बुधवार, 20 अगस्त 2014

दिशा सही है, लेकिन अभी रास्ता लंबा : भैयाजी जोशी 

दिशा सही है, लेकिन अभी रास्ता लंबा : भैयाजी जोशी 

 

विश्व हिन्दू परिषद की प्रकृति, विविध आयाम और इसकी गतिविधियों एवं समाज में इसके योगदान की 50 वर्षीय यात्रा पर पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर एवं आर्गनाइजर के संपादक  प्रफुल्ल केतकर ने रा.स्व.संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी से विशेष बातचीत की, जिसके प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं: 
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्ष 1925 से हिन्दुओं को संगठित और शक्तिशाली बनाने के लिए कार्य कर रहा है, फिर विश्व हिन्दू परिषद जैसे दूसरे संगठन की स्थापना की आवश्यकता क्यों पड़ी?
1925 में जब संघ की स्थापना हुई थी तो समाज के सभी वर्गांे के लिए देश की स्वतंत्रता एक सबसे बड़ा लक्ष्य था, लेकिन डॉ. हेडगेवार ने अपनी दूरदर्शी सोच एवं व्यापक दृष्टिकोण से देश की स्वतंत्रता के साथ-साथ समाज को संगठित व एकजुट करने की भी परिकल्पना की थी। वे अपने समाज की कमजोरियों को जानते थे जिनके चलते हम दूसरों के अधीन रहे थे। इसलिए वे इन कमजोरियों का ही समाधान करना चाहते थे। संघ के रचनात्मक कार्य के दो आयाम रहे हैं। पहला, हिन्दू समाज में यह आत्मविश्वास जागृत करना कि 'हम एक साथ आयें और साथ-साथ रहें'। दूसरा यह कि इस समाज के सदस्यों को यह अनुभूति हो कि हमने समाज के हित के लिए विशिष्ट योगदान देना है। इस लक्ष्य को पाने के लिए आवश्यक है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व का निर्माण किया जाये और परिवर्तन के लिए ऊर्जस्वी एवं उत्साहयुक्त नागरिकों का संगठन स्थापित किया जाये। मनुष्य समाज के लिए बना है, इस प्राथमिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर संघ ने 1925 में कार्य प्रारंभ किया। जैसे-जैसे संघ का कार्य विस्तृत हुआ, स्वयंसेवक सामाजिक मुद्दों पर प्रतिबिंबित होने प्रारम्भ हो चुके थे और यह प्रक्रिया निरंतर 1947 तक चलती रही। स्वतंत्रता के बाद यह महसूस किया जाने लगा कि जब तक राष्ट्रीय जीवन क ो प्रभावित करने वाले विभिन्न आयामों पर व्यवस्थित तरीके से नहीं सोचा जाएगा, चाहे वह शिक्षा हो, कृषि हो, धर्म या समाज, तब तक वास्तविक ठोस परिवर्तन नहीं हो पाएगा। संघ के इसी चिंतन से प्रेरणा लेकर स्वयंसेवकों ने विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करना प्रारंभ किया। भारतीय समाज क ी सबसे बड़ी विशेषता है इसकी गहरी धार्मिक मान्यताएं और परम्पराएं। भारतीयों में यह स्वभावगत विशेषता होती है कि चाहे शिक्षा के स्तर पर, वर्ग या अन्य के बावजूद कुछ मान्यताओं अथवा गुरुओं का अवश्य अनुकरण करते हैं। विभिन्न सम्प्रदायों की अपनी-अपनी शक्तियां और अपने अनुयायी होते हैं। ऐसे में उनको जोड़ना कठिन कार्य था। इसी परिप्रेक्ष्य में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी की प्रेरणा से विभिन्न सम्प्रदायों और वर्गों को संगठित करने के उद्देश्य से 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की गई थी। बड़ी संख्या में देश और विदेश में रह रहे हिन्दुओं के साथ संवाद स्थापित किया गया और राष्ट्रीय मूल्यों और संस्कृति से उन्हें जोड़ा गया।
- आपने अभी बताया कि इन सभी संतों और धर्मगुरुओं को एक मंच पर लाना कठिन कार्य था, श्री गुरुजी ने उनको ऐसा विशेष आकर्षक संदेश दिया। क्या इसी कारण वे सब विश्व हिन्दू परिषद के साथ एक मंच पर आने पर सहमत हो गए?
यही कारण है कि श्रीगुरुजी ने व्यक्तिगत रूप से रुचि लेकर इस मामले को प्रभावी बनाया। उन्होंने यह सामान्य तथ्य महसूस कराया कि यद्यपि बाहरी तौर पर भारत में अलग-अलग मतों-सम्प्रदायों में अलग-अलग पद्धति और मत हैं, लेकिन हमारी आंतरिक अन्त: प्रेरणा एक ही है। चाहे मोक्ष हो, निर्वाण हो, निरंकारी या कोई भी नाम, आखिर लक्ष्य तो सभी का एक ही है, भले ही रास्ते अलग-अलग हों। और तो और इन सभी वर्गों और सम्प्रदायों की कमजोरियां भी एक समान हैं, चाहे वह असमानता हो या अस्पृश्यता। इन सभी को सामूहिक प्रयत्नों से दूर किया जा सकता है। मानवता की इस वंशानुगत विरासत को हम सभी को मिलकर बचाना है। श्री गुरुजी इस बात को धार्मिक गुरुओं को समझाने में पूरी तरह सफल रहे कि उन्हें बिना अपना रास्ता बदले उस एक ही दिशा में जाना चाहिए।
ल्ल अपने गठन के बाद से विश्व हिन्दू परिषद ने कई मुद्दों को उठाया और राष्ट्रीय महत्व के बड़े-बड़े आंदोलनों का सफलता के साथ नेतृत्व किया। आप इन सभी गतिविधियों का भारतीय समाज और हिन्दू मत विचार पर कितना प्रभाव मानते हैं?
जब हम सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान की बात करते हैं तो हम विभिन्न उपकरणों और व्यूह रचनाओं के विषय में सोचते हैं। कुछ रास्ते जनजागरण के होते हैं और कुछ विरोध प्रदर्शन के। गंगासागर और एकात्मता यात्राएं जनजागरण की यात्राएं कही जा सकती हैं। कुछ मुद्दे तात्कालिक थे जैसे-मीनाक्षीपुरम में बड़ी मात्रा में हो रहा मतांतरण, कई भारतीयों को दु:खी कर रहा था। विदेशी धन के बल पर मतांतरण नहीं होना चाहिए, इसलिए इसके विरुद्ध जनता का आंदोलन प्रारंभ हुआ था। यह शुद्ध रूप से राष्ट्रीय और जागरूकता का आंदोलन था, किसी मत विशेष के विरुद्ध नहीं। राम जन्मभूमि आंदोलन शायद सबसे बड़ा आंदोलन था जो राष्ट्रीय पुनरोदय और एकता का प्रतीक बना। दुर्भाग्य से इसे इस्लाम-विरोधी रंग दे दिया गया। इस आंदोलन में किसी भी अन्य गैर हिन्दू धार्मिक स्थल को नहीं छेड़ा गया, चाहे वह अयोध्या हो, मथुरा या काशी जबकि ये आक्रांताओं के प्रतीक हैं। केवल आत्मसम्मान के प्रतीक स्थल जनता से संबंधित होते हैं। यह एकजुट भारतीय ही हैं, जो सभी सीमाओं, यहां तक कि वोट बैंक की राजनीति के बाद भी इस एकीकृत शक्ति का सम्मान सिखाते हैं।
- कुछ क्षेत्रों में विश्व हिन्दू परिषद के बारे में गलत अवधारणा और विचार हैं कि यह एक उग्र या रूढि़वादी संगठन है?
यह मुख्य रूप से मीडिया द्वारा राजनीतिक दृष्टि से गढ़ी गई बात है। मैं प्रत्येक व्यक्ति से यह कहना चाहता हूं कि संगठन के मूल्यांकन के लिए न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए संस्कृति, परम्परा और नेतृत्व को मानक बनाया जाए। हिन्दू सोच कभी उग्र या रूढि़वादी नहीं हो सकती। हिन्दुओं को विरासत में केवल कल्याण की अवधारणा ही प्राप्त हुई है और विश्व हिन्दू परिषद उसे आगे बढ़ा रही है। हिन्दुओं से संबंधित कोई भी चीज साम्प्रदायिक नहीं हो सकती है। यह किसी का व्यक्तिगत विरोध नहीं करती, सामाजिक जीवन में पूर्वाग्रह के साथ दुष्प्रचार करना बेइमानी कहलाएगा। कुछ लोगों को समवेत् रूप में सक्रिय होना होगा।
- विश्व हिन्दू परिषद समरसता का उद्देश्य लेकर सक्रिय है। इस मुद्दे को आगे ले जाने में यह संगठन कहां तक सफल रहा है?
दुर्भाग्य से हम दो कारणों से बंटे हुए हैं, एक तो यह कि हम यह भूल गए कि हम हिन्दू हैं और दूसरा परस्पर जातिगत दुराव। भारत में जाति को जन्म आधारित नहीं माना गया, किन्तु मध्यकाल में आक्रांताओं ने इसे व्यवसाय क ी बजाय जाति से जोड़ दिया और भारत में अस्पृश्यता पर आधारित जातिवाद को बढ़ावा मिला। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' के सिद्धांत को भूलकर हमने असमानता को ज्यादा फैला दिया। 18 पुराणों की रचना करने के बाद महर्षि व्यास ने कहा कि 'परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीड़नम', हम इसे भूल गए और हमारी सोच हीनतर हो गई। हम ने ईश्वर की भक्ति नकार दी और इसे धर्म का नाम दे दिया। आज अपने आंतरिक सिद्धांतों को व्यवहार में उतारकर विश्व हिन्दू परिषद सामाजिक समानता और समरसता के लिए ठोस कार्य कर रहा है। श्री गुरुजी के नेतृत्व में विश्व हिन्दू परिषद ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया था-'हिन्दव: सोदरा सर्वे' और 'न हिन्दू पतितो भवेत्'। इन ध्येय वाक्यों ने यह संदेश दिया कि समाज में सब समान हैं। एक स्वर में सभी धार्मिक नेताओं ने यह संदेश दिया कि इस समाज में कोई भी निम्न नहीं है। भारतीय इतिहास में यह क्रांतिकारी क्षण था। तथाकथित वंचितों की धार्मिक और सामाजिक प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कई परियोजनाएं और कार्यक्रम प्रारंभ किए गए। और तो और श्रीराम मंदिर की नींव का पत्थर भी एक वंचित वर्ग के व्यक्ति रामेश्वर चौपाल द्वारा स्थापित कराया गया- जिसका स्पष्ट संदेश सामाजिक समरसता का प्रमाण है। सभी जाति के लोगों को वैदिक परम्परा, कर्मकांड और अर्चक के रूप में, मंदिर के ट्रस्टी के रूप में और अन्य कई महत्वपूर्ण कार्यों में विश्व हिन्दू परिषद ने आगे बढ़ाया है। ये हजारों वर्ष पुरानी समस्याएं हैं, जो एकदम तो नहीं जाएंगी, लेकिन हम इन्हें धीरे-धीरे लंबी प्रक्रिया के साथ समाधान तक पहंुचाना चाहते हैं।
- विश्व हिन्दू परिषद धार्मिक संस्थानों के माध्यम से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बहुत प्रभावी कार्य कर रही है और तो और प्रशिक्षण भी इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष है। आप इस क्षेत्र में हो रहे सेवाकार्य को कैसे देखते हैं?
हमें इसे विभिन्न दृष्टिकोणों से देखना होगा। समाज के सभी वर्ग इस अनुभव और इसके परिणाम को देख रहे हैं। इसको देखने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हमारे पास जो कुछ है, हम उसे लोगों की आवश्यकता की पूर्ति में लगाएं। यह वित्तीय सहायता के रूप में भी हो सकता है, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार देने या अन्य रूप में भी किया जा सकता है। विश्व हिन्दू परिषद समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अलग-अलग रूपों, विशेषकर धार्मिक संस्थानों के माध्यम से विशिष्ट सेवाएं उपलब्ध करवाकर श्रेष्ठ कार्य कर रही है। आज भी समाज में कई वर्ग ऐसे हैं, जो बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, सरकार सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकती। व्यक्ति, संगठन, समाज और सरकार जब साथ-साथ मिलकर कार्य करेंगे, तभी सभी के जीवन के लिए न्यूनतम उपलब्ध हो पाएगा। विश्व हिन्दू परिषद ने हिन्दू चिंतन के इसी विशिष्ट पक्ष का स्पर्श किया है और वास्तव में यह कर रहा है। इनमें एकल विद्यालय, छात्रावास, स्वास्थ्य सुविधाएं, प्रशिक्षण शिविर आदि इस वृहत्तर दृष्टि के प्रमाण हैं।
- पिछले 50 वर्षों में आप विश्व हिन्दू परिषद की भूमिका को कैसे आंकते हैं, यह अपने उद्देश्यों को पाने में कहां तक सफल हुई है? इस स्वर्णजयंती वर्ष में विश्व हिन्दू परिषद की ओर से क्या प्रस्ताव होने चाहिए?
ईमानदारी से कहा जाए तो समाज निर्माण के कल्याण हेतु बने ऐसे संगठनों के जीवन में 50 वर्ष का कालखंड बहुत बड़ा नहीं होता। इसलिए मूल्यांकन कार्य को मात्रा के बजाय संगठन की दिशा से संबंधित होना चाहिए। विश्व हिन्दू परिषद की दिशा का मूल्यांकन केवल व्यापक समाज द्वारा नहीं, बल्कि विहिप द्वारा स्वयं भी किया जाना चाहिए। क्या लक्षित ध्येय की प्राप्ति के लिए पूरी ताकत और संसाधनों का उपभोग किया गया या नहीं। इस अवसर पर इसी उद्देश्य पर ध्यान देना चाहिए। समाज हमारे साथ कार्य करने को तत्पर है।
क्या विश्व हिन्दू परिषद प्रत्येक को साथ लेने के लिए प्रभावी रूप में तैयार है, वास्तविक प्रश्न तो यह है। कई ज्ञात-अज्ञात नाम ऐसे हैं जो दिन-रात विहिप के माध्यम से सेवा कार्यों में लगे रहे। दादा साहब आपटे, राजा भाऊ डेगवेकर और आचार्य गिरिराज किशोर और इन सब के साथ आज के दिन तक अशोक सिंहल भी हैं।
इन सभी ने संगठन के लिए ठोस कार्य किया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े तो उसे इन लोगों के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए। उसके बाद उन्हें संगठन की दिशा के विषय में संशय नहीं रहेगा।... लेकिन फिर भी हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अभी रास्ता लंबा है। 
साभार: पाञ्चजन्य

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित