सोमवार, 25 जनवरी 2016

शिक्षा व्यक्ति और समाज के विकास से जुड़ी है -मा. अवनीश जी भटनागर

शिक्षा व्यक्ति और समाज के विकास से जुड़ी है -मा. अवनीश जी भटनागर
 ‘‘नई शिक्षा नीति’’ पर विद्या भारती शिक्षा संस्थान, जोधपुर द्वारा गोष्ठी  सम्पन्न 

जोधपुर 23 जनवरी।  विद्या भारती शिक्षा संस्थान, जोधपुर द्वारा आयोजित सुभाषचन्द्र बोस जयन्ती के
अवसर पर ‘‘नई  शिक्षा नीति’’ के विषय पर गोष्ठी आयोजित की गई।

गोष्ठी में दीप प्रज्वलन के साथ वन्दना एवं अतिथियों का परिचय कराया गया गोष्ठी में मुख्य अतिथि माननीय डाॅ. रामपाल सिंह जी (कुलपति, जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर), अध्यक्ष माननीय डाॅ. दामोदर जी शर्मा (पूर्व कुलपति तकनीकि विश्वविद्यालय) एवं विषय प्रतिपादन माननीय अवनीश  जी भटनागर (राष्ट्रीय मंत्री, विद्या भारती) का माल्यार्पण एवं शाॅल ओढ़ाकर स्वागत किया गया।

गोष्ठी में नई  शिक्षा नीति पर विषय डालते हुए मा. अवनीश जी भटनागर ने बताया कि  शिक्षा व्यक्ति और समाज के विकास से जुड़ी है। वह भविष्य की सम्भावित चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिये व्यक्ति की क्षमताओं का विस्तार करने की प्रक्रिया है। अतः समय.समय पर परिवर्तित परिस्थितियों और सम्भावित चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए  शिक्षा नीति और उसके स्वरूप निर्धारण पर विचार होता रहा है। भटनागर ने कहा कि ब्रिटिश शासन काल में साम्राज्यवादी हितों की रक्षा और उनके संवर्धन के लिए भारत की  शिक्षा नीति और व्यवस्था पर विचार किया गया। सन् 1813 के आज्ञापत्र से लेकर सन् 1944 की सार्जेंट योजना (Sargent Plan) तक जितनी भी समितियाँ, आयोग और योजनाएँ बनी, लगभग सभी ने ब्रिटिष हितों को प्राथमिकता दी तथा तदनुरूप षिक्षा व्यवस्था की रचना की। अलबता, सार्जेंट योजना 1944 में महात्मा गाँधी की बुनियादी शिक्षा की कुछ बातों को कुछ संषोधनों के साथ अवश्य सम्मिलित किया गया।

स्वतंत्र भारत में यह आशा  की गई कि शिक्षा के प्रति समग्रता से विचार करते हुए राष्ट्रीय सोच, राष्ट्रीय भावना और भारतीय संविधान में निहित आर्दशों  का संवर्धन करने वाली, भारतीय मान्यताओं और मूल्यों पर आधारित राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण होगा, परन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। ताराचंद समिति (1948), विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (राधाकृष्णन् आयोग) 1948 तथा माध्यमिक शिक्षा आयोग (मदुलियार कमीषन 1952) आदि समितियों ने भी शिक्षा के प्रति समग्रता से विचार नहीं किया। वे केवल अपने कार्यक्षेत्र तक सीमित रहीं। 

1964 में डाॅ. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में  गठित शिक्षा आयेाग भारत का पहला शिक्षा आयोग था जिसने शिक्षा पर समग्रता से विचार किया तथा भारत की शिक्षा नीति का आधार क्या होना चाहिए इस पर विचार व्यक्त किये। इस क्रम में डाॅ. कोठारी का यह कथन सर्वाधिक महत्व का था कि, ‘‘वर्तमान में भारतीय शिक्षा का गुरूत्वकेन्द्र यूरोप है, जिसे शीघ्रातिषीघ्र पुनः भारत केन्द्रित करने की आवश्यकता है। 


विद्या भारती अखिल भारती शिक्षा संस्थान ने सवतंत्र भारत में भारतीय शिक्षा के स्वरूप के संबंध में सन् 2005 में पालक्काड (केरल) एवं सन् 2011 में कुरूक्षेत्र (हरियाणा) में विस्तृत और गंभीर विचार.विमर्ष किया था, उस विचार विमर्ष से शिक्षा के संबंध में जो सोच उभर कर आया वह डाॅ. कोठारी के उपर्युक्त कथन से मेल खाता है कि भारत की शिक्षा नीति को भारत केन्द्रित होना चाहिए। 


भटनागर ने कहा कि किसी भी देश  के लिए यह आवश्यक है कि उस देश  की शिक्षा उसकी संस्कृति, सभ्यता, परम्परा, इतिहास, पंचांग और भूगोल से जुड़ी हो तथा उससे प्रेरित हो। ऐसा होने पर उस शिक्षा में देश  का गौरव प्रतिबिम्बित होता है तथा संस्कृति का सातत्य बना रहता है। ज्ञान का स्वरूप वैश्विक होता हैं देश  की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से विरत शिक्षा आत्मगौरव और राष्ट्रभाव को विकसित नहीं कर सकती। 

विद्या भारती प्रारम्भ से ही ऐसी शिक्षा नीति की समर्थक रही है जो भारत केन्द्रित हो, एकात्मभाव से युक्त हो तथा अपने स्वरूप में समग्र हो। इन भावों से युक्त षिक्षा आत्मगौरव से पूर्ण होगी और राष्ट्रीय एकता का आधार बनेगी। इन विचारों को केन्द्र में रखकर विद्या भारती ने अपने सुझाव नई शिक्षा नीति 1986 के निर्माण के समय आयोग के सम्मुख प्रस्तुत किये थे। विद्या भारती आज भी इस केन्द्रीय विचार का समर्थन करती है।

भटनागर ने अपने नई शिक्षा नीति पर विषय वस्तु के 9 बिन्दुओं पर प्रकाश  डालते हुए कहा कि:- 
1- प्रारम्भिक शिक्षा में अधिगम परिणाम सुनिश्चित करना, आंगनबवाडी एवं शिशु शिक्षा, माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा की पहुँच का विस्तार करना, व्यावसायिक शिक्षा का सुदृढ़ीकरण, बस्ते का बोझ कम करना एवं प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा का स्वरूप निर्धारण करना। 

2-  स्कूल मानक, स्कूल आकलन और स्कूल प्रबंधन पद्धतियाँ व परीक्षा प्रणाली एवं मूल्याकंन। 

3- अनुशंषाएँ, पाठ्यचर्या, प्रवेश , वेतन एवं शुल्क, शिक्षक, माॅडल विद्यालय, शिक्षकों व विद्यार्थियों की उपस्थिति आदि। 

4- व्यापक शिक्षा नीति शास्त्र। 

5- भाषाओं का संवर्धन, भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक एकीकरण का उन्नयन करना, प्राचीन ज्ञान परम्परा का शिक्षा में समावेश । 

6- प्रौढ़ शिक्षा और राष्ट्रीय मुक्त शिक्षा प्रणालियों के जरिये महिलाओं, अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यकों पर विशेष बल देते हुए ग्रामीण साक्षरता में तेजी लाना, स्कूल प्रशिक्षण और प्रौढ़ शिक्षा में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का संवर्धन, समर्थनकारी समावेशी शिक्षा बालिकाओं, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अल्पसंख्यक और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा, मुक्त और दूरस्थ अधिगम तथा आॅन लाइन ओ.डी.एल. पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहित करना। 

7- राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में सुधार, उच्चतर शिक्षा को समाज से जोड़ना, अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देना, ज्ञानमय समाज एवं शिक्षा, विश्वविद्यालयों तथा औद्यौगिक संस्थानों में शोध एवं प्रशिक्षण के लिए संलग्नता।

8- गुणवता के लिए अभिशासन सुधार, संस्थाओं की रैकिंग और प्रत्यायन, विनिमय की कोटि में सुधार, केन्द्रीय संस्थाओं की गति निर्धारक भूमिका, राज्य के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में सुधार, उच्चतर शिक्षा में समेकित कौशल विकास, मुक्त और दूरस्थ अधिगम तथा आॅनलाइन पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहित करना, उच्चतर शिक्षा का वित्त पोषण, क्षेत्रीय असमानता का समाधान, निजी क्षेत्र की सार्थक भागीदारी, महिला.पुरुष सामाजिक अन्तराल को ठीक करने के लिए, उच्चतर शिक्षा का अन्तर्राष्ट्रीयकरण, छात्र सहयोग प्रणाली को कायम रखना। 

9- तकनीकि/मेडीकल के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक परीक्षा का आयेाजन, शिक्षा में स्वायतत्ता, राष्ट्रीय शिक्षा सेवा आयेाग का गठन आदि बातों पर प्रकाश  डाला।


गोष्ठी के मुख्य अतिथि मा. डाॅ. रामपाल सिंह जी ने कहा कि जब हम भारत-केन्द्रित शिक्षा की बात करते हैं तो शिक्षा के उद्देश्य , उसके अनुरूप, पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, शिक्षा पद्धति आदि सभी विचार की परिधि में आ जाते हैं। जहाँ तक भारत की शिक्षा के स्वरूप और शिक्षा के उद्देश्य का सम्बन्ध है भारतीय चिन्तन परम्परा में शिक्षा को सात्विक और पवित्र माना है जिसका अन्तिम उद्देष्य ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ है अर्थात् विद्या (शिक्षा) वह जो हमें सभी बन्धनों से मुक्त करें। इस कथन की दार्शनिक व्याख्या तो यह है कि विद्या हमें सभी सांसारिक बन्धनों से मुक्ति दिलाए अर्थात् आत्म मुक्ति का साधन बने पर इसका लौकिक अर्थ यह है कि शिक्षा हमें अज्ञान, अभाव, विषाद, रोग भय से मुक्त करे अर्थात् हम ज्ञानमय जीवन जिएँ। शिक्षा ज्ञान का स्तोत्र है। वह व्यक्ति के कौशल विकास का आधार है। हम अपने जीवन को सुखमय बना सकें तथा आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त कर सकें ऐसी क्षमताओं और कौशल का विकास करना शिक्षा का लक्ष्य रहा है। 

गोष्ठी के अध्यक्ष माननीय डाॅ. दामोदर जी शर्मा ने बताया कि शिक्षा के प्रति भारतीय सोच उसकी स्वायत्तता को लेकर भी है। भारत में शिक्षा का स्वरूप सदैव स्वायत्त रहा है। यह स्वायत्तता आज कैसे प्राप्त की जाए, उसका स्वरूप क्या हो, समाज और सरकार की क्या भूमिका हो आदि- ये विचार के विषय हैं।  आप सभी शिक्षाविदों और चिन्तकों से आग्रह है कि अपने चिन्तन और शिक्षा क्षेत्र के अनुभवों के आधार पर विचार करें।

अन्त में प्रबंध समिति आदर्ष विद्यामंदिर के अध्यक्ष प्रो. लालसिंहजी राजपुरोहित द्वारा गोष्ठी में पधारे हुए महानुभाव,शिक्षाविदों, गणमान्य नागरिकों को धन्यवाद ज्ञापित किया और सामूहिक वन्देमातरम् का गान हुआ मंच संचालन पारसमल जी जैन ने किया।


विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित