मंगलवार, 21 जुलाई 2009

मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते तस्कर

जोधपुर. पश्चिमी राजस्थान में बीते पांच साल में मादक पदार्र्थो की तस्करी में लिप्त 62 फीसदी आरोपी बरी हो गए। जोधपुर स्थित एनडीपीएस मामलात की विशेष अदालत से ज्यादातर आरोपी संदेह का लाभ पाकर कोर्ट से छूटे। यही वजह है कि नशीले पदार्र्थो के कारोबार पर अंकुश लगाने और अपराधियों को सजा दिलाने की सरकारी मुहिम का नतीजा सिफर है।

जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, जालोर व पाली जिले में स्थित 130 से ज्यादा पुलिस थानों व नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो पर क्षेत्राधिकार रखने वाली इस विशेष अदालत में पिछले पांच साल में 235 फैसले हुए, इनमें से मात्र 91 मामलों में ही सजा हो पाई। इनमें अफीम, डोडा पोस्त, हेरोइन, चरस व स्मैक जैसे नशीले पदार्र्थो की तस्करी के मामले शामिल थे। जोधपुर स्थित नारकोटिक्स की विशेष अदालत में वर्ष 2005 में 68 प्रतिशत, 2006 में 53 प्रतिशत, 2007 में 77 प्रतिशत, 2008 में 60 प्रतिशत और 2009 में 53 प्रतिशत आरोपी पुलिस के गैर जिम्मेदाराना अनुसंधान व लचर अभियोजन के चलते बरी हुए।

सरकार भी जिम्मेदार
एनडीपीएस मामलात की विशेष अदालत में नशीले पदार्थ की तस्करी के गंभीर मामलों का विचारण होता है। इसके बावजूद अदालत में आरपीएससी से चयनित नियमित काडर के सहायक निदेशक अभियोजन स्तर के अधिकारी को सरकारी वकील के रूप में नहीं लगाया जाता। इसके विपरीत इन मामलों में सरकारी पैरोकारी के लिए सरकार चहेते वकीलों में से ही अस्थायी तौर पर नियुक्ति करती है।

यह वकील नई सरकार बनने के साथ आते हैं व सरकार के प्रसाद पर्यन्त तक बने रहते हैं। इन पर अभियोजन विभाग का कोई नियंत्रण नहीं होता है और न ही इनकी कोई एसीआर लिखी जाती है, यानी अभियोजन विभाग के प्रति इनकी कोई जवाबदेही नहीं है। इसके चलते जब पुलिस, आरोपी के खिलाफ चालान पेश करती है तब चार्जशीट में रही कमियों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता और न ही विचारण के दौरान ज्यादा गंभीरता दिखाई जाती है। लिहाजा सजा की दर में गिरावट आती रहती है।

गवाहों के पक्षद्रोही हो जाने और कई बार पुलिस अनुसंधान में कमियां रह जाने से आरोपियों को संदेह का लाभ मिल जाता है। इससे सजा की दर में गिरावट आ जाती है।

- थानाराम विश्नोई, विशिष्ट लोक अभियोजक, एनडीपीएस मामलात अदालt


विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित