मंगलवार, 8 नवंबर 2011

क्या हिन्दुस्तान में हिन्दू होना गुनाह है? - श्री अश्वनी कुमार , पंजाब केसरी



श्री अश्वनी कुमार जी, पंजाब केसरी
सम्पादकीय
(दिनांक , तथा नवम्बर के अंको के )

भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ का काफी दुरुपयोग होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में चार विवाह की छूट एवं तलाक लेने की सरल प्रक्रिया के कारण मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव एवं अत्याचार तो होते ही हैं, अन्य धर्मों के लोग भी दूसरी शादी के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेते हैं। भारत में अल्पसंख्यको को अनेक प्रकार की सुविधाएं दी जाती हैं। अल्पसंख्यको को अपने धार्मिक शिक्षण संस्थान चलाने की छूट है और सरकार इन शिक्षण संस्थानों को करोड़ों रुपए का अनुदान भी देती है।

बदलती दुनिया और महिला अधिकारिता के प्रति जन जागृति आने के बाद कई मुस्लिम देशों ने अपने कानूनों में सुधार किया है। सीरिया, मिस्र, तुर्की, मोरक्को और ईरान में भी एक से अधिक विवाह प्रतिबंधित हैं। ईरान, दक्षिण यमन और कई देशों में मुस्लिम कानूनों में सुधार किया गया। हाल ही में सऊदी अरब के शासकों ने महिलाओं को वोट डालने का अधिकार दिया है और सऊदी शासक महिलाओं को उनके अधिकार देने के लिए भारतीय व्यवस्था का अध्ययन कर रहे हैं। पाकिस्तान ने भी १९६१ में दूसरे विवाह पर रोक लगाते हुए एक सरकारी कौंसिल की स्थापना की थी तथा दूसरी शादी के इच्छुक व्यक्ति को उचित कारण बताकर अनुमति लेना जरूरी बना दिया था। भारत में कई मौके आए जब अदालतों ने शरीयत कानून के विरुद्ध निर्णय दिया, परन्तु भारत के राजनीतिज्ञों ने वोट बैंक के लालच में अदालतों के फैसलों की अवमानना की।

मैं यहां कुछ प्रकरणों का उल्लेख करना चाहूंगा।

मोहम्मद अदमद खान बनाम शाहबानो बेगम और अन्य (ए.आई.आर. १९८५ एस.सी. ९४५) के प्रकरण में सन् १९८५ में शाहबानो नाम की मुस्लिम महिला अपने पति द्वारा तलाक दिए जाने पर न्यायालय में गई। उच्चतम न्यायालय ने उसके पक्ष में निर्णय सुनाते हुए उसके पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश देते हुए यह सुझाव दिया कि मुस्लिम समुदाय को पर्सनल लॉ में सुधार के लिए आगे आना चाहिए। एक 'समान नागरिक संहिता असमानता को मिटाकर राष्ट्रीय एकता के लिए सहायक होगी परन्तु १९८६ में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने संसद में विधेयक लाकर उच्चतम न्यायालय के निर्णय को ही पलट दिया और तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के लिए सरकारी धन देने की व्यवस्था कुछ विशेष परिस्थितियों में की गई तथा पति को सभी प्रकार के उतरदायित्व से मुक्त कर दिया गया।

दूसार प्रकरण श्रीमती जोर्डेन डेंगडेह बनाम श्री एस.एस. चोपड़ा (ए.आई.आर. १९८५ एस.सी. ९३५) का है। विदेश सेवा में कार्यरत इस ईसाई महिला ने क्रिश्चियन विवाह कानून १९७२ के अन्तर्गत एक सिख पुरुष से विवाह किया था। १९८० में अपने साथ की जा रही क्रूरता के आधार पर उसने तलाक की मांग की, परन्तु उसके तलाक की प्रार्थना स्वीकार नहीं की गई, तो उसने उच्चतम न्यायालय में पति के शारीरिक रूप से अक्षम होने के आधार पर तलाक की मांग की। उच्चतम न्यायालय ने इस विवाद पर निर्णय सुनाते हुए भारत के विधि एवं न्याय मंत्रालय को स्पष्ट रूप से दिशा-निर्देश जारी किया कि विवाह अधिनियम में पूर्णत: सुधार होना चाहिए तथा जाति एवं धर्म की परवाह न करते हुए एक समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए। यह भी कहा गया कि न्यायालय शीघ्र एवं अनिवार्य रूप से समान नागरिक संहिता की आवश्यकता अनुभव करता है। बाकी दो मु2य प्रकरणों का उल्लेख मैं कल के सम्पादकीय में करूंगा।

भारत में सरकारें बदलती रहीं। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गठबंधन होते रहे, सरकारें बनती रहीं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद देश में ही नहीं देश के बाहर भी यह संदेश भेजने की प्रक्रिया का सूत्रपात किया गया कि अटल जी की सरकार एक सांप्रदायिक किस्म की सरकार थी, अब यहां धर्मनिरपेक्ष सरकार का वर्चस्व हो चुका है। धर्मनिरपेक्षता क्या है इसकी कानूनी या संवैधानिक व्याख्या आज तक नहीं हो सकी। कानून का नया विद्यार्थी भी जब भारत में संविधान की ओर एक विहंगम दृष्टि डालता है तो पाता है कि संवैधानिक दृष्टिकोण से भारत में १९७६ से पूर्व धर्मनिरपेक्षता नहीं थी। भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्व या अधिकारों से सर्वधर्म समभाव झलकता था कि नहीं, मैं इस बहस में नहीं पडऩा चाहता पर यह शब्द धर्मनिरपेक्ष ४२वें संशोधन के बाद प्राक्कथन में आया।

मैं आगे बढऩे से पहले दो और प्रमाणों को पेश करना चाहूंगा। एक और प्रकरण शायरा बानो नाम की मुस्लिम महिला का है, जिसने अपने एवं अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा १९८७ (ए.आई.आर. १९८७ एस.सी. ११०७) में खटखटाया। न्यायालय ने शाहबानो बेगम के केस का उदाहरण देते हुए भरण-पोषण का आदेश दिया।एक और मामला ११ मई, १९९५ में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय का है। एक हिन्दू महिला जिसके पति ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर दूसरी शादी कर ली थी, की याचिका पर निर्णय सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि हिन्दू कानून के अनुसार धर्मांतरण के पश्चात् पूर्व शादी समाप्त नहीं होती तथा पुनर्विवाह धारा ४९४ के अनुसार दंडनीय है। विवाह, तलाक और पंथ यह स्वभाव और बहुत कुछ आस्था और विश्वास का विषय है, सुविधा का विषय नहीं है।

एक हिन्दू कलमा पढ़कर मुसलमान बन जाता है या एक मुसलमान मंत्र पढ़कर हिन्दू बन जाता है। यह भरोसा, विश्वास और आस्था एवं तर्क का विषय है। किसी के द्वारा पंथ का घटिया दुरुपयोग तुरन्त रोका जाना चाहिए, मतान्तरण सुविधा के लिए नहीं होना चाहिए। यह बहुत ग6भीर, सामाजिक, राजनीतिक अपराध है। न्यायाधीशों ने कहा कि समान नागरिक संहिता उत्पीडि़त लोगों की सुरक्षा तथा राष्ट्र की एकता एवं अखंडता दोनों के लिए अत्यावश्यक है। न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि जिन लोगों ने विभाजन के पश्चात् भारत में रहना स्वीकार किया, उन्हें स्पष्ट रूप से यह जान लेना चाहिए कि भारतीय नेताओं का विश्वास दो राष्ट्र या तीन राष्ट्र के सिद्धांत में नहीं था और भारतीय गणतंत्र में मात्र केवल एक राष्ट्र है। कोई भी समुदाय पंथ के आधार पर पृथक अस्तित्व बनाए रखने की मांग नहीं कर सकता। विधि ही वह प्राधिकरण है न कि पंथ जिसके आधार पर पृथक मुस्लिम पर्सनल लॉ को संचालित करने एवं जारी रखने की स्वीकार्यता मिली। इसलिए विधि उसे अधिक्रमित कर सकती है या उसके स्थान पर समान नागरिक संहिता की स्थापना कर सकती है।

न्यायालय के निर्णय में प्रधानमंत्री को संविधान के अनुच्छेद ४४ पर स्वच्छ दृष्टि डालने को कहा गया, जिसमें राज्य के द्वारा सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की बात कही गई है। सरकार को यह भी निर्देश दिया गया कि विधि आयोग को स्त्रियों के वर्तमान मानवाधिकारों को दृष्टि में रखते हुए एक विस्तृत समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करने को कहा जाए। बीच में कालखंड में एक समिति बनाई जानी चाहिए जो इस बात का निरीक्षण करे कि कोई मतान्तरण के अधिकार का दुरुपयोग न कर सके। ऐसा कानून बनाना चाहिए जिससे प्रत्येक नागरिक जो धर्मांतरण करता है वह पहली पत्नी को तलाक दिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता। उच्चतम न्यायालय ने सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को भी यह निर्देश दिया कि उत्तरदायित्व अधिकारी के द्वारा अगस्त १९९६ तक इस आशय का शपथ पत्र प्राप्त होना चाहिए कि न्यायालय के निर्देश के पश्चात् केन्द्र सरकार के द्वारा नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने हेतु कौन से कदम उठाए गए और 1या प्रयास किए गए, जो पिछले चार दशकों से शीत गृह में पड़ा हुआ है लेकिन सरकारों ने कुछ नहीं किया।

संविधान की आत्मा को पहचानने वाले, बड़े संविधानविदों का कहना है कि संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द की जरूरत नहीं थी, यह संविधान की आत्मा में निहित भाव था, परन्तु श्रीमती इंदिरा गांधी को मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए ऐसा करना पड़ा। श्रीमती गांधी ने ऐसा क्यों किया? लेकिन धर्मनिरपेक्षता शब्द के साथ धर्म भी जुड़ा है अत: आइए बिना पूर्वाग्रह के इस ओर राष्ट्र के हित में एक दृष्टि डालें।

आज सारे विश्व के नीतिज्ञ इस बात को मानते हैं कि इस पृथ्वी पर श्रीकृष्ण से बड़ा राजनीति का जानकार कोई दूसरा नहीं था। विद्वानों की इस धारणा के बाद दूसरा न6बर आता है कौटिल्य का और शेष आधे में विश्व के सभी राजनीतिज्ञ समेटे जा सकते हैं।

बस केवल ढाई राजनीतिज्ञ ही इस पृथ्वी पर हुए हैं। श्री कृष्ण ने विषम से विषम परिस्थिति में यह नहीं कहा कि मैं इस पृथ्वी पर 'राजनीतिÓ की स्थापना करने को अवतरित हुआ। उनका स्पष्ट उद्घोष है

''धर्मसंस्थापनार्थाय स6भवामि युगे-युगेÓÓ

मैं बार-बार आता हूं ताकि धर्म की स्थापना हो सके।

इस धर्म में एक बात और छिपी है

''साधुओं का त्राण और दुष्टों का नाश’

दूसरी बात जो आज विचारणीय है और सनातन वाङ्गमय के हर आराधक को जाननी होगी वह है भगवान के ये वचन कि 'अपने धर्म में रहकर मृत्यु को प्राप्त होना अच्छा है, पर दूसरों का धर्म विनाशकारी है, वह भयावह है। यह उक्ति विश्व के सबसे बड़े नीतिज्ञ की है। क्या यहां भगवान कृष्ण को हम सांप्रदायिक कहें और अपनी ओढ़ी हुई धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर उन्हें नकार दें। क्या यह उचित होगा?

थोड़ा सा इस बात को इसलिए समझना होगा क्योंकि भारत में जो कानून बनते हैं, उनका सबसे बड़ा स्रोत धर्म है। 'स्वधर्म’ की बात भगवान इसलिए करते हैं क्योंकि जन्म के साथ ही मनुष्य के संस्कार एक विशेष दिशा में बनने शुरू हो जाते हैं और उसी के अनुसार उसकी श्रद्धा का निर्माण होता है।

एक विशुद्ध आर्यसमाजी परिवार का उदाहरण लें। उस परिवार में उत्पन्न बालक को वेदों में अगाध निष्ठा होगी, वह एक ही ईश्वर को मानने वाला होगा, स्वामी दयानंद के विचारों पर आस्था रखने वाला होगा, स्पष्टवादी होगा। अगर ऐसे किसी युवक को आप यह कहें कि, ''तुम कल से पांचों व1त नमाज पढऩी शुरू कर दो’ तो यह उसके लिए विनाशकारी कृत्य हो जाएगा। हो सकता है वह विक्षिप्त हो जाए। ऐसा ही किसी आस्थावान मुस्लिम को यह कहें कि वह रोज सत्यनारायण की कथा घर पर करवाए तो उसकी क्या हालत होगी? वह असहज हो जाएगा।

ऐसी बात नहीं कि इनके मन में कोई द्वेष है, बात यह है कि यह स्वधर्म के विरुद्ध है। वेदवाणी है कि केवल स्थित प्रज्ञ या ब्रह्मज्ञान को प्राप्त व्यक्ति की दृष्टि ही ऐसी हो सकती है। भगवान कहते हैं, ''पर धर्मो भयावह:। ऐसे लोग जो यह दिखावा करते हैं कि वह सारे धर्मों को एक ही दृष्टि से देखते हैं, या तो वह ब्रह्मज्ञानी हैं या पहले दर्जे के बेईमान व धूर्त । 'धर्मनिरपेक्ष’ कौन है इसका फैसला आप स्वयं करें। किसी धर्म का अपमान न करो, विवेकानंद कहते हैं, परन्तु अपना धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। धर्मनिरपेक्ष शब्द बड़ा भयावह है, क्योंकि इसे तथाकथित राजनीतिज्ञ अस्तित्व में लाए हैं इससे बचना होगा। यह प्राणघातक है।

धर्मनिरपेक्षता, देश की एकता, राष्ट्रभक्ति और सामाजिक सौहार्द की दुहाई राजनीतिक दल और उनके नेता दे रहे हैं, मुझे लगता है कि उन्हें धर्म, देश, राष्ट्र की न तो जानकारी है और न ही चिंता। कांग्रेस, कम्युनिस्टों , तीसरे और चौथे मोर्चे के नेता और अनेक क्षेत्रीय नेता ऐसा कर रहे हैं। आजादी के बाद से ही मजहबी संकीर्णता, जातिवाद और क्षेत्रवाद जितना इन्होंने फैलाया है उतना किसी ने नहीं फैलाया। अल्प्संख्य्नको के वोट थोक में बटोरने के लिए बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्थाओं पर लगातार आघात करना और राष्ट्रीय अस्मिता पर प्रहार करना इनकी आदत बन चुका है। जो कुछ आज हो रहा है उसकी शुरूआत अंग्रेजों के शासनकाल में हुई थी, जिसकी चर्चा मैं कल करूंगा।

sabhar : Panjab kesari

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित