारत को प्राचीन काल से तमाम विविधताओं के बावजूद एकजुट रखा है। स्वामी विवेकानन्द का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि किसी ईश्वर की उपासना नहीं करने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति नास्तिक है, हालांकि जिसका खुद में विश्वास नहीं है, वो निश्चित तौर पर नास्तिक है।’
इसके पूर्व 2 अगस्त को भोपाल के एक कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने जो कहा उसे देखिए, ‘संघ जैन, सिख और बौद्ध को अल्पसंख्यक बताना साजिश है। संघ इन्हें हिंदुओं से अलग नहीं मानता।...भारत में राष्ट्र की अवधारणा हमारी सांस्कृतिक पहचान से ही बनी है वह लोगों को जोड़ती है।’
निस्संदेह, जिनका इस सोच से मतभेद है उनको उसे प्रकट करना ही चाहिए। लेकिन इसमें नया कुछ नहीं है। दूसरे, इसमें कहीं नहीं कहा गया है कि दूसरे प्रकार की पूजापद्धति का निषेध है, इसमें तो किसी की पूजा न करने वालों को भी हिन्दू कहा गया है। इसमें कहीं से यह अर्थ नहीं निकलता है कि सभी को हिन्दू कर्मकांड अपनाने के लिए मजबूर करने का उनका विचार है। इसका यह भी अर्थ नहीं निकलता है कि दूसरे मजहब और सम्प्रदाय के लोगों को इस देश में अपने मजहब और उपासाना पद्धति के साथ रहने का अधिकार नहीं है। यह संघ की मूल सोच है जिस पर वह खड़ी है और उससे सहमति जताने वाले लोगों की संख्या आज काफी संख्या में है। इसलिए उपरी तौर पर इसमें ऐसा कुछ नहीं दिखता जिस पर इतना बड़ा बवण्डर खड़ा किया जाए।
अब जरा विरोधियों की ओर आएं। कांग्रेस के मनीष तिवारी, माकपा के सीताराम येचुरी व जदयू के शरद यादव ने एतराज जताते हुए कहा कि संविधान में कहीं भी हिंदुस्तान का जिक्र नहीं है। बात ठीक है इसमें भारत और इंडिया कहा गया है। बसपा की मायावती ने भी आपत्ति जताई और कहा कि भीमराव अंबेडकर ने सभी धर्मों को एक भाव से देखते हुए भारत नाम दिया था। लिहाजा भागवत को ऐसे बयानों से बचना चाहिए, जिनसे एकता पर असर पड़े।
संयोग देखिए कि यह विवाद तब खड़ा हुआ है जब लोकसभा में साम्प्रदायिक हिंसा पर चर्चा होनी है। हमारे दिग्विजय सिंह को इसमें तालिबान और वहाबी विचारधारा नजर आने लगा। उन्होंने कहा कि हम इस विचारधारा से लड़ रहे हैं। चर्चा गृह मंत्रालय के कामकाज पर थी। लेकिन उससे परे जाकर उन्होंने कहा कि, ‘आज जितना खतरा तालिबान की विचारधारा से है, उतना ही खतरा आरएसएस की विचारधारा से है।...आरएसएस द्वारा कथित तौर पर फैलाई जा रही साम्प्रदायिक विचारधारा पर सरकार रोक लगाए।...देश इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर आतंकवाद का सामना कर रहा है। इस आतंकवाद को साम्प्रदायिक विचारधारा बढ़ावा देती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान की विचारधारा समस्या पैदा कर रही है। संघ की विचारधारा भी उसी तरह देश की शांति को नुकसान पहुंचा रही है।’
जरा सोचिए, संघ से मतभेद होना एक बात है, लेकिन उसका तालिबान या आतंकवाद फैलाने वाले आईएआईएस, अल कायदा आदि से कैसे तुलना की जा सकती है ? क्या उस विचारधारा में इतने सरेआम विरोध की गुंजाइश है ? अगर संघ इन संगठनों की तरह होता तो विरोधी आज कहां होते इसकी कल्पना करिए और देश अभी किस दशा में होता ? हम भी इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया की स्थिति में पहुंच गए होते। इसलिए इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं अतिवाद की सीमा को भी पार कर जाती हैं। चूंकि ऐसा है नहीं, इसलिए ऐसी प्रतिक्रियाओं के खिलाफ ही जनता में आक्रोश पैदा होता है। यहीं से राजनीतिक ध्रुवीकरण हो रही है। जहां तक संविधान की बात है तो आज हमें आपत्तिजनक नहीं लगता है, लेकिन इंडिया नाम अंग्रेजों का दिया हुआ है। हमें उसे स्वीकार करने और बनाए रखने में शर्म नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तान कहलाने में आपत्ति है, जबकि इसे भारत एवं हिन्दुस्तान दोनों कहा गया है। दोनों समानार्थी शब्द हैं। हिन्दू को जीवन पद्धति मान लीजिए, संस्कृति मान लीजिए, सभ्यता मान लीजिए, एक व्यापक धर्म भी मान लीजिए...यह सम्प्रदाय या मजहब तो नहीं हो सकता। और यह सच है कि जितनी सहिष्णुता हिन्दू संस्कृति में है उतनी अन्यत्र तलाशनी कठिन है। यह हिन्दू पद्धति ही है जिस कारण यहां इस्लाम, यहूदी, पारसी...जैसे सारे मजहब स्वतंत्रतापूर्वक अपने तरीके से अपने मजहब का पालन कर रहे हैं और अल्पसंख्यक के नाते उन्हें विशेष अधिकार है। इस सच को स्वीकारने में इसलिए हम हिचकिचाएं कि कहीं हम पर साम्प्रदायिकता का या सेक्यूलर विरोधी होने का आरोप न लग जाए तो इससे हम किसी का भला नहीं कर पाएगे। जो सच है उसे उसी रूप में स्वीकारना होगा।
विचार के आधार पर राजनीति में सकारात्मक बहस हो, संघर्ष हो...हिन्दू, हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता...धर्म, सम्प्रदाय, मजहब...सेक्यूलरवाद पर यदि सार्थक बहस हो तो यह देश के हित में होगा। पर संकुचित राजनीति की संकीर्णता ने इसकी संभावना मानो नि:शेष कर दिया है। यह खतरनाक स्थिति है। बिना सोचे समझे बस केवल बावेला खड़ा करना है। कांग्रेस सहित ऐसी अन्य पार्टियां वाकई ऐसी मनोदशा से ग्रस्त हो गईं हैं जहां से इनका बाहर आना मुश्किल दिख रहा है। अगर जितने तक वैचारिक मतभेद हैं संघ विरोधी नेता उतने तक सीमित रहें, उन पर बहस करें, जनता के बीच जाएं तो देश के लिए भी अच्छा होगा। हालांकि इसी मनोदशा और व्यवहार के कारण लोगों ने विद्रोह कर भाजपा एवं उसके सहयोगियों को इतना भारी बहुमत दे दिया है, पर ये सीख लेने को तैयार नहीं।
- लेखक जानेमाने वरिष्ठ पत्रकार हैं।
दिल्ली 
स्त्रोत: www.newsbharati.com

बुधवार, 20 अगस्त 2014

दिग्विजय सिंह का पुतला फूंक की नारेबाजी

ग्विजय सिंह पर हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा। कार्यकर्ताओं ने कांग्रेसी नेता का पुतला फूंकते हुए जमकर नारेबाजी की।
हिंदू जागरण मंच के विभाग संगठन मंत्री शिवऔतार गुप्ता के नेतृत्व में मंगलवार को अस्पताल रोड पर एकत्रित हुए कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर नारेबाजी की। विभाग संगठन मंत्री शिवऔतार गुप्ता ने कहा कि दिग्विजय सिंह आतंकवादियों की भाषा बोलते हैं। युवा वाहिनी के जिलाध्यक्ष मोहित कुशवाह ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बढ़ती विदेशी ताकतों को रोकने के लिए खड़ा हुआ है। प्रदर्शन के दौरान धर्मेद्र कश्यप, सुधांशू शंखवार, चंद्रहास शाक्य, पंकज चौधरी, मोनू चौहान, शब्द सिंह, छोटू पंडित, अमित राज आदि मौजूद रहेà
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दिशा सही है, लेकिन अभी रास्ता लंबा : भैयाजी जोशी 

दिशा सही है, लेकिन अभी रास्ता लंबा : भैयाजी जोशी 

 

विश्व हिन्दू परिषद की प्रकृति, विविध आयाम और इसकी गतिविधियों एवं समाज में इसके योगदान की 50 वर्षीय यात्रा पर पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर एवं आर्गनाइजर के संपादक  प्रफुल्ल केतकर ने रा.स्व.संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी से विशेष बातचीत की, जिसके प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं: 
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्ष 1925 से हिन्दुओं को संगठित और शक्तिशाली बनाने के लिए कार्य कर रहा है, फिर विश्व हिन्दू परिषद जैसे दूसरे संगठन की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी?
1925 में जब संघ की स्थापना हुई थी तो समाज के सभी वर्गांे के लिए देश की स्वतंत्रता एक सबसे बड़ा लक्ष्य था, लेकिन डॉ. हेडगेवार ने अपनी दूरदर्शी सोच एवं व्यापक दृष्टिकोण से देश की स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज को संगठित व एकजुट करने की भी परिकल्पना की थी। वे अपने समाज की कमजोरियों को जानते थे जिनके चलते हम दूसरों के अधीन रहे थे। इसलिए वे इन कमजोरियों का ही समाधान करना चाहते थे। संघ के रचनात्मक कार्य के दो आयाम रहे हैं। पहला, हिन्दू समाज में यह आत्मविश्वास जागृत करना कि 'हम एक साथ आयें और साथ-साथ रहें'। दूसरा यह कि इस समाज के सदस्यों को यह अनुभूति हो कि हमने समाज के हित के लिए विशिष्ट योगदान देना है। इस लक्ष्य को पाने के लिए आवश्यक है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व का निर्माण किया जाये और परिवर्तन के लिए ऊर्जस्वी एवं उत्साहयुक्त नागरिकों का संगठन स्थापित किया जाये। मनुष्य समाज के लिए बना है, इस प्राथमिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर संघ ने 1925 में कार्य प्रारंभ किया। जैसे-जैसे संघ का कार्य विस्तृत हुआ, स्वयंसेवक सामाजिक मुद्दों पर प्रतिबिंबित होने प्रारम्भ हो चुके थे और यह प्रक्रिया निरंतर 1947 तक चलती रही। स्वतंत्रता के बाद यह महसूस किया जाने लगा कि जब तक राष्ट्रीय जीवन क ो प्रभावित करने वाले विभिन्न आयामों पर व्यवस्थित तरीके से नहीं सोचा जाएगा, चाहे वह शिक्षा हो, कृषि हो, धर्म या समाज, तब तक वास्तविक ठोस परिवर्तन नहीं हो पाएगा। संघ के इसी चिंतन से प्रेरणा लेकर स्वयंसेवकों ने विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करना प्रारंभ किया। भारतीय समाज क ी सबसे बड़ी विशेषता है इसकी गहरी धार्मिक मान्यताएं और परम्पराएं। भारतीयों में यह स्वभावगत विशेषता होती है कि चाहे शिक्षा के स्तर पर, वर्ग या अन्य के बावजूद कुछ मान्यताओं अथवा गुरुओं का अवश्य अनुकरण करते हैं। विभिन्न सम्प्रदायों की अपनी-अपनी शक्तियां और अपने अनुयायी होते हैं। ऐसे में उनको जोड़ना कठिन कार्य था। इसी परिप्रेक्ष्य में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी की प्रेरणा से विभिन्न सम्प्रदायों और वर्गों को संगठित करने के उद्देश्य से 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की गई थी। बड़ी संख्या में देश और विदेश में रह रहे हिन्दुओं के साथ संवाद स्थापित किया गया और राष्ट्रीय मूल्यों और संस्कृति से उन्हें जोड़ा गया।
- आपने अभी बताया कि इन सभी संतों और धर्मगुरुओं को एक मंच पर लाना कठिन कार्य था, श्री गुरुजी ने उनको ऐसा विशेष आकर्षक संदेश दिया। क्या इसी कारण वे सब विश्व हिन्दू परिषद के साथ एक मंच पर आने पर सहमत हो गए?
यही कारण है कि श्रीगुरुजी ने व्यक्तिगत रूप से रुचि लेकर इस मामले को प्रभावी बनाया। उन्होंने यह सामान्य तथ्य महसूस कराया कि यद्यपि बाहरी तौर पर भारत में अलग-अलग मतों-सम्प्रदायों में अलग-अलग पद्धति और मत हैं, लेकिन हमारी आंतरिक अन्त: प्रेरणा एक ही है। चाहे मोक्ष हो, निर्वाण हो, निरंकारी या कोई भी नाम, आखिर लक्ष्य तो सभी का एक ही है, भले ही रास्ते अलग-अलग हों। और तो और इन सभी वर्गों और सम्प्रदायों की कमजोरियां भी एक समान हैं, चाहे वह असमानता हो या अस्पृश्यता। इन सभी को सामूहिक प्रयत्नों से दूर किया जा सकता है। मानवता की इस वंशानुगत विरासत को हम सभी को मिलकर बचाना है। श्री गुरुजी इस बात को धार्मिक गुरुओं को समझाने में पूरी तरह सफल रहे कि उन्हें बिना अपना रास्ता बदले उस एक ही दिशा में जाना चाहिए।
ल्ल अपने गठन के बाद से विश्व हिन्दू परिषद ने कई मुद्दों को उठाया और राष्ट्रीय महत्व के बड़े-बड़े आंदोलनों का सफलता के साथ नेतृत्व किया। आप इन सभी गतिविधियों का भारतीय समाज और हिन्दू मत विचार पर कितना प्रभाव मानते हैं?
जब हम सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान की बात करते हैं तो हम विभिन्न उपकरणों और व्यूह रचनाओं के विषय में सोचते हैं। कुछ रास्ते जनजागरण के होते हैं और कुछ विरोध प्रदर्शन के। गंगासागर और एकात्मता यात्राएं जनजागरण की यात्राएं कही जा सकती हैं। कुछ मुद्दे तात्कालिक थे जैसे-मीनाक्षीपुरम में बड़ी मात्रा में हो रहा मतांतरण, कई भारतीयों को दु:खी कर रहा था। विदेशी धन के बल पर मतांतरण नहीं होना चाहिए, इसलिए इसके विरुद्ध जनता का आंदोलन प्रारंभ हुआ था। यह शुद्ध रूप से राष्ट्रीय और जागरूकता का आंदोलन था, किसी मत विशेष के विरुद्ध नहीं। राम जन्मभूमि आंदोलन शायद सबसे बड़ा आंदोलन था जो राष्ट्रीय पुनरोदय और एकता का प्रतीक बना। दुर्भाग्य से इसे इस्लाम-विरोधी रंग दे दिया गया। इस आंदोलन में किसी भी अन्य गैर हिन्दू धार्मिक स्थल को नहीं छेड़ा गया, चाहे वह अयोध्या हो, मथुरा या काशी जबकि ये आक्रांताओं के प्रतीक हैं। केवल आत्मसम्मान के प्रतीक स्थल जनता से संबंधित होते हैं। यह एकजुट भारतीय ही हैं, जो सभी सीमाओं, यहां तक कि वोट बैंक की राजनीति के बाद भी इस एकीकृत शक्ति का सम्मान सिखाते हैं।
- कुछ क्षेत्रों में विश्व हिन्दू परिषद के बारे में गलत अवधारणा और विचार हैं कि यह एक उग्र या रूढि़वादी संगठन है?
यह मुख्य रूप से मीडिया द्वारा राजनीतिक दृष्टि से गढ़ी गई बात है। मैं प्रत्येक व्यक्ति से यह कहना चाहता हूं कि संगठन के मूल्यांकन के लिए न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए संस्कृति, परम्परा और नेतृत्व को मानक बनाया जाए। हिन्दू सोच कभी उग्र या रूढि़वादी नहीं हो सकती। हिन्दुओं को विरासत में केवल कल्याण की अवधारणा ही प्राप्त हुई है और विश्व हिन्दू परिषद उसे आगे बढ़ा रही है। हिन्दुओं से संबंधित कोई भी चीज साम्प्रदायिक नहीं हो सकती है। यह किसी का व्यक्तिगत विरोध नहीं करती, सामाजिक जीवन में पूर्वाग्रह के साथ दुष्प्रचार करना बेइमानी कहलाएगा। कुछ लोगों को समवेत् रूप में सक्रिय होना होगा।
- विश्व हिन्दू परिषद समरसता का उद्देश्य लेकर सक्रिय है। इस मुद्दे को आगे ले जाने में यह संगठन कहां तक सफल रहा है?
दुर्भाग्य से हम दो कारणों से बंटे हुए हैं, एक तो यह कि हम यह भूल गए कि हम हिन्दू हैं और दूसरा परस्पर जातिगत दुराव। भारत में जाति को जन्म आधारित नहीं माना गया, किन्तु मध्यकाल में आक्रांताओं ने इसे व्यवसाय क ी बजाय जाति से जोड़ दिया और भारत में अस्पृश्यता पर आधारित जातिवाद को बढ़ावा मिला। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' के सिद्धांत को भूलकर हमने असमानता को ज्यादा फैला दिया। 18 पुराणों की रचना करने के बाद महर्षि व्यास ने कहा कि 'परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़नम', हम इसे भूल गए और हमारी सोच हीनतर हो गई। हम ने ईश्वर की भक्ति नकार दी और इसे धर्म का नाम दे दिया। आज अपने आंतरिक सिद्धांतों को व्यवहार में उतारकर विश्व हिन्दू परिषद सामाजिक समानता और समरसता के लिए ठोस कार्य कर रहा है। श्री गुरुजी के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया था-'हिन्दव: सोदरा सर्वे' और 'न हिन्दू पतितो भवेत्'। इन ध्येय वाक्यों ने यह संदेश दिया कि समाज में सब समान हैं। एक स्वर में सभी धार्मिक नेताओं ने यह संदेश दिया कि इस समाज में कोई भी निम्न नहीं है। भारतीय इतिहास में यह क्रांतिकारी क्षण था। तथाकथित वंचितों की धार्मिक और सामाजिक प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कई परियोजनाएं और कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। और तो और श्रीराम मंदिर की नींव का पत्थर भी एक वंचित वर्ग के व्यक्ति रामेश्वर चौपाल द्वारा स्थापित कराया गया- जिसका स्पष्ट संदेश सामाजिक समरसता का प्रमाण है। सभी जाति के लोगों को वैदिक परम्परा, कर्मकांड और अर्चक के रूप में, मंदिर के ट्रस्टी के रूप में और अन्य कई महत्वपूर्ण कार्यों में विश्व हिन्दू परिषद ने आगे बढ़ाया है। ये हजारों वर्ष पुरानी समस्याएं हैं, जो एकदम तो नहीं जाएंगी, लेकिन हम इन्हें धीरे-धीरे लंबी प्रक्रिया के साथ समाधान तक पहंुचाना चाहते हैं।
- विश्व हिन्दू परिषद धार्मिक संस्थानों के माध्यम से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत प्रभावी कार्य कर रही है और तो और प्रशिक्षण भी इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष है। आप इस क्षेत्र में हो रहे सेवाकार्य को कैसे देखते हैं?
हमें इसे विभिन्न दृष्टिकोणों से देखना होगा। समाज के सभी वर्ग इस अनुभव और इसके परिणाम को देख रहे हैं। इसको देखने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हमारे पास जो कुछ है, हम उसे लोगों की आवश्यकता की पूर्ति में लगाएं। यह वित्तीय सहायता के रूप में भी हो सकता है, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार देने या अन्य रूप में भी किया जा सकता है। विश्व हिन्दू परिषद समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अलग-अलग रूपों, विशेषकर धार्मिक संस्थानों के माध्यम से विशिष्ट सेवाएं उपलब्ध करवाकर श्रेष्ठ कार्य कर रही है। आज भी समाज में कई वर्ग ऐसे हैं, जो बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, सरकार सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकती। व्यक्ति, संगठन, समाज और सरकार जब साथ-साथ मिलकर कार्य करेंगे, तभी सभी के जीवन के लिए न्यूनतम उपलब्ध हो पाएगा। विश्व हिन्दू परिषद ने हिन्दू चिंतन के इसी विशिष्ट पक्ष का स्पर्श किया है और वास्तव में यह कर रहा है। इनमें एकल विद्यालय, छात्रावास, स्वास्थ्य सुविधाएं, प्रशिक्षण शिविर आदि इस वृहत्तर दृष्टि के प्रमाण हैं।
- पिछले 50 वर्षों में आप विश्व हिन्दू परिषद की भूमिका को कैसे आंकते हैं, यह अपने उद्देश्यों को पाने में कहां तक सफल हुई है? इस स्वर्णजयंती वर्ष में विश्व हिन्दू परिषद की ओर से क्या प्रस्ताव होने चाहिए?
ईमानदारी से कहा जाए तो समाज निर्माण के कल्याण हेतु बने ऐसे संगठनों के जीवन में 50 वर्ष का कालखंड बहुत बड़ा नहीं होता। इसलिए मूल्यांकन कार्य को मात्रा के बजाय संगठन की दिशा से संबंधित होना चाहिए। विश्व हिन्दू परिषद की दिशा का मूल्यांकन केवल व्यापक समाज द्वारा नहीं, बल्कि विहिप द्वारा स्वयं भी किया जाना चाहिए। क्या लक्षित ध्येय की प्राप्ति के लिए पूरी ताकत और संसाधनों का उपभोग किया गया या नहीं। इस अवसर पर इसी उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए। समाज हमारे साथ कार्य करने को तत्पर है।
क्या विश्व हिन्दू परिषद प्रत्येक को साथ लेने के लिए प्रभावी रूप में तैयार है, वास्तविक प्रश्न तो यह है। कई ज्ञात-अज्ञात नाम ऐसे हैं जो दिन-रात विहिप के माध्यम से सेवा कार्यों में लगे रहे। दादा साहब आपटे, राजा भाऊ डेगवेकर और आचार्य गिरिराज किशोर और इन सब के साथ आज के दिन तक अशोक सिंहल भी हैं।
इन सभी ने संगठन के लिए ठोस कार्य किया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े तो उसे इन लोगों के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। उसके बाद उन्हें संगठन की दिशा के विषय में संशय नहीं रहेगा।... लेकिन फिर भी हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अभी रास्ता लंबा है। 
साभार: पाञ्चजन्य

दुनिया को एंड्राइड चाहिए दुनिया को हिंदुत्व चाहिए

दुनिया को एंड्राइड चाहिए दुनिया को हिंदुत्व चाहिए 
हिंदुत्व की शक्ति - हितेश शंकर, संपादक, पाञ्चजन्य 

पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश का सम्पादकीय प्रस्तुत है -
साभार: पाञ्चजन्य

श्री गुरु जी के विचार : हिन्दू ही क्यों?

श्री गुरु जी के विचार : हिन्दू ही क्यों?

जो लोग या समाज, अपने देश को मातृभूमि मानकर उसका वन्दन करता है, जिसकी इतिहास की अनुभूतियाँ समान हैं, तथा जिसके सांस्कृतिक जीवनमूल्य समान हैं, उस समाज का राष्ट्र बनता है. अपने देश के सन्दर्भ में विचार किया तो यह स्पष्ट रूप से प्रतीत होगा कि, ऐसे समाज का नाम हिन्दू है. अतः यह हिन्दू राष्ट्र है. एक राष्ट्र बनने के लिये समान भाषा की आवश्यकता नहीं है. अमेरिका और कनाडा की भाषा एक है, किन्तु वे अलग राष्ट्र हैं, कारण उनकी इतिहास की अनुभूतियाँ भिन्न हैं.

स्विटजरलैंड में तीन भाषायें प्रचलित हैं, फिर भी वह एक राष्ट्र है. भले ही भाषा भिन्न हो, पर आशय एक होना चाहिये. मजहब या उपासना पद्धति भी एकरूप होने की आवश्यकता नही. हिन्दू मन और संस्कार, विविधता के नित्य पोषक रहे हैं. समान आर्थिक हितसम्बन्धों के कारण आर्थिक गठबन्धन बन सकता है, राष्ट्र नहीं बनता. अर्नेस्ट रेनॉ भी यही मत प्रतिपादित करते हैं.
“Community of interests brings about commercial treaties. Nationality which is body and soul both together, has its sentimental side: and a Customs Union is not a country.” ( ibid – page 764 )
और आज के यूरोप का वास्तव, उसी मत की पुष्टि करता है. इंग्लैंड को छोड़कर यूरोप के कई देशों ने एक समान सिक्का भी स्वीकृत किया है, किन्तु उसके कारण यूरोपियन यूनियन में  अन्तर्भूत राष्ट्रों ने अपनी स्वतंत्र अस्मिता और अलग पहचान को समाप्त नहीं किया. उस विशिष्ट पहचान को खतरे का आभास दिखते ही फ्रान्स का राष्ट्र भाव जागृत हुआ और उसने अधिक नजदीकी का विरोध किया.

हिन्दू समाज में अनेक विविधतायें हैं. अनेक भाषायें हैं. जातियाँ हैं. प्रान्त के भेद भी हैं. फिर भी सबके अंतरंग में सांस्कृतिक एकात्मता का भाव है. भिन्न-भिन्न भाषाओं ने उसी सांस्कृतिक एकात्मता को अधोरेखित किया है. इस एकात्मता का नाम हिन्दू है. देश का नाम भी हिंदुस्थान है. श्री गुरुजी का आग्रह है कि हमने अपना सदियों से चलता आया हुआ ‘‘हिन्दू’’ यह नाम नहीं छोड़ना चाहिये. हिन्दू इस नाम में कोई बुराई नहीं है. श्री गुरुजी के शब्द हैः-
‘‘अनादि काल से, एक महान् एवं सुसंस्कृत समाज, जिसे हिन्दू कहते हैं, इस भूमि के पुत्र के रूप में निवास कर रहा है. किन्तु कुछ लोग हिन्दू नाम पर आपत्ति करते हैं और कहते हैं कि तुलनात्मक दृष्टि से इसका मूल तो साम्प्रदायिक है तथा यह नाम हमें विदेशियों द्वारा दिया गया है. वे हिन्दू के स्थानपर ‘आर्य’ अथवा ‘भारतीय’ नाम का सुझाव देते हैं.’’ इसपर श्री गुरुजी कहते हैं ‘‘निस्संदेह ‘आर्य’ एक स्वाभिमानपूर्ण प्राचीन नाम है. किन्तु इसका प्रयोग, विशेषतया गत सहस्र वर्षों में अप्रचलित हो गया. गत शताब्दी में एतिहासिक शोध के नाम पर अंग्रेजों द्वारा किए हुए अपप्रचार ने हमारे मस्तिष्क में धूर्ततापूर्वक बनाए गए आर्य-द्रविड़ विवाद की विषैली जड़ें गहराई तक फैला दी हैं. अतः ‘आर्य’ नाम का प्रयोग हमारे उद्देश्य की सिद्धि में निष्फलता का कारण बनेगा.’’
‘‘भारतीय’’ नाम के बारे में श्री गुरु कहते हैं:- भारतीय प्राचीन नाम है, जो अतिप्राचीन काल से हमसे संबंधित है. भारत नाम वेदों तक में मिलता है. हमारे पुराणों ने भी हमारी मातृभूमि को ‘भारत’ कहा है और यहाँ के निवासियों को ‘‘भारती’’. वास्तव में ‘‘भारती’’ सम्बोधन हिंदू का पर्यायवाची है. किन्तु आज भारतीय शब्द के सम्बन्ध में भ्रान्त धारणायें उत्पन्न हो गई हैं. सामान्यतया यह ‘इंडियन’ शब्द के अनुवाद के रूप में प्रयुक्त होने लगा है. भारत का अर्थ हिन्दू ही है. ‘‘भारत’’ को कितना ही तोड़-मरोड़ कर कहा जाय तो भी उसमें से अन्य कोई अर्थ नहीं निकल सकता. अर्थ  केवल एक ही निकलेगा ‘हिन्दू’. तब क्यों न ‘‘हिन्दू’’ शब्द का ही असंदिग्ध प्रयोग करें. हमारे राष्ट्र की पहचान करानेवाला सीधा-सादा प्रचलित शब्द ‘‘हिन्दू’’ है. केवल हिन्दू शब्द ही उस भाव को पूर्ण एवं शुद्ध रीति से व्यक्त करता है, जिसे हम व्यक्त करना चाहते हैं.

‘‘यह कहना भी ऐतिहासिक दृश्टि से शुद्ध नहीं है कि ‘हिन्दू नाम नूतन है अथवा विदेशियों द्वारा हमें दिया गया है. विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ में हमें ‘‘सप्त सिन्धु’’ नाम मिलता है, जो हमारे देश एवं हमारे जन के लिये प्रयुक्त हुआ है. यह भी भली प्रकार से ज्ञात है कि संस्कृत का ‘स’ वर्ण हमारी कुछ प्राकृत भाषाओं में तथा कुछ यूरोपीय भाषाओं में भी ‘ह’ में परिवर्तित हो जाता है. इस प्रकार प्रथम ‘हप्त हिन्दू’, तत्पश्चात् ‘‘हिन्द’’ नाम प्रचलित हो गया. इसलिये ‘‘हिन्दू’’ हमारा अपना और गौरवशाली नाम है, जिसके द्वारा बाद में अन्य लोग भी हमें पुकारने लगे.’’

यहाँ यह बात ध्यान में रखने लायक है कि कारण कुछ भी हों, पश्चिम और पूर्व के प्रदेशों में ‘स’ के बदले ‘ह’ का उच्चारण किया जाता है. ‘सप्ताह’ ‘हप्ता’ बनता है. ‘सम’ ‘हम’ हो जाता है और फिर समता के निदर्शक ‘हमदर्द’, ‘हमसफर’ ऐसे शब्द बनते हैं. पारसियों के धर्म ग्रन्थ में ‘सुर’ का ‘हुर’. और ‘असुर’ का ‘अहुर’ बना है. पूर्व में भी, जिसको हम ‘असम’ बोलते हैं, उसको वहाँ के लोग ‘अहोम बोलते हैं. इसी रीति से वहाँ ‘संघ’ ‘हंग’ हो जाता है. अतः सिन्धु का हिन्दू बनना एकदम स्वाभाविक है. ‘सिन्धु’ जितनी प्राचीन, उतना ही हिन्दू प्राचीन.

कुछ लोग, विशेषतः बाहरी लोग, हिन्दू समाज के अंतर्गत अनेक विश्वासों, सम्प्रदायों, जातियों, भाषाओं, रीति-रिवाजों के बाहुल्य को देखते हैं तो वे भ्रम में पड़ जाते हैं और प्रश्न करते हैं कि भाँति-भाँति के तत्त्वों एवं असंगत स्वरों से युक्त समूह को किस प्रकार एक समाज कहा जा सकता है? कहाँ है एक जीवनपद्धति जिसे तुम ‘हिन्दू’ कहते हो?,

इस प्रश्न के उत्तर में श्री गुरुजी का कथन है- ‘‘यह प्रश्न हिन्दू-जीवन के बाह्य स्वरूप से उत्पन्न होता है. उदाहरणार्थ एक वृ़क्ष को लीजिये, जिसमें शाखायें, पत्तियाँ, फूल और फल के समान भिन्न-भिन्न प्रकार के उसके कई भाग होते हैं. तने में शाखों से अन्तर होता है और शाखाओं में पत्तियों से. सभी एक दूसरे से नितान्त विभिन्न. किन्तु हम जानते हैं कि ये सब दीखनेवाली विविधतायें केवल उस वृक्ष की भाँति-भाँति की अभिव्यक्तियाँ हैं, जबकि उसके इन सभी अंगों को पोषित करता हुआ उनमें एक ही रस प्रवाहित हो रहा है. यही बात हमारे सामाजिक जीवन की विविधताओं के सम्बन्ध में भी है, जो इन सहस्रों वर्षों में विकसित हुई है.
जिस प्रकार वृ़क्ष में फूल और पत्तियों का विकसन उसका विभेद नहीं, उसी प्रकार हिन्दू समाज की विविधतायें भी आपसी विघटन नहीं है. इस प्रकार का नैसर्गिक विकास हमारे समाज जीवन का अद्वितीय स्वरूप है.’’ श्री गुरुजी आगे बताते हैं, ‘‘अनेकता में एकता’ का हमारा वैशिष्ट्य हमारे सामाजिक जीवन के भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी क्षेत्रों में व्यक्त हुआ है. यह उस एक दिव्य दीपक के समान है जो चारों ओर विविध रंगों के शीशों से ढका हुआ हो. उसके भीतर का प्रकाश, दर्शक के दृष्टिकोण के अनुसार भाँति-भाँति के वर्णों एवं छायाओं में प्रकट होता है. यही उस अभिव्यक्ति की विचित्र विविधता है, जिस से कुछ लोग कहते हैं कि हमारा एक समाज नहीं है, एक राष्ट्र नहीं है, यह बहुराष्ट्रीय देश है. यदि हम अपने समाजजीवन के सही मूल्यांकन को ग्रहण करें, तो उसकी वर्तमान व्याधियों का भी विश्लेषण कर सकेंगे तथा उनके उपचार के लिये
उपायों की भी योजना करने में समर्थ होंगे.’’

हिन्दू समाज में विभेद और विच्छिन्नता निर्माण करना ही जिनका जीवनोद्देश्य है, वे किसी भी कारण को उछालकर कटुता निर्माण करने की चेष्टा करते रहते हैं. उदाहरणार्थ – उत्तर भारत और दक्षिण भारत में विभेद. इस सम्बन्ध में श्री गुरुजी कहते हैं ‘‘सभी दार्शनिक सिद्धान्त हमारे सम्पूर्ण  देश में तथा जो उत्तर के भी कोने-कोने में परिव्याप्त हैं, उन्हीं महान आचार्यों द्वारा प्रतिष्ठापित हुये हैं, जिनका जन्म दक्षिण में हुआ है, अनुपम अद्वैत दर्शन के प्रवर्तक शंकर, विशिष्टाद्वैत की भक्ति के आलोक रामानुज, ईश्वर और जीवन की अति उच्च द्वैत भावना जगानेवाले मध्वाचार्य तथा विश्व यह ईश्वर के परमानंद स्वरूप की अभिव्यक्ति है, ऐसा  मानने वाले वल्लभाचार्य ये सभी दक्षिण के थे. तो क्या हमें कहना चाहिये कि दक्षिण ने दार्शनिक रूप में समस्त देश पर अधिकार जमाया हुआ है. यह कथन कितना असंगत है? अरे, क्या मेरा शीश मेरी टांगों पर अधिकार किये हुये है? क्या दोनों एक शरीर के समान भाव से अंग नहीं हैं?’’

श्री गुरुजी की पीड़ा है कि ‘‘हिन्दू नाम जो हमारे सर्वव्यापक धर्म का बोध कराता था, आज अप्रतिष्ठा को प्राप्त हुआ है, लोग अपने को हिन्दू कहने में लज्जा का अनुभव करने लगे हैं. इस प्रकार वह स्वर्णिम सूत्र जिसमें ये सभी आभायुक्त मोती पिरोये हुए थे, छिन्न हो गया है तथा विविध पंथ एवं मत केवल अपने ही नाम पर गर्व करने लगे हैं और अपने को हिन्दू कहलाने से इन्कार कर रहे हैं. कुछ सिख, जैन, लिंगायत, तथा आर्यसमाजी अपने को हिन्दुओं से पृथक घोषित करते हैं. यह कितनी विचित्र बात है?
‘‘वास्तविकता यह है कि ‘‘हिन्दू शब्द जातिवाचक नहीं है. वह सम्प्रदाय का भी वाचक नहीं है. अनादि काल से यह समाज अनेक सम्प्रदायों को उत्पन्न करके एक मूल से जीवन ग्रहण कर रहता आया है. उसके द्वारा यहाँ जो समाजस्वरूप निर्माण हुआ वह हिन्दू है. भले ही यहां अलग-अलग राजा हों, राज्य हों, सम्प्रदाय हों, असमानता, भिन्नता हों परन्तु सांस्कृतिक एकता है, एकसूत्र व्यावहारिक जीवन है.’’
सब मतों और धारणाओं की चर्चा करने के बाद, निचोड़ के रूप में श्री गुरुजी कहते हैं, ‘‘अपने राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति का जब हम विचार करते हैं, तो हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति,हिन्दू समाज का संरक्षण करते हुए ही यह हो सकता है. इसका आग्रह यदि छोड़ दिया तो अपने ‘राष्ट्र’ के नाते कुछ भी नहीं बचता. केवल दो पैरों वाले प्राणियों का समूह मात्र बचता है.

‘राष्ट्र’ नाम से अपनी विशिष्ट प्रकृति का जो एक समष्टि रूप प्रकट होता है, उसका आधार हिन्दू ही है. हमें इस आग्रह को तीव्र बनाकर रखना चाहिये. अपने मन में इसके सम्बन्ध में जो व्यक्ति शंका धारण करेगा, उसकी वाणी में शक्ति नहीं रहेगी और उसके कहने का आकर्षण भी लोगों के मन में उत्पन्न नहीं होगा. इसलिये हमें पूर्ण निश्टय के साथ कहना है, कि हाँ, हम हिन्दू हैं. यह हमारा धर्म, संस्कृति, हमारा समाज है और इनसे बना हुआ हमारा राष्ट्र है. इसी के भव्य, दिव्य, स्वतंत्र और समर्थ जीवन को खड़ा करने के लिये ही हमारा जन्म है.’’
स्त्रोत: vskbharat.com
 

राहत शिविर का दौरा करने गए मुख्यमंत्री का पलायन

राहत शिविर का दौरा करने गए मुख्यमंत्री का पलायन





गोलाघाट जिले के उरियामघाट में बीते दिनो में नागा उग्रवादियों द्वारा हत्या और आगजनी की घटनाओं से आतंकित गाँववाले राहत शिविर में रहने को मजबुर होे रहे हैं। एक हफ्ते बाद पीड़ितों की सुध लेने पहुँचे मुख्यमंत्रीश्री तरुण गोगोई को आज लोगों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों के तीखे तेवर और रौद्ररूप देखकर मुख्यमंत्री उस स्थान से पलायन करने को बाध्य हो गए। गुस्सायी भीड़ ने स्थानीय विधायक विस्मिता फुकन तथा असम के आयुक्त की गाड़ियों को क्षति पहुँचाई। हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को लाठी चार्ज, आँसू गैस व हवाई फायरिंग करने पड़े।
वहीं इस घटना को मुख्यमंत्री के सांसद पुत्र श्री गौरव गोगोई ने बाहरी तत्वों की कारस्तानी बताकर विवाद को बढ़ा दिया है। (असमीया प्रतिदिन, 19-08-2-14)

स्त्रोत: http://vskassam.org

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

हिंदुत्व गंगा के प्रवाह के सामान : मनमोहन वैद्य

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य ने यहाँ मंगलवार को कहा कि भारत और हिंदुत्व गंगा के प्रवाह के समान हैं. यमुना सहित अनेक नदियों के प्रवाह को अपने आप में समाहित करते हुए अपना पावित्र्य और सामर्थ्य बनाये रखते हुए वह गंगा ही कहलाती है और सदियों से उसका प्रवाह निरंतर बह रहा है. यही बात रविन्द्रनाथ ठाकुर और एस. राधाकृष्णन ने कही थी और वही बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्ण जयंती महोत्सव के दौरान कही थी कि हिन्दुत्व हमारे राष्ट्र की पहचान है

मालानी गो संवर्धन केंद्र जसोल का भूमि पूजनसंपन्न

मालानी गौ संवर्धन केंद्र का भूमि पूजन संपन्न  

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख माननीय सुरेशचंद्र उध्बोधन देते हुए



मारवाड़ गो ग्राम संवर्धन न्यास के अध्यक्ष घनश्याम ओझा ने न्यास के कार्यों की प्रस्तावना रखते हुए 2009 की विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा की दिशा में एक प्रभावी कदम बताया। 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुखमाननीय सुरेशचंद्र ने पंचगव्य की महत्ता के साथ गो विज्ञान अनुसंधान, जैविक खेती से अच्छी फसलों के उत्पादन, गोमूत्र से असाध्य बीमारियों का इलाज का वर्णन करते हुए इस क्षेत्र में और तेजी से अनुसंधान की आवश्यकता की बात कही। 
माननीय सुरेश चन्द्र ने  पंजाब हरियाणा में कैंसर फैलने का मुख्य कारण यूरिया का अत्यधिक प्रयोग होना बताया। संत प्रतापपुरी ने कामधेनु की विवेचना करते हुए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करते हुए सरकार की मनरेगा जैसी योजनाओं के माध्यम से गोपालकों संबल देने के लिए ग्राम सदन खोलने की कार्य योजना की मांग रखी। कृपारामजी महाराज ने कहा कि हमारे जीवन एवं संस्कृति का आधार गाय माता है। भगवान कृष्ण का गोपालक के रूप में अवतार हुआ। कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर न्यास का यह कार्यक्रम प्रेरणादायी है। अपनी काव्य रचना के द्वारा व्यंग्य करते हुए कहा कि आज घरों में गाय का स्थान नहीं बल्कि कुत्ते का है।

उन्होंने कहा कि गौशाला तो एक विश्राम केंद्र है। गाय का वास्तविक निवास किसान का घर होना चाहिए। संवर्धन केंद्र की ओर से नस्ल सुधार तथा संरक्षण का कार्य किया जाता है। साथ ही उपस्थित जनों से गौ-सेवा का संकल्प करवाया। प्रकल्प प्रमुख शांतिलाल बालड़, रामेश्वर भूतड़ा, मदनलाल चैपड़ा, हरिराम भूतड़ा ईश्वरसिंह जसोल सहित सभी दानदाताओं का प्रकल्प संयोजक भीमाराम माली द्वारा आभार ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम का संचालन मेघाराम सुथार सतीश व्यास ने किया। इस अवसर पर सिवाना विधायक हम्मीरसिंह भायल, बालोतरा नगर परिषद के अध्यक्ष महेश बी चौैहान सहित बालोतरा, जसोल, सिवाना, समदड़ी, पचपदरा, सिणधरी तथा आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में किसान एवं गोभक्त एकत्रित हुए।


साभार:  

शनिवार, 16 अगस्त 2014

भारतीय किसान संघ का अभ्यास वर्ग 21 से भोपाल मेें


भारतीय किसान संघ का अभ्यास वर्ग 21 से भोपाल मेें

जबलपुर ।  भारतीय किसान संघ का अभ्यास वर्ग 21 से 24 अगस्त 2014 तक भोपाल में आयोजित किया जायेगा ।  राष्ट्रीय स्तर के इस वर्ग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहन राव जी भागवत पूरे समय रह कर मार्गदर्शन करेगें ।

  मालूम हो कि भारतीय किसान संघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन है । इस अभ्यास वर्ग में पूरे देश से युवा किसान जिनकी उम्र 35 वर्ष से ज्यादा नहीं होगी भाग लेे सकेंगे ।  युवा किसानों को कृषि संस्कृति और संगठन पर प्रशिक्षण दिया जायेगा । यह वर्ग एग्रीकल्चर विभाग के भदभदा रोड़ भोपाल स्थित किसान प्रशिक्षण केेन्द्र मेें आयोजित होगा ।

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

अखंड भारत संकल्प दिवस - जोधपुर प्रान्त   

अखंड भारत संकल्प दिवस - जोधपुर प्रान्त 








संघ जुटा है आदर्श स्वयंसेवकों के निर्माण में : भय्याजी

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री सुरेश (भय्याजी) जोशी ने कहा है कि संघ कालक्रम में आ गये दोषों के परिमार्जन के साथ जागरूक, संस्कारित, संगठित और सक्रिय हिंदू समाज की रचना के लिये ऐसे आदर्श स्वयंसेवकों को तैयार करने में जुटा है, जिनमें उनके व्यक्तिगत जीवन की शुद्धता प्रकट होती हो और वे शेष समाज का मार्गदर्शन कर सकें.

प्रात: साढ़े सात से नौ बजे बजे तक संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू के निवास पर संघ के विविध क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और अधिकारियों ने रक्षाबंधन का पर्व मनाया. इस अवसर पर संघ कार्यकर्ताओं के सामूहिक चिंतन को अभिव्यक्त करते हुए सरकार्यवाह ने कहा कि संघ का अपना कोई नया विचार नहीं, इस देश का मूलभूत चिंतन ही संघ के सभी कार्यों का आधार है. उन्होंने कहा कि गत कुछ शतकों के दौरान चिंतन की प्रक्रिया का अवसर कुछ कम रहने के कारण समाज में  कुछ कुरीतियां आ गईं. इसीलिये 1974 में तत्कालीन सरसंघचालक परम पूज्य बालासाहब देवरस ने घोषणा की थी कि हमें शुद्ध सात्विक प्रेम के साथ निर्दोष समाज का निर्माण करना है.

सरकार्यवाह ने यह भी स्पष्ट किया कि संघ हिंदू समाज को सभी प्रकार के भेदों से ऊपर उठकर संगठित शक्ति के रूप में खड़ा करना चाहता है. यह न किसी के विरोध में है और न शक्ति प्रदर्शन कर किसी को डराना चाहता है. संघ संस्थापक डा. हेडगेवार को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि हम न किसी से डरते हैं और न किसी को डराते हैं. हमारा इतिहास साक्षी है कि हम अपने देश से बाहर कभी भी शस्त्र लेकर नहीं बल्कि शास्त्र लेकर गये.

भय्याजी ने कहा कि यदि हिन्दू समाज में एक बार फिर श्रद्धा और आत्मविश्वास जगाना है तो मंदिरों को सुरक्षित करना चाहिये. केरल में आज कई तरह से भगवा ध्वज, पताकायें लहराती हुईं  दिखाई देने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि जब वहां पर बाल गोकुलम का समारोह चलता है, तब सारे केरल के लोग चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय के हों, वह चाहे ईसाई हों या मुस्लिम या हिन्दू, वह चाहते हैं कि उनके बच्चे इस यात्रा में सम्मिलित हो जायें.

उन्होंने विविध क्षेत्र के कार्यकर्ताओं से परस्पर सद्भाव बढ़ाकर देश की सेवा में आगे बढ़ने का आह्वान किया. इस आयोजन में वरिष्ठ बीजेपी नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी, श्री नितिन गडकरी, शिक्षा बचाओ आंदोलन के अध्यक्ष श्री दीनानाथ बत्रा, स्वदेशी जागरण मंच के प्रमुख श्री कश्मीरी लाल जी, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य के अलावा लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी सम्मिलित हुईं. यहां पर सभी ने एक-दूसरे को राखी बांधकर एकदूसरे की रक्षा का संकल्प लिया जुटा है .


अखंड भारत के खंडन का इतिहास

अखंड भारत के खंडन का इतिहास


1857 से 1947 के बीच भारत के खंडन से बने 7 नए देश
सम्भवत: ही कोई पुस्तक (ग्रन्थ) होगी जिसमें यह वर्णन मिलता हो कि इन आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान, (म्यांमार), श्रीलंका (सिंहलद्वीप), नेपाल, तिब्बत (त्रिविष्टप), भूटान, पाकिस्तान, मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया। यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह भू-प्रदेश कब, कैसे गुलाम हुए और स्वतन्त्र हुए। प्राय: पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। शेष इतिहास मिलता तो है परन्तु चर्चित नहीं है। सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन है।
- इन्द्रेश कुमार
सम्पूर्ण पृथ्वी का जब जल और थल इन दो तत्वों में वर्गीकरण करते हैं, तब सात द्वीप एवं सात महासमुद्र माने जाते हैं। हम इसमें से प्राचीन नाम जम्बूद्वीप जिसे आज एशिया द्वीप कहते हैं तथा इन्दू सरोवरम् जिसे आज हिन्दू महासागर कहते हैं, के निवासी हैं। इस जम्बूद्वीप (एशिया) के लगभग मध्य में हिमालय पर्वत स्थित है। हिमालय पर्वत में विश्व की सर्वाधिक ऊँची चोटी सागरमाथा, गौरीशंकर हैं, जिसे 1835 में अंग्रेज शासकों ने एवरेस्ट नाम देकर इसकी प्राचीनता व पहचान को बदलने का कूटनीतिक षड्यंत्र रचा।
हम पृथ्वी पर जिस भू-भाग अर्थात् राष्ट्र के निवासी हैं उस भू-भाग का वर्णन अग्नि, वायु एवं विष्णु पुराण में लगभग समानार्थी श्लोक के रूप में है :-
उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारतं नाम, भारती यत्र संतति।।
अर्थात् हिन्द महासागर के उत्तर में तथा हिमालय पर्वत के दक्षिण में जो भू-भाग है उसे भारत कहते हैं और वहां के समाज को भारती या भारतीय के नाम से पहचानते हैं।
वर्तमान में भारत के निवासियों का पिछले सैकडों हजारों वर्षों से हिन्दू नाम भी प्रचलित है और हिन्दुओं के देश को हिन्दुस्तान कहते हैं। विश्व के अनेक देश इसे हिन्द व नागरिक को हिन्दी व हिन्दुस्तानी भी कहते हैं। बृहस्पति आगम में इसके लिए निम्न श्लोक उपलब्ध है :-
हिमालयं समारम्भ्य यावद् इन्दु सरोवरम।
तं देव निर्मित देशं, हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।
अर्थात् हिमालय से लेकर इन्दु (हिन्द) महासागर तक देव पुरुषों द्वारा निर्मित इस भूगोल को हिन्दुस्तान कहते हैं। इन सब बातों से यह निश्चित हो जाता है कि भारतवर्ष और हिन्दुस्तान एक ही देश के नाम हैं तथा भारतीय और हिन्दू एक ही समाज के नाम हैं।
जब हम अपने देश (राष्ट्र) का विचार करते हैं तब अपने समाज में प्रचलित एक परम्परा रही है, जिसमें किसी भी शुभ कार्य पर संकल्प पढ़ा अर्थात् लिया जाता है। संकल्प स्वयं में महत्वपूर्ण संकेत करता है। संकल्प में काल की गणना एवं भूखण्ड का विस्तृत वर्णन करते हुए, संकल्प कर्ता कौन है ? इसकी पहचान अंकित करने की परम्परा है। उसके अनुसार संकल्प में भू-खण्ड की चर्चा करते हुए बोलते (दोहराते) हैं कि जम्बूद्वीपे (एशिया) भरतखण्डे (भारतवर्ष) यही शब्द प्रयोग होता है। सम्पूर्ण साहित्य में हमारे राष्ट्र की सीमाओं का उत्तर में हिमालय व दक्षिण में हिन्द महासागर का वर्णन है, परन्तु पूर्व व पश्चिम का स्पष्ट वर्णन नहीं है। परंतु जब श्लोकों की गहराई में जाएं और भूगोल की पुस्तकों अर्थात् एटलस का अध्ययन करें तभी ध्यान में आ जाता है कि श्लोक में पूर्व व पश्चिम दिशा का वर्णन है। जब विश्व (पृथ्वी) का मानचित्र आँखों के सामने आता है तो पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि विश्व के भूगोल ग्रन्थों के अनुसार हिमालय के मध्य स्थल कैलाश मानसरोवर' से पूर्व की ओर जाएं तो वर्तमान का इण्डोनेशिया और पश्चिम की ओर जाएं तो वर्तमान में ईरान देश अर्थात् आर्यान प्रदेश हिमालय के अंतिम छोर हैं। हिमालय 5000 पर्वत शृंखलाओं तथा 6000 नदियों को अपने भीतर समेटे हुए इसी प्रकार से विश्व के सभी भूगोल ग्रन्थ (एटलस) के अनुसार जब हम श्रीलंका (सिंहलद्वीप अथवा सिलोन) या कन्याकुमारी से पूर्व व पश्चिम की ओर प्रस्थान करेंगे या दृष्टि (नजर) डालेंगे तो हिन्द (इन्दु) महासागर इण्डोनेशिया व आर्यान (ईरान) तक ही है। इन मिलन बिन्दुओं के पश्चात् ही दोनों ओर महासागर का नाम बदलता है।
इस प्रकार से हिमालय, हिन्द महासागर, आर्यान (ईरान) व इण्डोनेशिया के बीच के सम्पूर्ण भू-भाग को आर्यावर्त अथवा भारतवर्ष अथवा हिन्दुस्तान कहा जाता है। प्राचीन भारत की चर्चा अभी तक की, परन्तु जब वर्तमान से 3000 वर्ष पूर्व तक के भारत की चर्चा करते हैं तब यह ध्यान में आता है कि पिछले 2500 वर्ष में जो भी आक्रांत यूनानी (रोमन ग्रीक) यवन, हूण, शक, कुषाण, सिरयन, पुर्तगाली, फेंच, डच, अरब, तुर्क, तातार, मुगल व अंग्रेज आदि आए, इन सबका विश्व के सभी इतिहासकारों ने वर्णन किया। परन्तु सभी पुस्तकों में यह प्राप्त होता है कि आक्रान्ताओं ने भारतवर्ष पर, हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया है। सम्भवत: ही कोई पुस्तक (ग्रन्थ) होगी जिसमें यह वर्णन मिलता हो कि इन आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान, (म्यांमार), श्रीलंका (सिंहलद्वीप), नेपाल, तिब्बत (त्रिविष्टप), भूटान, पाकिस्तान, मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया। यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह भू-प्रदेश कब, कैसे गुलाम हुए और स्वतन्त्र हुए। प्राय: पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। शेष इतिहास मिलता तो है परन्तु चर्चित नहीं है। सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन है। अंग्रेज का 350 वर्ष पूर्व के लगभग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में व्यापारी बनकर भारत आना, फिर धीरे-धीरे शासक बनना और उसके पश्चात् सन 1857 से 1947 तक उनके द्वारा किया गया भारत का 7वां विभाजन है। आगे लेख में सातों विभाजन कब और क्यों किए गए इसका संक्षिप्त वर्णन है।
सन् 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग कि.मी. था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग कि.मी. है। पड़ोसी 9 देशों का क्षेत्रफल 50 लाख वर्ग कि.मी. बनता है।
भारतीयों द्वारा सन् 1857 के अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गए स्वतन्त्रता संग्राम (जिसे अंग्रेज ने गदर या बगावत कहा) से पूर्व एवं पश्चात् के परिदृश्य पर नजर दौडायेंगे तो ध्यान में आएगा कि ई. सन् 1800 अथवा उससे पूर्व के विश्व के देशों की सूची में वर्तमान भारत के चारों ओर जो आज देश माने जाते हैं उस समय देश नहीं थे। इनमें स्वतन्त्र राजसत्ताएं थीं, परन्तु सांस्कृतिक रूप में ये सभी भारतवर्ष के रूप में एक थे और एक-दूसरे के देश में आवागमन (व्यापार, तीर्थ दर्शन, रिश्ते, पर्यटन आदि) पूर्ण रूप से बे-रोकटोक था। इन राज्यों के विद्वान् व लेखकों ने जो भी लिखा वह विदेशी यात्रियों ने लिखा ऐसा नहीं माना जाता है। इन सभी राज्यों की भाषाएं व बोलियों में अधिकांश शब्द संस्कृत के ही हैं। मान्यताएं व परम्पराएं भी समान हैं। खान-पान, भाषा-बोली, वेशभूषा, संगीत-नृत्य, पूजापाठ, पंथ सम्प्रदाय में विविधताएं होते हुए भी एकता के दर्शन होते थे और होते हैं। जैसे-जैसे इनमें से कुछ राज्यों में भारत इतर यानि विदेशी पंथ (मजहब-रिलीजन) आये तब अनेक संकट व सम्भ्रम निर्माण करने के प्रयास हुए।
सन 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम से पूर्व-मार्क्स द्वारा अर्थ प्रधान परन्तु आक्रामक व हिंसक विचार के रूप में मार्क्सवाद जिसे लेनिनवाद, माओवाद, साम्यवाद, कम्यूनिज्म शब्दों से भी पहचाना जाता है, यह अपने पांव अनेक देशों में पसार चुका था। वर्तमान रूस व चीन जो अपने चारों ओर के अनेक छोटे-बडे राज्यों को अपने में समाहित कर चुके थे या कर रहे थे, वे कम्यूनिज्म के सबसे बडे व शक्तिशाली देश पहचाने जाते हैं। ये दोनों रूस और चीन विस्तारवादी, साम्राज्यवादी, मानसिकता वाले ही देश हैं। अंग्रेज का भी उस समय लगभग आधी दुनिया पर राज्य माना जाता था और उसकी साम्राज्यवादी, विस्तारवादी, हिंसक व कुटिलता स्पष्ट रूप से सामने थी।
अफगानिस्तान :- सन् 1834 में प्रकिया प्रारम्भ हुई और 26 मई, 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में निर्णय हुआ और अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट अर्थात् राजनैतिक देश को दोनों ताकतों के बीच स्थापित किया गया। इससे अफगानिस्तान अर्थात् पठान भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम से अलग हो गए तथा दोनों ताकतों ने एक-दूसरे से अपनी रक्षा का मार्ग भी खोज लिया। परंतु इन दोनों पूंजीवादी व मार्क्सवादी ताकतों में अंदरूनी संघर्ष सदैव बना रहा कि अफगानिस्तान पर नियन्त्रण किसका हो ? अफगानिस्तान (उपगणस्तान) शैव व प्रकृति पूजक मत से बौद्ध मतावलम्बी और फिर विदेशी पंथ इस्लाम मतावलम्बी हो चुका था। बादशाह शाहजहाँ, शेरशाह सूरी व महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में उनके राज्य में कंधार (गंधार) आदि का स्पष्ट वर्णन मिलता है।
नेपाल :-मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बडे राज्यों को संगठित कर पृथ्वी नारायण शाह नेपाल नाम से एक राज्य का सुगठन कर चुके थे। स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों ने इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध लडते समय-समय पर शरण ली थी। अंग्रेज ने विचारपूर्वक 1904 में वर्तमान के बिहार स्थित सुगौली नामक स्थान पर उस समय के पहाड़ी राजाओं के नरेश से संधी कर नेपाल को एक स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान कर अपना रेजीडेंट बैठा दिया। इस प्रकार से नेपाल स्वतन्त्र राज्य होने पर भी अंग्रेज के अप्रत्यक्ष अधीन ही था। रेजीडेंट के बिना महाराजा को कुछ भी खरीदने तक की अनुमति नहीं थी। इस कारण राजा-महाराजाओं में जहां आन्तरिक तनाव था, वहीं अंग्रेजी नियन्त्रण से कुछ में घोर बेचैनी भी थी। महाराजा त्रिभुवन सिंह ने 1953 में भारतीय सरकार को निवेदन किया था कि आप नेपाल को अन्य राज्यों की तरह भारत में मिलाएं। परन्तु सन 1955 में रूस द्वारा दो बार वीटो का उपयोग कर यह कहने के बावजूद कि नेपाल तो भारत का ही अंग है, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने पुरजोर वकालत कर नेपाल को स्वतन्त्र देश के रूप में यू.एन.ओ. में मान्यता दिलवाई। आज भी नेपाल व भारतीय एक-दूसरे के देश में विदेशी नहीं हैं और यह भी सत्य है कि नेपाल को वर्तमान भारत के साथ ही सन् 1947 में ही स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। नेपाल 1947 में ही अंग्रेजी रेजीडेंसी से मुक्त हुआ।
भूटान :-सन 1906 में सिक्किम व भूटान जो कि वैदिक-बौद्ध मान्यताओं के मिले-जुले समाज के छोटे भू-भाग थे इन्हें स्वतन्त्रता संग्राम से लगकर अपने प्रत्यक्ष नियन्त्रण से रेजीडेंट के माध्यम से रखकर चीन के विस्तारवाद पर अंग्रेज ने नजर रखना प्रारम्भ किया। ये क्षेत्र(राज्य) भी स्वतन्त्रता सेनानियों एवं समय-समय पर हिन्दुस्तान के उत्तर दक्षिण व पश्चिम के भारतीय सिपाहियों व समाज के नाना प्रकार के विदेशी हमलावरों से युद्धों में पराजित होने पर शरणस्थली के रूप में काम आते थे। दूसरा ज्ञान (सत्य, अहिंसा, करुणा) के उपासक वे क्षेत्र खनिज व वनस्पति की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। तीसरा यहां के जातीय जीवन को धीरे-धीरे मुख्य भारतीय (हिन्दू) धारा से अलग कर मतान्तरित किया जा सकेगा। हम जानते हैं कि सन 1836 में उत्तर भारत में चर्च ने अत्यधिक विस्तार कर नये आयामों की रचना कर डाली थी। सुदूर हिमालयवासियों में ईसाईयत जोर पकड़ रही थी।
तिब्बत :-सन 1914 में तिब्बत को केवल एक पार्टी मानते हुए चीनी साम्राज्यवादी सरकार व भारत के काफी बड़े भू-भाग पर कब्जा जमाए अंग्रेज शासकों के बीच एक समझौता हुआ। भारत और चीन के बीच तिब्बत को एक बफर स्टेट के रूप में मान्यता देते हुए हिमालय को विभाजित करने के लिए मैकमोहन रेखा निर्माण करने का निर्णय हुआ। हिमालय सदैव से ज्ञान-विज्ञान के शोध व चिन्तन का केंद्र रहा है। हिमालय को बांटना और तिब्बत व भारतीय को अलग करना यह षड्यंत्र रचा गया। चीनी और अंग्रेज शासकों ने एक-दूसरों के विस्तारवादी, साम्राज्यवादी मनसूबों को लगाम लगाने के लिए कूटनीतिक खेल खेला। अंग्रेज ईसाईयत हिमालय में कैसे अपने पांव जमायेगी, यह सोच रहा था परन्तु समय ने कुछ ऐसी करवट ली कि प्रथम व द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् अंग्रेज को एशिया और विशेष रूप से भारत छोड़कर जाना पड़ा। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने समय की नाजकता को पहचानने में भूल कर दी और इसी कारण तिब्बत को सन 1949 से 1959 के बीच चीन हड़पने में सफल हो गया। पंचशील समझौते की समाप्ति के साथ ही अक्टूबर सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर हजारों वर्ग कि.मी. अक्साई चीन (लद्दाख यानि जम्मू-कश्मीर) व अरुणाचल आदि को कब्जे में कर लिया। तिब्बत को चीन का भू-भाग मानने का निर्णय पं. नेहरू (तत्कालीन प्रधानमंत्री) की भारी ऐतिहासिक भूल हुई। आज भी तिब्बत को चीन का भू-भाग मानना और चीन पर तिब्बत की निर्वासित सरकार से बात कर मामले को सुलझाने हेतु दबाव न डालना बड़ी कमजोरी व भूल है। नवम्बर 1962 में भारत के दोनों सदनों के संसद सदस्यों ने एकजुट होकर चीन से एक-एक इंच जमीन खाली करवाने का संकल्प लिया। आश्चर्य है भारतीय नेतृत्व (सभी दल) उस संकल्प को शायद भूल ही बैठा है। हिमालय परिवार नाम के आन्दोलन ने उस दिवस को मनाना प्रारम्भ किया है ताकि जनता नेताओं द्वारा लिए गए संकल्प को याद करवाएं।
श्रीलंका व म्यांमार :-अंग्रेज प्रथम महायुद्ध (1914 से 1919) जीतने में सफल तो हुए परन्तु भारतीय सैनिक शक्ति के आधार पर। धीरे-धीरे स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु क्रान्तिकारियों के रूप में भयानक ज्वाला अंग्रेज को भस्म करने लगी थी। सत्याग्रह, स्वदेशी के मार्ग से आम जनता अंग्रेज के कुशासन के विरुद्ध खडी हो रही थी। द्वितीय महायुद्ध के बादल भी मण्डराने लगे थे। सन् 1935 व 1937 में ईसाई ताकतों को लगा कि उन्हें कभी भी भारत व एशिया से बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ सकता है। उनकी अपनी स्थलीय शक्ति मजबूत नहीं है और न ही वे दूर से नभ व थल से वर्चस्व को बना सकते हैं। इसलिए जल मार्ग पर उनका कब्जा होना चाहिए तथा जल के किनारों पर भी उनके हितैषी राज्य होने चाहिए। समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठाने, उसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतन्त्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन 1965 में श्रीलंका व सन 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दी। ये दोनों देश इन्हीं वर्षों को अपना स्वतन्त्रता दिवस मानते हैं। म्यांमार व श्रीलंका का अलग अस्तित्व प्रदान करते ही मतान्तरण का पूरा ताना-बाना जो पहले तैयार था उसे अधिक विस्तार व सुदृढ़ता भी इन देशों में प्रदान की गई। ये दोनों देश वैदिक, बौद्ध धार्मिक परम्पराओं को मानने वाले हैं। म्यांमार के अनेक स्थान विशेष रूप से रंगून का अंग्रेज द्वारा देशभक्त भारतीयों को कालेपानी की सजा देने के लिए जेल के रूप में भी उपयोग होता रहा है।
पाकिस्तान, बांग्लादेश व मालद्वीप :-1905 का लॉर्ड कर्जन का बंग-भंग का खेल 1911 में बुरी तरह से विफल हो गया। परन्तु इस हिन्दु मुस्लिम एकता को तोड़ने हेतु अंग्रेज ने आगा खां के नेतृत्व में सन 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना कर मुस्लिम कौम का बीज बोया। पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश जनजातीय जीवन को ईसाई के रूप में मतान्तरित किया जा रहा था। ईसाई बने भारतीयों को स्वतन्त्रता संग्राम से पूर्णत: अलग रखा गया। पूरे भारत में एक भी ईसाई सम्मेलन में स्वतन्त्रता के पक्ष में प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। दूसरी ओर मुसलमान तुम एक अलग कौम हो, का बीज बोते हुए सन् 1940 में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग खड़ी कर देश को नफरत की आग में झोंक दिया। अंग्रेजीयत के दो एजेण्ट क्रमश: पं. नेहरू व मो. अली जिन्ना दोनों ही घोर महत्वाकांक्षी व जिद्दी (कट्टर) स्वभाव के थे। अंग्रेजों ने इन दोनों का उपयोग गुलाम भारत के विभाजन हेतु किया। द्वितीय महायुद्ध में अंग्रेज बुरी तरह से आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से इंग्लैण्ड में तथा अन्य देशों में टूट चुके थे। उन्हें लगता था कि अब वापस जाना ही पड़ेगा और अंग्रेजी साम्राज्य में कभी न अस्त होने वाला सूर्य अब अस्त भी हुआ करेगा। सम्पूर्ण भारत देशभक्ति के स्वरों के साथ सड़क पर आ चुका था। संघ, सुभाष, सेना व समाज सब अपने-अपने ढंग से स्वतन्त्रता की अलख जगा रहे थे। सन 1948 तक प्रतीक्षा न करते हुए 3 जून, 1947 को अंग्रेज अधीन भारत के विभाजन व स्वतन्त्रता की घोषणा औपचारिक रूप से कर दी गयी। यहां यह बात ध्यान में रखने वाली है कि उस समय भी भारत की 562 ऐसी छोटी-बड़ी रियासतें (राज्य) थीं, जो अंग्रेज के अधीन नहीं थीं। इनमें से सात ने आज के पाकिस्तान में तथा 555 ने जम्मू-कश्मीर सहित आज के भारत में विलय किया। भयानक रक्तपात व जनसंख्या की अदला-बदली के बीच 14, 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में पश्चिम एवं पूर्व पाकिस्तान बनाकर अंग्रेज ने भारत का 7वां विभाजन कर डाला। आज ये दो भाग पाकिस्तान व बांग्लादेश के नाम से जाने जाते हैं। भारत के दक्षिण में सुदूर समुद्र में मालद्वीप (छोटे-छोटे टापुओं का समूह) सन 1947 में स्वतन्त्र देश बन गया, जिसकी चर्चा व जानकारी होना अत्यन्त महत्वपूर्ण व उपयोगी है। यह बिना किसी आन्दोलन व मांग के हुआ है।
भारत का वर्तमान परिदृश्य :-सन 1947 के पश्चात् फेंच के कब्जे से पाण्डिचेरी, पुर्तगीज के कब्जे से गोवा देव- दमन तथा अमेरिका के कब्जें में जाते हुए सिक्किम को मुक्त करवाया है। आज पाकिस्तान में पख्तून, बलूच, सिंधी, बाल्टीस्थानी (गिलगित मिलाकर), कश्मीरी मुजफ्फरावादी व मुहाजिर नाम से इस्लामाबाद (लाहौर) से आजादी के आन्दोलन चल रहे हैं। पाकिस्तान की 60 प्रतिशत से अधिक जमीन तथा 30 प्रतिशत से अधिक जनता पाकिस्तान से ही आजादी चाहती है। बांग्लादेश में बढ़ती जनसंख्या का विस्फोट, चटग्राम आजादी आन्दोलन उसे जर्जर कर रहा है। शिया-सुन्नी फसाद, अहमदिया व वोहरा (खोजा-मल्कि) पर होते जुल्म मजहबी टकराव को बोल रहे हैं। हिन्दुओं की सुरक्षा तो खतरे में ही है। विश्वभर का एक भी मुस्लिम देश इन दोनों देशों के मुसलमानों से थोडी भी सहानुभूति नहीं रखता। अगर सहानुभूति होती तो क्या इन देशों के 3 करोड़ से अधिक मुस्लिम (विशेष रूप से बांग्लादेशीय) दर-दर भटकते। ये मुस्लिम देश अपने किसी भी सम्मेलन में इनकी मदद हेतु आपस में कुछ-कुछ लाख बांटकर सम्मानपूर्वक बसा सकने का निर्णय ले सकते थे। परन्तु कोई भी मुस्लिम देश आजतक बांग्लादेशी मुसलमान की मदद में आगे नहीं आया। इन घुसपैठियों के कारण भारतीय मुसलमान अधिकाधिक गरीब व पिछड़ते जा रहा है क्योंकि इनके विकास की योजनाओं पर खर्च होने वाले धन व नौकरियों पर ही तो घुसपैठियों का कब्जा होता जा रहा है। मानवतावादी वेष को धारण कराने वाले देशों में से भी कोई आगे नहीं आया कि इन घुसपैठियों यानि दरबदर होते नागरिकों को अपने यहां बसाता या अन्य किसी प्रकार की सहायता देता। इन दर-बदर होते नागरिकों के आई.एस.आई. के एजेण्ट बनकर काम करने के कारण ही भारत के करोडों मुस्लिमों को भी सन्देह के घेरे में खड़ा कर दिया है। आतंकवाद व माओवाद लगभग 200 समूहों के रूप में भारत व भारतीयों को डस रहे हैं। लाखों उजड़ चुके हैं, हजारों विकलांग हैं और हजारों ही मारे जा चुके हैं। विदेशी ताकतें हथियार, प्रशिक्षण व जेहादी, मानसिकता देकर उन प्रदेश के लोगों के द्वारा वहां के ही लोगों को मरवा कर उन्हीं प्रदेशों को बर्बाद करवा रही हैं। इस विदेशी षड्यन्त्र को भी समझना आवश्यक है। 

सांस्कृतिक व आर्थिक समूह की रचना आवश्य :-आवश्यकता है वर्तमान भारत व पड़ोसी भारतखण्डी देशों को एकजुट होकर शक्तिशाली बन खुशहाली अर्थात विकास के मार्ग में चलने की। इसलिए अंग्रेज अर्थात् ईसाईयत द्वारा रचे गये षड्यन्त्र को ये सभी देश (राज्य) समझें और साझा व्यापार व एक करन्सी निर्माण कर नए होते इस क्षेत्र के युग का सूत्रपात करें। इन देशों 10 का समूह बनाने से प्रत्येक देश का भय का वातावरण समाप्त हो जायेगा तथा प्रत्येक देश का प्रतिवर्ष के सैंकड़ों-हजारों-करोड़ों रुपये रक्षा व्यय के रूप में बचेंगे जो कि विकास पर खर्च किए जा सकेंगे। इससे सभी सुरक्षित रहेंगे व विकसित होंगे।
- लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य हैं।
वाराणसी 
स्त्रोत:http://hn.newsbharati.com

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित