सोमवार, 4 जनवरी 2016

शीलयुक्त शक्ति के सिवा विश्व में कोई किमत नही - सरसंघचालक मोहनजी भागवत

शीलयुक्त शक्ति के सिवा विश्व में कोई किमत नही

सरसंघचालक मोहनजी भागवत का प्रतिपादन

एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों की उपस्थिति में शिवशक्ति संगम संपन्न



पुणे, ता। ३ ः हमारी परंपरा शिवत्व की है जिसे शक्ती का साथ मिले तो विश्व में हमें हमारी पहचान मिलेगी। चरित्र ही हमारी शक्ति है। शीलयुक्त शक्ती के बिना विश्व में कोई किमत नहीं है। इस महत्तम उद्दिष्ट के लिए ही शिवशक्ती संगम अर्थात् सज्जनों की शक्ती के प्रदर्शन की आवश्यकता है, यह प्रतिपादन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनजी भागवत ने रविवारी को किया।
रा. स्व. संघ की ओर से पुणे के पास जांभे, मारुंजी एवं नेरे गांवों की सीमा पर आयोजित शिवशक्ति संगम के महासांघिक में वे बोल रहे थे। पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, प्रांत संघचालक नानासाहेब जाधव, प्रांत कार्यवाह विनायकराव थोरात मंच पर उपस्थित थे।
अपने लगभग ४५ मिनिटों से अधिक समय चले भाषण में सरसंघचालक भागवतजी ने सामाजिक परिस्थिति का जायजा लेते हुए संघ की स्थापना का महत्त्व तथा कार्य का विवेतन किया। सरसंघचालक भागवतजी ने कहा, कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के १२५ व्या जयंति वर्ष में, स्त्री शिक्षा की शुरूआत करनेवाली सावित्रीबाई फुले की जयंति दिन पर विराट शिवशक्ति संगम के व्दारा प्रस्तुति प्रशंसास्पद है। शिवशक्ति कहने पर हमें छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मरण था है। अपने स्थान पर उचित राज करनेवाला यह पहला राजा था। सीमित राज्य में राष्ट्र का विचार करनेवाला यह राजा था। धर्म का राज्य चलें, यह सोचनेवाला आदर्श हिंदवी स्वराज्य के वे संस्थापक थे। उनके द्वारा किया गया संगठन तत्त्वनिष्ठा पर निर्भर है। इसी तत्त्वनिष्ठा के कारण हमने भगवा ध्वज को गुरू माना है। निर्गुण निरामय के अलावा तत्त्व का आचरण संभव नहीं है। तत्त्वों में सद्गुण आवश्यक है। वह काम रा. स्व. संघ कर रहा है। संघ के छह में से शिवराज्याभिषेक का अपवाद कर कोई उत्सव वैयक्तिक नहीं है। शिवाजी महाराज का स्मरण अर्थात् चरित्र, नीति का स्मरण है। महापुरूषों का स्मरण करते समय उन्होंने यह उद्योग कैसे किया, शक्ति कैसे उत्पन्न होती है, इसका स्मरण करना आवश्यक है। हमारी परंपरा शिवत्व की है। सत्य, शिव, सुंदरम हमारी संस्कृती है। समुद्र मंथन से जो हलाहल निर्माण हुआ, उसकी बाधा विश्व को ना हो इसलिए जिन्होंने प्राशन किया, वे नीलकंठ हमारे आराध्य दैवत है। उनके आदर्श की तरह हमारी यात्रा जारी है। शिवत्व की परंपरा शाश्वत अस्तित्व के तौर पर जानी जाती है। शिव को शक्ती का साथ मिलना चाहिए। शिव को शक्ती के सिवा समाज नहीं जानता। विश्व में शक्तिमान राष्ट्रों की बुराई पर चर्चा नहीं होती। वे हम चुपचाप सह लेते है। लेकिन अच्छे, परंतु शक्ति में कम राष्ट्रों की अच्छी बातों पर चर्चा नहीं होती। उन राष्ट्रों की अच्छी सभ्यता को बहुमान नहीं मिलता।
रवींद्रनाथ टागोर के जपान में अनुभव का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, कि उस व्याख्यान में कई छात्र नहीं आए, क्योंकि गुलाम राष्ट्र के नेता कता भाषण हम क्यों सुनें, यह छात्रों का सवाल था। हमारे पास सत्य होने के बाद भी हम उसे बता नहीं सकते थे। स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद, युद्ध में विजय के बाद और अणु परीक्षण के बाद चाचणीनंतर हमारी प्रतिष्ठा नहीं बढ़ी। देश की शक्ति बढ़ती है, तब सत्य की भी प्रतिष्ठा बढ़ती है। इसके लिए शक्ति की नितांत आवश्यकता है। शक्ति का अर्थ मान्यता है। शक्तिसंपन्न राजा भी शीलसंपन्न विद्वानों के सामने नतमस्तक होते है। यह हमारी परंपरा है। हमारे यहां त्याग से, चरित्र से शक्ति जानी जाती है। शक्ति यानि दमन करना। शक्ति का विचार शील से आता है। इसके लिए शिलसंपन्न शक्ति की आवश्यकता है और शीलसंपन्न शक्ति सत्याचरण से बनती है।
भागवत ने आगे कहा, शीलसंपन्न विश्व में जीवों के विभिन्न प्रकार मिलते है। अस्तित्व की एक ही बात है। विभिन्नता से एकता स्वीकारने के लिए समदृष्टी से देखने की आवश्यकता है। सत्य में भेद के लिए, विषमता के लिए कोई स्थान नहीं है। सबको हमारे जैसा देखना चाहिए। चरित्र से ही व्यक्तिगत और सामाजिक शक्ति बनती है। समाज भेदों से ग्रस्त समाज की प्रगति नहीं होती। सुगठीत, एक दूसरे की चिंता करनेवाला समाज हो, तभी समाज का हित साध्य होता है। यह कहते हुए भागवतजी ने इस्त्राईल के स्वाभिमान एवं विकास का उदाहरण दिया। इस देश द्वारा ३० वर्षों में की हुई प्रगति का मर्म उन्होंने प्रकट किया।
संकल्पबद्ध समाज सत्य की नींव पर खड़ा हो, तो क्या होता है, इस बात का यह देश उदाहरण है। सभी लोग मेरे है, ऐसा कहने पर मनुष्य धर्म से खड़ा रहता है। धर्म यानि जोडनेवाला, उन्नति करनेवाला, मूल्यों का आचरण करना यानि धर्म, यह आचरण सत्यनिष्ठता से आता है।
संविधान लिखते समय डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था, कि राजतिक एकता आई है, किंतु आर्थिक और सामाजिक एकता के बिना वह टीक नहीं सकती, यह कहकर भागवत ने कहा, कि हमने कई युद्ध दुश्मन के बल के कारण नहीं बल्कि आपसी भेद के कारण हम हार गए। भेद भूलाकर एक साथ खड़े न हो तो संविधान भी हमारी नहीं कर सकता। व्यक्तिगत और सामाजिक चरित्रनिष्ठ समाज बनना चाहिए। सामाजिक भेदभावों पर कानून में प्रावधना कर समरसता नहीं हो सकती। समरसता आचरण का संस्कार करना पड़ता है जिसके लिए समरसता का संस्कार करने की आवश्यकता है। तत्व छोड़कर राजनीति, श्रम के सिवा संपत्ति, नीति छोड़कर व्यापार, विवेकशून्य उपभोग, चारित्र्यहीन ज्ञान, मानवता के सिवा विज्ञान और त्याग के सिवा पूजा सामाजिक अपराध है, ऐसा महात्मा गांधी कहते थे। इन अपराधों का निराकरण करना ही संपूर्ण स्वराज्य, यह उनका विचार था। इसलिए उनके विचारों की संपूर्ण स्वतंत्रता मिलना अभी भी बाकी है। इस तरह की संपूर्ण स्वतंत्रता, समता और बंधुतावाले समाज का निर्माण करना संघ का ध्येय है और इसके लिए संघ की स्थापना हुई है।
डॉ. भागवत ने कहा, शिवत्व और शक्ति की आराधना होने के लिए प. पू. डॉ. हेडगेवार ने रा. स्व. संघ की स्थापना की। राष्ट्रोद्धार के लिए उन्होंने कई उपक्रमों में सहभागी होकर अपना कर्तव्य निभाया। संघ की स्थापना से पूर्व और बाद भी उन्होंने सभी आंदोलनों में सहभागी होकर कारावास भी भुगता। सभी प्रकारची विचारधाराओं से उनका परिचय था। गुणसंपन्न समाज की निर्मिती के अलावा विकल्प नहीं है, यह उन्होंने जान लिया था। इसके लिए उन्होंने उपाय खोजा था। सबको एक साथ बांधनेवाला धागा हिंदुत्व है, यह उन्होंने जान लिया था। सबके लिए कृतज्ञता व्यक्त करनेवाला मूल्य उन्होंने बताया था। इस दृष्टी से जागृती की। मातृभूमी के लिए आस्था यह हिंदू समाज का स्वभाव है। परंपरा से आई हुई यह आस्था है। इसके आधार पर संस्कृति बढ़ती है, पुरखों का गौरव होता है। आज विश्व को इसकी आवश्यकता है। भारतीय मूल्यों की प्रतिष्ठापना करने हेतु संगठन की आवश्यकता है। राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करनेवाला समाज निर्माण करना और देश को परम वैभव प्राप्त करवाना, यह संघ का कार्य है। किसी भी प्राकृतिक विपत्ति के समय आगे आनेवाला स्वयंसेवक यह संघ की पहचान है। अपने हित का विचार छोड़कर समाज के तौर पर निरालस, निस्वार्थ सेवा करनेवाला अर्थात् संघ स्वयंसेवक। यह गर्व का नहीं, अपितु ९० वर्षों से संघ जो कर रहा है उस प्रयोग का फल है। नेता, सरकार पर देश नहीं बढ़ता बल्कि चरित्रसंपन्न समाज पर वह टिका रहता है। चरित्रसंपन्न व्यक्ति के वर्तन से ही समाज का परिवर्तन होता है। शिव-शक्ति संगम अर्थात् वैभव प्रदर्शन नहीं है बल्कि समाज परिवर्तन के लिए सही रास्ता है।
देश प्रतिष्ठित, सुरक्षित न हो तो व्यक्तिगत सुख की किमत नहीं है। सभी प्रापंचिक जिम्मेदारियां संभालकर समाजसेवा करनेवाली शक्ति अर्थात् संघ का कार्य। समाजहित के इस कार्य में सब सक्रीय हो।
प्रांत कार्यवाह विनायकराव थोरात ने प्रास्ताविक में संघ के कार्य का जायजा लिया। सूखाग्रस्तों के लिए रा. स्व. संघ, जनकल्याण समिति को आर्थिक सहायता करने का आवाहन उन्होंने किया। सूखा निवारण के कार्य में प्रत्यक्ष सहभागी होने के लिए (०२२) ३३८१४१११ पर मिस कॉल करने का आवाहन उन्होंने किया। सुनील देसाई तथा संदीप जाधव ने सूत्रसंचालन किया।
सभी क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति
शिवशक्ती संगम के लिए समाज के विभिन्न घटकों से गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिती प्राप्त हुई थी। दोपहर तीन के आसपास विशेष अतिथि कार्यक्रमस्थल पर आना शुरू हुआ। विभिन्न पीठों के धर्माचार्य़, राजनैतिक नेता, कला, सांस्कृतिक क्षेत्र के दिग्गज और उद्योजक बड़ी संख्या में उपस्थित थे, यह कार्यक्रम का एक आकर्षण था। विशेष अतिथियों के लिए स्वतंत्र चार एवं धर्माचार्यों के लिए अलग प्रवेशव्दार एंव प्रबंध किए गए थे। इस प्रवेशव्दार पर संघ के कार्य एवं सेवाकार्यों की जानकारी प्रदान करनेवाली सीडी, तिलगुल वडी, पानी की बोतल और सरबत का पैक देकर आमंत्रितों का स्वागत किया गया। इन पांचों प्रवेशव्दारों पर संघ परिवार के विभिन्न संस्थाओं से १४० से अधिक पदाधिकारी - स्वागत के लिए उपस्थित थे। इनमें सभी महिला पदाधिकारियों ने एक ही रंग की साडियां परिधान की थी।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस, पुणे जिले के पालकमंत्री गिरीष बापट, पुणे के सांसद अनिल शिरोले, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर, सांसद हरिश्चंद्र चव्हाण, अरूण साबले, जलसंपदा मंत्री गिरीश महाजन, ग्रामविकास मंत्री पंकजा मुंडे, राज्य के सार्वजनिक निर्माण मंत्री चंद्रकांतदादा पाटील, आदिवासी कल्याण मंत्री विष्णु सावरा, शिक्षणमंत्री विनोद तावडे, गृहराज्यमंत्री राम शिंदे, सामजिक न्यायमंत्री दिलीप कांबळे, विधायक मेधा कुलकर्णी, विजय काळे, लक्ष्मण जगताप, भीमराव तापकीर, माधुरीताई मिसाळ, योगेश टिळेकर, सदाशिव खाडे
महाराष्ट्र भूषण शिवशाहीर बाबासाहेब पुरंदरे, विश्वनाथ कराड, लेखक द. मा. मिरासदार, प्रा. शां.ब. मुजूमदार, डॉ. अशोक कुकडे, प्रा. अनिरूद्ध देशपांडे, राहूल सोलापूरकर, रवींद्र मंकणी, उद्यमी अभय फिरोदिया, अनिरूद्ध देशपांडे, अतुल गोयल, धर्माचार्य श्री व्दारिकापीठाधिश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी त्रिलोकतिर्थ, ज्ञान चरणसिंहजी, श्री कालसिद्धेश्वर महाराज, आचार्य श्री विश्वकल्याण विजयश्री महाराज, श्री मारूती महाराज पुरेकर, श्री किसन महाराज पुरेकर, श्री भास्करगिरी महाराज, श्री बालयोगी ओतुरकर महाराज, श्री शांती गिरीमहाराज, श्री मकरंद दासजी महाराज, श्री फरशीवाले बाबा, श्री कलकीमहाराज, नारायणपूरचे श्री नारायण महाराज, राष्ट्रसंत भैय्यूजी महाराज, ह.भ.प. श्री। बंडातात्या कराडकर आदी उपस्थित थे।

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित