शनिवार, 28 मार्च 2015

संगठन के कार्यकर्ताओं को श्रीराम-चरित से सन्देश'






-राघवलु
संयुक्त महामंत्री, विहिंप
राम शब्द में तीन बीजाक्षर है- ‘र’कार, ‘अ’कार, और ‘म’कार| ‘र’ अग्नि बीज है, ‘अ’ आदित्य बीज है, ‘म’ चंद्र बीज है|
सृष्टि में अग्नि, सूर्य और चंद्रमा यह तीन ही प्रकाश देनेवाले है| ये तीन एक राम शब्द में समाविष्ट है| यदि हम एक बार मनसे राम कहेंगे तो शरीर के अंदर प्रकाश उत्पन्न होता है| कोटी-कोटी बार राम जप करनेसे ही शबरी सशरीर स्वर्ग पहुँची, हनुमान देवता स्वरूप बने और वाल्मीकि ऋषी बनें| इतना सामर्थ्य है राम शब्द में|
श्रीराम का आदर्श जीवन
त्रेतायुग में बहुत आतंकवाद फैला था| उस समय ऋषि-मुनियों की हत्या करना, यज्ञ-याग आदि का विध्वंस करना, कन्या-अपहरण, अपनी राज्य सत्ता के लिए समाज में पूरा आतंक निर्माण करना, ऐसी उस समय की परिस्थिति रही| इस पृष्ठभूमि में श्रीराम एक आदर्श राजा एवं सामान्य मानव के रूप में कैसे जीवन चलाएँ, यह उनके जीवन से हमें सीखना हैं|
स्थितप्रज्ञ राम
श्रीराम को राज्याभिषेक की जानकारी मिली, उसके बाद दो घंटे के अंदर कोपगृह में बुलाकर १४ वर्ष जंगल जाने के लिए आज्ञा मिली| लेकिन दोनों को सहर्ष स्वीकार करते हुए श्रीराम ने अपने जीवन में कृती में लाया है|
उदये सविता रक्तो रक्तश्चालस्तमने तथा|
सम्पतौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥
(सूर्योदय के समय जैसे सूरज का वर्ण होता है, वहीं वर्ण सूर्यास्त के समय भी होता है| वैसे ही समृद्धि तथा
विपत्काल में भी श्रेष्ठ लोग स्थितप्रज्ञ रहते हैं|)
राज्याभिषेक की वार्ता सुनकर तथा वनगमन की जानकारी सुनकर, दोनों ही स्थितियों में श्रीराम अचल थे| इतना ही नहीं, सब प्रकार से सरल जीवन अपनाया| अयोध्या का संपन्न अंत:पुर छोड़कर जंगल में आए| पर्ण-कुटिर में रहने लगे| फल-पत्ते खाकर जीने लगे| जमीन पर सोने लगे|
निरंतर और प्रभावी संपर्क
अगस्त्य ऋषि से संपर्क करते हुए आदित्य हृदय महामंत्र पाया है और भरद्वाज ऋषि से संपर्क करते हुए समंत्रित अस्त्र-शस्त्र पाए| अत्रि-अनसूया से संपर्क करते हुए समंत्रित वस्त्र पाए| सुग्रीव से संपर्क करते हुए महाबल वानरसेना पाए| नील-नल को भी संपर्क करके रामसेतु निर्माण किया| शक्तिमान महारावण को संहार करके अयोध्या वापस आए| संपर्क से सबकुछ पाए| किसी भी स्थिति में भरत से ना सैन्य मॉंगा ना धन|
कार्यकर्ता का चयन
सीता की खोज चल रही थी, उस समय श्रीराम के सामने वाली और सुग्रीवआए| किसको चुनना? वाली के पास शक्ति, साम्राज्य, सेना, संपत्ती सब कुछ है| लेकिन चरित्र, सत्य, धर्म और नम्रता आदि गुण नहीं है| ऐसी व्यक्ति धर्म संस्थापना के लिए योग्य नहीं है| इसलिए वाली को समाप्त कर दिया| जो गुण आवश्यक थे वे सुग्रीव के पास थे| इसके कारण उसको स्वीकारा| संगठन का कार्य करते समय व्यक्ति का या सहयोगी का चयन करना हो तो राम का आदर्श आवश्यक है|
यश मिला तो साथियों में बॉंटना
रावण-संहार के बाद अंगद, सुग्रीव, नील,नल, विभिषण, हनुमान, जांबुवंत सभी को लेकर श्रीराम अयोध्या पहुँचे| वहॉं इन सभी सहयोगीयों का अयोध्या वासीयोंको परिचय कराया| सेतु-बंधन इन्ही लोगों ने किया है| रावण-संहार इन्ही लोगों ने किया है, ऐसा बताया| यह सब मैंने किया, मैंने करवाया ऐसा एक भी शब्द बोले नहीं| यही संगठन कार्यकर्ता की विशेषता है|
शत्रु से भी सीखना
रावण बाणसे विद्ध होकर गिरने के बाद राम और लक्ष्मण रावण के पास पहुँचकर ‘तुमने जीवन मे क्या सीखा है’ ऐसा प्रश्न किया| तब रावण ने बताया ‘मैंने धरती से स्वर्ग तक सिढ़िया बनाने के लिए सोचा था| अष्टदिग्पाल, नवग्रह मेरे नियंत्रण में थे इस लिए यह काम कभी भी कर सकता हूँ ऐसा सोचकर उस काम को तुरंत न करते हुए छोड़ दिया| लेकिन जानकी का अपहरण करने की लालसा मन में आयी तो यह काम तुरंत कर दिया| गलत काम तुरंत करने से मेरा पतन हो गया|’
रावण का पछताना भी श्रीराम को कुछ सीखा गया| तात्पर्य, अच्छा काम को छोड़कर गलत काम जल्दी करने  से किसी का भी पतन हो सकता है|
कनक, कांता, कीर्ति का मोह
जब सुवर्ण लंका प्राप्त हुई तब, लक्ष्मण ने इसका क्या करना इस बारे में श्रीराम के विचार जानने चाहे| श्रीराम ने कहा- 
अपि स्वर्णमयि लंका न मे लक्ष्मण रोचते
जननी जन्मभूमिश्चक स्वर्गादपि गरीयसी|
लोक कल्याण कार्य में धन, व्यामोह रुकावट होगा इसलिए यह तुच्छ है, अपने जननी जन्मभूमि स्वर्ग से अधिक सुख देने वाली है| ऐसा कहकर लक्ष्मण का मार्गदर्शन किया|
शूर्पणखा अतिसुंदरी बनकर श्रीराम के पास आकर, ‘मैंने आपके लिए ही जन्म लिया है; कृपया मुझे स्वीकार करो’ ऐसी बोली तब श्रीराम ने शूर्पणखा के अनुरोध को ठुकरा दिया| इतना ही नहीं, जानकी के साथ १३ वर्ष रहे; लेकिन मुनिवृत्ति अपनाकर पूर्ण रूप से इंद्रियों को नियंत्रण कर दिया|

जब सुवर्ण लंका मिली तो वह विभिषण को दे दी| किष्किंधा का राज्य मिला तो वह सुग्रीव को दे दिया| अयोध्या का राज्य मिला तो वह भरत को दे दिया| इस प्रकार श्रीराम पदवी तथा व्यामोह से दूर रहे|
अच्छे लोगों की पहचान
रावण कुल में विभिषण एक दैवी गुण का व्यक्ति है, यह श्रीराम ने जाना| जब विभिषण श्रीराम के शरण में आ गये तो सब लोग विभिषण के बारे में संदेह करने लगे| लेकिन श्रीराम ने उनका व्यवहार देखकर विभिषण पर अनुग्रह किया| इतनाही नहीं, शत्रु भावना रखने वाले रावण के दहन संस्कार कार्यक्रम संपन्न करने के लिए विभिषण को प्रोत्साहित किया|
समरसता का कार्य
श्रीराम प्रेम के सागर है| समरसता के निर्माता है| जंगल में वनवासी महिला शबरी के झुटे फल खाकर उसपर अनुग्रह किया है| केवट को आलिंगन कर के अनुग्रह किया है| जटायु का दहन संस्कार करते हुए उसे मोक्ष उपलब्धी करायी| गिल्लरी को हस्तस्पर्श करके अनुग्रह किया|
इस प्रकार अयोध्या वासीयों के साथ परिवारपर भी अनंत प्रेम की वृष्टि की| 
सभी वर्गों के विचारों का आदर
लंका से वापस आने के बाद जब धोबी समाज के एक व्यक्ति ने सीता पर कलंक लगाया, तो उसके विचार का आदर करते हुए प्राणसमान सीता को वनवास भेजने के लिए भी श्रीराम तैयार हुए| उस समय श्रीराम ने प्रतिज्ञा की- 
स्नेहम् दयां च सौख्यं च यदि वा जानकी मति
आराधनाय लोकस्य मुंचते नास्ति मे व्यथा॥
लोककल्याण के लिए स्नेह, दया, स्वीय सुख, इतना ही नहीं अत्यंत प्रिय जानकी को भी छोड़ने में किंचित भी व्यथित नहीं है|
कठोर अनुशासन
त्रेता युग के अंत में कलि अयोध्या में प्रवेश करते हुए श्रीराम के साथ एकांत में बात करने के लिए आ गये| उस समय किसी का भी अंदर प्रवेश ना हो इसलिए श्रीराम ने लक्ष्मण को द्वार पर खड़ाकिया| ‘किसी को अंदर आने नहीं देना, यदि इस आज्ञा का उल्लंघन होता तो कठिन दंड भोगना पड़ेगा’ ऐसा बताकर श्रीराम अंदर गए| इतने में दुर्वास महर्षि आकर ‘मुझे अभी श्रीराम से बात करनी है| अनुमति नहीं मिली तो तुम्हारा पुरा इक्ष्वाकु वंश का नाश करुंगा|’ ऐसा क्रोधित हो कर कहा| लक्ष्मण दुविधा में पड़े| प्रवेश की अनुमति देते तो श्रीराम क्रोधित होंगे और अनुमति नहीं दी तो दुर्वास महर्षि इक्ष्वाकु वंश का नाश कर देंगे| अंतत: लक्ष्मण दुर्वास महर्षि को अंदर जाने की अनुमति देते है| तब राम बाहर आ रहे थे| आज्ञा का उल्लंघन देखकर अति प्रिय भ्राता लक्ष्मण को कठिन दंड देते हुए श्रीराम अपने शरीर को भी शरयु नदी में छोडकर अवतार समाप्त कर देते है|
निन्दन्तु नीतिनिपुणा: यदि वा स्तुवन्तु|
लक्ष्मी: समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्|
मरणमद्यास्तु युगान्तरे वा
न्यायात्पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा॥
नीतिज्ञ लोग निन्दा करे या स्तुति,  संपत्ति का लाभ हो या हानी, मृत्यु आज आये या युगों के बाद, श्रेष्ठ लोग
कभी भी न्यायपथ से दूर नहीं जाते|
श्रीराम का जीवन भी इसी प्रकार का है| उन्होंने किसी भी स्थिति में आदर्शों को तिलांजली नहीं दी| सामाजिक जीवन में संगठन का कार्य करते हुए, अनेक बाधाएँ, व्यवधान, मोह-माया के प्रसंग पग पग पर आ सकते हैं| क्या करना, क्या नहीं करना, ऐसी किंकर्तव्यमूढ़ स्थिति बनती है| किस से मार्गदर्शन लेना, समझ में नहीं आता| उस समय श्रीराम हमारे सहायक हो सकते है| उनका जीवन चरित हमें दिग्दर्शन करा सकता है| श्रीराम
नवमी के पावन पर्व श्रीराम चरित का चिंतन करने पर यह विश्वाबस हमें मिलता है|


विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित