बुधवार, 3 सितंबर 2014

महाभारत बताता है क्या करें और क्या न करें: डा. कृष्णगोपाल

महाभारत बताता है क्या करें और क्या न करें:       डा. कृष्णगोपाल

 नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह डा. कृष्णगोपाल ने कहा है कि व्यास रचित महाभारत एक ऐसा अनुपम, अद्वितीय एवं शाश्वत ग्रंथ है जो जीवन के अनेकानेक द्वंदों के समय करणीय धर्म का बोध कराता है कि क्या करें और क्या न करें.

कॉंस्टीट्यूशन क्लब में 1 सितंबर को श्री सूर्य कांत बाली की पुस्तक ‘महाभारत का धर्मसंकट’ का लोकार्पण करते हुए डा. कृष्ण गोपाल ने कहा कि द्वन्द और धर्मसंकट सबके जीवन में प्रत्येक काल में रहेंगे. इनसे उबरने के लिये सिर्फ सत्य काफी नहीं है. करणीय धर्म ही इन व्यूहों का भेदन संभव बना सकता है. उन्होंने कहा कि व्यष्टि और समष्टि का कल्याण ही धर्म है, जिसे महाभारत के अध्ययन-अनुशीलन से समझा जा सकता है.
डा. कृष्ण गोपाल ने कहा कि रामायण और महाभारत की हमारे सम्पूर्ण राष्ट्र-जीवन और मानस में गहराई से पैठ बनी हुई है. उन्होंने कहा, “हम देश में कहीं भी जायें तो महाभारत की कथा हमको सुनने को मिल जाती है. मैं नागालैण्ड गया तो वहां बताया गया कि वहां भीम और घटोत्कच शतरंज खेलते थे. असम गया तो अनेक प्रसंग वहां पांडवों के बताये गये. मणिपुर गया तो वहां भी पांडवों की स्मृतियों की बहुत सारी बातें हैं. अरुणाचल गया तो पता लगा कि रुक्मणि तो वहीं की थी. आप कर्नाटक में जाइये, तमिलनाडु में जाइये वहां भी पांडवों की कथा मिलती है, बंगाल में जाइये, हरियाणा, पंजाब में भी पांडवों की कथा. अर्थात् इस देश के जनजीवन में यह ग्रंथ, यह काव्य, यह कथा, इसके चरित्र, इसके नायक इसका कण-कण बड़ी सूक्ष्मता से बहुत गहरा बैठा है.”
सहसरकार्यवाह ने कहा, “धर्म का संकट क्या है, धर्म का तत्व क्या है, धर्म और अधर्म क्या है, संकट आये तो मार्ग क्या है. इसके बारे में व्यास जी ने बहुत बार स्पष्ट किया है. हजारों प्रसंग इसमे हैं. जो इस धर्म के तत्व को स्पष्ट करते हैं, लेकिन द्वंद हमेशा बना रहता है. महाभारत केवल एक कालखण्ड की एक कथा नहीं है, यह हर काल में आने वाला संकट है और हर काल में कोई न न कोई ऐसा व्यक्ति चाहिये जो ठीक मार्ग को प्रशस्त कर सके. उस काल में कृष्ण मौजूद हैं, जो “ठीक और सत्यान्वेषी मार्ग को बताते हैं.”
मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने युगधर्म की चर्चा करते हुए कहा कि आधुनिक भारत की महिला होने के नाते हम सारी बहनें जानती हैं कि इस युग में कृष्ण बचाने के लिये नहीं आयेंगे, महिलाओं को स्वयं शस्त्र उठाना होगा. उन्होंने यह भी कहा कि महाभारत अधूरे ज्ञान के कारण होने वाले गंभीर परिणामों से भी सावधान करता है. उन्होंने शंका की कि आज के युग में क्या अभिमन्यु जैसा पुत्र किसी माँ को प्राप्त होगा. वह अभिमन्यु जिसके पास पूरा ज्ञान नहीं था, वह भेदे हुए चक्रव्यूह से बाहर निकलना नहीं जानता था. वह अपना धर्म समझते हुए पिता की अनुपस्थिति में चुनौती को स्वीकार करता है, यह जानते हुए कि इसमें वह वीरगति को प्राप्त होगा. इस संदर्भ पर उन्होंने बताया कि जब ज्ञान आधा अधूरा हो तो उसके भी कितने गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं.
तकनीकी विकास के इस युग में धर्म पर बढ़ते संकट पर उन्होंने कहा कि सरकार का काम है सुविधा और संसाधन प्रदान करना है, संस्कार परिवार और समाज ही देता है. लेकिन डा. कृष्ण गोपाल ने इससे असहमत होते हुए कहा, “स्मृति जी ने कहा कि संस्कार घर में दिया जाता है यह ठीक है अच्छी बात है लेकिन संस्कार विद्यालय में भी दिया जाता है. हमारे संस्कार के केन्द्र सब थे, विद्यालय भी थे, घर भी थे, गांव भी थे, पंचायतें भी थीं, समाज भी था, हर स्थान से वह संस्कार पाता था. हर स्थान पर लोग उसको धीरे-धीरे बताते थे कि करणीय क्या है. और यह संकट हर काल में रहा, हर समय रहा. हर काल में व्यास और कबीर जैसे समाज जागृत करने वाले चाहिये, इसलिए हर स्थान में, समाज में, विद्यालय में, हर स्थान पर संस्कार देने की पद्यति चाहिये ही चाहिये.
पुस्तक लेखक श्री सूर्यकांत बाली के इस कथन का कि आर्थिक एवं तकनीकी समृद्धि सदैव धर्म एवं मर्यादा के पतन को अभिप्रेरित करती है,  इस चुनौती से निपटने का प्रश्न हमारे सामने है, उल्लेख करते हुए डा. कृष्णगोपाल ने कहा, “यह अर्थ की सुनामी जो है वह आयेगी, इस सुनामी में बड़े-बड़े साम्राज्य ध्वस्त हो गये हैं, यह हमने देखा है, यहां भी यह आ गयी है लेकिन हमारी जड़ बहुत गहरी है, वह जड़ धर्म में है, उस जड़ को हिलाने की ताकत दुनिया की किसी सुनामी में नहीं है. यह पुस्तक उस धर्म के लिये एक योगदान है.”

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित