कतरन समाचार पत्रों की

साभार: पांचजन्य

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सवालों के घेरे में क्रीड़ा परिषद अध्यक्ष

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shivcharan_4456456789आदर्श विद्या मदिर में पढ़ाते थे शपथ पत्र भरवाने वाले माली, सालों 
तक रहे संघ गतिविधियों में सक्रिय, कानूनी लड़ाई लड़ेगी क्रीड़ा भारती 
संदीप देशपांडे
जयपुर, 13 अप्रेल।
पुरस्कार के हकदार खिलाडिय़ों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंध न रखने का शपथ पत्र भरवाने वाले खेल परिषद के अध्यक्ष शिवचरण माली स्वयं अब सवालों के घेरे में आ गए है। शिवचरण माली न सिर्फ लंबे समय तक संघ के अनुषांगिक संगठन विद्याभारती के अधीन संचालित स्कूल आदर्श विद्या मंदिर में शिक्षक रहे बल्कि संघ गतिविधियों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे। ऐसे में अब यह सवाल उठने लगे हंै कि यदि क्रीड़ा परिषद को खिलाडिय़ों के संघ से जुड़े रहने पर आपत्ति है तो खुद परिषद के अध्यक्ष को क्यों छूट दी गई है! दूसरी ओर खेलों के क्षेत्र में काम करने वाली संघ की आनुषांगिक संस्था क्रीड़ा भारती अब इस मामले पर अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। क्रीड़ा भारती के सचिव और आदर्श विद्या मंदिर के प्रधानाचार्य रामानंद चौधरी के अनुसार क्रीड़ा परिषद का यह फरमान गैरकानूनी है इसका जवाब कानूनी रूप से ही दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है ऐसे में खिलाडिय़ों से संघ से संबंध नहीं होने का शपथ पत्र भरवाना अवैधानिक है। चौधरी ने क्रीड़ा परिषद अध्यक्ष की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि खुद अध्यक्ष शिवचरण माली आदर्श विद्या मंदिर में शिक्षक रहे हंै। इतना ही नहीं बल्कि वे संघ शाखा में जाते थे और सभी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेते रहे हैं। चौधरी ने कहा कि जब क्रीडा परिषद अध्यक्ष ही संघ से जुड़े रहे हैं तो वे खिलाडिय़ों से इस प्रकार का बेतुका शपथ पत्र कैसे भरवा सकते है!
क्या है मामलाविभिन्न खेलों में पदक हासिल करने वाले खिलाडिय़ों को सम्मान स्वरूप चेक प्रदान करने की प्रक्रिया तब विवादों में आ गई है जब खेल परिषद ने चेक देने से पूर्व खिलाडिय़ों से एक शपथ-पत्र भरवाया, जिसमें उनसे इस बात की शपथ ली गई कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात ए इस्लामी संगठन के सदस्य नहीं है। इस तरह का शपथ पत्र भरवाए जाने की बात सार्वजनिक होने पर हंगामा मच गया है।
साभार: महानगर टाईम्स ,जयपुर http://mahanagartimes.com/?p=15998

 

साभार: दैनिक जागरण 

अमेरिका में योग का विरोध
 एस शंकर 


व्हाइट हाउस में ईस्टर पर योग उद्यान बनवाया जाना महत्वपूर्ण घटना है। हालांकि स्वामी विवेकानंद ने लगभग सवा सौ वर्ष पहले अमेरिका में ही पहली बार आधुनिक विश्व को योग का संदेश दिया था, फिर भी चार दशक पहले तक भी ज्यादातर पश्चिमी लोग योगाभ्यास को हिंदू एक्रोबेटिक (ऊट-पटांग कसरत) कहते थे। स्थिति तेजी से बदली और आज पूरी दुनिया में योग को सम्मान मिला। हालांकि कट्टरपंथी ईसाइयों ने इसे हिंदू धर्म-चिंतन को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने का प्रयास बताते हुए आलोचना की। स्कूलों में योग शिक्षा देने के विरुद्ध कैलिफोर्निया में पहले ही एक मुकदमा चल रहा है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने भाषण में योग को धार्मिक क्रियाकलाप न बताकर इसके स्वास्थ्य संबंधी पंथनिरपेक्ष लाभ का ध्यान दिलाया जाए। असल में योग सिर्फ व्यायाम नहीं, बल्कि मानवता के सबसे महान दर्शन, चिंतन का ही एक अभिन्न अंग है।
इसका सबसे सरल प्रमाण यह है कि जिन महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में योग की व्याख्या दी, स्वयं उन्होंने उन्हीं ग्रंथों में मुख्यत: आध्यात्मिक, दार्शनिक संदेश दिया है। सहस्त्रब्दियों पहले कही गई वे बातें यदि आज भी लाभकारी दिखती हैं तो उनकी शाश्वत सच्चाई में कोई शंका नहीं बचती। आज भी स्वामी विवेकानंद से लेकर महर्षि अरविंद, स्वामी शिवानंद और सत्यानंद तक किसी भी सच्चे योगी ने योगाभ्यास को हिंदू धर्म-चिंतन से अलग करके नहीं दिखाया। वस्तुत: सभी ने निरपवाद रूप से योग विधियों को संपूर्ण जीवन दृष्टि के अंग रूप में प्रस्तुत किया। इन योग गुरुओं की संपूर्ण शिक्षाओं में योग से स्वास्थ्य लाभ की चर्चा कम और आध्यात्मिक, चारित्रिक उत्थान का विचार अधिक है। यह तो उनके यूरोपीय अनुयायियों ने अपनी सीमित समझ से योग की स्वास्थ्य उपयोगिता पर बल दिया।
योग को उस सीमित दायरे में देखना उचित नहीं। ऐसा करना ऐसा ही है जैसे केवल वर्णमाला के ज्ञान को ही संपूर्ण भाषा का ज्ञान मान लेना अथवा किसी पुस्तक की भूमिका को ही पूरी पुस्तक समझ कर शेष वृहत भाग को छोड़ देना। योग दर्शन मुख्यत: एक जीवन दृष्टि है जिससे मनुष्य इस संसार में सार्थक जीवन जीते हुए निरंतर अपने उत्थान की ओर बढ़ता है और अंतत: मानव आत्मा पूर्ण रूप से परमात्मा से मिल कर मुक्ति पाती है। गीता के अठारहों अध्याय योग शिक्षा हैं। भगवान कृष्ण ने अनेक प्रकार से समझाया है, ‘समत्वं योग उच्यते’। यानी सम भाव में स्थित हो पाने तथा ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों या किसी भी एक में निष्णात हो सकने की क्षमता प्राप्त कर लेना ही योगी होना है। इसलिए जिसे योगाभ्यास कहा जाता है, वह तो सचेतन होने का प्रारंभिक उपक्रम भर है। यह गंभीरता से सोचने की बात है कि जब मामूली व्यायाम रूप में योगाभ्यास ने सारी दुनिया को इतना सम्मोहित किया तब योग दर्शन को संपूर्ण रूप में समझना मानवता के लिए कितनी महान उपलब्धि हो सकती है। आज जब वैज्ञानिक परीक्षण, उपयोगिता और बौद्धिकता का इतना बोलबाला है तब यदि हिंदू योग दर्शन की बातें बेकार होंगी तो मानव बुद्धि उसे स्वयं ठुकरा देगी। ऐसी स्थिति में धमकी या दबाव डालकर योग से लोगों को विमुख करने के पीछे क्या कारण हो सकता है? केवल यही कि यदि दुनिया के गैर हिंदुओं में योग के प्रति रुचि बढ़ी तो अंतत: उनका मजहबी विश्वास नष्ट हो सकता है। ईसाइयों को यह चेतावनी 24 वर्ष पहले दिवंगत पोप जॉन पाल द्वितीय ने विस्तार से एक पुस्तिका लिखकर दी थी। कुछ ऐसी ही बात मलेशिया की नेशनल फतवा काउंसिल ने भी कही, जब वहां मुसलमानों के लिए योगाभ्यास वर्जित करने का फतवा जारी हुआ। हालांकि वहां अधिकांश मुस्लिम इसे खेल-कूद के लोकप्रिय रूप में ही लेते हैं। भारतीय मुसलमानों को भी योग से परहेज करने को कहा जाता रहा है। इसलिए जब कुछ पादरियों ने ओबामा के योग उद्यान की आलोचना की तो इसे निपट अज्ञान नहीं मानना चाहिए। अधिकांश ईसाई नेता योग को स्वास्थ्य लाभ की नजर से देखने के विरोधी हैं। यूरोप के बाप्टिस्ट और आंग्लिकन चर्च ने भी स्कूल में योगाभ्यास प्रतिबंधित करने की मांग की थी। क्रोएशिया के स्कूलों में चर्च के दबाव में योग शिक्षा हटाई गई।
अब्राहमी धार्मिक मतवाद की दोनों धाराएं योग से एक ही कारण दूरी रखती हैं कि यह हिंदू धर्म का अंग है और इसके अभ्यास से ईसाई या मुसलमान अपने मजहब से दूर होकर हिंदू चिंतन की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में हिंदुओं का क्या कर्तव्य बनता है? सबसे पहले तो यह कि योगाभ्यास से आगे बढ़कर संपूर्ण योग दर्शन को जानें। अपनी नई पीढ़ी की नियमित शिक्षा में इस चिंतन का समुचित परिचय अनिवार्य करें। यह समङों कि यदि योग व्यायाम में इतनी शक्ति है तो उस ज्ञान में कितनी होगी जिससे योगसूत्र जैसी कालजयी रचनाएं निकलीं। इसके बाद योग विरोधियों के साथ स्वस्थ विचार-विमर्श भी चलाना जरूरी है। यह रेखांकित करना कि एक ओर किसी विचार के प्रति लोगों की स्वत: ललक और दूसरी ओर चेतावनियों के बल पर किसी मतवाद से लोगों को जोड़े रखने के प्रयत्न में कितनी बड़ी विडंबना है। ऐसा विलगाव और कृत्रिम उपाय किस काम का और यह कितने दिन कायम रहेगा? व्हाइट हाउस का योग उद्यान और उसके विरोध जैसी घटनाएं अवसर देती हैं कि हम जरूरी, मगर कठिन विषयों से बचना छोड़ें। यही हमारा धर्म है। इसमें हमारा ही नहीं संपूर्ण मानवता का हित जुड़ा है। ऐसे छोटे-छोटे प्रसंगों पर खुला विमर्श वस्तुत: बड़ी-बड़ी समस्याओं को सुलझाने के रास्ते खोल सकता है। आज नहीं तो कल यह समझना ही होगा। पंथनिरपेक्षता की झक ने भारतीय बौद्धिक वर्ग को सचेत हिंदू विरोधी बना दिया है, वरना स्वामी विवेकानंद के सवा सौ वर्ष बाद भी हमारा बौद्धिक वर्ग ऐसे प्रसंगों से नहीं कतराता।
( लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
साभार: दैनिक जागरण 

राम मंदिर निर्माण का संकल्प
 
अहमदाबाद। हिन्दुत्व की प्रयोगशाला माने जाने वाले गुजरात में विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने एक बार फिर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का संकल्प उठाया है। शहर के कांकरिया फुटबॉल मैदान पर रविवार को आयोजित विहिप के हिन्दू संगम को संबोधित करते हुए एक तरफ जहां राष्ट्र्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सर संघ चालक मोहन भागवत ने कहा कि श्री राम मंदिर के भव्य मंदिर के निर्माण के लिए राम नाम के विजय मंत्र का जाप आरंभ किया जाएगा। वहीं विहिप के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष डॉ. प्रवीण तोगडिया ने राम मंदिर के निर्माण ही नहीं बल्कि काशी व मथुरा में भी मंदिर बनाने की बात कही। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष राघव रेड्डी ने भी श्री राम मंदिर के प्रति कटिबद्धता की बात कही।

तोगडिया ने कहा कि हमें राम मंदिर जैसे प्रश्नों में धार्मिक भावना का सम्मान करना चाहिए। साथ ही उन्होंने 2015 तक गुजरात को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की आशा व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि हिन्दू संगम सिर्फ कार्यक्रम या सम्मेलन नहीं है, बल्कि हिन्दुस्तान का इतिहास बदलने का संकल्प का दिन है। पेशे से कैंसर चिकित्सक डॉ. तोगडिया के अनुसार दुनिया के किसी भी कोने में हिन्दू सुरक्षित नहीं है। युगों-युगों तक भारत सुरक्षित था लेकिन अब ऎसा नहीं है।

उन्होंने राजनीतिक दलों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि विकास की बात करने वाले कई लोग मिलेंगे, लेकिन हमें सुरक्षा देने वाला नेता ढूंढना होगा। समृद्धि होने पर सुरक्षा मिलनी जरूरी है। इसलिए हमें सुरक्षा व समृद्धि दोनों चाहिए।

राजनेताओं पर अपना निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि कुछ नेता जो मुसलमानों की बात करते हैं वह हिन्दुओं को कुछ देना नहीं चाहते हैं और जो सभी की बातें करते हैं वह हिन्दुओं की बातों को छिपाने का काम करते हैं।

उन्होंने कहा कि हमें आचरण में हिन्दू, जागृत हिन्दू व सक्रिय हिन्दू बनना होगा। विहिप का लक्ष्य सत्ता की छोटी चाबी नहीं है। पांच वर्ष की सत्ता भी नहीं है बल्कि हमारा लक्ष्य हिन्दुओं का ऎश्वर्य व सुरक्षा है।

इस अवसर पर विहिप के अखिल भारतीय महासचिव विनायक राव देशपांडे, गुजरात विहिप के अध्यक्ष दिलीप त्रिवेदी, विहिप के महामंत्री डॉ. कौशिक मेहता, वडताल के नवोत्त्म स्वामी, झंुडाल स्थित स्वामीनारायण मंदिर के पुरूषोत्तमचरण शास्त्री, संत समाज के अलावा राज्य के दिवंगत गृह राज्य मंत्री हरेन पंडया की पत्नी जागृति पंडया भी उपस्थित थीं।


हिन्दुओं को अंतर्मुखी होने की जरूरत
विहिप के स्वर्ण जयंती वर्ष के आरंभ होने के अवसर पर आयोजित इस हिन्दू संगम के उद्घाटन भाषण पर आरएसएस मुखिया ने भागवत ने कहा कि नारों व घोषणा से कुछ नहीं होने वाला। हिन्दुओं को अंतर्मुखी होने की जरूरत है। हिन्दुत्व को आचरण में उतारने की जरूरत है। अब वैचारिक दृष्टि से भारत दुनिया का नेतृत्व करने की स्थिति में आ गया है। उन्होंने कहा कि वे हिन्दू को ही आगे देखना चाहते हैं। दुनिया के सामने दूसरा कोई चारा नहीं है। वे अच्छा, पक्का व सच्चा हिन्दू खड़ा करना चाहते हैं जो आचरण से हिन्दू हो। हिन्दू विनम्र होता है, लालची नहीं होता। हिन्दू विचारों में हिन्दू होता है लेकिन व्यवहार में नहीं होता है। उन्होंने कहा कि सत्व सभी बातों का मूल है। जहां सत्व है, वहीं बल है और वहीं लक्ष्मी है।

साभार : राजस्थान पत्रिका, अहमदाबाद
साभार: दैनिक भास्कर भोपाल २५ मार्च २० १  ३



विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित