सोमवार, 17 अप्रैल 2017

मेरे पिता मेरे सपनों को पूरा करना चाहते थे .... फूलों से सुसज्जित ताबूत भेंट ....केरल में वामपंथी आतंक के पीड़ितों ने सुनाया अपना दर्द

हमारे कार्य का आधार घृणा, हिंसा नहीं, आत्मीयता है – डॉ. कृष्ण गोपाल जी

केरल में वामपंथी आतंक के पीड़ितों ने सुनाया अपना दर्द
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मेरे पिता मेरे सपनों को पूरा करना चाहते थे ....................................  
विस्मया, ये नाम अधिकांश ने सुना होगा. उसकी कविता सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुई थी. वह पुलिस अधिकारी बनकर अपने गांव की सेवा करना चाहती है, लेकिन वामपंथी गुंडों ने उसके पिता की हत्या कर दी. वह कहती है कि ---- मेरे पिता मेरे सपनों को पूरा करना चाहते थे, वह रात मेरे सारे सपनों को तबाह कर गई. उनकी (विस्मया के पिता संतोष कुमार, 52 वर्ष) बस एक ही गलती थी कि उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी का समर्थन (पार्टी गांव में भाजपा के समर्थन से पंचायत का चुनाव लड़ा था) किया था. अब मुझे अपने भविष्य में सिर्फ अंधकार दिख रहा है. उन्होंने सिर्फ मेरे पिता को नहीं मारा बल्कि मेरे सपनों और भविष्य़ की भी हत्य़ा कर दी. मुझे सिर्फ अंधकार दिख रहा है, पूर्ण अंधकार. मुझे अब तक यह जवाब नहीं मिला कि उन्होंने मेरे पिता को क्यों मारा?”


http://vskbharat.com/wp-content/uploads/2017/04/showimg-1.jpg अब किसके सहारे जियेंगी ..................... आंखों के सामने पुत्र की हत्या देख नारायणी अम्मा टूट गईं. अब वे इन वामपंथी गुंडों से दोनों हाथ जोड़कर एक ही प्रार्थना कर रही हैं कि जिस चाकू से उन्होंने उनके पति और बेटे को मारा, उसी से उन्हें भी मार दें. उन्हें किस लिये छोड़ दिया, अब किसके सहारे जियेंगी?”


चलते फिरते शहीद ..................
विभाग प्रचार प्रमुख प्रजिल चलते फिरते शहीद हैं, उनके शरीर पर करीब ढाई दर्जन घावों के निशान हैं. खुशकिस्मत हैं कि वामपंथी गुंडों के हमले में उनका जीवन बच गया.

दोनों पैर चले गए ..................
 श्रीधरन अपने घर के पास चीखने चिल्लाने की आवाजें सुनीं तो लोगों को बचाने के लिये दौड़े, लेकिन वामपंथी गुंडों ने उन पर बम फैंक दिया, जिसमें उनके दोनों पैर चले गए.

फूलों से सुसज्जित ताबूत भेंट ................
 केरल के एक कॉलेज की पूर्व प्राचार्या डॉ. टीएन सरसू, उनकी सेवानिवृत्ति पर कॉलेज की एसएफआई इकाई ने अनोखा गिफ्ट दिया, उन्हें सेवानिवृत्ति पर फूलों से सुसज्जित ताबूत भेंट किया गया.

ये केवल कुछ घटनाएं मात्र हैं, कहानी केवल यहीं तक सीमित नहीं है. शिवदा, रजनी पीड़ितों की सूची काफी लंबी है. पिछले साठ साल के दौरान 400 से अधिक कार्यकर्ता वामपंथी गुंडों के हिंसक हमलों का शिकार हुए हैं. केरल में वामपंथी सरकार के गठन के पश्चात हिंसक घटनाओं में अचानक बढ़ोतरी हुई है. नई सरकार के छोटे से कार्यकाल में अकेले कन्नूर जिले में 436 हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं. इसी कालखंड में 19 कार्यकर्ता मारे गए हैं, जिसमें 11 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के, 4 कांग्रेस के थे. 4 सीपीआई एम के कार्यकर्ता, लेकिन ये वामपंथी विचार को छोड़कर कहीं न कहीं संघ की शाखा, भारतीय मजदूर संघ या भाजपा की ओर आकर्षित थे. इस कारण उनकी भी हत्या कर दी गई.

लेकिन ये समस्त घटनाएं, परिवारों की पीड़ी कभी नेशनल मीडिया की सुर्खियां नहीं बनीं, न ही मानवाधिकार आयोग का कभी इन पीड़ितों की ओर ध्यान गया. न ही तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग का ध्यान इनकी ओर गया.

भगवान की धरती कहलाने वाला केरल आज मार्क्सवादी हिंसा का प्रतीक बन चुका है. केरल मार्क्सवादी हिंसा के चेहरे को सबके समक्ष लाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अभियान शुरू किया है. जिसके तहत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, इन कार्यक्रमों में केरल में मार्क्सवादी हिंसा के शिकार पीड़ित कुछ स्वयंसेवक परिवारों के सदस्य भी भाग ले रहे हैं. इसी निमित्त शनिवार 15 अप्रैल को दिल्ली में तीन कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, पहला कार्यक्रम जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में था, इसके पश्चात मीडिया जगत में कार्यरत पत्रकार बंधुओं के साथ गोष्ठी का आयोजन किया गया, तीसरे कार्यक्रम में दिल्ली के बुद्धिजीवी वर्ग (प्राध्यापक, अध्यापक, अधिवक्ता, व अन्य) के लिये नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर फ्रंट एवं योगक्षेम न्यास ने संगोष्ठी का आयोजन किया. इन कार्यक्रमों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी, प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार जी (मूलतः केरल निवासी) तथा पीड़ित परिवारों के सदस्य उपस्थित रहे. कार्यक्रम में शहीद स्वयंसेवकों की जानकारी पर आधारित पुस्तक आहुति का लोकार्पण किया गया.

हमारे कार्य का आधार घृणा, हिंसा नहीं, आत्मीयता है – डॉ. कृष्ण गोपाल जी
बम बनाना केरल में कुटीर उद्योग  

http://vskbharat.com/wp-content/uploads/2017/04/IMG_20170415_153220.jpgनई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल जी ने कहा कि बम बनाना केरल में कुटीर उद्योग जैसा बन गया है. पुलिस राज्य सरकार के आदेश पर सबूत इकट्ठे करती और बाद में उन्हें नष्ट कर  देती है. इसलिए वहां मार्क्सवादी विचारधारा से अलग विचार रखने वालों के लिए बहुत संकट पैदा हो गया है. केरल हमारे देश का ही एक अंग है, इसलिए यह सारे देश की समस्या है. वैचारिक भिन्नता से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इस देश का महान दर्शन, महान परम्पराओं को नष्ट नहीं करने दिया जा सकता. राज्य के मुख्यमंत्री, जिनके पास गृह विभाग भी है, उन्हें अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का पालन करना चाहिए. एक पार्टी कार्यकर्ता के रूप में नहीं बल्कि एक मुख्यमंत्री की तरह व्यवहार करना चाहिए. उन्हें राज्य में कानून, न्याय और शांति सुनिश्चित करनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि आरएसएस का विरोध किसी कम्युनिस्ट से नहीं है, अपितु भारत के लिए प्रतिकूल कम्युनिज्म विचारधारा से है. क्योंकि हमारे देश में शास्त्रार्थ कर अपने विचारों से दूसरों को जीतने की परम्परा रही है. किसी की हत्या से आतंक उत्पन्न कर अपने विचार मनवाना यह भारतीय परंपरा कभी नहीं रही. वामपंथ की विचारधारा भारतीय परंपरा, आध्यात्मिक दर्शन के अनुकूल नहीं है. ये देश प्रेम, करुणा, दया का देश है. संघ के कार्यकर्ताओं का स्वभाव सभी जानते हैं. आपातकाल में हजारों कार्यकर्ताओं ने यातनाएं झेलीं. लेकिन सरसंघचालक बाला साहब देवरस जैसे ही जेल से बाहर आए, उन्होंने एक ही बात कही, जिन्होंने हमको बंद किया, कष्ट दिया वे अपने ही थे, अपने मन के अन्दर से यह बैर-भाव निकाल दो, सबसे मित्रता रखो. हमारा दर्शन ही ऐसा है कि हम लम्बे समय तक अपने ऊपर हुए अत्याचारों को याद ही नहीं रखना चाहते. संघ का कार्य का आधार घृणा, हिंसा नहीं, आत्मीयता है, हममें विचारधारा की भिन्नता से घृणा उत्पन्न नहीं होती. यही कारण है कि विरोध के बावजूद देश में सबसे अधिक शाखाएं (लगभग 4500) केरल में हैं.

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प्रज्ञा प्रवाह के संयोजक जे. नंदकुमार जी ने कहा कि केरल में मार्क्सवादी आतंक से पीड़ित परिवारों को यहां लाना तथा उनके परिवार के सदस्यों की निर्मम हत्याओं का प्रस्तुतिकरण उनके तथा हमारे लिए अत्यंत कष्टकारी है, लेकिन केरल के बाहर वहां का सच तथाकथित बुद्धिजीवियों के सामने लाने का अन्य मार्ग न होने के कारण इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने पड़ रहे हैं. एक अखलाक की हत्या मीडिया में कई दिनों तक चर्चा व बहस का विषय बनी रहती है, लेकिन केरल में सत्ताधारी वामपंथियों की वैचारिक असहिष्णुता के कारण हुई नृशंस हत्याओं पर मीडिया में चर्चा नहीं होती. उन्होंने केरल से आये पीड़ित परिवारों का परिचय संगोष्ठी में आये बुद्धिजीवियों से करवाते हुए उनके परिजनों की मार्क्सवादियों द्वारा की गयी हत्याओं का उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि पीड़ित परिवारों की ओर से मानवाधिकार आयोग और अनुसूचित जाति आयोग में भी मामले को ले जाया गया है.

डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन वास्तव में हिंसा को रोकना चाहते हैं या सच को सबके समक्ष लाना चाहते हैं तो सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों से या पूर्व न्यायाधीशों से हिंसक घटनाओं की जांच करवाएं. पुलिस पर पार्टी का नियंत्रण है, पुलिस ट्रेड यूनियन में वामपंथी पदाधिकारी पुलिस विभाग में प्रमुख पदों पर विराजमान हैं. ऐसे में कैसे निष्पक्ष न्याय की उम्मीद की जा सकती है. उन्होंने बताया कि 1948 तक केरल में संघ की नाम मात्र की शाखाएं थीं, जनवरी 1948 में श्रीगुरूजी का प्रवास था. कार्यक्रम में 150-200 कार्यकर्ता उपस्थित थे, इस दौरान वामपंथी गुंडों ने हमला कर दिया था.

उल्लेखनीय है कि केरल में वामपंथी हिंसा के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ ही अन्य सामाजिक संगठनों ने धरना प्रदर्शन का आयोजन किया था . देशभर में लगभग 800 स्थानों पर विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया. जिसमें साढ़े चार लाख बंधु भगिनियों की भागीदारी रही. (केरल, पंजाब, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, गोवा, मणिपुर शामिल नहीं)

 
निकुंज सूद

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

विषम सामाजिक परिस्थितियों को रौंदते हुए हमारे राष्ट्र को सामाजिक समरसता के विचार डॉ अम्बेडकर ने दिए - नन्दलाल जी

 विषम सामाजिक परिस्थितियों को रौंदते हुए हमारे राष्ट्र को सामाजिक समरसता के विचार डॉ अम्बेडकर ने दिए - नन्दलाल जी 



पाली 14 अप्रेल २०१७ । शुक्रवार को लाखोटिया उद्यान स्थित माली समाज भवन में डाॅ सुरेन्द्रसिहजी की अध्यक्षता में डाॅ. भीमराव अम्बेडकर जयन्ती समारोह उत्साह व श्रृद्वा के साथ माल्यापर्ण कर मनाया गया। 

कार्यक्रम की जानकारी देते हुए संयोजक मुकेश  पोखरणा ने बताया कि इस अवसर पर डाॅ अम्बेडकर के व्यक्तित्व और विचार पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। 

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के राजस्थान के क्षेत्र कार्यकारिणी सदस्य श्री नंदलालजी जोशी ने कहा कि डाॅ भीमराव अम्बेडकर एक ऐसे अदभूत व्यक्तित्व के धनी थे जिन्होने विषम सामाजिक परिस्थितियों को रौदते हुए हमारे राष्ट्र को सामाजिक समरसता के ऐसे विचार दिये जो आज भी हमारे देश  के संविधान को गौरवान्वित कर रहे है। 

नंदलालजी जोशी ने कहा कि भेदभाव की पीड़ा में भी अपने अन्दर की प्रतिभा को प्रखर कर जीवन की सार्थकता को सिद्व करने वाले ऐसे चिन्तक के चिन्तन को सही व सकारात्मक रूप से समझकर आत्मसात करना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। 

सामाजिक भेदभाव पर कटाक्ष करते हुए जोशी  ने कहा कि भारत विश्व  गुरू था। कालान्तर में हमारी पराजय का कारण खोजे तो हम पायेंगे कि ज्ञान व वैभव के मिथ्या अभिमान की गलती से ही हम हारे। हमारी भारतीय संस्कृति का दृश्टिकोण इतना व्यापक है कि हम सृष्टि के प्रत्येक जीव में परमात्मा का अंश  देखते है। हमारी संस्कृति समन्वय व न्याय की संस्कृति है। ऐसी संस्कृति पर चालाक लोगो द्वारा आघात होता है तो मन में पीड़ा होना स्वाभाविक है। हमारे महापुरूषो  विवेकानन्द स्वामी, डाॅ हेडगेवारजी, स्वामी शिवानन्द ने सामाजिक समरसता को जो पाठ हमे पढाया, हमे उन्हीं के अनुभवो का अनुकरण करना चाहिए। 
 
डाॅ सुरेन्द्रसिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डाॅ अम्बेडकर के व्यक्तित्व में  हिन्दुवादी आदर्श था। संविधान निर्माण की जो आधारशीला रखी गयी है वो आज भी विश्व  में अहिंसा, प्रेम व त्याग का संदेश  देती है। उन्होने समाज के पिछड़े व दलित व समाज की मुख्य धारा में छुटे हुये नागरिको के उत्थान के लिए संविधान के कई उपयोग कर बल देते, संविधान के बारे में विभिन्न जानकारियाॅ दी।

 कार्यक्रम के अंत में जिला संघ चालक नेमिचन्द अखावत ने धन्यवाद ज्ञापित किया और समरसता मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।   
 
                                                                  

सामाजिक समरसता से दूर होगा छुआछूत- इंद्रेश कुमार जी

सामाजिक समरस्ता से दूर होगा छुआछूत- इंद्रेश कुमार जी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य इंद्रेश कुमार जी उध्बोधन देते हुए

जोधपुर, 14 अप्रेल। छुआछूत एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या हैं,। सामाजिक समरसता के माध्यम से ही इसे दूर किया जा सकता है। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य इंद्रेश कुमार जी ने उपस्थित जन समूह को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। अवसर था  राष्ट्रीय जन चेतना न्यास एवं नगर निगम जोधपुर द्वारा बाबा साहेब भीमराव अबेडकर की 126वीं जयन्ति  पर आयोजित कार्यक्रम का। खचाखच भरे जोधपुर के टाउन हॉल में बाबा साहेब के जीवन के कई पहलुओ को  इस कार्यक्रम को रेखाकिंत किया गया।

मुख्य वक्ता इंद्रेश कुमार जी ने कहा देश मे छुआछुत क्रूरता  की चरम सीमा पर था तब भीमराव अम्बेडकर का जन्म हुआ था। बाबा साहेब ने हिन्दुओ का धर्मान्तरण न हो  इसलिए हिन्दुत्व पंथ के भारतीय संस्कार एवं संस्कृति से जुड़े बौद्ध धर्म  को स्वीकार कर करोड़ो हिन्दुओ को धर्मान्तरण से बचाया। क्योंकि बाबा साहेब जानते थे कि अस्पर्शयता  को कभी धार्मिक ,नैतिक व सामाजिक अनुमति नहीं थी। जाति से पुकारने की परम्परा भी पुरातन भारत में नहीं थी। जातिवाचक पुकारने की परम्परा षडयंत्र पुर्वक अग्रेजों द्वारा चलाई थी जिसका मूल उद्धेश्य हिन्दू समाज का विभाजन करना था। जातिवाद छुआछुत को मिटाना ही सच्ची ईश्वर की भक्ति हैं।

उन्होने बताया संघ का सामाजिक, समरसता जनचेतना के प्रयास रंग ला रहे है, एक कुआ, एक मंदिर, एक शम्शान  का अभियान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ चला रहा है।

डॉ अम्बेडकर भारत  के विभाजन के पक्ष में नहीं थे
इंद्रेश कुमार जी ने अपने उध्बोधन में बताया कि  डॉ अम्बेडकर भारत  के विभाजन के पक्ष में नहीं थे इसलिए उन्होंने समझौते की बैठक से दुरी  बनाये रखी.  भारत को आज़ादी बाद में मिली पहले विभाजन मिला। 


छुआछुत मुक्त भारत के निर्माण का दिलाया संकल्प
सभी समाजो से आये समाज प्रतिनिधियों को  इस अवसर पर छुआछुत मुक्त भारत बनाने का संकल्प दिलवाया  समाज में खुशहाली हो, कोई भी बिना कपड़ा नहीं रहें, कोई भी भुखा नहीं रहे ऐसी हमारी ग्राम की रचना बननी चाहिये ।

जाति, बिरादरी के प्रतिनिधियों की रही सहभागिता
क्रार्यक्रम में सभी जातिबिरादरी के मुखिया एवं प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिससे कार्यक्रम का वातावरण सामाजिक समरसता , समानता और समता बना हुआ नजर आ रहा था।

मंच पर राष्ट्रीय जन चेतना न्यास के सत्यपाल हर्ष, राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के प्रान्त संघचालक ललित कुमार शर्मा , महापौर घनश्याम औझा एवं नगर निगम जोधपुर के आयुक्त शिव प्रसाद मदन नकाते भी विराजमान थे।

कार्यक्रम के समापन पर जन चेतना न्यास के सचिव हरदयाल वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 






सोमवार, 10 अप्रैल 2017

गौ रक्षा के दौरान कोई हिंसा न हो – डॉ. मोहन भागवत

गौ रक्षा के दौरान कोई हिंसा न हो – डॉ. मोहन भागवत

  
दिल्ली 9 अप्रैल 2017. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आज एक कार्यक्रम में कहा, "गौ रक्षा के दौरान कोई हिंसा न हो. गौ रक्षकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस दौरान किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे, नहीं तो गौ रक्षा के तरीके पर ही सवाल उठने लगेंगे."

श्री भागवत ने कहा, "गौ हत्या बंदी सरकार के अधीन है. हमारी इच्छा है कि पुरे भारतवर्ष के लिए कानून बने. इसके लिए केंद्र सरकार को एक कानून बनाना चाहिए." उक्त विचार डॉ. भागवत ने दिल्ली के तालकटोरा इनडोर स्टेडियम में भगवान महावीर जयंती महोत्सव महासमिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम महावीर जयंती महामहोत्सव के दौरान अपने संबोधन में कहा.

श्री भागवत ने कहा, "जैन धर्म हमें जीवों, प्राणियों और संपूर्ण श्रृष्टि की रक्षा करना, उनसे प्यार करना सिखाता है. अहिंसा की सीख देता है. हमें भगवान महावीर स्वामी के बताये हुए अहिंसा का मार्ग अपनाना होगा. तभी जाकर हम भारत को विश्व में एक मजबूत राष्ट्र बनाने में सफल हो पाएंगे."

उन्होंने कहा, "अगर सभी नागरिक अहिंसा का पालन करना शुरू कर दें तो सारे भारतवर्ष में किसी भी प्रकार की हिंसा की घटना नहीं होगी. जैन धर्म के मूल में भी अहिंसा है. अहिंसा करुणा से ही आती है और करुणा धर्म का अभिवाज्य घटक है. हमें अपने अन्दर करुणा के भाव उत्पन्न करने होंगे."

उन्होंने कहा, "अहिंसा का प्रचार अहिंसा का पालन करके ही करना पड़ेगा. किसी भी प्रकार की हिंसा भारतीय सभ्यता-संस्कृति में मान्य नहीं रही है. अहिंसा के आधार पर पूरा राष्ट्र एकजुट हो सकता है. इसलिए हमें मत और विचारों को मतभेद के नाते न देखते हुए मतभेदों को भुलाकर एकजुट होना है और राष्ट्र को मजूबत बनाना है."

उन्होंने कहा, "अहिंसा का पालन करने से श्रृष्टि का रख-रखाव होता है. अहिंसा किसी भी धर्म का मूल भाव होता है. धर्म जोड़ने वाला होता है. जोड़ने का और जोड़कर उन्नत करने का प्रयास धार्मिक प्रयास है. जैन धर्म और इसके आचार्य हमें इस बात की सीख देते हैं."

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

पाथेय कण हमें मनो से जोड़ रहा है और यह एक सामाजिक क्रान्ति का अग्रदुत है - जसवन्त जी खत्री

पाथेय कण हमें मनो से जोड़ रहा है और यह एक सामाजिक क्रान्ति का अग्रदुत है - जसवन्त जी खत्री
पाथेय कण पाठक सम्मेलन सम्पन्न , डाक मित्रों को किया सम्मानित

स्मृति चिन्ह व पाथेय विशेषांक की प्रति दी

बीकानेर 02 अप्रेल 2017 . राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार विभाग, बीकानेर महानगर के द्वारा  खेलकूद विभाग, राजकीय पोलिटेक्निक महाविद्यालय बीकानेर में पाथेय कण पाठक सम्मेलन एवं डाक मित्र सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।

सम्मान समारोह राजस्थान क्षेत्र के क्षेत्रीय सम्पर्क प्रमुख श्रीमान् जसवन्त जी खत्री के सानिध्य में आयोजित किया गया। उक्त कार्यक्रम की अध्यक्षता श्रीमान् जी.एन. कनवाड़िया, डाक अधीक्षक, मुख्य डाकघर बीकानेर ने की। उक्त कार्यक्रम में श्री देवाराम गोदारा, प्राचार्य, राजकीय पोलिटेक्निक महाविद्यालय बीकानेर का भी सानिध्य प्राप्त हुआ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजस्थान क्षेत्र के क्षेत्रीय सम्पर्क प्रमुख श्रीमान् जसवन्त जी खत्री ने कहा कि पाथेय कण एक परिवार के सदस्य के रूप में अपना स्थान बना चुकी है। पाथेय कण हमें मनो से जोड़ रहा है और यह एक सामाजिक क्रान्ति का अग्रदुत है। पाथेय कण द्वारा हमें सम्पूर्ण विश्व की गरिमामय जानकारी बखुबी प्राप्त हो रही है।

श्रीमान् जी.एन. कनवाड़िया, द्वारा प्रचार विभाग द्वारा डाक मित्रों को दिये गये सम्मान के लिए विभाग के उक्त कार्य की भरीभूरी प्रश्ांसा की गई।  

उक्त कार्यक्रम में बीकानेर के प्रचार प्रमुखों द्वारा डाक मित्र श्री धनश्याम दास सुथार, श्री विष्णुदत्त श्रीमाली, श्री सीताराम साध आदि का माल्यार्पण कर स्मृति चिन्ह के साथ पाथेय कण की प्रति देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर श्री सुरेन्द्र सिंह जी (गार्ड साहब), श्री उमेश भाटी, श्रीमती अनामिका श्रीमाली, श्री बाबुलाल जी एवं     श्री विवेक सक्सेना ने अपने विचार रखे। प्रचार विभाग, बीकानेर की ओर से विभाग प्रचार प्रमुख श्रीमान् एस. एल. राठी जी ने सभी आगुन्तकों का आभार व्यक्त किया व मंच का संचालन किया।

मंगलवार, 28 मार्च 2017

‘भेद रहित समाज का निर्माण होने वाला है’- श्री मोहनराव भागवत

‘भेद रहित समाज का निर्माण होने वाला है’-         श्री मोहनराव भागवत



 
फिर कोई अन्याय करने वाला खड़ा न होना सके— इसका इंतजाम होना चाहिए। यह सब इसलिए करना है ताकि संपूर्ण समाज एक हो सके। आपस में दुर्भावना बढ़ाने वाली भाषा नहीं होनी चाहिए। फिर व्यवस्था में इस दृृष्टि से जो-जो प्रावधान किए जाते हैं, या करने के सुझाव आते हैं, वे प्रावधान लागू हों। इस प्रक्रिया में सबको समाहित करते हुए, किसी की राह देखे बिना, नित्य व्यवहार में इसका प्रकटीकरण शुरू कर दें, तो फिर ये कार्य जल्दी हो जाएगा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत के ‘एक मंदिर, एक श्मशान और एक कुआं’ के भेदभाव दूर करने के आह्वान ने सामाजिक समरसता और सौहार्द के लिए एक नई कार्य दिशा दिखाई है। संघ से बाहर के बहुत से लोग भी इस पहल का स्वागत कर रहे हैं। तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस, जिन्होंने इस सुधारवादी विचार को सामाजिक बल प्रदान करने हेतु जो  गति दी थी, उसे आज श्री भागवत आगे ले जा रहे हैं। 

कोयम्बटूर में संपन्न रा.स्व.संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के अवसर पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर एवं आर्गेनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने उनसे बालासाहब देवरस, समरसता में उनके योगदान और आगे की दिशा में बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश :-


 समरसता संघ के स्वभाव में 1925 से ही रही है। आगे चलकर इस आग्रह के पीछे बालासाहब देवरस बड़ी प्रेरणा रहे। उनके योगदान को आप कैसे देखते हैं?

 हिन्दू संगठन समरसता के बिना असंभव ही है और इसलिए संपूर्ण हिन्दू समाज को एक करने के लिए उसकी दृष्टि भेदविहीन होनी, आवश्यक है। इसलिए समरसता की दृष्टि संघ के स्वभाव में ही है। परंतु संघ की शक्ति क्रमश: बढ़ी है। संघ में तो संघ के जन्म से ही यह व्यवहार है, परंतु बालासाहब जब सरसंघचालक बने, उस समय समाज द्वारा संघ से कुछ सुनने और कुछ मात्रा में उस पर विचार करने और प्रयोग करने की स्थिति भी बन रही थी। आज संघ की बात समाज सोचेगा, करेगा इसका परिमाण बहुत बड़ा है, तब उतना बड़ा नहीं था, लेकिन इसका प्रारंभ हो चुका था। संघ का यह समतामूलक, समरसतामूलक दृष्टिकोण समाज के लिए भी आवश्यक है। (यह दृष्टिकोण) समाज में भी जाना चाहिए। इस दृष्टि से सरसंघचालक बनते ही बालासाहब ने विषय रखा कि अब संघ का मुख्य ध्येय सामाजिक समरसता है। इसकी स्पष्टता स्वयंसेवकों में भी हो और समाज में भी हो, इसलिए बालासाहब ने बहुत सोच-समझकर वसंत व्याख्यानमाला का भाषण कुछ महीनों तक तैयारी के बाद दिया। संघ का इसके बारे में विचार, व्यवहार तो पहले से था लेकिन पीछे जो विचार प्रक्रिया थी, वह स्वयंसेवकों को भी स्पष्ट हो गई और समाज में भी एक संदेश गया।

संघ के इस आग्रह का समाज पर कैसा प्रभाव रहा?
 
यह सबको पता है कि संघ हिन्दुत्ववादी है। अब हिन्दू के साथ यह भेदभाव वाली बात चिपकाई जाती है तो फिर संघ का दृष्टिकोण क्या होगा? ऐसा मानने वाले लोग समाज में थे कि निश्चित ही यह जात-पात का समर्थन करने वाला, भेदभाव का समर्थन करने वाला संगठन होगा। तब संघ में इस बारे में, समाज के लिए सार्वजनिक रूप से बहुत चर्चा की गई। इस तरह के प्रश्न भी थे और समाज में उन प्रश्नों का लाभ लेकर संघ की खाल उधेड़ने वाले लोग भी थे। किन्तु जब बालासाहब ने (वसंत व्याख्यामाला, 8 मई, 1974, पूना में) स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह भेदभाव जड़-मूल से खत्म (छङ्मू‘, २३ङ्मू‘ ंल्ल िुं११ी’) हो जाना चाहिए, तो ये सारे प्रश्न एकदम समाप्त हो गए। इससे समाज में अपनी भूमिका रखने के लिए स्वयंसेवकों में एकदम हिम्मत आ गई। व्यवहार तो दिख ही रहा था परंतु इसके पीछे वैचारिक कल्पना कौन सी है, क्या है, इसकी स्पष्टता सामान्य स्वयंसेवकों को नहीं थी। (बालासाहेब का) भाषण है, जिसमें यह सारी बातें हैं कि वैचारिक परिकल्पना क्या है, क्या व्यवहार अपेक्षित है, क्या-क्या होना चाहिए। इससे स्वयंसेवकों के सामने विषय स्पष्ट हो गया। हमारा कहना क्या है, उस बारे में भी उनका आत्मविश्वास बढ़ गया। समाज में शंकाओं पर प्रामाणिक लोगों के लिए विराम लग गया। इस प्रकार एक बहुत बड़ी सुविधा बन गई। सामाजिक समता के संघर्ष में अन्य लोग स्पष्ट भूमिका नहीं ले पाए, लेकिन भेदभाव के शिकार समाज के साथ संघ के स्वयंसेवक स्पष्ट रूप से खड़े रहे, ऐसे अनेक प्रसंग हैं।

  वसंत व्याख्यानमाला में बालासाहब के ऐतिहासिक उद्बोधन के बाद संघ कार्य में कौन-कौन से नए आयाम जुड़े?
 
 समाज के साथ जब कार्य शुरू हुआ तो स्वाभाविक रूप से अनेक बातों में नए आयाम जुड़े। समाज के इस भेदभाव के शिकार वर्ग की समस्याएं क्या हैं? उनका मन क्या है? और जो समाज में एक खाई उत्पन्न हुई है, उसके बारे में, उसे पाटने के उपाय क्या होने चाहिए,  इस बारे में चिंतन शुरू हुआ। उसमें से सामाजिक समरसता मंच जैसी गतिविधि शुरू हुई। विशेषकर जो वर्ग हिन्दू समाज, हिन्दू वगैरह बातों से दूर रहने की मानसिकता में था, उसके साथ संपर्क करना, उसको समझाना-बुझाना, उसको शाखाओं में लाना, इसके प्रयत्न ज्यादा बड़े हो गए। इसके फलस्वरूप ऐसे वर्गों का आत्मसम्मान का जो संघर्ष था, उसमें हिन्दू संगठन करने वालों की धारा का बल भी कहीं-कहीं जुड़ने लगा।

 सामाजिक विभेदों को दूर करने के लिए और उपाय होने चाहिए?
 
एक सदा के लिए चलने वाला उपाय है कि अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, आजीविका के और सामाजिक आचरण में, सभी भेदभावों को नकारते हुए उचित भूमिकाएं लेना। प्रत्यक्ष व्यवहार की बातों के लिए अपनी आदत बदलना। जैसे अनेक भाषाओं में जातिवाचक मुहावरे हैं। भेदभाव का जो युग था, उसमें तथाकथित ऐसी जातियों, जिनको पिछड़ा कहा जाता था, अस्पृश्य कहते थे, ऐसी जातियों को जरा छोटा स्थान देने वाली कहावतें, मुहावरे हैं। हम उनका उपयोग करते हैं, तो उसके पीछे निहित द्वेषभाव चाहे नहीं लाते हैं, परंतु शब्द तो अस्तित्व में है और जो भेदभाव के शिकार हुए हैं, उनके हृदय में घर कर गए हैं। हमको ऐसी आदतें बदलनी पड़ेंगी। मन और विचार सहमत होने के बावजूद शरीर की आदत हो जाती है, वह बदलनी होगी। बोलने की आदत बदलनी पड़ेगी। हमारा व्यवहार पुरानी विषमता को त्यागकर समतायुक्त हुआ कि नहीं -लोग इसकी परीक्षा करेंगे। खासकर वे लोग इसकी परीक्षा करेंगे, जिनको हमको जोड़ना है, जिन अपनों को फिर से अपना बनाना है। सहज व्यवहार में भी अपने आप को परिष्कृत बनाकर प्रयोग करना होगा। उदाहरणार्थ- मान लीजिए, मैं किसी के घर गया। मुझे प्यास नहीं है, पानी आया और मैंने कहा, पानी नहीं पीना है, तो मेरे हृदय में भले ही कुछ न हो, लेकिन वहां शंका खड़ी होती है कि हमारे यहां पानी नहीं पीना चाहते। पूजनीय गुरुजी ने एक बार बहुत अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया। एक स्वयंसेवक ने कहा कि मेरी झोंपड़ी में आएं, चाय पीने के लिए, पास में ही है। वह झोंपड़ी में रहने वाला स्वयंसेवक था। गुरुजी ने कहा, चलो। एक तो ऐसा वर्ग, दूसरा बहुत गरीब। गुरुजी गए तो एक-दो कार्यकर्ता भी साथ थे। आधी झोंपड़ी में यह भी दिख रहा था कि घर की माता चाय बना रही है। बर्तन गंदा जैसा था, छलनी नहीं थी, कपड़े से चाय छानी गई, कपड़ा भी कैसा था, चाय आई तो एक ने कहा, मैं चाय नहीं पीता, दूसरे ने कहा, सुबह से बहुत चाय पी चुका हूं। गुरुजी ने चाय पी ली। बाहर जाने के बाद कार्यकतार्ओं ने पूछा, गुरुजी आपने ऐसी चाय कैसे पी ली? गुरुजी ने कहा, आप लोग उसकी चाय देख रहे थे! मैं तो उसका प्रेम पी रहा था। यही सहजता रखिए। प्रेम-सम्मान समाज की जरूरत है। तो अपने व्यवहार को ऐसा रखना चाहिए जिससे उनकी प्रेम-सम्मान की अपेक्षा की पूर्ति हो। ऐसे व्यवहार की आदत डालनी पड़ेगी। दूसरा, सार्वजनिक जीवन में ऐसे प्रश्न आते हैं। अंतरजातीय विवाह होता है, विरोध भी खड़ा होता है। संघ के स्वयंसेवक उसके समर्थन में खड़े दिखने चाहिए। होना भी चाहिए और सामान्यत: ऐसा है भी। यदि कोई अंतरजातीय विवाहों के संदर्भ में सर्वेक्षण करे तो सबसे ज्यादा स्वयंसेवक ही मिलेंगे। अनौपचारिक चर्चा में कई बार यह अनुभव देखने में आया है। महाराष्ट्र का जो पहला अंतरजातीय विवाह था उससे दो संदेश गए थे। एक डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का और दूसरा गुरुजी का। गुरुजी ने संघ के स्वयंसेवकों को ये लिखा था कि जो शारीरिक आकर्षण के चलते नहीं, बल्कि समाज में जो जाति प्रथा है, उसका विरोध दर्ज करने के लिए अंतरजातीय विवाह कर रहे हैं, मैं उनके इस अंतरजातीय विवाह का समर्थन भी करता हूं और अंतरजातीय विवाह को शुभकामनाएं भी देता हूं।
संघ के स्वयंसेवकों की इस प्रकार की भूमिका सार्वजनिक रूप से होनी चाहिए। स्वयंसेवक को किसी तात्कालिक भावनाओं में न बहते हुए, अहंकार में, इधर-उधर की चपेट में नहीं आना चाहिए। संघ के स्वयंसेवक समाज की एकात्मता, अखंडता, समरसता को ध्यान में रखकर भूमिका तय करें और उसका निर्भय रूप से निर्वहन करें, इसकी आवश्यकता है।

 समरसता की राह में कठिनाइयां क्या हैं?
 
 सबसे बड़ी जरूरत आदत बदलने की है। दो हजार वर्षों से हम जो कर रहे हैं, उसमें कई बातों में धर्म के नाम पर अधर्म हो रहा है। अपनी पुरानी बातों का मोह यदि छोड़कर नहीं जाता, तो उस मोह को तोड़कर, सत्य के साथ खड़ा होना पड़ेगा। बालासाहब ने सिरे से कह दिया - जड़-मूल से खत्म (छङ्मू‘, २३ङ्मू‘ ंल्ल िुं११ी’)। भेदभाव का विषय सामने ऐसे आता है कि प्राचीन ब्राह्मण व्यवस्था ने मुझ पर अन्याय किया। वे स्वार्थी लोग थे, अहंकारी लोग थे। पहली प्रतिक्रिया में पूर्वजों का बचाव करना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। वह कह रहा भेदभाव के निषेध की बात, उसके मन में हजारों वर्ष से चिढ़ है। चिढ़ को अनदेखा कीजिए। उसकी समता की बात का समर्थन कीजिए। क्योंकि अगर पूर्वज और परंपरा श्रेष्ठ है तो किसी के कहने से कोई आंच आने वाली नहीं है। अन्याय हो रहा है, तो उसका तो विरोध करना ही पड़ेगा। एक कार्यकर्ता से किसी ने एक बार कार्यक्रम में पूछा कि हिन्दू धर्म में प्रभु श्रीरामचन्द्र को आप बड़ा प्यारा मानते हैं, पर उन्होंने शंबूक वध किया, क्या उसका समर्थन करते हैं? तो हिन्दू के लिए यह बहुत टेढ़ा प्रश्न है। राम का निषेध करना, शंबूक वध का समर्थन करना-ये पेच फंसता है। संघ का जो कार्यकर्ता था उसने कहा कि पहले तो मैं आपका अभिनंदन करता हूं क्योंकि जिन्होंने आपको प्रश्न पूछने के लिए पढ़ा कर भेजा है, तो इस प्रश्न के जरिए उन्होंने भी मान लिया कि राम नाम के कोई हुए भी थे। यह बहुत बड़ी बात है। दूसरी बात है कि राम ने शंबूक वध किया या नहीं किया? क्योंकि अनेक लोग मानते हैं कि यह पूरा प्रकरण ही उत्तरकांड का पक्षिप्त भाग है। लेकिन हम जिस राम की पूजा करते हैं, उस राम ने एक अन्यायी राक्षस का वध किया था। शंबूक वध हमारे लिए राम के आदर का विषय नहीं है और अगर कल ऐसा सिद्ध हुआ कि ऐसा किया था तो हम शंबूक वध के लिए राम का धिक्कार भी करेंगे। ऐसा उसने सीधा उत्तर दिया। एक स्पष्ट भूमिका लेनी चाहिए। इसमें पूर्वजों का अनादर नहीं होता है। सावरकरजी कहते थे कि गलत बातों के लिए पूर्वजों को दोषी मत कहो, लेकिन पूर्वजों की गलत बातों का आदरपूर्वक धिक्कार करो। परंपराओं के बारे में अपनी भूमिका आदरपूर्वक धिक्कार की होनी चाहिए। ऐसा वे कहते थे। ऐसी बातों में कठिनाई आती है, संकोच होता है। ऐसे व्यावहारिक प्रश्नों में यदि स्वार्थ मार खाता हो, तो स्वार्थ छोड़ कर भी, जो उचित है उसका समर्थन करना चाहिए। उसमें कई बार समाज भी विरोध में खड़ा होता है। तो इसको सीखना पड़ता है, इसका आदर करना पड़ता है। अपने मन में आवश्यक साहस बना रहे, इसका प्रयास करना चाहिए। दूसरी बात आती है कि हजारों वर्ष अन्याय के कारण वहां क्रोध है, द्वेष है ये जानते हुए भी अपना प्रेम बनाए रखते हुए धैर्यपूर्वक व्यवहार करना। भड़ास निकलने के बाद वह शांत होगा-इस विश्वास के साथ सोचना पड़ेगा। इसका लाभ लेकर वहां सतत मन कलुषित करने वाले लोग और प्रवृत्तियां रहती हैं। यह षड्यंत्र चल रहा है। इसका ठीक से बंदोबस्त हो जाए। इसलिए अपने स्नेह से वहीं पर इसको समझने वाले लोग खड़े हों। यह बाधा नहीं, व्यवस्था की आवश्यकता है। यह सतत कार्य है।

 आपने कहा कि समरसता सतत चलने वाला काम है। इसमें समाज के विभिन्न घटकों की क्या भूमिका हो सकती है?
  
 एक तो बड़ा अच्छा उदाहरण दीनदयालजी ने रखा है कि गढ्डे में कोई गिरा है और उसको निकालना है तो ऊपर वाले को झुकना होगा। तभी वह हाथ दे सकता है। और नीचे वाले को अपनी ऐड़ियां उठाकर हाथ ऊपर उठाने होंगे। तभी वह उस हाथ को पकड़ सकता है। यह प्रयत्न शुरू हुआ है। ऊपर से झुकने का संकोच हटना चाहिए। ये एक बात है। ऊपर वाले घटक को झुकने का प्रयास रना चाहिए। और नीचे वाला घटक अपनी ऐड़ियां उठा कर हाथ ऊपर कर रहा है, उसमें उसकी जितनी मदद हो सकती हो, वह करनी चाहिए। दूसरा, ठंडे दिमाग से सोचना, बोलना, करना चाहिए। बालासाहब ने उस व्याख्यान में यह बात कही है कि अस्पृश्यता, अन्याय बहुत साफ है। आखिर अपना समाज एक है, यही मान्यता है न। समाज को एक रखना है, न कि अस्पृश्यता के शिकार लोग और अस्पृश्यता चलाने वाले लोग, इस प्रकार के दो वर्गों को हमेशा बनाए रखना है या झगड़ा बनाए रखना है। अगर झगड़ा नहीं बनाए रखना है, सर्वत्र शांति बनाए रखनी है, तो अपने-अपने विषय को भूलने वाले दोनों तरफ के लोगों को गाली-गलौज की भाषा छोड़नी पड़ेगी। इधर के लोगों को समझना पड़ेगा कि यह हजार वर्षों की चिढ़ बोल रही है। बहुत कठोर भाषा सुनने के बाद भी गुस्सा नहीं आने देना, यह इनको करना पड़ेगा। और इधर के लोगों को धीरे-धीरे समाज को गुस्सा आएगा, दूरी बढ़ेगी, ऐसा न करते हुए, यह अंतर कम हो ऐसी भाषा रखनी पड़ेगी। अन्याय का स्पष्ट उल्लेख करते हुए भी हम यह कर सकते हैं। नेतृत्व करने वाले लोगों को भी विवेक होना चाहिए कि यह अन्याय है, इसे समाप्त होना चाहिए, पूरी तरह समाप्त होना चाहिए। और फिर कोई अन्याय करने वाला खड़ा न होना सके- इसका इंतजाम होना चाहिए। यह सब इसलिए करना है ताकि संपूर्ण समाज एक हो सके। आपस में दुर्भावना बढ़ाने वाली भाषा नहीं होनी चाहिए। फिर व्यवस्था में इस दृष्टि से जो-जो प्रावधान किए जाते हैं, या करने के सुझाव आते हैं, वे प्रावधान लागू हों। इस प्रक्रिया में सबको समाहित करते हुए, किसी की राह देखे बिना, नित्य व्यवहार में इसका प्रकटीकरण शुरू कर दें, तो फिर ये कार्य जल्दी हो जाएगा।

सामाजिक परिवर्तन की इस प्रक्रिया में संघ की भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
 
 संघ की सबसे मूलगामी योजना प्रत्यक्ष व्यवहार के आधार पर सबको जोड़ना है। बाहर की परिस्थिति कुछ भी हो, समाज के सब वर्गों के लोग आपस में मित्र बनें। और जैसे एक वर्ग के लोगों में जो मित्र बनते हैं, फिर उनके परिवार भी मित्र बनते हैं, आना-जाना शुरू होता है, पारिवारिक आत्मीयता का व्यवहार होता है, उसी तरीके से सभी वर्गों के परिवार आपस में मिलते-जुलते रहें। ये जहां-जहां इस प्रकार का व्यवहार होता हो, ‘रोटी व्यवहार-बेटी व्यवहार’ तक में समता लाने का प्रयास होता हो, वहां-वहां अपना हाथ लगे, मदद हो, उसको बल मिले, उसकी विजय हो। यह हमारा कार्य है। अन्यायग्रस्तों का अन्याय जल्द से जल्द दूर हो। अपने व्यवहार के इस उदाहरण का समाज भी अनुकरण करे, इस उद्देश्य से समाज से बातचीत हो। इसलिए सर्वे करो, दुनिया के लोगों को बताओ कि यह ठीक नहीं है। उनको समझाओ। आपका व्यवहार भी लोग देखेंगे। उसके आधार पर समझेंगे तो उपाय होंगे।

 एक कुआं, एक मंदिर, एक श्मशान के आपके आह्वान के बाद आपको समाज के विभिन्न मत संप्रदायों के अग्रणी नेतृत्व से किस प्रकार की प्रतिक्रियाएं मिलीं?
 
 लगभग सारी प्रतिक्रयाएं अनुकूल रही हैं। विचार के तत्व को तो सौ प्रतिशत ने स्वीकार किया, लेकिन जिनको संघ की जानकारी नहीं है, अथवा जिनको विरोध ही करना है, उन्होंने इसके साथ ही जोड़ दिया कि अच्छा, अब जाग गए क्या?  अब तक कहां थे? यह एक प्रकार है। यानी मंदिर, पानी, श्मशान एक हो- इस बात का विरोध नहीं किया, लेकिन मेरे कहने पर शंका का एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया। अथवा यह कहा कि यह केवल बोलने की बातें हैं। विषय का सीधा विरोध कहीं नहीं हुआ। बहुत सारा समाज इससे आनंदित हो गया। संघ के सरसंघचालक ऐसा कहते हैं- इस बात से अन्यायग्रस्त समाज में तो एक आशा का संचार हुआ। इसके पीछे एक वृत्तांत है। मेरे भाषण में यह बात आने के पहले मैं पलामुरू गया था, जो तेलंगाना में है। वहां बहुत बड़ी संख्या ऐसे वर्गों की है, उनमें स्वयंसेवक भी हैं। यहां तथाकथित वाम विचारों के, तथाकथित दलित कहलाने वाले एक नेता मंच पर थे। पहले मेरा भाषण और बाद में उनका भाषण हुआ। मैं तब सरकार्यवाह था। मुझे सामाजिक समरसता का विषय रखना ही था। उसके बाद उन्होंने सार्वजनिक भाषण में कहा कि मैं तो मानता था कि संघ सवर्णों का है। लेकिन यहां तो मैं देख रहा हूं संघ में बहुमत तो हमारा हो गया और वह भी पूर्णकालिक लोगों में। और संघ के ‘जनरल सेक्रेटरी’ का भाषण मैंने सुना है। संघ भी सार्वजनिक तौर पर ऐसा बोलता है, यह मैं पहली बार सुन रहा हूं। उन्होंने प्रश्न भी किया कि वास्तव में संघ की भूमिका है क्या? भाषण होने के बाद हम सब बैठे हुए थे तो मैंने उनको कहा, हमारी यही भूमिका पहले से है, उनको आश्चर्य हुआ। फिर बाद में संवाद भी बढ़ा। कार्यकर्ताओं से और कभी-कभी मेरे साथ भी। इसी तरह की गप-शप में मैंने एक बार कहा कि मंदिर, पानी, श्मशान का विषय समाज में पहले जाना चाहिए, क्योंकि समाज को इस विषय में रोज की अनुभूति होती है। उन्होंने कहा, यह बात आप बोल नहीं सकते। मैंने कहा, मैं बोलने वाला हूं, आप आइए। उस विजयादशमी के उत्सव में वे आए। यह देखने के लिए आए कि मैं यह बोलता हूं या नहीं। इसके बाद उन्होंने अपने लोगों को संबोधित करते हुए बहुत बार यह कहा कि संघ इस प्रकार सोचता है। संघ वालों को दूर मत रखो। इस तरह जो वास्तव में प्रामाणिक नेतृत्व है, जो किसी राजनीति का भाग नहीं है, लेकिन जो पक्का तथाकथित दलित है, उसको यह सुनकर आनंद होगा। संघ के प्रति आशा जगेगी। संघ में विश्वास जगेगा। सारे देश में संदेश जाएगा।

राजनीतिक अनुकूलता इसमें कितनी सहायक होती है?
 
राजनीतिक अनुकूलता इसमें एक ही पहलू में सहायक हो सकती है। जो लोग राजनीति में हैं, वे सोचकर कुछ करें तो सहायक होती है। जहां समता चाहने वाले लोग सत्ता में हैं, वहां अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए संविधान प्रदत्त अधिकारों के साथ जगह-जगह पर जो कानूनी प्रावधान हैं, वे ठीक से लागू हो जाएं। यदि सरकारें इतना ही देख लें कि समय पर उनका धन आवंटित हो रहा है, योग्य व्यक्ति द्वारा कार्य हो रहा है, तो बहुत बड़ा काम हो जाएगा। यानी पचास प्रतिशत से ज्यादा उनकी दुर्व्यवस्था दूर हो सकती है। यह प्रावधान पहले से ही हैं। हम मानते हैं जहां-जहां सरकारों में स्वयंसेवक हैं, वहां उनका ध्यान इस ओर ज्यादा रहे। यह करना उनके हाथ में है, हम इसके लिए आग्रह कर सकते हैं, और कर भी रहे हैं।

समाज समरस हो, एकात्म हो, इसके लिए समाज अपने सामने क्या उदाहरण रख सकता है, उसकी प्रेरणा क्या होगी?
 
 वास्तव में जो प्रेरणा है वह हमारी संस्कृति में है- सत्य, करुणा, शुचिता, तपस्या-धर्म के ये चार पात्र हैं। सत्य क्या है? सत्य हमारी सबसे बड़ी मान्यता है कि सबमें एक ही तत्व है और उसी का आविष्कार सब हैं। कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई अपना-पराया नहीं। सब अपने ही हैं। अब इसका स्वभाविक परिणाम है कि यदि कोई दुर्व्यवस्था हो तो अपनों के लिए करुणा मन में होनी ही चाहिए। धर्म यानी समाज की धारणा इन दो तत्वों से शुरू होती है कि सब मेरे ही अपने हैं, मैं ही सब में हूं, सब मुझमें हैं और इसलिए कोई दुर्व्यवस्था में न रहे, यह देखना मेरा काम है। यह करुणा आत्मीयता से उपजती है। ऐसा व्यक्ति यदि पवित्र है, स्वार्थी नहीं है, विकारों से दूषित नहीं है, लोभ-दंभ, मोह, काम-क्रोध उसमें नहीं है तो वह अपना जीवन लोक कल्याणकारी ही बनाएगा। लोक कल्याणकारी जीवन उसे धर्म की धारणा देगा। इसलिए धर्म यानी समाज की धारणा-इन चार बातों का ध्यान रखना चाहिए। यह हमारी संस्कृति का आदेश है। तथागत ने यही कहा है, भगवद्गीता में यही बात कही गई है। श्रीभगवत्पुराण यही कहता है। शिवपुराण यही कहता है। हमारी जितनी भारतीय विचारधाराएं हैं, उनके दर्शन अलग-अलग हैं। जगत के मूल में जड़ है या चेतन है, इसका चिंतन अलग है। लेकिन प्रत्यक्ष व्यवहार में सभी का आदेश सत्य है। यह केवल लिखित नहीं है। हमारे हजारों संतों ने ऐसा जीवन व्यतीत किया है। यह पुरानी बात नहीं है। आधुनिक संतों ने भी यही कहा है। स्वामी विवेकानंद ने वाराहनगर मठ के काम करने वाले मजदूरों को अपने हाथ से सुग्रास भोजन करवाया। उसका उत्सव मनाया। सबको बताया कि असली नारायण तो यही हैं। पीड़ा कैसी होती है, यह अनुभव करने के लिए गाडगे बाबा किसी बावड़ी पर जाते थे और पानी मांगते थे। किसान कहता था कि अभी मैं आराम कर रहा हूं, पानी पीना हो, तो तुम रस्सी से खींच लो। वह पानी खींचते थे। कई बार उनके पानी पीते समय किसान को याद आती थी कि वह किस जाति के हैं। गाडगे बाबा अपनी जाति जान-बूझकर नहीं बताते थे और मार खाते थे। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने भी ऐसा बहुत बार किया। ऐसे संत आधुनिक समय में भी हमारे यहां हैं। उनका प्रत्यक्ष जीवन है। सब त्याग करके और सब दुख सहन करके भी इस रास्ते पर चलते हैं। यह बहुत बड़ी प्रेरणा है। ये समाज मेरा अपना है। देश मेरा अपना है। यह क्या कम बड़ी प्रेरणा है! मेरे अपने लोग ऐसे ही रहे, तो मेरा नाम किस काम का। क्या रहेगा दुनिया में? मैं भारत से विदेश में जाता हूं, तो भारत में जात-पात का इतना बड़ा भेद है, यह बात मेरी गर्दन झुकाएगी या ऊंची करेगी? समाजभक्ति, देश भक्ति, संस्कृति भक्ति यह बहुत बड़ी बातें हैं।

 भारतीय दर्शन की बात करें, तो विविधता में एकता हिन्दू समाज की शक्ति है, इसमें भेद पैदा करने की होड़ क्यों बढ़ रही है?
 
 भेद पैदा होने का एक कारण तो अपनी आत्मविस्मृति है। मैं आपको अपना प्रतिद्वंद्वी मानने लगूं, तो स्वाभाविक तौर पर, अपनी हित रक्षा के स्वार्थ में मैं आपकी हित रक्षा की अनदेखी करने लगूंगा, कभी-कभी आपके हित का विरोध भी करूंगा। देश पर आक्रमण करने वाला, जो कम से कम उस दिन तो आपका और मेरा दोनों का विरोधी होता है। लेकिन आपस में भेद होने के कारण  मैंने ऐसा नहीं माना, और आपको नीचा दिखाने के लिए मैंने उसको बुला लिया। बाबासाहब आंबेडकर ने भी संविधान सभा की बहस में यही कहा कि किसी ने अपने बल पर भारत को नहीं जीता। हमारे अपने भेदों के कारण वे जीते और गद्दारी के कारण हमने अपना देश उनके हवाले किया। यह हमारे देश के इतिहास का हिस्सा रहा है। इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। यह हमारी आत्मविस्मृति की पराकाष्ठा है। फिर से हम उस ज्ञान का स्मरण करें कि हम एक हैं। इन भेदों को और चौड़ा करने वाली निहित स्वार्थी शक्तियां देश के अंदर और देश के बाहर बहुत हैं। जहां-जहां लोगों को बांट कर लाभ हो सकता है, वहां-वहां लोगों को बांटना और उनके बंटवारे की आग पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकना— ऐसा करने वाले लोग और स्वार्थी शक्तियां रहती हैं। ये लोग उसका लाभ लेते हैं। मैं समझता हूं कि बार-बार ऐसा करने वाले लोगों के बजाए ज्यादा उचित होगा कि हम लोगों का ध्यान इस पर हो कि हमको यह याद रखना है और याद रखके उचित व्यवहार करना है।

आप देश में लगातार प्रवास करते हुए समरसता का विषय रख रहे हैं। आप इसका फलित कैसे देखते हैं?
 
 देखिए, मुझे लगता है कि समरसता पर आग्रह रखें और इन बातों के पीछे अपना व्यवहार सब पहलुओं पर स्थापित करें, वही हम लोग कर रहे हैं। इससे एक दिन यह बात सिरे चढ़ेगी और समाज इसको मानेगा। क्योंकि लोगों को बांटने वाले और उस पर अपना खेल खेलने वाले लोग बहुत थोड़े दिन के हैं। और ऐसे थोड़े लोग हैं जो ये सारी बातें समझकर एकदम आदर्श व्यवहार अपने आप कर रहे हैं। बीच का जो अस्सी प्रतिशत या नब्बे प्रतिशत समाज है, वह हवा के साथ इधर उधर झूलता है किन्तु मूल में मनुष्यता से परिपूर्ण है। इसलिए वह सद्प्रवृत्त है। सद्प्रवृत्ति की राह मिलेगी तो वह उधर जाएगा। सद्प्रवृत्ति की हवा जितनी जल्दी बनाएंगे, उतना जल्दी समाज उसी पर आ जाएगा, जो उचित है, सत्य है और न्यायपूर्ण है। मुझे लगता है कि, जैसा कि बाबासाहब कहते थे भेदरहित, समतायुक्त, शोषणमुक्त राष्ट्र व समाज का सपना लेकर हजार सालों में बहुत उठापटक हुई है। बहुत लोगों ने काम किया है। लेकिन तब से लेकर अब तक चले सारे प्रयासों का सम्मिलित फल आने वाले समय में हमें मिलने वाला है और भेदरहित समाज का निर्माण होने वाला है।

साभार : पाञ्चजन्य http://panchjanya.com//Encyc/2017/3/27/spl-Interview.aspx

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित