बुधवार, 25 मार्च 2015

अपनी बात :सहमत हो तो आगे बढ़ो


- हितेश शंकर 



नीति-निर्माताओं, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों में कई बातें साझी होती हैं। यह शक्ति-केंद्र के करीब सदा चलने वाली ऐसी रस्साकशी है जहां पाले बंटे होने पर भी रस्सी एक को दूसरे से जोड़ती है। विकर्षण में भी एक आकर्षण है।

कुछ ऐसे रुझान हैं जो साझे हैं, किन्तु समय के साथ बदलते हैं। जैसे पहनावा। जहां पहले नेहरू जैकेट की ठसक थी वहां अब मोदी कुर्ते की ललक है। जैसे किताबें। जहां पहले समाजवादी पोथियां या 'दास कैपिटल' सजी थीं वहां अब एकात्म मानव दर्शन को बूझने की बेचैनी है। लेकिन, कुछ साझा चीजें शाश्वत हैं। ये समय बदलने पर भी नहीं बदलतीं। जैसे मंच, या फिर एक से मुहावरे। समय बदलता रहे, मंच और मुहावरों की साझेदारी इन बिरादरियों को एक करती है। 

भारत विविधताओं का देश है, यह ऐसा ही एक मुहावरा है। मंच कोई भी हो, यह मुहावरा खूब चलता है। लेकिन क्या सिर्फ 'चलना' काफी है! पोशाक हो या पुस्तक, लोगों के लिए सिर्फ चलन के करीब दिखना क्या काफी है? पुस्तक सिर्फ अलमारी या मेज पर सजी रहे तो एकात्म मानववाद मन में नहीं उतरेगा। यह देश विविधताओं की
भूमि है, यह बात मंच पर निकली मगर मन से नहीं फूटी तो तालियां मिलने पर भी भाव खाली ही होगा। यह शून्य कौन भरेगा? अंतर कैसे पाटा जाएगा? 

क्या सत्ता-केंद्र के ईद-गिर्द विमर्श और साझेपन की कोई धुरी नहीं होनी चाहिए? यह फौरी चलन और रुझान से परे की बात है, ऐसे विचार पर टिके रहने की बात जिस पर टिका रहना हम सब के लिए जरूरी है। नीति-नियंता, बुद्धिजीवी और मीडिया यदि किन्हीं बातों पर एकमत हैं तो उन्हें साकार रूप क्यों नहीं लेना चाहिए? भारत विविधताओं का देश है और इस बात पर सब एकमत हैं तो इस विविधता को सहेजने के लिए क्या कर रहे हैं? मानवता को एक सूत्र में पिरोने वाली इस संस्कृति को बल देने के लिए क्या कर रहे हैं? 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा से निकले प्रस्ताव इस मायने में सभी को जगाने वाले हैं। यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्ीय योग दिवस की घोषणा के स्वागत और मातृभाषा अथवा संविधानसम्मत भारतीय भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा दिए जाने से जुड़े हैं। इन प्रस्तावों में देश के वैविध्य को पुष्ट करने की शक्ति है। साथ ही मानवता
को एकरस करने वाली सांस्कृतिक जीवन शैली के सम्मान का भाव भी है।

योग सिर्फ योगासन या कसरत नहीं, योग का अर्थ है जोड़ना। आज यदि दुनिया भारत की सांस्कृतिक जीवन शैली को सम्मान दे रही है तो यह बात किस भारतीय को बुरी लगेगी? कौन इस विचार की स्वीकार्यता पर सहमत नहीं होगा? जब सब सहमत हैं तो विरोध कैसा? क्या यह योग के पक्ष में और जोर-शोर से उठ खड़े होने का वक्त
नहीं? इस बात को बढ़ना ही चाहिए।

इस विविधता भरे देश में अभी हमारे बच्चों की प्राथमिक शिक्षा की भाषा कौन सी है? उनकी लाड़-लड़ाई की भाषा, गिनती-पहाड़े में मजा देने वाली भाषा, जगते में रोने और सोते में सपनों की भाषा कौन सी है? मासूम मनों पर कोई बोझ तो नहीं है? अगर है तो इस बोझ को कौन हटाएगा? उडि़या, असमिया, मराठी, मलयाली, पंजाबी, बंगाली, तमिल, तेलुगू... इन भाषाओं को कौन बचाएगा? इस देश की विविधता को कैसे सहेजा जाएगा?

क्या यह मातृभाषा में शिक्षा के पक्ष में, भारतीय भाषाओं के पक्ष में उठ खड़े होने का समय नहीं है? दुनिया भर के शोध-अध्ययन इस बात पर एकमत हैं। हमारे अपने शिक्षाविद् लंबे समय से यह मांग उठाते रहे हैं। खुद गांधी
और टैगोर इस विचार के पोषक रहे हैं। सबने कहा है, फिर सहमति में कहां कसर है? इस बात को बढ़ना ही चाहिए।

राजनीति नचाती है, ठीक। लेकिन सत्ता का लट्टू भुरभुरी जमीन पर नहीं चल सकता। वैचारिक दृढ़ता राजनीति को ठोस आधार देती है। भारत और भारतीयता से जुड़े ऐसे विषयों पर, जिन पर दो राय हैं ही नहीं, वहां भी करीब सात दशक से वैचारिक कच्चापन-अनमनापन रहा है। यह बात खलती है। जहां-जहां विवाद नहीं वहां-वहां विस्तार क्यों नहीं होना चाहिए? 

राजनेता, बुद्धिजीवी और मीडिया जिन मुद्दों पर एकमत हैं, यह उन मुद्दों पर आगे बढ़ने का वक्त है। अगर हम भारतीय एकमत हैं तो यह भारत और भारतीयता का वक्त है। 
स्त्रोत: सम्पादकीय , पाञ्चजन्य ,

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित