सोमवार, 5 अप्रैल 2010

दीक्षांत समारोह से गाऊन आउट, कुर्ता-पायजामा इन

बिलासपुर। दीक्षांत समारोहों में पहने जाने वाले पारंपरिक गाऊन और टोपी के खिलाफ केन्द्रीय वन पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश के सार्वजनिक विरोध के तत्काल बाद छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के गुरूघासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय ने इसी माह होने जा रहे अपने दीक्षांत समारोह में इस पुरानी परंपरा को समाप्त करने का निर्णय लिया है।

गुरूघासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति डा. लक्ष्मण चतुर्वेदी ने रविवार को पत्रकारों को बताया कि विश्वविद्यालय ने नई परंपरा शुरू करने का निर्णय लिया है जिसके तहत हिन्दी भाषी राज्य की पहचान के रूप में प्रचलित वेशभूषा अपनाने का फैसला लिया गया है। इस नवीनतम देशी वेशभूषा में डिग्रियां प्रदान करने से सदियों पुरानी गैरजरूरी परम्परा से मुक्ति मिलेगी।

उन्होंने कहा कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद 26 अप्रेल को प्रस्तावित दीक्षांत समारोह में गाऊन और टोपी की जगह अतिथियों को खादी का कुर्ता, पायजामा तथा छत्तीसगढ़ी परम्परागत पगडी पहनाई जाएगी। वहीं गोल्ड मेडिलिस्ट और शोधार्थियों यानी डिग्रियां प्राप्त करने वालों के लिए कुर्ता, पायजामा एवं टोपी पहनाना तय किया गया है।

डा. चतुर्वेदी का कहना है कि गाउन पहनने की परम्परा अग्रेंजों की देन है। आजादी के लंबे दौर के बाद दीक्षांत समारोह में भारतीय एवं क्षेत्रीय संस्कृति की झलक होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में खादी का कुर्ता, पायजामा व टोपी पहनने के साथ सिर पर पगड़ी बांधने की परम्परा है, जो भारतीय संस्कृति की पहचान भी है। युवतियों के लिए भारतीय संस्कृति आधारित पारंपरिक वेशभूषा साड़ी तय की गई है।

उल्लेखनीय है कि दो दिन पूर्व शुक्रवार को मध्यप्रदेश के भोपाल में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के दीक्षांत समारोह में केन्द्रीय राज्य मंत्री जयराम रमेश ने अपने मुख्य वक्तव्य के दौरान ही हुड और गाऊन यह कहते उतार दिया कि किसी पुरानी परम्परा को ढोते रहने का कोई औचित्य नहीं। उनके गाऊन उतार फेंकने और गुलामी की प्रतीक परम्परा बताने के बाद नई बहस छिड़ गई है। समर्थन तथा विरोध दोनों पक्षों के बयान सामने आ रहें हैं।

दूसरी ओर स्थानीय शिक्षाविदों ने यद्यपि नई परम्परा के प्रस्ताव का पक्ष तो लिया पर साथ ही यह भी कहा है कि कुलपति का केन्द्रीय मंत्री के बयान के बाद तुरत फुरत में वेशभूषा बदलने का निर्णय लेना लोकप्रियता हासिल करने जैसा कदम माना जा सकता है।

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित