शनिवार, 26 सितंबर 2015

व्यक्ति विशेष: मोहन भागवत कैसे बनें मोदी के 'कृष्ण'

 सबसे तकतवर हस्ती हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. लोकसभा चुनाव में जीत के बाद से ही राजनीतिक के आसमान पर सबसे चमकदार चेहरा बन कर चमक रहे हैं नरेंद्र मोदी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजनीति की दुनिया से अलग देश में दूसरा सबसे ताकतवर शख्स कौन हैं? दरअसल मोहन भागवत वो शख्स भी है जिन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में सबसे अहम रोल निभाया है.

देश के सबसे बड़े संगठन, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ को चलाते हैं. उनका संगठन, आरएसएस यूं तो जाहिरी तौर पर राजनीतिक गतिविधियों से परहेज करता है लेकिन बीजेपी को चुनावी जंग जिताने में पर्दे के पीछे आऱएसएस औऱ उसके प्रमुख मोहन भागवत का सबसे अहम योगदान माना जाता है. मोहन भागवत का नाम यूं तो मीडिया में कभी-कभार ही चमकता है लेकिन केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से वो अक्सर अपने बयानों को लेकर विवादों में घिरते रहे हैं. पिछले दिनों आरक्षण के मुद्दे पर उनके ताजा बयान ने एक बार फिर देश में राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ यानी आरएसएस को देश के सबसे बड़े संगठनों में से एक माना जाता है. आरएसएस की कमान संघ प्रमुख मोहन भागवत के हाथों में हैं. भागवत साल 2009 में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख बने थे लेकिन संघ प्रमुख बनने के बाद से ही वो अपने बयानों को लेकर ही ज्यादा चर्चा में रहे हैं. केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद हिंदुत्व पर दिए उनके बयान को लेकर भी हंगामा खड़ा हो गया था और अब आरक्षण के मुद्दे पर उनके बयान ने देश की राजनीति को गर्मा दिया है.

गुजरात में पटेल समुदाय को आरक्षण देने के लिए शुरु हुए आंदोलन का नाम लिए बगैर भागवत ने आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग उठाई है. आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर को इंटरव्यू देते हुए मोहन भागवत ने कहा है कि आरक्षण को हमेशा राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है. लोग अपनी सुविधा के मुताबिक अपने समुदाय या वर्ग का ग्रुप बनाते हैं और आरक्षण की मांग करने लगते हैं. लोकतंत्र में कई नेता उनका समर्थन भी करते हैं. एक गैर राजनीतिक समिति का गठन होना चाहिए जो समीक्षा करे कि किसे आरक्षण की ज़रूरत है और कब तक?

बिहार चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान को लेकर आरोप प्रत्यारोप का एक नया दौर शुरु हो गया है. आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक दलों में तलवारें खिंचती रही हैं और आरक्षण की ये बहस आजादी के वक्त से ही चलती रही है. दरअसल आजादी के बाद जब भारत का संविधान बना तो दलितों और आदिवासियों को मुख्य धारा में लाने के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी.

आजाद भारत का संविधान लागू होते ही एससी यानि अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी और एसटी यानि अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी. 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग यानि ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गई. इस हिसाब से देश में आरक्षण 49.5 फीसदी हो गया और सामान्य वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में 50.5 का हिस्सा रह गया.

लेकिन आजादी के 60 साल बाद आज भी देश में अलग-अलग समुदाय के लोग आरक्षण की मांग का झंडा बुलंद किए हुए हैं. इन दिनों आरक्षण की ताजा आग गुजरात में लगी है जहां हार्दिक पटेल की अगुवाई में पाटीदार समाज खुद को ओबीसी वर्ग में शामिल कराना चाहता है ताकि कॉलेज और सरकारी नौकरियों में उन्हें कोटा मिल सके.


गुजरात में पटेल तो राजस्थान में गुर्जर भी लंबे वक्त से आरक्षण की मांग करते रहे हैं. राजस्थान में बीजेपी की सरकार ने पिछले दिनों गुर्जरों को 5 फीसदी और अगड़ों में आर्थिक रूप से पिछड़ों को 14 फीसदी का आरक्षण देने के लिए दो बिल भी पास कर दिए हैं. खास बात ये है कि इन बिलों के पास होने के बाद अब राजस्थान में 68 फीसदी आऱक्षण हो गया है. जो सुप्रीम कोर्ट की 50 फीसदी आरक्षण देने की सीमा को पार कर गया है और यही वजह है कि देश में आरक्षण के मुद्दे पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है.


गुजरात में पटेल समाज से पहले भी आरक्षण की मांग पर आंदोलन होते रहे हैं और सरकारें इन मांगों के सामने झुकती भी रही हैं. महाराष्ट्र में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसला हुआ था लेकिन हाईकोर्ट ने मराठों को आरक्षण के फैसले पर रोक लगा रखी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार के उस फैसले को निरस्त कर दिया था जिसमें जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल किया जाना था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “जाति एक महत्वपूर्ण वजह है लेकिन सिर्फ जाति पिछड़ापन तय करने का मानक नहीं हो सकती. पिछड़ापन सामाजिक होना चाहिए, सिर्फ शैक्षिक और आर्थिक नहीं.“लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल और फैसले के बाद भी आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ चुका है और आरक्षण नीति की समीक्षा की बात कह कर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है.

कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला नरेंद्र मोद जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उस समय गुजरता के अंदर एक नई आरक्षण की नीति लाए जहां आरक्षण को जिला स्तर तक उन्होंने सीमित कर दिया. और उन पदों को इंटरचेंजजेबल बनाने से इंकार कर दिया. और यहां तक कि गुजरात में ग्राम पंचायतों में भी अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्गों के लोगों को उन्होने आरक्षण से महरुम कर दिया. तो जो देश के भाजपा के सबसे अग्रिम नेता हैं अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गो को जिस पक्ष का वो होने का दम भरते हैं. ये उनका रवैया था. और शायद आज भी है. और यही रवैया उनके मार्गदर्शक आरएसएस के सरसंघचालक का भी है.

आरक्षण के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत विवादों में है लेकिन उनको लेकर विवाद पहली बार नहीं छिड़ा है उनके विवादों की ये कहानी भी हम आपको सुनाएंगे आपको आगे लेकिन उससे पहले देखिए देश की मौजूदा राजनीति में मोहन भागवत होने का क्या है मतलब.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है. जिससे करीब तीन दर्जन छोटे बडे संगठन जुड़े हुए हैं इन संगठनों का दायरा पूरे देश में फैला हुआ है. देश के सबसे बड़े ट्रेड यूनियन में से एक भारतीय मजदूर संघ, जिसके करीब दस लाख सदस्य हैं. देश का सबसे बडा विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और देश की रूलिंग पार्टी भारतीय जनता पार्टी जैसे संघ के कई और संगठन है. जिन्हें संघ परिवार कहा जाता है. संघ परिवार देश भर में शिक्षा, जनकल्याण और हिंदू धर्म से जुड़े कार्यक्रमों समेत कई क्षेत्रों में हजारों प्रोजेक्ट चला रहा है. और संघ परिवार के इन सारे कार्यक्रमों औऱ उद्देश्यों के लिए दिशा निर्देश देना और उनका वैचारिक मार्गदर्शन करने का काम राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सरसंघचालक का होता है.


मोहन भागवत साल 2009 में जब सरसंघचालक बने थे उस वक्त बीजेपी लोकसभा चुनाव हार चुकी थी. लेकिन भागवत ने हार नहीं मानी वो ना सिर्फ बीजेपी में जबरदस्त बदलाए लाए बल्कि उन्होंने संघ परिवार को चुनावी जंग में बीजेपी की मदद के लिए तैयार भी किया गया. मोहन भागवत कैसे बने संघ के सरताज और कैसे उन्होंने हारी और थकी हुई बीजेपी में फूंक दी एक नई जान?

दरअसल मोहन भागवत ने भारत को हिंदू राष्ट्र बोल कर नए विवाद को जन्म दे दिया था. उन्होंने कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और हिंदुत्व उसकी पहचान है और यह अन्य (धर्मों) को स्वंय में समाहित कर सकता है. पिछले साल अगस्त 2014 में मोहन भागवत ने कटक में कथित तौर पर कहा था कि सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिंदुत्व है और देश के वर्तमान निवासी इसी महान संस्कृति की संतान हैं. उन्होंने सवाल किया था कि यदि इंगलैंड के लोग इंग्लिश हैं, जर्मनी के लोग जर्मन हैं, अमेरिका के लोग अमेरिकी हैं तो हिंदुस्तान के सभी लोग हिंदू के रुप में क्यों नहीं जाने जाते? हिंदू राष्ट्र, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का सबसे बडा एजेंडा रहा है. ऐसे में हिंदुत्व पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान पर भी घमासान मच गया था.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का प्रमुख बनने के बाद से ही भागवत अपने बयानों को लेकर विवादों में घिरते रहे हैं लेकिन 2014 के चुनाव से पहले जब उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुद मोर्चा संभाला तो वो और ज्यादा लाइमलाइट में आ गए थे.

ये धुआं उगलती चिमनियों का शहर है जो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा बिजली पैदा करने के लिए भी पहचाना जाता है और ये शहर चंद्रपुर, संघ प्रमुख मोहन भागवत का भी शहर है. मोहन भागवत का जन्म तो 11 सितंबर 1950 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था लेकिन चंद्रपुर की गलियों में ही खेलते- कूदते हुए उनका बचपन गुजरा है. क्योंकि मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत महाराष्ट्र के सतारा से चंद्रपुर में आकर बस गए थे. मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार के स्कूल के दिनों के दोस्त भी थे यही वजह है कि मोहन भागवत का संघ से पुराना नाता रहा है. उनका संघ से ये तीन पीढ़ियों पुराना कनेक्शन है.

चंद्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से मोहन भागवत ने स्कूल की पढाई पूरी की थी. स्कूल के उनके टीचर आज भी उन्हें एक ऐसे विद्यार्थी के तौर पर याद करते हैं जिससे इतनी कामयाबी की उम्मीद उन्हें भी नहीं थी.

चंद्रपुर से स्कूल की पढाई पास करने के बाद उन्हें शहर के ही जनता कॉलेज में बीएससी में एडमीशन ले लिया था लेकिन उन्होंने ग्रेजुएशन की ये पढाई बीच में ही छोड दी और एक साल बाद ही मोहन भागवत ने चंद्रपुर शहर को भी छोड़ दिया. उनकी जिंदगी का पहला अहम पड़ाव बना महाराष्ट्र का शहर आकोला.

मोहन भागवत ने बीएससी की पढाई छोड़कर अकोला के इसी पंजाबराव कृषि विद्यापीठ में वेटनिरी साइंसेज एंड एनीमल हस्जबेंडरी के कोर्स में दाखिला ले लिया था. स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने आगे पोस्ट ग्रेजुएशन की पढाई के लिए इसी कॉलेज में एडमीशन ले लिया था लेकिन 1975 में उन्होंने ये पढाई बीच में ही अधूरी छोड़ दी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दामन थाम लिया.


मोहन भागवत की तीन पीढ़ियां संघ से जुडी रही है. मोहन भागवत के दादा नारायण भागवत संघ के स्वयं सेवक थे और उनके पिता मधुकर राव भागवत भी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रचारक रहें है उन्होंने गुजरात में प्रांत प्रचारक के तौर पर भी काम किया है. आम तौर पर संघ के प्रचारक शादी नहीं करते हैं लेकिन जब मधुकर राव भागवत ने शादी करने का फैसला किया तो वह वापस चंद्रपुर आ गए और चंद्रुपर क्षेत्र के कार्यवाह सचिव पद पर रहे. मोहन भागवत की मां मलातीबाई भी संघ की महिला शाखा सेविका समिति की सदस्य थी. खास बात ये भी है कि मुधकर राव भागवत ने ही बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को संघ में दीक्षित किया था. ये है मोहन भागवत की तीन पीढियों की राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से कनेक्शन की कहानी लेकिन अब सुनिए मोहन भागवत के नरेंद्र मोदी से कनेक्शन की ये कहानी. दरअसल जिन दिनों मोहन भागवत के पिता मुधकर राव भागवत गुजरात में संघ के प्रांत प्रचारक हुआ करते थे तब उनके संपर्क में पहली बार आए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

आकोला कें पंजाबराव कृषि विद्यापीठ से एनीमल हसबेंड्री में ग्रेजुएशन करने के बाद मोहन भागवत ने कुछ महीनों के लिए चंद्रपुर में ही एनीमल हसबेंड्री डिपार्टमेंट में नौकरी कर ली थी. क्योंकि ग्रेजुएशन के बाद ये दो साल की इंटर्नशिप जरुरी होती थी. लेकिन जब मोहन भागवत एमएससी की पढ़ाई कर रहे थे तब 1975 में उन्होंने अचानक बीच में ही पढाई अधूरी छोड़ी दी. ये वो दौर था जब देश में आपातकाल लगाया गया. ऐसे हालात के बीच मोहन भागवत पढ़ाई छोड़ने के बाद फुल टाइम संघ के प्रचारक बन गए.

आपात काल के दौरान मोहन भागवत ने संघ के लिए भूमिग होकर काम किया. 1977 में उन्हें अकोला में ही संघ का प्रचारक बना दिया गया और बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्रों का प्रचारक भी बनाया गया.

1991 में मोहन भागवत संघ कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण के लिए अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख भी बनाए गए और वे इस पद पर 1999 तक रहे. इसी साल उन्हें सारे देश में पूर्णकालिक काम करने वाले संघ कार्यकर्ताओं का प्रभारी, अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, बना दिया गया इस तरह मोहन भागवत संघ में तेजी से तरक्की की सीढ़ियां चढते गए.

मोहन भागवत संघ के प्रचारक है और संघ की परंपरा के मुताबिक उन्होनें शादी भी नहीं की है. साल 2000 में जब राजेंद्र सिंह ऊर्फ रज्जू भय्या और एच पी शेषाद्रि ने सरसंघचालक और संघ सरकार्यवाहक के पद से इस्तीफा दिया तो के एस सुदर्शन संघ के नए सरसंघचालक बने और मोहन भागवत सरकार्यवाहक. और आखिरकार साल 21 मार्च 2009 को भागवत संघ के सरसंघचालक बना दिए गए.

मोहन भागवत को करीब से जानने वाले उन्हें एक विनम्र औऱ व्यावहारिक शख्स के तौर पर पहचानते हैं जो संघ को राजनीति से दूर रखने का नजरिया रखता हैं लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह उन्होंने बीजेपी को जिताने और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुल कर बैटिंग की उसने संघ के राजनीति से दूर रहने के दावे को चर्चा में ला दिया है. भागवत ने कैसे दूर की मोदी के प्रधानमंत्री बनने की राह में आने वाली रुकावटें?

2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बुरी हार हुई थी. हार से बीजेपी और संघ में निराशा का माहौल था तो वही गुजरात में लगातार दो चुनावों में जीत के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की दावेदारी के लिए अपनी तैयारी भी तेज कर दी थी. इसीलिए उस वक्त चुनाव नतीजों के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी प्रेस कांफ्रेस करके अपने इरादे जता दिए थे कि वो बीजेपी में बड़े परिवर्तन चाहते हैं दरअसल हार के बाद संघ के निशाने पर खास तौर पर लाल कृष्ण आडवाणी और उनकी टीम के वो केंद्रीय नेता थे जिन्होंने इन चुनावों की रणनीति बनाई थी.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि भाजपा के काम आज के नहीं है, लाखों कार्यकर्ता उनके देश भर में हैं और उन्होंने तपस्या की है इसके चलते उनके पुण्य काम आएंगे ऐसे होता नहीं है. इतने नीचे तक गहराई तक वो काम किया गया है, गांव गांव में लोग मिलते हैं अब अगर गांव में कोई व्यक्ति भाजपा के लिए आखों में आंसू लेकर खड़ा है तो उस पार्टी का पतन नहीं हो सकता जितना होना है.

बीजेपी की हार के बाद ये भी तय किया गया था कि अब पार्टी की कमान लालकृष्ण आडवाणी नहीं बल्कि कोई और संभालेगा लेकिन तब संघ के आगे भी ये सवाल खड़ा था की आडवाणी के बाद आखिर किसे बीजेपी की कमान सौंपी जाए.

वरिष्ठ पत्रकार जयंतो घोषाल बताते हैं कि नरेंद्र मोदी का ब्रांड इक्युटी जो है वो ब्रैड इक्युटी के सामने ना राजनाथ है ना नितिन गडकरी है. बीजेपी का जो अपना संविधान है उसमें तो नरेंद्र मोदी नंबर 1 ब्रैंड है. तो इसलिए आरएसएस ने भी काम्प्रोमाइज किया. उनके जो इएस मैन रोयलिस्ट को छोड़ के एसे एक बन्दे का जिसका एक ब्रैंड है जिसके साथ वर्किग रिलेशनशिप को सुधारा और आगे बढ़ाया तो इसमें मुझे लगता है कि आरएसएस ने सोचा कि नरेंद्र मोदी एक सर्वश्रेष्ठ बेट हैं.

गुजरात में जीत की हैट्रिक लगाने के बाद नरेंद्र मोदी ने 6 फरवरी 2013 को पहली बार दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दी थी. दिल्ली के श्री राम कॉलेज में जब मोदी बोले तो साफ हो गया की अब उनकी अगली मंजिल दिल्ली ही है. लेकिन नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की राह में अभी कई रोड़े बाकी थे और सबसे बडी दीवार बन कर खड़े थे खुद बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी. लेकिन मोदी को लेकर संघ में फैसला हो चुका था. इसीलिए बीजेपी ने भी जून 2013 में उन्हें केंद्रीय चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना कर अपना संदेश साफ कर दिया था.

गुजरात से निकलकर नरेंद्र मोदी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनने में तो कामयाब रहे थे लेकिन मोदी के विरोध में आडवाणी रुके नहीं बल्कि 10 जून को उन्होंने पार्टी के सभी अहम पदों से इस्तीफा भी दे दिया था. औऱ ये पहला मौका था जब संघ ने सीधे तौर पर खुल कर बीजेपी के मामले में दखल दिया. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आडवाणी को समझाने औऱ मनाने के लिए खुद मोर्चा संभाला.

संघ प्रमुख मोहन भागवत का पहला बडा एक्शन तब हुआ था जब नितिन गड़करी को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था और उनका दूसरा बड़ा एक्शन था नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना. यहीं नहीं उन्होंने बीजेपी और संघ के अंदर नरेंद्र मोदी की राह की हर रुकावट को साफ करने में अहम भूमिका निभाई. ये मोहन भागवत की ही रणनीति थी कि संघ कार्यकर्ताओं ने चुनाव में सौ फीसदी वोटिंग का लक्ष्य बनाया औऱ उसे काफी हद तक हासिल भी किया. जिसका नतीजा चुनाव में  बीजेपी की बडी जीत के तौर पर सामने आया है औऱ बीजेपी की इस जीत का सबसे चमकदार चेहरा  बनकर उभरे हैं नरेंद्र मोदी लेकिन पर्दे के पीछे इस जीत का हकदार एक चेहरा और भी है.



  • साभार ::abpnews.abplive.in

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित