मंगलवार, 22 नवंबर 2011

महाराणा प्रताप की 57 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित होगी, एक अरब आएगा खर्च


प्रताप गौरव केन्द्र के लिए सहायता की अपील

जोधपुर. राष्ट्रीय स्मारक प्रताप गौरव केन्द्र उदयपुर के निर्माण में जोधपुर के भामाशाहों एवं शहरवासियों का सहयोग लिया जाएगा। उदयपुर के टाइगर हिल की 25 बीघा जमीन पर मेवाड़ के इतिहास की जीवंत जानकारी देने वाले प्रकल्प के लिए तीन करोड़ खर्च हो चुके हैं। यह जानकारी सोमवार को आयोजित प्रेसवार्ता में शहर विधायक कैलाश भंसाली ने दी।

भंसाली ने बताया कि वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति उदयपुर की ओर से गौरवशाली प्रकल्प निर्माण में सौ करोड़ लागत की संभावना है। जोधपुर महानगर में भामाशाहों से सम्पर्क करने के लिए 12 विशेष टीमों का गठन किया गया है। महानगर को 12 क्षेत्रों में बांटकर प्रत्येक क्षेत्र में सौ-सौ टोलियां घर-घर जाकर प्रकल्प निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग की अपील करेगी।

यह है केन्द्र की खासियत : 25 बीघा भूमि पर वर्ष 2008 से प्रताप गौरव केन्द्र नामक राष्ट्रीय स्मारक का निर्माण कराया जा रहा है, जिसमें अब तक तीन करोड़ रूपए खर्च हो चुके हैं। इसमें महाराणा प्रताप की गन मेटल की 57 फीट ऊंची मूर्ति, 500 चित्रों की भव्य प्रदर्शनी, 20 लाइव मेकेनिकल मॉडल (जो विविध घटनाओं को जीवंत करेंगे), शस्त्रागार, राष्ट्रीय गौरव दीर्घा, भक्तिधाम, भारत माता मंदिर, शोध केन्द्र तथा मेवाड़ गौरव फिल्म मुख्य आकर्षण रहेंगे। मेवाड़ के इतिहास के प्रेरक प्रसंगों व चरित्र नायकों पन्नाधाय, हाड़ीरानी, कुम्भा, सांगा, महाराणा प्रताप, राजसिंह, भामाशाह व पूंजा भील सहित 300 बिन्दुओं पर केन्द्रित चित्रों की भव्य प्रदर्शनी लगाई जाएगी। इस मौके पर समिति के सह संयोजक घनश्याम ओझा, मेघराज लोहिया, गजेन्द्र सिंह शेखावत, महेन्द्र दवे मौजूद थे।

स्त्रोत: :http://www.rajasthanpatrika.com/news/jodhpur/11222011/jodhpur-news/250435


साभार : दैनिक नवज्योति, जोधपुर

उदयपुर में बनेगा प्रताप गौरव केंद्र

महाराणा प्रताप की 57 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित होगी, एक अरब आएगा खर्च

जोधपुर मेवाड़ के इतिहास की गौरवपूर्ण विरासत से वर्तमान पीढ़ी को परिचित कराने के लिए उदयपुर में नीमच माता मंदिर के पीछे टाइगर हिल्स पर 25 बीघा जमीन पर 100 करोड़ की लागत से प्रताप गौरव केंद्र की स्थापना की जाएगी। यहां पर महाराणा प्रताप की 57 फीट ऊंची प्रतिमा लगेगी।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के जोधपुर महानगर संयोजक व विधायक कैलाश भंसाली ने सोमवार को पत्रकार वार्ता में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रताप केंद्र से जोधपुर की जनता जोडऩे के लिए विस्तृत योजना तैयार की गई हैं। इसके लिए विभिन्न स्तरों पर 100 से ज्यादा टोलियों का गठन किया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित सभी शाखाओं के स्वयंसेवकों ने घर- घर जन जागरण का कार्य शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि जोधपुर व बीकानेर से प्रताप गौरव केंद्र के निर्माण के लिए 35 करोड़ रुपए एकत्रित करने का लक्ष्य रखा गया है। निर्माण केंद्र पर अब तक 3 करोड़ के कार्य पूरे करवाए जा चुके हैं। समिति के प्रवक्ता महेंद्र दवे ने बताया कि जोधपुर जिले को 12 क्षेत्रों में बांटने के साथ योजनाबद्ध तरीके से कार्य प्रारंभ किया गया है।

दर्शनीय केंद्रों का निर्माण भी होगा

दवे ने बताया कि स्मारक में दो सौ लोगों के बैठने लायक समता का फिल्म थियेटर, मेवाड़ का इतिहास बताने वाली तीन सौ चित्रों की प्रदर्शनी, शस्त्रागार केंद्र, राष्ट्रीय गौरव दीर्घा, वनवासी गौरव दीर्घा, मेवाड़ कला दीर्घा, मेवाड़ दर्शन के लिए लघु प्रतिमाएं स्थापित होंगी, संस्कृति विहार, भक्ति धाम, मेवाड़ शोध केंद्र, भारत माता मंदिर, रोप वे, प्रताप जलाशय के साथ किड्स गार्डन सहित अन्य निर्माण कार्य होंगे।

स्त्रोत: http://epaper.bhaskar.com/Details.aspx?id=121015&boxid=112233338265

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

पूनमनगर में सीमा सुरक्षा सम्मेलन 23 को

पूनमनगर में सीमा सुरक्षा सम्मेलन 23 को
रामगढ़ सीमा क्षेत्र के नागरिकों को सीमा सुरक्षा के प्रति जागरूक व सतर्क करने के लिए विराट सीमा सुरक्षा सम्मेलन का आयोजन 23 नवंबर को शहीद पूनम सिंह भाटी की जन्म स्थली पूनमनगर में किया जाएगा। सीमा जन कल्याण समिति रामगढ़ तहसील के अध्यक्ष केप्टन देरावरसिंह सेऊवा ने बताया कि सीमा सुरक्षा चेतना रथ यात्रा 15 नवंबर को नारायण सरोवर (गुजरात) से प्रारंभ होकर 23 नवंबर को पूनमनगर पहुंचेगी।

इस सम्मेलन में सेवानिवृत्त लेफ्टिनेट जनरल दौलतसिंह शेखावत, सेवानिवृत्त कर्नल रघुवीरसिंह हाड़ा, अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री पूर्व सैनिक सेवा परिषद विजय कुमार का मार्ग दर्शन मिलेगा तथा संत शिवसुखनाथ, संत ब्रह्मपुरी, संत निरंजन भारती, संत दीपक साहेब, संत सांवलाराम भी शिरकत करेंगे। कार्यक्रम में प्रात: 9 बजे गायत्री परिवार की ओर से यज्ञ का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान भारत के पश्चिमी सीमा क्षेत्र के समस्त तीर्थ स्थलों का पवित्र जल व पावन मिट्टी का वितरण किया जाएगा तथा देशनोक के करणी माता मंदिर में अभिमंत्रित किया हुआ एक विशेष रक्षा सूत्र सीमा क्षेत्र के नागरिकों को बांधकर उन्हें सीमा सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने के लिए संत शक्ति व सैन्य शक्ति द्वारा संकल्प दिलवाया जाएगा। क्षेत्र के अधिक से अधिक नागरिकों को इस सम्मेलन में पहुंचने की अपील की गई हैं।






प्रताप गौरव केंद्र से बढ़ेगा गौरव: मनोहर


पचपदरा .वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति उदयपुर की ओर से प्रताप गौरव केंद्र के रूप में स्मारक का निर्माण कराना प्रत्येक भारतवासी के लिए गौरव की बात है। यह बात सोमवार को प्रताप गौरव केंद्र की पचपदरा तहसील के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए श्याम मनोहर ने कही।

उन्होंने कहा कि विश्व के इतिहास में मेवाड़ का प्रेरणा देने वाला इतिहास रहा है। इस विरासत को चिर स्थाई बनाने के लिए उदयपुर के निकट 25 बीघा जमीन पर 2008 से निर्माण कार्य शुरू किया गया है। इस काम और राष्ट्रीय यज्ञ में भागीदारी के उद्देश्य से प्रत्येक जिले, तहसील व नगर में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति का निर्माण किया जा रहा है। तहसील समिति संयोजक भूपत चौपड़ा ने कहा कि आज हमारे देश की विडंबना है कि यहां पर भ्रष्ट नेताओं की मूर्तियां खड़ी हो रही है। ऐसे समय में देश की अस्मिता को बचाने वाले महाराणा प्रताप के स्मारक का निर्माण कराया जाना गौरव की बात है। उन्होंने बताया कि तहसील में समिति का निर्माण किया जा रहा है जिसमें अलग-अलग गांवों से सभी वर्ग, जाति व संप्रदाय के लोगों से स्वीकृतियां प्राप्त की जा रही है। बैठक में उपस्थित सभी कार्यकर्ताओं को प्रताप गौरव केंद्र के फोल्डर, चित्र व अन्य प्रचार सामग्री का वितरण किया गया।

ऐसे बनेगा गौरव केंद्र

पचपदरा तहसील समिति के कोष प्रमुख जितेंद्र लूकड़ ने बताया कि महाराणा प्रताप की 57 फीट ऊंची प्रतिमा के लिए 5 करोड़, चारदीवारी के लिए 10 करोड़, राष्ट्रीय गौरव दीर्घा के लिए 2 करोड़, प्रताप जलाशय के लिए 1 करोड़, मंदिर के लिए 50 लाख, 9 अन्य मंदिरों के लिए 25-25 लाख, महापुरुषों की छतरियों के लिए 10-10 लाख, संस्कृति प्रसार रथ के लिए 20-20 लाख के खर्च का अनुमान है।

प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचेंगे कार्यकर्ता

क्षेत्र में सभी 92 गांवों में प्रत्येक व्यक्ति तक समिति के कार्यकर्ताओं के पहुंचने की योजना बनाई गई है। पचपदरा खंड में नरेंद्र व्यास, परेऊ खंड में श्याम खारवाल, पाटोदी खंड में शिवराज सैन व बागावास खंड में सतीश खारवाल को प्रमुख बनाया गया है।
लक्षित हिंसा कानून के विरोध में ज्ञापन भेजा
देसूरी भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने सोमवार को एसडीएम कार्यालय में राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन देकर भारत सरकार द्वारा संसद के आगामी सत्र में लाए जाने वाले सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा कानून 2011 का विरोध किया

संघ के बाली संगठन जिलाध्यक्ष रामप्रसाद बोहरा के नेतृत्व में राष्ट्रपति को भेजे गए ज्ञापन में बताया गया है कि यह कानून बहुसंख्यक हिंदु समाज, हिंदु संगठनों, हिंदु नेताओं एवं किसानों को कुचलने एवं अल्पसंख्यक तुष्टीकरण कर कांग्रेस द्वारा अपना वोट बैंक मजबूत करने की घिनौनी साजिश है।

इससे सांप्रदायिक हिंसा करने वालों को संरक्षण मिलेगा एवं हिंसा के शिकार होने वाले हिंदु समाज एवं इस हिंसा के विरोध में आवाज उठाने वाले हिंदु संगठनों का दमन होगा।यह कानून न केवल संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत होगा, बल्कि राज्य सरकारों के कार्यों में हस्तक्षेप कर देश के संघीय ढांचे को ध्वस्त कर देगा।

उन्होंने इस कानून को पारित नहीं करने की मांग की। इस अवसर पर जिला उपाध्यक्ष कूपाराम चौधरी, हकाराम जाट, रामसिंह आदि उपस्थित थे।


सादड़ी। केंद्र सरकार द्वारा आगामी शीतकालीन सत्र में लाए जाने वाले सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा अधिनियम को हिंदु विरोधी बताते हुए स्थानीय प्रबुद्ध संगठनों ने मारवाड़ विचार मंच के तत्वावधान में पालिका के ईओ को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। मारवाड़ विचार मंच के संयोजक मोहनलाल ने बताया कि मारवाड़ विचार मंच के तत्वावधान में विश्व हिंदु परिषद, बजरंग दल, सेवाभारती, किसान संघ, राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, अरावली क्षेत्रीय रांकावत समाज, माली समाज गोडवाड़ युवा संघ, गुरु ब्राह्मण जागृति मंच के कार्यकत्र्ता नगरपालिका पहुंचे। वहां पालिका अध्यक्ष दिलीप सोनी व पूर्व पालिका उपाध्यक्ष सुरेश पुरी गोस्वामी के नेतृत्व में अधिशासी अधिकारी को ज्ञापन दिया।
स्त्रोत: http://epaper.bhaskar.com/Details.aspx?id=118748&boxid=१११५१५९४२८४३

वो महाराणा प्रताप कठै...

पाली. वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति की ओर से सोमवार रात सूरजपोल पर आयोजित एक शाम महाराणा प्रताप के नाम भजन संध्या में श्रोता देर रात तक भजनों की सरिता में डूबते-उतराते रहे। रमेश माली के गणपति और गुरु वंदना करने के साथ भजन संध्या में कलाकारों ने एक के बाद एक शानदार भजनों से मेवाड़ के गौरवपूर्ण इतिहास की गाथा सुनाई। भजन संध्या के सफर में माली के ‘म्हारा महाराणा प्रताप सरकार’ की प्रस्तुति के बाद महेन्द्रसिंह राठौड़ ने ‘मैं तो अरज करा गुरु थानै’ भजन से गुरु चरणों में वंदन किया। ‘धरती धोरां री’ भजन के माध्यम से राजस्थान के धरती का बखान किया। इसके बाद मोइनुद्दीन मनचला के मच पर आते ही श्रोताओं ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया। उनके ‘वो महाराणा प्रताप कठै’ व ‘अरे घास री रोटी’ भजन पर श्रोता झूमने पर मजबूर हो गए। श्रोताओं की मांग के कारण उन्हें इन भजनों की पंक्तियां वापस गाकर सुनानी पड़ी।

पुस्तक का विमोचन
भजन संध्या के दौरान मुख्य अतिथि एसपी अजयपाल लांबा, विधायक ज्ञानचंद पारख, एएसपी प्रसन्न कुमार खमेसरा, सुरेश माथुर, नेमीचंद अखावत आदि ने पुस्तकों व कूपन का विमोचन किया। समिति के कमल गोयल, परमेश्वर जोशी,अनिल भंडारी व हीरामोती वैष्णव आदि ने अतिथियों का माला पहनाकर व श्रीफल प्रदान कर स्वागत किया।

स्त्रोत:http://epaper.bhaskar.com/Details.aspx?id=118749&boxid=१११५१५९४६७५०

बुधवार, 9 नवंबर 2011

जनमानस के प्रेरणा स्त्रोत हैं महाराणा प्रताप



बालोतरा। राजस्थान की आन, बान, शान के प्रतीक महाराणा प्रताप ने अपना सम्पूर्ण जीवन देश व समाज के स्वाभिमान की रक्षा के लिए समर्पित किया। देश की सरकारों ने उनकी स्मृतियों को चिर स्थाई बनाए रखने के लिए कुछ भी नहीं किया। आमजन द्वारा एकत्रित धन एकत्रित से प्रताप की कर्म स्थली उदयपुर में ताजमहल व अक्षरधाम से भी भव्य प्रताप गौरव केन्द्र का निर्माण करवाया जाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जोधपुर प्रांत प्रचारक मुरलीधर ने सोमवार को संघ कार्यालय में आयोजित बैठक में यह बात कही।

उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप वीर पुरूष थे, उन्होंने कई कष्ट सहते हुए धर्म, देश व समाज की सेवा की। वे आज भी जनमानस के प्रेरणा स्त्रोत हैं, लेकिन उनकी यादों को चिर स्थाई बनाए रखने के लिए किसी भी सरकार ने कोई कार्य नहीं किया। भविष्य की नई पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा मिलती रहे, इसे लेकर उदयपुर में प्रताप गौरव केन्द्र का भव्य निर्माण करवाया जाएगा। भामाशाह बनकर इस निर्माण कार्य में अपना आर्थिक सहयोग करें। उन्होंने कहा कि 30 नवम्बर से शुरू करने वाले धन संग्रह अभियान में बढ़-चढ़ कर भाग लें, स्वयं सेवक टोलियां बनाकर अधिकाधिक धन संग्रहित करें।

उन्होंने कहा कि देश की सीमा पर दुश्मन राष्ट्र पाकिस्तान के साथ चीन युद्धाभ्यास कर रहा हैं। किसी भी स्थिति के लिए सावधान रहें। बैठक की अध्यक्षता धन संग्रह अभियान के जिला संग्रह संयोजक सुरंगीलाल सालेचा ने की। बैठक में बालोतरा, सिवाना, जसोल, पचपदरा, समदड़ी, गुड़ामालानी क्षेत्र के प्रमुख कार्यकर्ताओ ने भाग लिया।
स्त्रोत: http://www.patrika.com/news.aspx?id=710723

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

प्रताप गौरव के लिए जुटाएंगे सहयोग राशी - मुरलीधर


साभार : दैनिक भास्कर

क्या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? - श्री अश्वनी कुमार , पंजाब केसरी



श्री अश्वनी कुमार जी, पंजाब केसरी
सम्पादकीय
(दिनांक , तथा नवम्बर के अंको के )

भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ का काफी दुरुपयोग होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में चार विवाह की छूट एवं तलाक लेने की सरल प्रक्रिया के कारण मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव एवं अत्याचार तो होते ही हैं, अन्य धर्मों के लोग भी दूसरी शादी के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेते हैं। भारत में अल्पसंख्यको को अनेक प्रकार की सुविधाएं दी जाती हैं। अल्पसंख्यको को अपने धार्मिक शिक्षण संस्थान चलाने की छूट है और सरकार इन शिक्षण संस्थानों को करोड़ों रुपए का अनुदान भी देती है।

बदलती दुनिया और महिला अधिकारिता के प्रति जन जागृति आने के बाद कई मुस्लिम देशों ने अपने कानूनों में सुधार किया है। सीरिया, मिस्र, तुर्की, मोरक्को और ईरान में भी एक से अधिक विवाह प्रतिबंधित हैं। ईरान, दक्षिण यमन और कई देशों में मुस्लिम कानूनों में सुधार किया गया। हाल ही में सऊदी अरब के शासकों ने महिलाओं को वोट डालने का अधिकार दिया है और सऊदी शासक महिलाओं को उनके अधिकार देने के लिए भारतीय व्यवस्था का अध्ययन कर रहे हैं। पाकिस्तान ने भी १९६१ में दूसरे विवाह पर रोक लगाते हुए एक सरकारी कौंसिल की स्थापना की थी तथा दूसरी शादी के इच्छुक व्यक्ति को उचित कारण बताकर अनुमति लेना जरूरी बना दिया था। भारत में कई मौके आए जब अदालतों ने शरीयत कानून के विरुद्ध निर्णय दिया, परन्तु भारत के राजनीतिज्ञों ने वोट बैंक के लालच में अदालतों के फैसलों की अवमानना की।

मैं यहां कुछ प्रकरणों का उल्लेख करना चाहूंगा।

मोहम्मद अदमद खान बनाम शाहबानो बेगम और अन्य (ए.आई.आर. १९८५ एस.सी. ९४५) के प्रकरण में सन् १९८५ में शाहबानो नाम की मुस्लिम महिला अपने पति द्वारा तलाक दिए जाने पर न्यायालय में गई। उच्चतम न्यायालय ने उसके पक्ष में निर्णय सुनाते हुए उसके पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश देते हुए यह सुझाव दिया कि मुस्लिम समुदाय को पर्सनल लॉ में सुधार के लिए आगे आना चाहिए। एक 'समान नागरिक संहिता असमानता को मिटाकर राष्ट्रीय एकता के लिए सहायक होगी परन्तु १९८६ में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने संसद में विधेयक लाकर उच्चतम न्यायालय के निर्णय को ही पलट दिया और तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के लिए सरकारी धन देने की व्यवस्था कुछ विशेष परिस्थितियों में की गई तथा पति को सभी प्रकार के उतरदायित्व से मुक्त कर दिया गया।

दूसार प्रकरण श्रीमती जोर्डेन डेंगडेह बनाम श्री एस.एस. चोपड़ा (ए.आई.आर. १९८५ एस.सी. ९३५) का है। विदेश सेवा में कार्यरत इस ईसाई महिला ने क्रिश्चियन विवाह कानून १९७२ के अन्तर्गत एक सिख पुरुष से विवाह किया था। १९८० में अपने साथ की जा रही क्रूरता के आधार पर उसने तलाक की मांग की, परन्तु उसके तलाक की प्रार्थना स्वीकार नहीं की गई, तो उसने उच्चतम न्यायालय में पति के शारीरिक रूप से अक्षम होने के आधार पर तलाक की मांग की। उच्चतम न्यायालय ने इस विवाद पर निर्णय सुनाते हुए भारत के विधि एवं न्याय मंत्रालय को स्पष्ट रूप से दिशा-निर्देश जारी किया कि विवाह अधिनियम में पूर्णत: सुधार होना चाहिए तथा जाति एवं धर्म की परवाह न करते हुए एक समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए। यह भी कहा गया कि न्यायालय शीघ्र एवं अनिवार्य रूप से समान नागरिक संहिता की आवश्यकता अनुभव करता है। बाकी दो मु2य प्रकरणों का उल्लेख मैं कल के सम्पादकीय में करूंगा।

भारत में सरकारें बदलती रहीं। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गठबंधन होते रहे, सरकारें बनती रहीं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद देश में ही नहीं देश के बाहर भी यह संदेश भेजने की प्रक्रिया का सूत्रपात किया गया कि अटल जी की सरकार एक सांप्रदायिक किस्म की सरकार थी, अब यहां धर्मनिरपेक्ष सरकार का वर्चस्व हो चुका है। धर्मनिरपेक्षता क्या है इसकी कानूनी या संवैधानिक व्याख्या आज तक नहीं हो सकी। कानून का नया विद्यार्थी भी जब भारत में संविधान की ओर एक विहंगम दृष्टि डालता है तो पाता है कि संवैधानिक दृष्टिकोण से भारत में १९७६ से पूर्व धर्मनिरपेक्षता नहीं थी। भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्व या अधिकारों से सर्वधर्म समभाव झलकता था कि नहीं, मैं इस बहस में नहीं पडऩा चाहता पर यह शब्द धर्मनिरपेक्ष ४२वें संशोधन के बाद प्राक्कथन में आया।

मैं आगे बढऩे से पहले दो और प्रमाणों को पेश करना चाहूंगा। एक और प्रकरण शायरा बानो नाम की मुस्लिम महिला का है, जिसने अपने एवं अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा १९८७ (ए.आई.आर. १९८७ एस.सी. ११०७) में खटखटाया। न्यायालय ने शाहबानो बेगम के केस का उदाहरण देते हुए भरण-पोषण का आदेश दिया।एक और मामला ११ मई, १९९५ में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय का है। एक हिन्दू महिला जिसके पति ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर दूसरी शादी कर ली थी, की याचिका पर निर्णय सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि हिन्दू कानून के अनुसार धर्मांतरण के पश्चात् पूर्व शादी समाप्त नहीं होती तथा पुनर्विवाह धारा ४९४ के अनुसार दंडनीय है। विवाह, तलाक और पंथ यह स्वभाव और बहुत कुछ आस्था और विश्वास का विषय है, सुविधा का विषय नहीं है।

एक हिन्दू कलमा पढ़कर मुसलमान बन जाता है या एक मुसलमान मंत्र पढ़कर हिन्दू बन जाता है। यह भरोसा, विश्वास और आस्था एवं तर्क का विषय है। किसी के द्वारा पंथ का घटिया दुरुपयोग तुरन्त रोका जाना चाहिए, मतान्तरण सुविधा के लिए नहीं होना चाहिए। यह बहुत ग6भीर, सामाजिक, राजनीतिक अपराध है। न्यायाधीशों ने कहा कि समान नागरिक संहिता उत्पीडि़त लोगों की सुरक्षा तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता दोनों के लिए अत्यावश्यक है। न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि जिन लोगों ने विभाजन के पश्चात् भारत में रहना स्वीकार किया, उन्हें स्पष्ट रूप से यह जान लेना चाहिए कि भारतीय नेताओं का विश्वास दो राष्ट्र या तीन राष्ट्र के सिद्धांत में नहीं था और भारतीय गणतंत्र में मात्र केवल एक राष्ट्र है। कोई भी समुदाय पंथ के आधार पर पृथक अस्तित्व बनाए रखने की मांग नहीं कर सकता। विधि ही वह प्राधिकरण है न कि पंथ जिसके आधार पर पृथक मुस्लिम पर्सनल लॉ को संचालित करने एवं जारी रखने की स्वीकार्यता मिली। इसलिए विधि उसे अधिक्रमित कर सकती है या उसके स्थान पर समान नागरिक संहिता की स्थापना कर सकती है।

न्यायालय के निर्णय में प्रधानमंत्री को संविधान के अनुच्छेद ४४ पर स्वच्छ दृष्टि डालने को कहा गया, जिसमें राज्य के द्वारा सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। सरकार को यह भी निर्देश दिया गया कि विधि आयोग को स्त्रियों के वर्तमान मानवाधिकारों को दृष्टि में रखते हुए एक विस्तृत समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करने को कहा जाए। बीच में कालखंड में एक समिति बनाई जानी चाहिए जो इस बात का निरीक्षण करे कि कोई मतान्तरण के अधिकार का दुरुपयोग न कर सके। ऐसा कानून बनाना चाहिए जिससे प्रत्येक नागरिक जो धर्मांतरण करता है वह पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता। उच्चतम न्यायालय ने सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को भी यह निर्देश दिया कि उत्तरदायित्व अधिकारी के द्वारा अगस्त १९९६ तक इस आशय का शपथ पत्र प्राप्त होना चाहिए कि न्यायालय के निर्देश के पश्चात् केन्द्र सरकार के द्वारा नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने हेतु कौन से कदम उठाए गए और 1या प्रयास किए गए, जो पिछले चार दशकों से शीत गृह में पड़ा हुआ है लेकिन सरकारों ने कुछ नहीं किया।

संविधान की आत्मा को पहचानने वाले, बड़े संविधानविदों का कहना है कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द की जरूरत नहीं थी, यह संविधान की आत्मा में निहित भाव था, परन्तु श्रीमती इंदिरा गांधी को मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए ऐसा करना पड़ा। श्रीमती गांधी ने ऐसा क्यों किया? लेकिन धर्मनिरपेक्षता शब्द के साथ धर्म भी जुड़ा है अत: आइए बिना पूर्वाग्रह के इस ओर राष्ट्र के हित में एक दृष्टि डालें।

आज सारे विश्व के नीतिज्ञ इस बात को मानते हैं कि इस पृथ्वी पर श्रीकृष्ण से बड़ा राजनीति का जानकार कोई दूसरा नहीं था। विद्वानों की इस धारणा के बाद दूसरा न6बर आता है कौटिल्य का और शेष आधे में विश्व के सभी राजनीतिज्ञ समेटे जा सकते हैं।

बस केवल ढाई राजनीतिज्ञ ही इस पृथ्वी पर हुए हैं। श्री कृष्ण ने विषम से विषम परिस्थिति में यह नहीं कहा कि मैं इस पृथ्वी पर 'राजनीतिÓ की स्थापना करने को अवतरित हुआ। उनका स्पष्ट उद्घोष है

''धर्मसंस्थापनार्थाय स6भवामि युगे-युगेÓÓ

मैं बार-बार आता हूं ताकि धर्म की स्थापना हो सके।

इस धर्म में एक बात और छिपी है

''साधुओं का त्राण और दुष्टों का नाश’

दूसरी बात जो आज विचारणीय है और सनातन वाङ्गमय के हर आराधक को जाननी होगी वह है भगवान के ये वचन कि 'अपने धर्म में रहकर मृत्यु को प्राप्त होना अच्छा है, पर दूसरों का धर्म विनाशकारी है, वह भयावह है। यह उक्ति विश्व के सबसे बड़े नीतिज्ञ की है। क्या यहां भगवान कृष्ण को हम सांप्रदायिक कहें और अपनी ओढ़ी हुई धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर उन्हें नकार दें। क्या यह उचित होगा?

थोड़ा सा इस बात को इसलिए समझना होगा क्योंकि भारत में जो कानून बनते हैं, उनका सबसे बड़ा स्रोत धर्म है। 'स्वधर्म’ की बात भगवान इसलिए करते हैं क्योंकि जन्म के साथ ही मनुष्य के संस्कार एक विशेष दिशा में बनने शुरू हो जाते हैं और उसी के अनुसार उसकी श्रद्धा का निर्माण होता है।

एक विशुद्ध आर्यसमाजी परिवार का उदाहरण लें। उस परिवार में उत्पन्न बालक को वेदों में अगाध निष्ठा होगी, वह एक ही ईश्वर को मानने वाला होगा, स्वामी दयानंद के विचारों पर आस्था रखने वाला होगा, स्पष्टवादी होगा। अगर ऐसे किसी युवक को आप यह कहें कि, ''तुम कल से पांचों व1त नमाज पढऩी शुरू कर दो’ तो यह उसके लिए विनाशकारी कृत्य हो जाएगा। हो सकता है वह विक्षिप्त हो जाए। ऐसा ही किसी आस्थावान मुस्लिम को यह कहें कि वह रोज सत्यनारायण की कथा घर पर करवाए तो उसकी क्या हालत होगी? वह असहज हो जाएगा।

ऐसी बात नहीं कि इनके मन में कोई द्वेष है, बात यह है कि यह स्वधर्म के विरुद्ध है। वेदवाणी है कि केवल स्थित प्रज्ञ या ब्रह्मज्ञान को प्राप्त व्यक्ति की दृष्टि ही ऐसी हो सकती है। भगवान कहते हैं, ''पर धर्मो भयावह:। ऐसे लोग जो यह दिखावा करते हैं कि वह सारे धर्मों को एक ही दृष्टि से देखते हैं, या तो वह ब्रह्मज्ञानी हैं या पहले दर्जे के बेईमान व धूर्त । 'धर्मनिरपेक्ष’ कौन है इसका फैसला आप स्वयं करें। किसी धर्म का अपमान न करो, विवेकानंद कहते हैं, परन्तु अपना धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। धर्मनिरपेक्ष शब्द बड़ा भयावह है, क्योंकि इसे तथाकथित राजनीतिज्ञ अस्तित्व में लाए हैं इससे बचना होगा। यह प्राणघातक है।

धर्मनिरपेक्षता, देश की एकता, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सौहार्द की दुहाई राजनीतिक दल और उनके नेता दे रहे हैं, मुझे लगता है कि उन्हें धर्म, देश, राष्ट्र की न तो जानकारी है और न ही चिंता। कांग्रेस, कम्युनिस्टों , तीसरे और चौथे मोर्चे के नेता और अनेक क्षेत्रीय नेता ऐसा कर रहे हैं। आजादी के बाद से ही मजहबी संकीर्णता, जातिवाद और क्षेत्रवाद जितना इन्होंने फैलाया है उतना किसी ने नहीं फैलाया। अल्प्संख्य्नको के वोट थोक में बटोरने के लिए बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्थाओं पर लगातार आघात करना और राष्ट्रीय अस्मिता पर प्रहार करना इनकी आदत बन चुका है। जो कुछ आज हो रहा है उसकी शुरूआत अंग्रेजों के शासनकाल में हुई थी, जिसकी चर्चा मैं कल करूंगा।

sabhar : Panjab kesari

शनिवार, 5 नवंबर 2011

क्या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? - श्री अश्वनी कुमार , पंजाब केसरी

श्री अश्वनी कुमार जी, पंजाब केसरी
आज का सम्पादकीय

देश बहुत खतरनाक दौर से गुजर रहा है। अगर जल्द सही दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो राजनीतिक पार्टियां वोट के लालच में सामाजिक ढांचे की जड़ों में इतना जहर घोल देंगी कि स5य व धर्मनिरपेक्ष नागरिकों के लिए जीना मुश्किल हो जाएगा। देश के स्वतंत्र होने के बाद यह आवश्यक था कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू की जाए। संविधान के अनुच्छेद ४४ में कहा गया था कि सरकार को प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करनी चाहिए, लेकिन जब भी कभी समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रश्र खड़ा होता है मुस्लिम और ईसाई वोटों के लालची कांग्रेस व अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल स्वर में स्वर मिला कर इसका विरोध करना शुरू कर देते हैं।

१३ जुलाई, २००३ को सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में निर्णय देते हुए कहा था कि यह अत्यंत दु:ख की बात है कि स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद भी संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत आने वाले अनुच्छेद ४४ पर अमल नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए संसद को कानून बनाना चाहिए क्योंकि इससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण निर्णय आते ही आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और कट्टरपंथियों ने शोर-शराबा मचाना शुरू कर दिया। सबसे ज्यादा शर्मनाक बात यह थी कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों और अन्य दलों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध किया।

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनका उल्लेख होते ही राजनीतिक क्षेत्र में भूचाल आ जाता है। देश के लिए चाहे वे कितने ही अधिक महत्वपूर्ण हों परन्तु राजनीतिक क्षेत्र के लोग अपने सत्ता स्वार्थ के कारण उनकी निरंतर उपेक्षा करते आ रहे हैं। उन्हीं में से एक मुद्दा है समान नागरिक संहिता का, जिसका नाम लेना भी भारतीय राजनीति में अपराध समझा जाने लगा है परन्तु भारतीय संविधान एवं न्यायपालिका समान नागरिक संहिता को देश की एकता एवं अखंडता के लिए आवश्यक समझती है। ऐसी परिस्थिति में जब संवैधानिक उतरदायित्व एवं न्यायालय का निर्णय राजनीतिज्ञों की दृष्टि में अपराध बन जाए तब देश के नागरिकों को इसके विषय में जानना एवं निर्णय लेना अनिवार्य हो जाता है। अत: इस दृष्टि से निम्र बिन्दुओं पर विचार करना आवश्यक है।

दुनिया के किसी भी अन्य देश में दोहरी कानून व्यवस्था नहीं तथा भारत के अतिरिक्त किसी भी दूसरे देश के नागरिकों के लिए अलग-अलग कानून का विधान भी नहीं। यूरोप एवं अमरीका समेत सभी पश्चिमी राष्ट्रों में वहां रहने वाले नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता है। वहां पंथ, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी विशेष कानून का विधान नहीं किया गया। दूसरी तरफ अरब के उन मुस्लिम राष्ट्रों में भी अलग कानून की व्यवस्था नहीं है जहां शरीयत एवं कुरान के कानून मान्य हैं। वहां के अन्य धर्मावलंबियों के ऊपर भी वही कानून लागू होते हैं। एकमात्र भारत ही ऐसा राष्ट्र है जहां मुस्लिम मतावलम्बियों के लिए नागरिक कानून से अलग शरीयत कानून लागू होता है। उन पर भारत की संसद के द्वारा बनाए गए कानून लागू नहीं होते। दूसरी तरफ सनातनी हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा सिखों पर संसद द्वारा बनाई गई एक समान नागरिक संहिता लागू होती है, जिसे हिन्दू लॉ कहते हैं। एक ही क्षेत्र में रहने वाले एक ही शासन द्वारा शासित नागरिकों पर भिन्न-भिन्न कानून के लागू होने का यह अद्भुत उदाहरण केवल भारत में ही मिलता है।

५ नवम्बर २०११

साभार : पंजाब केसरी


शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

RSS didn’t plot Gandhi killing, Hindu Mahasabha did, Patel told Nehru - Indian Express

RSS didn’t plot Gandhi killing, Hindu Mahasabha did, Patel told Nehru - Indian Express

क्या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? - श्री अश्वनी कुमार , पंजाब केसरी

श्री अश्वनी कुमार जी, पंजाब केसरी
आज का सम्पादकीय



मैंने एक बार नहीं अनेक बार लिखा है कि उन्माद की हिन्दुत्व में कोई जगह नहीं। उन्माद की भाषा मत बोलो, लाखों वर्ष की कालजयी विरासत पर कलंक मत लगाओ। मैंने बार-बार इस बात को दोहराया कि चाहे हिन्दू का जुनून हो चाहे मुस्लिम का जुनून हो, जब भी मारे जाते हैं निर्दोष ही मारे जाते हैं, जो गलत है। इस्लामी आतंकवाद पर भी मेरा यही कहना है कि प्रेम और करुणा के मार्ग पर चलने वाले इस्लाम के अनुयायियों को यह शोभा नहीं देता। किसी भी लेखक ने ‘जहरीला इस्लाम’ कभी नहीं लिखा, ऐसे में कुछ उन्मादियों को जहरीला हिन्दुत्व कहने की अनुमति कैसे दी जा सकती है। वह अपने भीतर झांकें और खुद का विश्लेषण करें।

मैं छद्म बुद्धिजीवियों से कहना चाहूंगा कि हिन्दुत्व को समझना है तो वेद की ऋचाओं से समझें, उपनिषदों के मंत्रों में झांक कर देखें, मर्यादा पुरुषोतम भगवान राम के पावन चरित्र से जानें, श्रीकृष्ण की गीता में इस दर्शन को पहचानें, शिवाजी और बंदा बहादुर का चरित्र पढ़ें, लेकिन अफसोस इस राष्ट्र में भगवान राम को भी अपमानित किया गया। भारत और श्रीलंका को जोडऩे वाले पुल श्रीराम सेतु को तोडऩे का प्रयास किया गया और हद तो तब हो गई जब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम के अस्तित्व को ही नकारने जैसी जघन्य राजनीति शुरू कर दी। जब प्रबल विरोध हुआ तो सरकार को हलफनामा वापस लेना पड़ा। दिल्ली विश्वविद्यालय की पाठ्य पुस्तकों में भी भगवान राम के बारे में अनर्गल टिप्पणियां की गईं जो हिन्दू समाज के लिए असहनीय हैं।

शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति ने देश के उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी जिसमें यह निवेदन किया गया था कि बी.ए. (आनर्स) इतिहास के द्वितीय वर्ष में एक निबंध पढ़ाया जा रहा है जिसका शीर्षक है ‘थ्री हण्ड्रेड रामायणा वीथ फाइव एक्साम्प्ल’। निबंध के लेखक हैं ए.के. रामानुजन। इस निबंध में रामायण के सम्मानित चरित्रों जैसे राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, अहिल्या आदि के विषय में अत्यंत आपतिजनक टिप्पणी की गई है। इसी निबंध में अन्य सामग्री के अतिरिक्त निम्रलिखित बातें पढ़ाई जा रही थीं.
* रावण और मंदोदरी की कोई संतान नहीं थी। दोनों ने शिवजी की पूजा की। शिवजी ने उन्हें आम खाने को दिया। गलती से सारा आम रावण ने खा लिया और उसे गर्भ ठहर गया। दु:ख से बेचैन रावण ने छींक मारी और सीता का जन्म हुआ। सीता रावण की पुत्री थी। उसने उसे जनकपुरी के खेत में त्याग दिया।
* हनुमान छुटभैया एक छोटा सा बंदर था एवं कामुक व्यक्ति था। वह लंका के शयनकक्षों में स्त्रियों और पुरुषों को आमोद-प्रमोद करते बेशर्मी से देखता फिरता था।
* रावण का वध राम से नहीं लक्ष्मण से हुआ।
* रावण और लक्ष्मण ने सीता के साथ व्यभिचार किया।
* माता अहिल्या को यौन की एक मूर्ति बताया गया है, जिसका इन्द्र के साथ लज्जापूर्ण ढंग से यौन व्यभिचार दर्शाया गया है।

ए.के. रामानुजन द्वारा लिखित निबंध ‘थ्री हण्ड्रेड रामायणा’ एक पुस्तक में सम्मलित था जिसका नाम था ‘मैनी रामायण।’ यह पुस्तक पौला रिचमेन (आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी) द्वारा सम्पादित की गई थी। संपादक ने अपनी पुस्तक में पुस्तक के उद्देश्य स्पष्ट किए थे। उनका कहना था कि यह पुस्तक रामानंद सागर द्वारा प्रदर्शित ‘रामायण’ टी.वी. सीरियल के अत्यधिक सकारात्मक प्रभाव को निरस्त करने के लिए लिखी गई है।

शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति ने सन् २००८ में पुस्तक के प्रकाशक आ1सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रैस, लंदन से संपर्क किया तथा निबंध के विषय में अपनी आपति बताई और कहा कि पुस्तक में हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया गया है। आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने खेद प्रकट किया, माफी मांगी तथा आश्वासन दिया कि उनका उद्देश्य हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। उन्होंने पुस्तक को वापस लेना स्वीकार किया। इसकी सूचना उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तथा दिल्ली विश्वविद्यालय को भी दी किन्तु इतिहास विभाग ने इसका संज्ञान नहीं लिया तथा अनधिकृत रूप से निबंध को अपने पाठ्यक्रम में पढ़ाना जारी रखा।

समिति ने न्यायालय से प्रार्थना की थी कि इस निबंध को पाठ्यक्रम से हटा दिया जाए। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इस संबंध में कुछ विद्वानों की राय ली जाए। विद्वानों की राय विश्वविद्यालय की एकेडेमिक कौंसिल के सामने प्रस्तुत की जाए। कौंसिल के निर्णय के अनुसार उपकुलपति अग्रिम कार्यवाही करें। दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने न्यायालय के आदेश के अनुसार कार्यवाही करके पूरे तथ्य एकेडेमिक कौंसिल की बैठक में प्रस्तुत किए। सदस्यों ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए। कौंसिल ने इन विचारों का गंभीरता से अध्ययन किया। कौंसिल के समक्ष यह तथ्य भी लाया गया कि उक्त निबंध केवल २००९ तक के लिए पाठ्यक्रम के लिए स्वीकृत था और सन् २००९ के पश्चात् उसे अनधिकृत रूप से पढ़ाया जाता रहा है। विषय के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद एकेडेमिक कौंसिल ने विवादित निबंध को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय लिया।

प्रख्यात विद्वान हृदय नारायण दीक्षित लिखते हैं कि जीवंत इतिहास बोध में ही राष्ट्र का अमरत्व है और विकृत इतिहास में राष्ट्र की मृत्यु। श्रीराम भारत के मन का रस और छंद हैं। रामानुजन के विवादित निबंध को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग हिन्दू धर्म के खिलाफ कुत्सित षड्यंत्र है।
इतने वर्षों से बच्चों को इतिहास की कक्षा में अश्लील कथा पढ़ाई जाती रही और भगवान राम का अपमान किया जाता रहा, हिन्दुओं की सहनशीलता को दाद तो देनी ही पड़ेगी।
४ नवम्बर
२०११



साभार : पंजाब केसरी

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित