गुरुवार, 21 अगस्त 2014

संघ प्रमुख के बयान पर इतनी तिलमिलाहट क्यों ?

संघ प्रमुख के बयान पर इतनी तिलमिलाहट क्यों ?


संघ से मतभेद होना एक बात है, लेकिन उसका तालिबान या आतंकवाद फैलाने वाले आईएआईएस, अल कायदा आदि से कैसे तुलना की जा सकती है ? क्या उस विचारधारा में इतने सरेआम विरोध की गुंजाइश है ? अगर संघ इन संगठनों की तरह होता तो विरोधी आज कहां होते इसकी कल्पना करिए और देश अभी किस दशा में होता ? हम भी इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया की स्थिति में पहुंच गए होते।

- अवधेश कुमार
हमारा देश ऐसी अवस्था में पहुंच गया है जहां ऐसा लगता ही नहीं कि किसी के बयान पर शांति और संतुलन से विचार कर प्रतिक्रिया देने की हम आवश्यकता समझते हैं। किसी का एक बयान आया नहीं कि हम उसका परिप्रेक्ष्य, पृष्ठभूमि संदर्भ आदि जाने बिना बयानवीर बन कर खड़े हो जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ.मोहन भागवत के हिन्दू संबंधी बयान पर जो बावेला खड़ा करने की कोशिशें हो रहीं हैं वे इसी श्रेणी की हैं। अगर कटु सच कहा जाए तो जिस ढंग से विरोधी नेताओं और मीडिया के एक धड़े ने इसे महाविवाद का मुद्दा बनाया वह हास्यास्पद है। इसलिए नहीं कि उनको असहमति व्यक्त करने का अधिकार नहीं है, बल्कि इसलिए कि इनने इसे इस तरह प्रस्तुत किया मानो पहली बार और कोई अजूबी बात मोहन भागवत ने कही है।
संघ के विचारों से मतभेद होना अपनी जगह है, पर जिन्होंने संघ के विचारों को पढ़ा है, संघ नेताओं के भाषणों को सुना है, वे नि:संकोच कहेंगे कि भागवत ने कोई नई बात नहीं कह रही है। संघ की मान्यता है कि किसी व्यक्ति का मजहब कुछ भी हो सकता है, उसकी उपासना पद्धत्ति कोई भी हो सकती है, पर हिन्दुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। हिन्दू विशेषण संघ राष्ट्रीयता के तौर पर प्रयोग करता है। संघ का कोई सरसंघचालक, कोई ऐसा पदाधिकारी नहीं होगा जो यह बात बार-बार बोला नहीं होगा।
किंतु खबर यह दी गई कि उड़िया भाषा के एक साप्ताहिक पत्रिका के स्वर्ण जयंती समारोह में संघ प्रमुख ने ऐसा बयान दिया है जिससे विवाद पैदा हो गया है। असल में यही संघ की मूल विचारधारा है। वे हिन्दू राष्ट्र शब्द का प्रयोग इसी संदर्भ में करते हैं। इसलिए मोहन भागवत ने कटक की सभा में जो कहा वह उनकी परंपरागत सोच और पहले से कही जा रही बातों की पुनरावृत्ति भर है। लेकिन हमारी मीडिया की कृपा और कुछ नेताओं की शब्दवीरता से ऐसा संदेश निकला मानो मोहन भागवत ने ऐसा बयान दिया है जो पहले कभी आया नहीं और इस कारण इतना बड़ा विवाद खड़ा हो रहा है। आइए, यह देखें कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा क्या है। इन पंक्तियों पर दृष्टिपात करिए, ‘अगर इंग्लैंड में रहने वाले अंग्रेज हैं, जर्मनी में रहने वाले जर्मन हैं और अमेरिका में रहने वाले अमेरिकी हैं तो फिर हिंदुस्तान में रहने वाले सभी लोग हिंदू क्यों नहीं हो सकते ?...सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश में रहने वाले इस महान संस्कृति के वंशज हैं।...हिंदुत्व एक जीवनशैली है और किसी भी ईश्वर की उपासना करने वाला अथवा किसी की उपासना नहीं करने वाला भी हिंदू हो सकता है।...दुनिया अब मान चुकी है कि हिंदुत्व ही एकमात्र ऐसा आधार है, जिसने भारत को प्राचीन काल से तमाम विविधताओं के बावजूद एकजुट रखा है। स्वामी विवेकानन्द का हवाला देते हुए भागवत ने कहा कि किसी ईश्वर की उपासना नहीं करने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति नास्तिक है, हालांकि जिसका खुद में विश्वास नहीं है, वो निश्चित तौर पर नास्तिक है।’
इसके पूर्व 2 अगस्त को भोपाल के एक कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने जो कहा उसे देखिए, ‘संघ जैन, सिख और बौद्ध को अल्पसंख्यक बताना साजिश है। संघ इन्हें हिंदुओं से अलग नहीं मानता।...भारत में राष्ट्र की अवधारणा हमारी सांस्कृतिक पहचान से ही बनी है वह लोगों को जोड़ती है।’
निस्संदेह, जिनका इस सोच से मतभेद है उनको उसे प्रकट करना ही चाहिए। लेकिन इसमें नया कुछ नहीं है। दूसरे, इसमें कहीं नहीं कहा गया है कि दूसरे प्रकार की पूजापद्धति का निषेध है, इसमें तो किसी की पूजा न करने वालों को भी हिन्दू कहा गया है। इसमें कहीं से यह अर्थ नहीं निकलता है कि सभी को हिन्दू कर्मकांड अपनाने के लिए मजबूर करने का उनका विचार है। इसका यह भी अर्थ नहीं निकलता है कि दूसरे मजहब और सम्प्रदाय के लोगों को इस देश में अपने मजहब और उपासाना पद्धति के साथ रहने का अधिकार नहीं है। यह संघ की मूल सोच है जिस पर वह खड़ी है और उससे सहमति जताने वाले लोगों की संख्या आज काफी संख्या में है। इसलिए उपरी तौर पर इसमें ऐसा कुछ नहीं दिखता जिस पर इतना बड़ा बवण्डर खड़ा किया जाए।
अब जरा विरोधियों की ओर आएं। कांग्रेस के मनीष तिवारी, माकपा के सीताराम येचुरी व जदयू के शरद यादव ने एतराज जताते हुए कहा कि संविधान में कहीं भी हिंदुस्तान का जिक्र नहीं है। बात ठीक है इसमें भारत और इंडिया कहा गया है। बसपा की मायावती ने भी आपत्ति जताई और कहा कि भीमराव अंबेडकर ने सभी धर्मों को एक भाव से देखते हुए भारत नाम दिया था। लिहाजा भागवत को ऐसे बयानों से बचना चाहिए, जिनसे एकता पर असर पड़े।
संयोग देखिए कि यह विवाद तब खड़ा हुआ है जब लोकसभा में साम्प्रदायिक हिंसा पर चर्चा होनी है। हमारे दिग्विजय सिंह को इसमें तालिबान और वहाबी विचारधारा नजर आने लगा। उन्होंने कहा कि हम इस विचारधारा से लड़ रहे हैं। चर्चा गृह मंत्रालय के कामकाज पर थी। लेकिन उससे परे जाकर उन्होंने कहा कि, ‘आज जितना खतरा तालिबान की विचारधारा से है, उतना ही खतरा आरएसएस की विचारधारा से है।...आरएसएस द्वारा कथित तौर पर फैलाई जा रही साम्प्रदायिक विचारधारा पर सरकार रोक लगाए।...देश इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर आतंकवाद का सामना कर रहा है। इस आतंकवाद को साम्प्रदायिक विचारधारा बढ़ावा देती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान की विचारधारा समस्या पैदा कर रही है। संघ की विचारधारा भी उसी तरह देश की शांति को नुकसान पहुंचा रही है।’
जरा सोचिए, संघ से मतभेद होना एक बात है, लेकिन उसका तालिबान या आतंकवाद फैलाने वाले आईएआईएस, अल कायदा आदि से कैसे तुलना की जा सकती है ? क्या उस विचारधारा में इतने सरेआम विरोध की गुंजाइश है ? अगर संघ इन संगठनों की तरह होता तो विरोधी आज कहां होते इसकी कल्पना करिए और देश अभी किस दशा में होता ? हम भी इराक, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया की स्थिति में पहुंच गए होते। इसलिए इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं अतिवाद की सीमा को भी पार कर जाती हैं। चूंकि ऐसा है नहीं, इसलिए ऐसी प्रतिक्रियाओं के खिलाफ ही जनता में आक्रोश पैदा होता है। यहीं से राजनीतिक ध्रुवीकरण हो रही है। जहां तक संविधान की बात है तो आज हमें आपत्तिजनक नहीं लगता है, लेकिन इंडिया नाम अंग्रेजों का दिया हुआ है। हमें उसे स्वीकार करने और बनाए रखने में शर्म नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तान कहलाने में आपत्ति है, जबकि इसे भारत एवं हिन्दुस्तान दोनों कहा गया है। दोनों समानार्थी शब्द हैं। हिन्दू को जीवन पद्धति मान लीजिए, संस्कृति मान लीजिए, सभ्यता मान लीजिए, एक व्यापक धर्म भी मान लीजिए...यह सम्प्रदाय या मजहब तो नहीं हो सकता। और यह सच है कि जितनी सहिष्णुता हिन्दू संस्कृति में है उतनी अन्यत्र तलाशनी कठिन है। यह हिन्दू पद्धति ही है जिस कारण यहां इस्लाम, यहूदी, पारसी...जैसे सारे मजहब स्वतंत्रतापूर्वक अपने तरीके से अपने मजहब का पालन कर रहे हैं और अल्पसंख्यक के नाते उन्हें विशेष अधिकार है। इस सच को स्वीकारने में इसलिए हम हिचकिचाएं कि कहीं हम पर साम्प्रदायिकता का या सेक्यूलर विरोधी होने का आरोप न लग जाए तो इससे हम किसी का भला नहीं कर पाएगे। जो सच है उसे उसी रूप में स्वीकारना होगा।
विचार के आधार पर राजनीति में सकारात्मक बहस हो, संघर्ष हो...हिन्दू, हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता...धर्म, सम्प्रदाय, मजहब...सेक्यूलरवाद पर यदि सार्थक बहस हो तो यह देश के हित में होगा। पर संकुचित राजनीति की संकीर्णता ने इसकी संभावना मानो नि:शेष कर दिया है। यह खतरनाक स्थिति है। बिना सोचे समझे बस केवल बावेला खड़ा करना है। कांग्रेस सहित ऐसी अन्य पार्टियां वाकई ऐसी मनोदशा से ग्रस्त हो गईं हैं जहां से इनका बाहर आना मुश्किल दिख रहा है। अगर जितने तक वैचारिक मतभेद हैं संघ विरोधी नेता उतने तक सीमित रहें, उन पर बहस करें, जनता के बीच जाएं तो देश के लिए भी अच्छा होगा। हालांकि इसी मनोदशा और व्यवहार के कारण लोगों ने विद्रोह कर भाजपा एवं उसके सहयोगियों को इतना भारी बहुमत दे दिया है, पर ये सीख लेने को तैयार नहीं।
- लेखक जानेमाने वरिष्ठ पत्रकार हैं।
दिल्ली 
स्त्रोत: www.newsbharati.com

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित