बुधवार, 9 सितंबर 2015

अपनी बात :भारत की ताकत है हिन्दी

हितेश शंकर
बात पखवाड़े भर पहले की है। स्वाधीनता दिवस के मौके पर भारत में शुभकामना संदेशों की साझेदारी जिस समय पूरे जोरों पर थी ठीक उसी समय ट्विटर की चौपाल पर #stohindiimposition का नारा बार-बार अलग-अलग संदेशों में लहराने लगा।


स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर लोगों के मन में हिन्दी विरोध की गांठ लगाने वाले लोग कौन हो सकते हैं, इस सवाल को बूझने का सबसे सही समय हिन्दी पखवाड़ा ही है। हिन्दी के प्रति वैमनस्य खड़ा करने वालों को उनकी इच्छा और भय के संदर्भ में समझना चाहिए। उपरोक्त नारे और इसे उछालने के मौके के चयन से दो बातें एकदम साफ हैं। पहली यह कि हिन्दी विरोध भले बात अन्य भारतीय भाषाओं की करता दिखे, लेकिन आता वह अंग्रेजी का लबादा ओढ़कर ही है। यानी, भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाकर राष्ट्रभाषा के शीर्ष स्थान पर खालीपन पैदा करना ही इस विरोध की मंशा रहती है। दूसरी, भारत को एक सूत्र में बांधने की हिन्दी की शक्ति उन लोगों को डराती है जो आज भी राष्ट्र व्यवस्थाओं को परतंत्रता की अंग्रेजी जंजीरों में बांधे रखना चाहते हैं।

भारत में हिन्दी से आमने-सामने की लड़ाई अंग्रेजी के बूते की बात नहीं। भारतीय भाषाओं के उस भरे-पूरे परिवार से अंग्रेजी थरथराती है जिसकी अगुआ हिन्दी है। इसमें संदेह नहीं कि बांटो और राज करो की ब्रिटिश
तर्ज पर अंग्रेजी के व्यूहकार भारतीय भाषा परिवार को बांटना चाहते हैं।

हिन्दी के अन्य भाषाओं से विरोध या इसे थोपे जाने की बात अपने आप में मूर्खतापूर्ण है। हिन्दी भला तमिल, कन्नड़, मलयालम या बंगाली की विरोधी कैसे हो सकती है? गंगा भला यमुना, कावेरी, गोदावरी, नर्मदा या तीस्ता की विरोधी कैसे हो सकती है? इसी भूमि की अपनी अन्य भगिनी भाषाओं से दुराव का प्रश्न हिन्दी के मन में नहीं उठता। गुजराती, बंगाली, मराठी बोलियों के अलग-अनूठे शब्द अपनी झोली में भरती और पूरे देश में समझी-बोली जाती हिन्दी की ताकत यह है कि इसने समाचार, विज्ञापन, बाजार, राजनीति जैसे हर मोर्चे पर अंग्रेजी को धूल चटाई है। अपनी विमर्शकारी भूमिका का भ्रम बचाने की उधेड़बुन में लगे अंग्रेजी के समाचार पत्र और चैनल कई हिन्दी अखबारों के स्थानीय संस्करणों के सामने बौने हैं। विदेशी कंपनियों के उत्पादों को हिन्दी के कंधे पर चढ़े बिना बाजार नहीं मिलता। राजनीति के मंचों पर अंग्रेजी चमक वाले मोहरे पिट चुके हैं।

सवाल है कि यदि हिन्दी का ऐसा डंका बज रहा है तो फिर चिंता की बात ही क्या है? फिर अंग्रेजी है कहां? उत्तर है, अंग्रेजी भारतीय व्यवस्था की ब्रिटिशकालीन मांदों में छिपी है। देश स्वतंत्र हुआ परंतु व्यवस्था के 'इंग्लिश उपासक' कर्णधार हिन्दी जनाधार को दुहते रहे।

सर्वोच्च  न्यायालय के कामकाज में, नौकरशाही की टिप्पणियों में, हर नीतिगत विमर्श के संचालन सूत्रों में, अंग्रेजी की घुसपैठ हर उस जगह पर गहरी है जहां यह ज्यादा घातक है। संविधान निर्माता अंग्रेजी को ज्यादा छूट और बढ़ावा देने के पक्षधर नहीं थे। 15 वर्ष के संक्रमण काल में, 1965 तक भारत को अंग्रेजी का जुआ उतारकर स्वभाषा पर आना था। लेकिन संविधान निर्माताओं की इच्छा का पालन करने में पर्याप्त राजनैतिक रुचि नहीं दिखाई गई। महात्मा गांधी ने जिस भाषा के सहारे इस देश को जगाया, सुभाष बाबू और भगत सिंह के ओजस्वी आह्वानों का आधार बनी उस हिन्दी के प्रति सत्ता के केन्द्र निष्ठावान नहीं रहे। इसके उलट भारतीय भाषाओं को हिन्दी के विरोध में लामबंद करने के राजनैतिक षड्यंत्र किए गए।

वैसे, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हिन्दी के विरुद्ध अभियान छेड़ने वाले भले ही ट्विटर पर जरा देर में उखड़ गए हों, राष्ट्रविरोधी कंदराओं में स्वाधीनता के 68 वर्ष बाद भी जमे हुए हैं। जरूरत इन तत्वों की पहचान करने और समस्या का उपचार करने की है। हिन्दी को मजबूत करना राष्ट्र को मजबूत करना है। उसे नीति निर्धारण में सम्मानजनक स्थान दिलाना देश के उन विभिन्न भाषा-भाषी समूहों में आत्मविश्वास भरना है जो अंग्रेजी के सामने लड़खड़ाते हैं और हिन्दी की छांह में राहत पाते हैं।

भारतीय भाषाओं से पर्याप्त पर्यायवाची शब्दों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देते हुए, तकनीकी शब्दावलियों को सहज हिन्दी शब्दों में उतारने का प्रयास करते हुए, कंप्यूटर पर लिखाई और छपाई की दृष्टि से हिन्दी अक्षरों को सार्वभौमिक तौर पर स्वीकार्य सुन्दर-सुस्पष्ट रूप से तैयार करते हुए हिन्दी को बढ़ाना आज की आवश्यकता है।

बिना शासकीय प्रश्रय के हिन्दी की इतनी शक्ति है तो जरा सहारा लगने पर यह राष्ट्र की सामूहिक चेतना का कैसा चमत्कारिक सूत्र साबित हो सकती है... जरा सोचिए!
साभार:: पाञ्चजन्य

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित