गुरुवार, 3 सितंबर 2015

प्रताप महान, अकबर नहीं : विश्लेषण


Source: न्यूज़ भारती
केवल ‘महान‘ कह देने से या लिख देने से कोई ‘महान‘ नहीं हो जाता है। ‘महान‘ अथवा ‘महानता‘ का भावार्थ, ‘उत्कृष्ट, अति उत्तम, सर्वश्रेष्ठ तथा बहुत बढ़िया/शानदार, उद्देश्यपूर्ण कर्म, जिसमें व्यक्ति विशेष, स्वयं का त्याग/बलिदान/नि:स्वार्थ भाव/सहायता या भागीदारी प्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित हो और जिसकी एक स्वर में प्रशंसा की जा सके।

इतिहास में सिकन्दर, अशोक एवं अकबर को महान लिखा गया, ये तीनों विजेता थे। सिकन्दर ने यूनान से लेकर झेलम के पूर्व में मगध राज्य तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया, अशोक ने कलिंगा युद्ध में विजय प्राप्त की तथा अकबर ने समकालीन हिन्दुस्तान में मेवाड़ और दक्षिण भारत को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण देश में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। क्योंकि इतिहास विजेता द्वारा लिखा अथवा लिखवाया जाता है, इसलिए पराजित को कभी भी ‘महान‘ नहीं कहा गया। चाहे उसके कर्म और गुण विजेता से उत्तम हों।

सिकन्दर महान 30 वर्ष से कम आयु में लगभग विश्व विजेता कहलाया, परन्तु हिन्दुस्तान से लौटते समय मलेरिया - बुखार से हारकर इस संसार को अलविदा कह गया, क्योंकि उस समय तक ‘कुनेन‘ नामक दवा की खोज नहीं हुई थी, इसलिए सिकन्दर महान एक हिन्दुस्तानी मच्छर से हार गया। अशोक महान कलिंगा युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात् महात्मा बुद्ध की शरण में चला गया और भिक्षु बन गया। यदि सम्राट अशोक कलिंगा युद्ध में पराजित हो जाता तो क्या इतिहास उसे ‘महान‘ कहता?

तैमूरवंशी उमर शेख मिर्जा जो तैमूर लंग की चौथी पीढ़ी का सदस्य था और मंगोल (तातारी) हलाकू खां की पडनातिन कतलक निगार बेगम जो की चंगेज खां की तेरहवी पीढी में हुई। - हुमायूनामा, पृष्ठ-140
उमर शेख मिर्जा जो की फरगना का  शासक था तथा कतलक निगार बेगम का पुत्र बाबर का पौत्र ‘अकबर’ हिन्दुस्तान के लिए आक्रांन्ता था, जिसे महान बनाने में उसके दरबारी, चाटूकार इतिहासकार अबुल फजल, अल बदायुनी, मोहम्मद कासिम एवं यूरोपियन इतिहासकारों ने बड़ा सहयोग दिया, क्योंकि उन्हें व्यक्तिगत तथा संस्थागत लाभ (व्यापार के लिए शाही फरमान) प्राप्त करना था।

सन् 14 अक्टूबर 1542 को थार रेगिस्तान की छोटी सी जागीर अमरकोट के राणा की शरण में हमीदा बानों की कोख से अकबर का जन्म हुआ। उस समय उसका पिता हुमायूँ, शेरशाह सूरी से कन्नौज युद्ध में बुरी तरह हारकर हिन्दुस्तान से अफगानिस्तान व इरान की ओर भाग रहा था और शेरशाह सूरी उसका पिछा करते हुए मारवाड़ की सरहद (रास-बावरा) गांव तक पहुंच गया था। परास्त, निराश हुमायूँ बदहवासी में अपनी गर्भवती पत्नी हमीदा बानो को अमरकोट के राणा के संरक्षण में छोड़कर पश्चिम दिशा में भागता चला गया। उसे काबुल और कंधार के शासक सगे भाइयों से भी समर्थन नहीं मिला, इसलिए उसे शाह ईरान की शरण में जाना पड़ा।
इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव ने अकबर के लिए लिखा है:
            'Born under the sheltering care of a Hindu. Akbar was a broad minded & Tolerant Ruler.'

मेवाड़ के सूर्यवंशी सिसोदिया राजपूत शासक, जो स्वयं को भगवान रामचन्द्र जी का वंशज मानते रहे, उस वंश के राणा हम्मीरसिंह की ग्यारहवीं पीढ़ी के शासक और मेवाड़ के प्रसिद्ध राणा संग्रामसिंह के पौत्र तथा राणा उदयसिंह तथा जैवन्ता बाईजी की प्रथम संतान प्रताप का जन्म ईस्वी 9 मई, 1540 को सूर्य उदय की बेला में कुम्भलगढ़ में हुआ। महराणा प्रताप के सम्बन्ध में एक दोहा बहुत प्रसिद्ध है:
      ‘मां पूत ऐसो जणजै जेसौ राणा प्रताप‘
सम्राट अकबर और महाराणा प्रताप- यदि मुख्य इन दोनों शासकों के शौर्य, प्रशासनिक, सैन्य एवं संगठनात्मक क्षमता, त्याग एवं बलिदान के साथ-साथ व्यक्तिगत गुणों एवं व्यक्तिगत गुणों की निष्पक्ष तुलना करते हैं तो निम्न ऐतिहासिक घटनाओं/तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है:

1.हुमायूँ का आकस्मिक निधन दिनांक 27 जनवरी, 1556 को हो जाने के कारण पंजाब के ‘कलानौर‘ गांव में 14 वर्ष से कम आयु के बालक अकबर का राज्याभिषेक दिनांक 27 जनवरी, 1556 को किया गया। उस स्थान पर आज भी एक कच्चा चबूतरा बना हुआ है।

इस दिन मुगल फौज स्वयंभू सम्राट हेमू की सेना के सामने पानीपत के मैदान में खड़ी थी। युद्ध अवश्यंभावी था। दिनांक 5 नवम्बर, 1556 को लड़ा गया युद्ध इतिहास में ‘पानीपत की दूसरी लड़ाई‘ के नाम से दर्ज हो गया। ईरानी संरक्षक ‘बेहराम खां‘ के संरक्षण में अकबर ने विजय प्राप्त कर दिल्ली एवं आगरा पर कब्जा कर लिया।
बेहराम खां के संरक्षण एवं धाय मां महाअग्ना के साये में पल रहा अवयस्क सम्राट ने किसी प्रकार की कोई शिक्षा हासिल नहीं की। इसलिए वह जीवन पर्यन्त ‘निरक्षर‘ ही रहा।

इतिहासकार डॉ. श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘‘अकबर-द-ग्रेट’’ भाग - 1, पृष्ठ - 497 में लिखा है कि - ‘‘अकबर लिखने-पढने से दूर भागता था, इसलिए वह जीवन भर अनपढ़ रहा...।’’
जेयुष्ट पादरी मौसारत जिसने अकबर को करीब से देखा है अपनी पुस्तक ‘‘द ग्रेट मुगल’’ पृष्ठ 281 पर लिखा है ‘‘वह कुछ भी पढना-लिखना नहीं जानता था’’

प्रताप के जन्म के समय उत्तर भारत में केवल मेवाड़ ही ऐसा राज्य था जिसने किसी की अधीनता स्वीकार नहीं की। महाराणा प्रताप की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा कुम्भलगढ़ में हुई। प्रतापसिंह ने शैक्षणिक तथा शस्त्र शिक्षा परम्परागत गुरूकुल पद्धति के साथ धार्मिक शिक्षा भी प्राप्त की।

प्रतापसिंह अपने बाल्यकाल से भील आदिवासी के सादा रहन-सहन, स्वामिभक्ति, पहाड़ो की उंची चोटियों पर आसानी से चढ़ जाने की कला, कठिन कांटेदार झाड़ियों में कूद जाना, पत्थर और तीर से अचूक निशाना लगा कर शिकार करना और जलवायु के परिवर्तन को आसानी से सहन करने की क्षमता के कारण उनसे बहुत प्रभावित था। वह अपना अधिकतर समय भील आदिवासियों के साथ बीतता था और उनके साथ, पंक्ति में बैठकर भोजन करता था। इसलिए भील आदिवासियों के साथ-साथ उसे जनसामान्य का भी पूर्ण स्नेह एवं स्वामीभक्ति प्राप्त कर लिया था।

राणा उदयसिंह की मृत्यु फरवरी, 1572 में हुई। राणा उदयसिंह ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने ज्येष्ठ पुत्र प्रतापसिंह की बजाय धीर बाई भटियानी के पुत्र जगमालसिंह को मेवाड़ का शासक बनाने की वसीयत लिख दी थी। कुँवर प्रतापसिंह ने अपने पिता की अन्तिम इच्छा का आदर करते हुए मेवाड़ से बाहर जाने का निश्चय कर प्रस्थान कर दिया, परन्तु मेवाड़ के सामंत और जागीरदारों में प्रताप के व्यक्तिगत शौर्य एवं गुणों के कारण हठ कर उन्हें मेवाड़ की गद्दी पर आसीन कर दिया गोगुन्दा में 32 वर्ष की आयु में उसका राज्याभिषेक दिनांक 28 फरवरी, 1572 को परम्परागत संस्कारों के साथ कर दिया।

महाराणा बनने से पहले प्रताप कई युद्धों में मेवाड़ की सेना का सफल नेतृत्व कर चुके थे। महाराणा प्रताप को भली-भांति ज्ञात था कि अकबर किसी भी स्थिति में उन पर हमला अवष्य करेगा। इसलिए उन्होंने युद्ध की समस्त तैयारियां पूरी की। अपने विश्वासनीय “लुहार समुदाय” के कुशल कारीगरों को बड़ी संख्या में अच्छी तलवारें बनाने का आदेश दिया। स्वामिभक्त लुहार-कारीगरों ने महाराणा की ईच्छा अनुसार तलवारों तथा धनुष-बाण आदि का निर्माण किया तथा स्वयं भी महाराणा के साथ लड़ाई के मैदान में डटे रहे। इस समुदाय ने महाराणा का अनुसरण करते हुए अपने घर-परिवार बैल गाडियों पर स्थानान्तरित कर लिये थे इसलिए इन्हें     ‘‘गाड़िया लुहार’’ कहा जाता है। आज भी यह घुमन्तु जाति गडिया लुहार के नाम से ही प्रसिद्ध है और सरकार के कई बार प्रयास करने के बाद भी इनके परिवार बैल गाडियों पर ही अपना जीवन व्यतीत करते है। यह स्वामिभक्ति और देषप्रेम की अनोखी मिसाल है।   

मेवाड़ की राजगद्दी से वंचित कुँवर जगमाल-
अकबर की शरण में चला गया। उसका बड़ा भाई शक्तिसिंह पहले से ही अकबर के दरबार में शरण ले चुका था। महाराणा प्रताप, राजगद्दी संभालने के उपरान्त भी चित्तौड़ का पतन, मेवाड़ की स्त्रियों एवं बच्चों का जौहर तथा राजपूत वीरों का धर्म युद्ध तीसरा शाका की यादें अपने मस्तिष्क से नही निकाल सका। क्योंकि उसने यह सबकुछ अपनी आंखों से देखा था इसलिए यह घटना उस पर अमिट छाप छोड़ चुकी थीं। जब अकबर ने भारी सैन्य बल, भारी तोपखाना तथा 300 हाथी लेकर 23 अक्टूबर 1567 को चित्तौड़गढ को घेर लिया। उस समय चित्तौड़ की कुल आबादी चित्तौड़गढ़ में ही बसी हुई थी। लगभग 4 माह की कोशिश के बाद भी जब दुर्ग नहीं टूटा तो अकबर ने यह मन्नत मांगी थी कि यदि वह इस गढ़ को जीत जाएगा तो वह पैदल ही चलकर ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह (अजमेर) में जियारत करने जाएगा।

यह किला इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यह आगरा/दिल्ली से सूरत/दक्षिण दिषा में व्यापार/हज यात्रा के रास्ते में स्थित था।
अपने सलाहकारों की सलाह से उसने दीवार तोड़ने के लिए दो सुरंगे किले की दीवार में भरवायी। 24 फरवरी 1568 को गोधूली के समय 200-मन बारूद की 2 सुरंगों से किले की दीवार को तोड़ने का निश्चय किया एवं अपनी सेना के सबसे बहादुर 200 घुड़सवारों को आदेश दिया कि जैसे ही किले की दीवार टूटे, वे किले के अन्दर घुस जाएं, परन्तु यहाँ पर अकबर से बहुत बड़ी सैन्य भूल हो गयी, क्योंकि उसने 24 फरवरी को 1568, गोधूली के समय बारूदी सुरंगे उड़ाने का आदेश दिया। जैसे ही एक सुरंग में विस्फोट हुआ, अकबर ने अपने घुड़सवारों को किले में घुसने का आदेश दे दिया। जिस समय घुड़सवार किले की दीवार पर पहुँचे, उसी समय दूसरी बारूदी सुरंग में विस्फोट हुआ। यह विस्फोट इतना भयंकर था कि कई मन भारी पत्थर कई-कई मील दूर जाकर गिरे। इसके साथ ही 200 घुड़सवारों के भी टूकड़े उड़ गए। किले की दीवार की मरम्मत के लिए आए किलादार जयमल मेडतियां  अकबर की बंदूक ’’संग्राम’’ के निशाने पर आ गया। 25 फरवरी, 1568 को ब्रह्म मुहूर्त में 300 क्षत्राणी वीरांगनाओं ने अपने मान-सम्मान एवं पवित्रता की रक्षा हेतु जौहर की ज्वाला को गले से लगा लिया। ¼Cambridge History of India, Page 68½ प्रातःकाल (25 फरवरी 1567) को राजपूत यौद्धा केसरिया-बाना बांधकर युद्ध भूमि में शत्रु पर टूट पडे़। यह था चित्तौड़ का तीसरा शाका ¼Fight unto Death½। मुगलों ने तोपों और बन्दूकों के बल पर दोपहर के समय चित्तौड़गढ में प्रवेश किया क्रोधित युवा अकबर ने शुद्ध मंगोल क्रूरतम परम्परा के अनुसार गढ़ में ’’कत्ले आम’’ का हुक्म जारी किया। इस कत्ले आम में 12000 निर्दोषों की हत्या हुई थी। इस विवरण को मुगल इतिहासकार का अबुल फजल अल्लामी का दिल भी इस कत्लेआम को देखकर चीत्कार कर उठा और वह इस वीभत्सतम नरसंहार का वर्णन गद्य में नहीं लिख सका और उसने पद्य में लिखा है-
अकबरनामा, भाग द्वितीय, पृष्ठ 475
अनुवाद : ‘‘किसी ने ऐसा युद्ध नहीं देखा.....मैं तो लाख में एक भी बयान नहीं कर सकता।”
निश्चय ही यह दृश्य और जौहर की ज्वाला, राजपूत सैनिकों का शाका तथा असहाय नागरिकों की चीत्कारें, महाराणा प्रताप के मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ गईं। चित्तौड़गढ़ युद्ध वास्तव में बारूद तथा राजपूतों की तलवारों के बीच लडा गया युद्ध था जिसमें जीत बारूद की हुई।

राजगद्दी संभालने के पश्चात् उसने शपथ ली कि जब तक मेवाड़ की भूमि पर एक भी शत्रु सैनिक है वह कुटिया में रहेगा, भूमि पर सोएगा तथा पतल में खाना खाएगा। महाराणा प्रताप ने अपने इस वचन का जीवनपर्यन्त निर्वहन किया।

मेवाड़ की राजधानी उदयपुर स्थापित हो जाने तथा चित्तौड़ युद्ध समाप्त होने के लगभग एक वर्ष की अवधि में प्रताप के शौर्य व पराक्रम दिखाते हुए मेवाड़ की 80 प्रतिशत भूमि पर मुगलों का आधिपत्य समाप्त कर दिया था।
चित्तौड़ युद्ध 1568 से लेकर 1572 तक लगभग चार वर्ष शांति रही। इस अवधि में महाराणा प्रताप ने मुगलों के विरुद्ध युद्ध हेतु समस्त तैयारियां पूर्ण कर लीं।

हल्दीघाटी युद्ध से पूर्व अकबर ने महाराणा प्रताप से बिना युद्ध अधीनता स्वीकार करने के लिए कई प्रयास किए। सर्वप्रथम उसने अपनी विश्वसनीय जलाल खां कोरची (1572), उसके बाद कुंवर मानसिंह (जून 1573), इसके पश्चात् आमेर के राजा भगवन्तदास (दिसम्बर 1573), अन्त में अपने विश्वसनीय दरबारी टोडरमल को महाराणा प्रताप के पास संधि संदेश लेकर भेजा, परन्तु सूर्यवंशी प्रताप ने अकबर के सामने शीश झुका अपनी मातृभूमि का अपमान समझा।

इसलिए महत्वकांक्षी एवं साम्राज्यवादी अकबर के सामने शस्त्र बल से महाराणा प्रताप को झुकाने के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं था, क्योंकि उसे सदैव आशंका बनी रहती थी कि कही हिन्दुस्तान के राजपूत मेवाड़ के झंडे के नीचे संगठित होकर उसके साम्राज्य को नष्ट न कर दें।

‘‘बादशाह अकबर ने महाराणा प्रताप से अपमानित आमेर के कुंवर मानसिंह को बड़ी सेना एवं भारी तोपखाना देकर तारीख 2 मोहर्रम हिजरी संवत् 98 को ईस्वी सन् 1576 तारीख 2 अप्रेल में महाराणा प्रताप के विरुद्ध 20 हजार घुड़सवार लेकर भेजा। मानसिंह ने मांडलगढ़ से चलकर खमणोर गांव के समीप हल्दीघाटी से कुछ दूर बनास नदी के किनारे डेरा डाला। (अल बदायूनी-मुन्तखबुत्तवारीख अंग्रेजी अनुवाद, वॉल्यूम 2, पृष्ठ 236)
‘‘महाराणा भी अपनी सेना तैयार कर गोगुंदा से चला और मानसिंह से तीन कोस की दूरी पर आ ठहरा। (अकबरनामा, लेखक अबुल फजल, अनुवाद वॉल्यूम 3, पृष्ठ 236-37)
महाराणा प्रताप की सेना पहाड़ी के दूसरी तरफ रूक गई थी। दोनों सेनाओं के बीच बहुत संकरी हल्दीघाटी थी, जिसमें से एक-दो सैनिक साथ निकल सकते थे।
      वीर विनोद, भाग 2, पृष्ठ 151, तथा ख्यातें के अनुसार-
‘‘युद्ध छिड़ने के एक दिन पूर्व कुंवर मानसिंह थोड़े से साथियों सहित शिकार को गया था, जिसकी सूचना भील गुप्तचरों ने महाराणा को दी और सामंतों ने निवेदन किया इस अच्छे अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए, परन्तु वीर महाराणा ने उत्तर दिया कि इस तरह छल और धोखे से शत्रु को मारना सच्चे क्षत्रियों का काम नहीं है।
देशकाल, समयकाल, भौगोलिक परिस्थितियाँ तथा युद्ध के स्थान का चयन इन सब बातों को ध्यान में रखकर महाराणा प्रताप के सैन्य संचालन का विश्लेषण किया जावें तो निश्चित ही यह तथ्य सामने आते हैं कि महाराणा प्रताप में एक उच्च सेनापति के गुण प्राकृतिक रूप से विद्यमान थे।

क्योंकि मुगलों के पास भारी तोपखाना और दूर तक मार करने वाली बन्दूकें थीं, इसलिए मैदान की बजाय पहाड़ों में लड़ना ही उचित था, क्योंकि पहाड़ों पर भारी तोपे लेकर नहीं चढ़ा जा सकता था एवं भीलों के तीरों का वार भी अचूक था। क्योंकि मुगल ठण्डे मुल्क (ताशकंद, समरकन्द और बल्ख) के रहने वाले थे, इसलिए हिन्दुस्तान की गर्मी सहन करना बहुत दुष्कर था। इसीलिए महाराणा ने सैन्य चतुराई से युद्ध के लिए सबसे ज्यादा गर्म दिन 18 जून, 1576 चुना। दूसरे शब्दों में श्रेष्ठ युद्ध कला एवं सैन्य चतुराई का परिचय देते हुए प्रताप ने समय, स्थान एवं दिन का चयन स्वयं अपनी शर्तों पर किया और अपनी शर्तों के अनुसार शत्रु को लड़ने के लिए बाध्य भी किया।

एक उच्चतम कोटि के सेनानायक की तरह सैनिक और घोड़ों को पहचानने के लिए प्रताप को ऊपर वाले ने बहुत पारखी नजर ¼keen insight½ दी थी। इसीलिए उसने अपने हरावल ¼assault squadron½ की कमान निडर, साहसी एवं स्वामीभक्त हकीम खां सूर को सौंपी तथा अपनी सवारी के लिए स्वामीभक्त ‘चेतक‘ का चयन किया।
हल्दीघाटी का युद्ध के नाम से विख्यात युद्ध 18 जून, 1976 को खमणोर गांव और हल्दीघाटी के बीच में लड़ा गया।

‘हल्दीघाटी‘ से कुछ ही दूर खमणोर के निकट दोनों सेनाओं का भीषण युद्ध हिजरी संवत् 984 रबी उल् अव्वल के प्रारम्भ ई.वी. 1576 जून में हुआ। - ओझा, राजपूताना, पृष्ठ 744
मुगल इतिहासकार अल बदायूनी, जो स्वयं इस युद्ध में मुगल फौज के साथ उपस्थित था, लिखता है - ‘‘राजा की सेना दर्रे के पीछे से आयी थी। इसका सेनापति हकीम सूर था। पहाड़ों की तरफ से निकल कर हमारी हरावल पर आक्रमण किया। भूमि ऊँची-नीची और रास्ते टेड़े-मेढ़े औरउ कांटों से भरे होने के कारण हमारी हरावल में हड़बड़ी मच गई, जिससे हमारी हरावल की पूरी तरह से हार हुई। हमारी सेना के राजपूत, जिनका मुखिया राजा लूणकरण था, और जिनमें से अधिकतर वाम पार्श्व में थे, भेड़ों के झुण्ड की तरह भाग निकले और हरावल को चीरते हुए अपनी रक्षा के दक्षिण पार्श्व की तरफ दौड़े। इस समय मैंने (अल बदायूनी), जबकि मैं हरावल के खास सैन्य के साथ था,....।’’

‘‘राणा कीका (प्रताप) के सैन्य के दूसरे भाग में, जिसका संचालक राणा स्वयं था, घाटी से निकलकर काजीखान के सैन्य पर, जो घाटी के द्वार पर था, हमला किया और उसकी सेना का संहार करता हुआ मध्य तक पहुँच गया जिससे सबस के सब सीकरी के शैखजादे भाग निकले और उनके मुखिया शैख मन्सूर को भागते हुए तीर लगा। काजी खां मुल्ला कुछ देर तक टिका रहा, परन्तु दाहिने हाथ का अंगूठा तलवार से कट जाने पर वह भी अपने साथियों के पीछे यह कहता हुआ भाग गया कि ‘संकट सामने जब सहने लायक नहीं रहे, वहां से भाग जाना पेगम्बर की ही एक परम्परा है।‘’ अल बदायूनी आगे लिखता है -
‘‘हमारी जो फौज पहले ही भाग निकली थी, नदी (बनास) को पार कर 5-6 कोस तक भागती ही रही। इस तबाही के समय चन्दावल का सेनानाक मिहतर खान ने मुगल ढोल और नगाड़े बजाकर यह अफवाह फैलाई कि शहंशाह अकबर खुद अपनी फौज के साथ आ पहुँचा है, इसलिए भागती हुई सेना के पैर टिक गए।‘‘

महाराणा प्रताप की तलवार की जद में जो भी आया उसे अपने प्राण गंवाने पड़े। वह रौद्र रूप धारण कर चुका था, बुरी तरह घायल होने के उपरांत भी वह पूरे मुगल सैन्य बल को चीरता हुआ शत्रु के सबसे सुरक्षित स्थान ‘सेनापति कुंवर मानसिंह‘ के हाथी के सामने पहुँच गया। चेतक, अपने स्वामी का इशारा पाते ही मानसिंह के हाथी पर चढ़ दौड़ा। चेतक के पांव की अगली टाप मानसिंह के हाथी के मस्तिष्क पर पडी। महाराणा प्रताप ने शत्रु सेनापति का वध करने के लिए पूरी ताकत से अपना भाला फेंका, मानसिंह ने हाथी के हौदे में छुपकर अपनी जान बचाई, परन्तु भाला महावत के कवच को भी चीरता हुआ हाथी के हौदे के अन्दर समा गया। हाथी की सूंड में बंधी तरवार से चेतक का एक पांव और पेट पर गहरे घाव आएं। महाराणा प्रताप भी इस समय तक बुरी तरह घायल हो चुके थे। इस संघर्ष में उन्हें 5 घाव लगे, जिनमें 2 तलवारों के घाव, 1 गोली का घाव और 2 भालों के घाव थे। झाला सरदार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मेवाड़ का राज्य-चिन्ह अपने ऊपर ले लिया और विनती कर महाराणा को युद्ध भूमि से प्रस्थान करने को विवश कर दिया।

उधर महाराणा की हरावल का सेनानायक हकीम खां, मुगल सेना का संहार करते हुए उसे बनास नदी के तट के उस पार तक खदेड़ता हुआ ले गया। उसी समय बहुसंख्यक मुगल सेना की चंदावल (रक्षित फौज) के सेनानायक मेहतर खां ने ढोल और नगाड़े बजाकर यह अफवाह फैला दी कि बादषाह अकबर स्वयं तेज घोड़ों पर सवार अपनी फौज के साथ पहुंच गया है। इस खबर से भारतीय मुगल सेना रूक गई। इस समय भीषण युद्ध हुआ जिसमें हकीम खां अद्धितीय रण कौषल दिखाता हुआ वीर गति को प्राप्त हुआ। परंतु उसके हाथ से तलवार नही छुटी।

जब उसे दफनाने के लिए ‘‘गुस्ल’’ (अंतिम स्नान) दिया गया तब भी कई शक्तिषाली लोगों ने पूरी शक्ति लगाई, परंतु तलवार नही छुडा सके। तब सामंतों ने महाराणा से हाथ काटने का निवेदन किया परंतु महाराणा ने वीर का सम्मान करते हुए हाथ काटने से मना कर दिया। इसलिए हकीम खां सूर को तलवार के साथ ही दफनाया गया।
      इतिहास में एकमात्र यही वीर है जो तलवार हाथ में लेकर सो रहा है।
      “मेवाड़ फाउण्डेशन” से आज भी ‘‘हकीम खां सूर – अवॉर्ड” दिया जाता है।

      जन-राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी इस अवॉर्ड से सम्मानित किए गए थे। 

युद्ध भूमि से जाते समय दो शत्रु सैनिक घुड़सवारों ने महाराणा का पीछा किया। महाराणा के पास पहुंचकर एक मुगल सरदार ने महाराणा पर तलवार से वार करने का प्रयास किया, परन्तु महाराणा की तलवार बिजली की तरह कौंधी और उस मुगल सरदार का लोहे का कवच काटते हुए उस यवन के साथ-साथ उसके अश्व को भी काट डाला। दूसरे सैनिक का भी यही हश्र हुआ।

      घायल महाराणा को उनके भाई शक्तिसिंह ने अपना घोड़ा दिया।
‘‘जिस स्थान पर चेतक ने प्राण त्यागे वह स्थान हल्दी घाटी से लगभग 2 मील दूर वलीचा गांव के पास स्थित है जहां नाले के निकट उसका चबूतरा बना हुआ है।’’
                                                       - कर्नल टॉड
                                                      ए.ए.क्यू. - राजपूताना

झाला सरदार के वीरगति को प्राप्त होते ही हल्दी घाटी का युद्ध समाप्त हो गया।
‘‘उस दिन गर्मी इतनी भीषण थी कि भेजा उबला जाता था और गरम लू तीर की तरह बदन में घुस रही थी। मुगल सेनिकों में चलने-फिरने की भी हिम्मत नही रही थी। यह भी अंदेषा था कि प्रताप पहाड़ी की दूसरी तरफ घात लगाये खड़ा है, इसलिए हमारे सैनिकों ने उसका पीछा नही किया और अपने डेरे पर लौट आए।’’
- अल बदायूनी।

‘‘दूसरे दिन हमारी सेना ने रणभूमि का अवलोकन किया तथा गोगुन्दा पर कब्जा कर लिया। गोगूंदा में केवल 20 पुजारी और सेवक थे जिन्होंने बहादुरी से लड़कर मौत को गले लगाया।”
‘‘हमारी फौज को हमले का खतरा था इसलिए गहरी-गहरी खन्दकें खोद कर हर मौहल्ले में ऊंची-ऊंची आड़ खड़ी कर दी गई ताकि घोड़ें नहीं फांद सके।’’
- अल बदायूनी

शाही सेना गोगूंदा में कैदी की भांति सीमाबद्ध रही और राषन तक ना ला सकी। परन्तु यह युद्ध महाराणा प्रताप और अकबर के संघर्ष का प्रारंभ था।
‘‘अकबर 29 सितम्बर 1576 को ख्वाजा गरीब नवाज के उर्स पर अजमेर आया और उसने कुतुबुद्धीन, मौहम्मद खां, कुलीज खां और आसफ खां को आज्ञा देकर भेजा कि वह गोगून्दे से राणा के मुल्क में सब जगह फिरें और जहां कहीं उसका पता लगे वहीं उसे मार डालें’’।
- मुन्तखबुत्तावारीख का अंग्रेजी अनुवाद, जिल्द 2, पृष्ठ 246

शाही सेना गोगून्दा में कैदियों की तरह पडी हुई थी। जब कभी थोडे से आदमी रसद का सामान लेने के लिए जाते तो उन पर राजपूत धावा बोल देते थे। अतः शाही सेना घबराकर बादषाह के पास अजमेर चली गई और महाराण बहुत से बादषाही थानों के स्थान पर अपने थाने नियत कर कुंभलगढ़ चला गया। - वीर विनोद, भाग 2 पृष्ठ 155
शाही सेना के लौट जाने के बाद महाराणा ने सिरोही के राव सुरताण, जालोर के स्वामी ताजखां और अपने श्वसुर ईडर के राजा नाराणदास के साथ मिलकर गुजरात के कई स्थानों पर शाही थानों को नष्ट कर दिया और कई गांव और शहरों को अपने अधीन कर लिया।
- मुंशी देवीप्रसाद : महाराणा श्रीप्रतापसिंहजी का जीवन चरित्र, पृष्ठ - 26

‘‘बादशाह अकबर स्वयं 13 अक्टूबर 1576 को अजमेर से गोगून्दा को रवाना हुआ। गोगूंदा से अकबर ने कुतुबुद्धीन खां, राजा भगवन्तदास और कुंवर मानसिंह को राणा के पीछे पहाड़ों में भेजा। परन्तु महाराणा उन पर हमला ही करता रहा। अन्त में वे पराजित होकर बादशाह के पास लौट आए।’’ - अबुलफजल 

‘‘वे राणा के प्रदेश में गए परन्तु उसका कुछ पता ना लगने से बिना आज्ञा ही लौट आएं जिस पर अकबर ने अप्रसन्न हो उनकी डयोढ़ी बंद कर दी, जो माफी मांगने पर फिर बहाल की गई।”
- अबुलफ़जल-अकबरनामा अंग्रेजी अनुवाद, जिल्द सं. 3, पृष्ठ - 274-75

अकबर मेवाड़ के इलाके में 6 महीने तक रहा और सारी कोशिशों के बावजूद प्रताप का या उसकी सेना का कोई ओहदेदार उसके हाथ में नहीं आया।
- अकबरनामा भाग 3, पृष्ठ 193-194

बादशाह ने फिर एक बड़ी सेना लेकर मिर्जाखां (खानखाना) व अन्य अफसरों को राणा पर भेजा। एक बार राजपूत सेना ने हमला किया जिसमें कुंवर अमरसिंह ने खानखाना की औरतों को बंदी बना लिया, जिनका महाराणा ने बहन बेटी का सम्मान कर प्रतिष्ठा के साथ पीछा उनके पति के पास पहुंचा दिया। महाराणा के उत्तम बर्ताव के कारण खानखाना उस समय से ही मेवाड़ के महाराणाओं की तरफ सद्भाव रखने लगा।
- मुंशी देवीदास, महाराणा श्रीप्रतापसिंहजी का जीवन चरित्र, पृष्ठ-40

बादशाह ने फिर 15 अक्टूबर, 1578 को एक बड़ा सैन्य दल महाराणा प्रताप के विरूद्ध भेजा परंतु वह भी महाराणा तक नहीं पहुंच सके केवल राव सुरजन, हाडा के बेटे दूदा को साथ लेकर अकबर के दरबार में हाजिर हुए। - अकबरनामा जिल्द 3, पृष्ठ -355-56

इसी बीच भामाशाह के नेतृत्व में राजपूत सेना ने मालवा पर चढ़ाई कर, वहां से 25 लाख रूपये और 20 हजार अशर्फियां लूटकर चुलिया गांव में महाराणा को भेंट की।
महाराणा जीवन पर्यन्त पहाड़ों की चट्टानों तथा गुफाओं में अपने परिवार के सहित सुरक्षित रहे। कई अवसर पर उन्हें और उनके परिवार को समय पर खाना भी नसीब नही होता था। एक बार तो उनकी पत्नी और कुंवर अमरसिंह की पत्नी ने मिलकर घास के बीज की रोटी बनाई। आधी रोटी एक बच्ची के हाथ में से जंगली बिल्ली छीनकर ले गई। परंतु इन सब प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद महाराणा ने अक्रांता से अपनी मातृभूमि का सौदा नहीं किया।
संक्षिप्त में इस संघर्ष का अंत यह हुआ कि महाराणा ने अपने छोटे से राज्य का 80 प्रतिषत भू-भाग मुगलों से दुबारा प्राप्त कर लिया। महाराणा एक ही वर्ष 1586 में चित्तौड़ और मांडलगढ को छोडकर सारे मेवाड को अपने अधीन कर लिया था।-
  • वीर विनोद भाग - 2, पृष्ठ - 164
अकबर ने साम्राज्य विस्तार के लिए जितने युद्ध किए उससे ज्यादा युद्ध उसे अपने नजदीकी रिष्तेदारों और सेनानायकों के विद्रोह को दबाने के लिए करना पडा। - मई 1562 ई. में अकबर का दूध शरीक भाई ¼Foster Brother½ आदम खां को वजीर शमशुद्दीन की हत्या का कठोर दंड देते हुए उसे दुर्ग की दूसरी मंजिल से नीचे फिकवा दिया। अकबर ने उसके शरीर में जीवन का संकेत पाने पर उसे दुबारा दुर्ग से नीचे फिकवा दिया। कुछ इतिहासकार कहते है कि अकबर ने स्वयं आदम खां को नीचे फेका था। 

- अकबर का बहनोई और सेनापति सरफुद्दीन की बगावत 5 नवम्बर 1562 में हुई। ख्वाजा मुअज्जम, (अकबर के मातृ पक्ष का चाचा) द्वारा विद्रोह 1564 ई.।
- मालवा के सूबेदार अब्दुला खां उजबेक की बगावत जुलाई 1564 ई.।
-रानी दुर्गावती के विरूद्ध सैनिक अभियान। तथा सेनापति आसफ खां द्वारा विद्रोह 1565-66 ई.
- अकबर का भाई मो. हकीम - काबुल का सूबेदार द्वारा पंजाब पर आक्रमण - फरवरी 1567 ई.।
- खान जमान तथा बहादुर खां की बगावत। बन्दी बनाएं जाने पर शहंषाह ने उन्हें हाथी के पांव तले कुचलवाकर मरवा डाला - मई 1567 ई.।
-  चित्तोडगढ के विरूद्ध फौजी अभियान 1567।
- गुजरात में मो. हुसैन का विद्रोह-अगस्त-अक्टूबर 1573।
- काबुल में मोहम्मद हकीम का विद्रोह, अकबर स्वयं काबुल पहुंचा-9 अगस्त 1581
‘‘असीरगढ के युद्ध के बाद अकबर के प्रभुत्व में कमी होने लगी। वह लगभग 45 वर्ष तक युद्ध करता रहा। जहांगीर के विद्रोह के कारण अकबर मई में आगरा लौट आए। सलीम के लगातार विद्रोह, शहजादा दानियाल की मृत्यु और अन्य घटनाओं के कारण अकबर, जीवन के अंतिम वर्षों में अकबर का मन खिन्न हो गया था.......।‘‘- इतिहासकार विंसेंट स्मिथ अपनी पुस्तक ‘‘अकबर द ग्रेट मुगल’’ पृष्ठ 207 से 222
अकबर की शाही सेना जो कार्य 10 वर्षों में नही कर सकी वह कार्य महाराणा ने एक साल में कर दिखाया। सन् 1585 के पश्चात् महाराणा ने आमेर की प्रमुख व्यवसायिक मंडी मालपुरा पर हमला कर दिया और उसे तहस-नहस कर उस पर अधिकार कर लिया।
                                                      - राणा रासो पद्य 458

उदयपुर आदि शहर भी महाराणा के अधीन आ गए थे परंतु महाराणा अपनी राजधानी चावंड को ही रखा। महाराणा ने अपना अंतिम राज्यकाल अपने राज्य को सुव्यवस्थित करने में लगाया। महाराणा ने अपने जीवन के अंतिम 9-10 वर्ष अपने राज्य को सभी दृष्टि से सुदृढ करने के लिए कार्य किया। 19 जनवरी 1597 को षिकार खेलते समय धनुष पर ‘‘ताण‘‘ चढाते समय दुर्घटनावश गंभीर रूप से घायल हो जाने के कारण महाराणा की मृत्यु चावंड में हो गई। चावंड से लगभग डेढ मील दूर बंडोली गांव के निकट महाराणा का अग्नि-संस्कार हुआ।
कुंवर अमरसिंह ने मेवाड की परंपरा के विरूद्ध महाराणा प्रताप की अंत्येष्टि, विधि-विधान के अनुसार स्वयं श्रुति, स्मृति, पुराण आदि शास्त्रो युक्त विधि से अपनी उपस्थिति में पूर्ण करवाई तथा मुखाग्नि स्वयं दी।

जब महाराणा के स्वर्गवास का समाचार अकबर के पास पहुंचा तब वह भी उदास होकर स्तब्ध सा हो गया। उसकी यह दशा देखकर दरबारी लोगों को भी आश्चर्य हुआ। उस समय चारण दुरसा आढा ने जो वहां उपस्थित था नीचे लिखा हुआ छप्पय कहा -
अस लेगो अणदाग, पाघ लेगो उणनामी।
गौ आडा गवडाय, जिको बहतो धुर वामी।।
आशय – हे गुहिलोत राणा प्रतापसिंह! तेरी मृत्यु पर शाह ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निष्वास के साथ आंसू टपकाये, क्योंकि तूने अपने घोड़ को दाग नही लगने दिया, अपनी पगडी को किसी के आगे नही झुकाया। 
दूसरी और अकबर अपने साम्राज्य को विस्तार देने के लिए अथक प्रयत्नशील रहा।
- गुजरात के शासक मुजफ्फर खां का विद्रोह - सितम्बर 1583।
- कश्मीर अभियान शासक यूसुफ खां को गिरफ्तार किया गया। पर बगावत जारी रही दिसम्बर 1586।
- अज्ञात व्यक्ति द्वारा राजा टोडरमल की छुरा घोंपकर हत्या - 28 जुलाई, 1587।
- शहजादा सलीम का विद्रोह। स्वयं को शासक घोषित कर दिया - 01 अगस्त 1601।
इस्वी सन् 1602 में शहजादा सलीम ने अपने पिता बादशाह अकबर के खिलाफ खुली बगावत का ऐलान कर स्वयं को हिन्दुस्तान का शहंशाह घोषित कर दिया तथा इलाहाबाद में अपना दरबार भी लगाने लगा, उसने अपने नाम के सोने व चांदी के सिक्के भी ढलवाएं और अकबर के पास नमूने के तौर पर आगरा/फतेहपुर सीकरी भिजवाए। लगभग दो साल तक हरम की वरिष्ठ महिलाएं जिनमें जोधा बाई भी सम्मिलित थी बाप-बेटे के बीच सुलह का प्रयास करते रहे।

अंत में 21 अगस्त 1604 को जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने शहजादा सलीम के विरूद्ध युद्ध का ऐलान कर दिया, अकबर स्वयं इस युद्ध में शामिल होने के लिए कूच भी कर चुका था। परंतु रास्ते में आठवें दिन, अचानक अकबर की माता का देहान्त हो जाने का समाचार पाकर वह लौट आया। कुछ समय बाद सलीम भी अपनी दादी को श्रद्धांजलि अर्पित करने का बहाना लेकर आगरा पहुंचा। जोधाबाई के अथक प्रयास से अकबर ने सलीम को क्षमा कर दिया। परंतु 22 सितम्बर 2005 को शहंशाह अचानक बीमार पड गया। 21 अक्टूबर 1605 को अकबर ने शहंशाह बाबर की तलवार (राजसी चिन्ह) सलीम को सौंप दी। अकबर की बीमारी ज्यादा बढती गई। वह नीम बेहोशी (अर्द्धमूर्छित अवस्था) के हालत में बडबडाया करता था कि ‘‘शेखूं, तूने ऐसा क्यों किया’’ ? ‘‘शेखूं, तूने ऐसा क्यों किया’’ ? इसी बीमारी में 26-27 अक्टूबर 1605 की रात को अकबर का निधन हो गया।

इस बीच उसके सगे-सम्बन्धी और रिश्तेदारों ने कई अवसर पर बगावत की। यहां तक की उसके पुत्र शहजादा सलीम ने भी एक अवसर पर स्वयं को हिन्दुस्तान का शहंशाह घोषित कर दिया। अकबर के विरूद्ध ऐतिहासिक विवरण निम्न प्रकार है -
नोट - अकबर ने अपने शासन काल में सबसे भयंकर भूल स्वयं को मालिक का दूत ¼Messanger½ मानकर और दीन-ए-ईलाही धर्म चलाकर की, जिसका विवरण आगे दिया जा रहा है।
- मासूम खां फर्हनखुदी का विद्रोह - मार्च 1582।
1576 ई. के बाद अकबर का ध्यान अपने साम्राज्य के अन्य ईलाकों की ओर गया। क्योंकि अकबर को मेवाड में व्यस्त देखकर उसके रिश्ते का भाई हाकीम खां ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया था। इसलिए अकबर को अपनी सेना सहित पश्चिम दिशा की ओर जाना पडा। हाकिम खां के विद्रोह का दमन कर अकबर अपनी राजधानी लौटा, परंतु वह हाकिम खां का विद्रोह कभी भी पूरी तरह समाप्त नही कर पाया।
अकबर ने अपने साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ धार्मिक मामलों में भी रूचि लेना शुरू कर दिया था जिसका मुख्य सूत्रधार यमन का मूल निवासी शेख मुबारक था। जिसके दोनों लडके अबुल फजल तथा फैजी अकबर के नवरत्नों में शामिल थे।

श्री मुबारक ने अकबर को हिन्दुस्तान पर लंबे समय तक राज्य करने के लिए यह समझाया, वह उपर वाले की तरफ से हिन्दुस्तान की जनता का सबसे बडा ‘‘मजहबी खलीफा’’ है। इसी धारणा से प्रभावित होकर अकबर ने 1579 में ‘मजहर’ (मजहबी मामलों का सर्वोच्च निर्णायक) की घोषणा की। अकबर ने स्वयं को ‘इमामे-आदिल’ घोषित करवाया। -ईमाम यानि मुखिया तथा आदिल का मतलब होता है इंसाफ करने वाला। दूसरे शब्दों में मजहबी / धार्मिक मामलों में भी अकबर सर्वोच्च न्यायाधीष बन गया। मजहबनामा की नियमावली बनाने वाला यही शेख मुबारक था।

अकबर की धार्मिक तृष्णा यही शांत नही हुई। वह अति महत्वकांशी बनता चला गया। अकबर को अति महत्वकांशी बनाने में मुख्य सहयोगी यही शेख मुबारक था।

दीन-ए-ईलाही -  फतेहपुर सीकरी में बनाये गये ईबादतखाना में सभी धर्मावलियों/धर्मगुरूओं से अकबर सभी धर्मों के प्रवचन सुना करता था। तथा उनकी आपस में शास्त्रार्थ भी करवाया करता था। क्योंकि वह स्वयं पढा-लिखा नही था इसलिए वह समस्त विचार-विमर्श को याद रखने की कोषिष करता था। शेख मुबारक के द्वारा प्रेरित करने पर उसने 1582 में दीन-ए-इलाही मजहब की घोषणा कर डाली। इस नए धर्म में शुक्रवार के दिन मांसाहार वर्जित था। तथा इस धर्म की दीक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति को अपना सिर अकबर के चरणों में झुकाना पडता था। और पगडी अकबर के चरणों में रखनी पडती थी। सम्राट उसे उठाकर उसके सर पर पुनः रखकर ‘शष्ठ’ करता था अर्थात उसे अपना स्वरूप प्रदान करता था। इस पष्ठ पर अल्लाह-हो-अकबर खुदा रहता था। अनुनायी को अपने जीवन में श्राद्ध भोज देना होता था। इसके अतिरिक्त पूर्व की ओर सिर करके सोना शुभ माना जाता था।

अकबर द्वारा प्रचलित धर्म दीन-ए-ईलाही में सभी धर्मों का समावेष करने का असफल प्रयास किया गया था। बीरबल पहला व अंतिम हिन्दू था जिसने दीन-ए-ईलाही को स्वीकार किया। बीरबल के अतिरिक्त अबुल फजल, अबुल फैजी तथा शेख मुबारक ने भी यह धर्म अपनाया। अबुल फजल को दीन-ए-ईलाही का प्रधान मुकर्रर किया गया था। अकबर के द्वारा दीन-ए-ईलाही धर्म को राजकीय धर्म घोषित किया गया था। अकबर की मृत्यु 1605 ई. तक यह राजकीय धर्म रहा।

इतिहासकार स्मिथ ने दीन-ए-ईलाही के बारे में लिखा है - ’’यह साम्राज्यवादी भावनाओं का शिशु व उसकी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं का एक धार्मिक जामा है।’’
अकबर ने नया कैलेण्डर ‘इलाही संवत’’ भी शुरू किया था। अकबर के नौ के नौ नवरत्न भी इस धर्म में शामिल नही हुए। अकबर के केवल तीन नवरत्न ही इस धर्म में शामिल हुए।
नया धर्म दीन-ए-ईलाही की अवधारणा - इस्लाम धर्म के शत प्रतिषत प्रतिकूल होने के कारण अकबर के साम्राज्य के मुल्ला, मौलवी, ईमाम तथा कट्टर मुसलमान अकबर के विरोधी हो गए थे। इस कारण अकबर को धार्मिक व मजहबी तिरस्कार का सामना करना पडा। क्योंकि अकबर दृढ शक्तिशाली सम्राट था तथा उसे राजपूतों व अन्य जाति का समर्थन प्राप्त था इसलिए इस तिरस्कार की भावना को व्यक्त करने का साहस किसी में नही था। परंतु मजहबी बिन्दुओं को लेकर पैदा होने वाले विरोधाभास पर मुफ्ती तथा उलमाओं ने अकबर के विरूद्ध ‘‘फतवा‘‘ जारी करने में कोई देर नही करते थे। क्योंकि ईस्लाम अपने पैगंबर मोहम्मद (स.अ.) को अंतिम पैगम्बर ¼Last Messenger½ मानता है। तथा यह अविवादित मान्यता है कि ईस्लाम मजहब मोहम्मद साहब के साथ पूर्ण हो चुका है। अब इसमें किसी प्रकार की ‘‘जैर और जबर‘‘ (एक मात्रा) की गुंजाइश नहीं है। इसलिए अकबर के प्रति मुसलमानों के दिलों में घृणा पनप गई थी। कई मौकों पर अकबर को मस्जिद में प्रवेश करने पर भी फतवा जारी किया गया।

‘‘मृत अकबर की अंत्येष्टि बिना किसी उत्साह के जल्दी ही कर दी गई। दुर्ग की दीवार तोडकर एक मार्ग बनवाया गया तथा शव चुपचाप सिकंदरा के मकबरे में दफन कर दिया गया।’’
- विन्सेन्ट स्मिथ, अकबर द ग्रेट, पृष्ठ – 236  
इस प्रकार प्रमाणित ऐतिहासिक घटनाओं/तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि -
- अकबर तैमूर एवं मंगोल वंश का था एवं उसकी रगों में तुर्क एवं मंगोल खून दोडता था। जबकि महाराणा प्रताप का संबंध सूर्यवंषी सिसोदिया राजपूत खानदान से था जो स्वयं को भगवान राम का वंशज मानते है।
- अकबर निरक्षर था, पढने-लिखने में उसको कोई रूचि नही थी। जबकि महाराणा प्रताप ने उच्च कोटि की समायिक, गुरूकुल पद्धति से शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की थी।
- अकबर आक्रान्ता था। बाल्यकाल से ही साम्राज्यवादी एवं विस्तारवादी था। जबकि प्रताप को जनसामान्य विशेषतया आदिवासी एवं गाडिया लुहारों की स्वामिभक्ति प्राप्त थी।
- अकबर ने ’’मंगोल - कू्ररता’’ अपनी चरम पर थी। चितोडगढ युद्ध के बाद 12000 निहिर और निसहाय आदमी - औरतों और बच्चों का कत्ले आम इस बात का प्रमाण है।
- अकबर एक धनलोलुप एवं लालची शासक था। वह जिस व्यक्ति से अप्रसन्न होता था। चुपके से उसकी हत्या भी करवा दिया करता था।
- महाराणा प्रताप मातृभूमि प्रेम, स्वाभिमान, एवं त्याग ज्वलंत उदाहरण थे क्योंकि उन्होंने शपथ ली थी कि जब तक वे एक भी शत्रु को अपने राज्य से नही निकाल देंगे कुटिया में रहेंगे, पतल में खाएंगे तथा जमीन पर सोएंगे। जबकि अकबर शाही महलों में रहने का आदि था।
- शोर्य - हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा द्वारा प्रदर्षित वीरता अविस्मरणीय है। 5 घांव खाने के पश्चात् भी शत्रु के सेनापति पर घोडा चढा देना कोई विरला वीर ही कर सकता है।  अकबर द्वारा ऐसी वीरता का प्रदर्शन का वर्णन उसके किसी दरबारी इतिहासकार ने भी नही लिखा है।

- जननायक - प्रताप को जन सामान्य की स्वामिभक्ति प्राप्त थी। जिसके सहारे वह दुनिया के बहुत बडे शासक तथा हर तरह से साधन सम्पन्न सम्राट अकबर से हर कदम पर मुकाबला करता रहा। जबकि अति धार्मिक महत्वकाक्षांओं के कारण अकबर के द्वारा प्रचलित दीन-ए-इलाही का केवल 4 आदमियों ने ही समर्थन किया। और इस कारण उसके खिलाफ कई फतवें जारी हुए। यहां तक की उसे मुसलमान मानने पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया गया था। इस प्रकार मजहब से अकबर एक बहिष्कृत व्यक्तित्व का व्यक्ति था।

व्यक्तिगत जीवन - अकबर अपनी मृत्यु के पश्चात् 500 औरतों का हरम छोड गया। सवेरे के समय वह पोस्त (अफीम, सूखें मेवे तथा अन्य प्रकार की यौन वर्धक दवाईयों के साथ) खाया करता था और रात को अर्क (ईरानी अंगूरी शराब) पीने का आदी था जबकि महाराणा प्रताप शराब को छूते भी नहीं थे।

अंत्येष्टि - महाराणा प्रताप की अंत्येष्टि विधि पूर्वक की गई, जबकि अकबर का शव किले की दीवार तोड़कर चुपचाप निकाला गया व दफना दिया गया।
अतः वस्तुस्थिति का वर्णन स्वयं ही एक खुला प्रश्न है जिसका प्रत्येक व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार विष्लेषण कर सकता है कि दोनों समकालीन शासक में कौन महान था?
साभार: newsbharati.com

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित