शनिवार, 5 जनवरी 2013

मिडिया इण्डिया का है मिडिया भारत का बने



मिडिया इण्डिया का  है मिडिया भारत का बने 
व्यर्थ विवाद  आखिर क्या चाहती है मीडिया ?
क्यों स्वयं अपनी विश्वनीयता खोने में लगी है मीडिया ?
 
- प्रफुल्ल

भ्रम के सहारे टी आर पी (TRP) बढ़ाने में लगे मीडिया पर कौन यकीन करता है ? दिन भर एक ही झूट को बार बार दिखला कर सच में बदलने का कुत्सित प्रयास सफल होता है क्या? सत्य को तोड़ मरोड़ कर परोसना क्या यही है पत्रकारिता ? यह कुछ सवाल है जो अक्सर सभी के मन में उठते रहते है.

यह तो साफ़ नज़र आने लगा है कि कुछ मीडिया हाउसेस का एकत्रीकरण संघ के विरुद्ध ही है तभी तो सिर्फ एक नज़र से ही वो इसको आंकते है . अपनी पूरी नेगेटिव एनर्जी दम खम  से लगा लेते है बस एक मौका मिलना चाहिए। तुष्टिकरण की राजनीती में लिप्त दलों के नेताओं की तो जैसे बांछे खिल उठती है। क्या तो एंकर और क्या पैनल में डिस्कशन करने वाले सभी अपने अपने ढंग से छोटे परदे में छाने  की होड़ में लगे रहते है। शायद इन कृत्यों से कही पुरस्कृत हो ही जाये।
कुछ समाचार पत्रों और चेनलो में तो न जाने बेसिर पैर क्या क्या लिख डाला जबकि मोहन भागवत  जी ने ऐसा कुछ कहा ही नहीं की बवाल मच जाये।  मोहन जी भागवत ने जो कहा  वह यू ट्यूब पर भी उपलब्ध है उसका आलेख कई ब्लॉग अथवा वेब साइट्स पर भी उपलब्ध है। सत्य तो शायद मीडिया को दिखलाना ही नहीं है शायद यह उन्होंने तय कर रखा है।
मिडिया ने इंडिया  और भारत की व्याख्या अपने हिसाब से कर डाली इण्डिया को शहर और भारत को गाँव तक सिमित कर डाला, क्योंकि इसी तरह वो सही कथन का पोस्टमार्टम अपने हिसाब से कर पाते. अरे मीडिया के भाइयो गाँव से आगे वनवासी क्षेत्र भी है जहाँ तक शायद  पहुँच ही नहीं है या फिर वहाँ  पहुच कर भी टी आर पी नहीं बढती इसलिए आप वहां जाना नहीं चाहते।

कुछ खबरे जो समाचार पत्रों में छपी  उनकी बात करे और जो मोहन जी भागवत  ने कहा उसकी सत्यता से मिलान  करे तो दूध का दुध  और पानी का पानी अलग हो जायेगा।

न्यूज़ डाट गूगल डाट कॉम से कुछ खबरे ली और उसकी मोहन जी भागवत के कथन से मिलान करने का प्रयास देखिये
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आंकड़े बताते हैं, कितने गलत हैं RSS प्रमुख मोहन भागवत के विचार : नवभारत टाइम्स आगे लिखता है की ...इसी क्रम में आरएसएस प्रमुख मोहन राव भागवत ने कहा था कि रेप की घटनाएं गांवों के मुकाबले शहरों में ज्यादा होती हैं। भागवत ने कहा था कि रेप की घटनाएं 'इंडिया' में ज्यादा और 'भारत' में कम होती हैं। लेकिन, रेप की घटनाओं के आंकड़ों को देख कर लग रहा है कि भागवत के न सिर्फ विचार गलत हैं, बल्कि वह सरासर 'झूठ' बोल रहे हैं।
भागवत ने की विवादित टिप्पणी, गृह सचिव ने की आलोचना एनडीटीवी खबर  नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को अपनी उस टिप्पणी से एक विवाद को जन्म दे दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय शहरों में पाश्चात्यीकरण, बढ़ रहे अपराधों का कारण है। केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने भागवत की इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फर्क करने का कोई आधार नहीं है।
नई दिल्ली: दिल्ली गैंगरेप के मसले पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख के मोहन राव भागवत ने कहा है कि रेप की घटनाएं गांवों के मुकाबले शहरों में ज्यादा होती है। उन्होंने इस मसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शहरों में ज्यादा बलात्कार होते हैं और गांवों में रेप की घटनाएं कम होती है। उन्होंने इसके पीछे शहरों में पश्चिमी सभ्यता के हावी होने को कारण बताया। उन्होंने कहा कि पश्चिम सभ्यता का ही असर है कि रेप भारत में नहीं बल्कि इंडिया में होते हैं।
......कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि मोहन भागवत और कैलाश विजयवर्गीय को तत्काल इस्तीफा देना चाहिए क्योंकि पता नहीं किस देश और समाज में यह लोग रहते हैं। अफसोस भागवत को इंडिया और भारत के बीच का अंतर नहीं पता। ........
सिलचर(असम)। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध और बलात्कार जैसे मामलों पर विवादास्पद बयान दिया है। मोहन भागवत ने कहा है कि रेप जैसी घटनाएं गांवों की तुलना में शहरी इलाकों में ज्यादा होती है और इसकी वजह पश्चिमी सभ्यता का असर है। संघ प्रमुख ने कहा है कि रेप भारत में कम और इंडिया में ज्यादा होती है। भागवत के इस बयान पर कांग्रेस सहित कई पार्टियों ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की।
केंद्रीय गृह सचिव आर.के. सिंह ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत की उस टिप्पणी की आलोचना की है, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारतीय शहरों में पाश्चात्यीकरण, बढ़ रहे अपराधों का कारण है. सिंह ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फर्क करने का कोई आधार नहीं है. गृह सचिव, सिंह ने यहां एक कार्यक्रम के इतर मौके पर कहा कि इंडिया और भारत के बीच फर्क बताने का कोई आधार नहीं है.

नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानी आरएसएस के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को अपनी उस टिप्पणी से एक विवाद को जन्म दे दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय शहरों में पाश्चात्यीकरण, बढ़ रहे अपराधों का कारण है. कांग्रेस ने भागवत की इस टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फर्क करने का कोई आधार नहीं है. कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, "इससे आरएसएस की मानसिकता जाहिर होती है. मोहन भागवत वही कह रहे हैं." उन्होंने आगे कहा, "मोहन भागवत का बयान उनकी मानसिकता का दिखाता है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान से विवाद पैदा हो गया है जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा है कि शहरों में ज्यादा बलात्कार होते हैं और गांवों में रेप की घटनाएं कम होती है. भागवत का कहना था कि शहरों में पश्चिमी सभ्यता का काफी असर है. खबरों के अनुसार हाल के अपने सिलचर दौरे के दौरान उन्होंने कथित तौर पर कहा, ''इस तरह के अपराध भारत में कम होते हैं और इंडिया में अधिक होते हैं.'' खबरों के मुताबिक उन्होंने इसका विवरण देते हुए कहा, ''आप देश के गांवों और जंगलों में देखें जहां कोई सामूहिक बलात्कार या यौन अपराध की घटनाएं नहीं होतीं. यह शहरी इलाकों में होते हैं
मोहन जी भागवत ने एक कार्यक्रम में असम के सिल्चर में प्रबुद्ध नागरिकों के साथ हुए वार्तालाप कार्यक्रम में उपस्थित एक सज्जन ने डा. भागवत से प्रश्न पूछा‘‘ये जो इंडिया में आजकल जो अट्रॉसिटीज अगेन्स्ट विमेन, रेप्स, मॉलेस्टेशन बढ़ रहे है, इनमें हिंदुओंपर ज्यादा अत्याचार होते दिख रहे है। यह हिन्दुओंका मानोबल नष्ट करने का प्रयास लग रहा है। इसके संदर्भ में आपके क्या विचार हैं?’’
इस प्रश्न के उत्तर में डा. भागवत ने कहा – ‘‘इंडिया में जो यह घट रहा है, बढ़ रहा है वह बहुत खतरनाक और अश्लाघ्य है। लेकिन ये भारत में नहीं है। यह इंडिया में है। जहां इंडिया नहीं है, केवल भारत है वहां ये बातें नही होती, आज भी। जिसने भारत से नाता तोड़ा उसका यह हुआ। क्योंकि यह होने के पीछे अनेक कारण हैं। उसमें एक प्रमुख कारण यह भी है कि हम मानवता को भूल गये, संस्कारों को भूल गये। मानवता, संस्कार पुस्तकों से नहीं आते, परंपरा से आते हैं। लालन-पालन से मिलते हैं, परिवार से मिलते है, परिवार में हम क्या सिखाते है उससे मिलते हैं।
अब इसमें न तो शहर और गाँव की बात नज़र आती है मिडिया ने कहाँ  से ली यह तो उनसे बेहतर कौन समझा और बता सकता है।
मिडिया को यह नज़र नहीं आया न ही उन्होंने जहमत उठाई की एक बार उनके वक्तव्य को पूर्ण रूप से पढ़ सुन लेते। भागवत जी ने कहा कि हमारे यहां ऐसा नहीं है। हम कहते हैं  कि  महिला  जगज्जननी है। कन्याभोजन होता है हमारे यहां, क्योंकि वह जगज्जननी है। आज भी उत्तर भारत में कन्याओंको पैर छूने नहीं देते, क्योंकि वह जगज्जननी का रूप है। उल्टे उनके पैर छुए जाते हैं। बड़े-बड़े नेता भी ऐसा करते हैं। उनके सामने कोई नमस्कार करने आए तो मना कर देते हैं,स्वयं झुक कर नमस्कार करते हैं। वो हिंदुत्त्ववादी नहीं है। फिर भी ऐसा करते हैं। क्योंकि यह परिवार के संस्कार हैं। अब यह संस्कार  आज के तथाकथित एफ्लुएन्ट परिवार में नहीं हैं। वहां तो करिअरिझम है। पैसा कमाओ, पैसा कमाओ। बाकी किसी चीज से कोई लेना-देना नहीं। 
मिडिया ने कही भी उपरोक्त कथन का जिक्र नहीं किया .
भागवत  ने यह भी कहा :
बिना संस्कार कानून असरदार नहीं
 कानून और व्यवस्था अगर चलनी है, उसके लिए मनुष्य पापभीरू होना है, तो उसके लिए संस्कारोंका होना जरूरी है। अपने संस्कृति के संस्कारों को हमें जल्द जीवित करना पड़ेगा। शिक्षा में कर लेंगे  तो परिस्थिति बदल पाएंगे। तब तक के लिए कड़े कानून, कड़ी सजाएं आवश्यक है।  दण्ड हमेशा होना चाहिए शासन के हाथों में और वह ठीक दिशा में चलना चाहिए। वह इन सबका प्रोटेस्ट करने वालों पर नहीं चलना चहिए। उसके लिए उनका संस्कार भी आवश्यक है। वो वातावरण से मिलता है। पर वो भी आज नहीं है। हम यह करें तो इस समस्या का समाधान पा सकते हैं।
मातृशक्ति है भोगवस्तु नहीं
हमारी महिलाओं की ओर देखने की दृष्टि वे मातृशक्ति है यही है। वे भोगवस्तु नहीं,देवी हैं। प्रकृति की निर्मात्री है। हम सब लोगों की चेतना की प्रेरक शक्ति है और हमारे लिए सबकुछ देनेवाली माता है। यह दृष्टि जब तक हम सबमें लाते नहीं तब तक ये बातें रुकेगी नहीं। केवल कानून बनाने से काम नहीं चलेगा। वो होना चाहिए किन्तु उसके साथ संस्कार भी होने चाहिए।’’
न्यूज़ रूम में बैठकर कहना और हकीकत में बहुत बड़ा फर्क है यह शायद अब सब जान लेंगे।
मीडिया को ओवेशी का बयान शायद नज़र नहीं आया . सलाहुद्दीन ओवेसी के पुत्र अकबरुद्दीन अली ओवेसी के हिन्दुओ के प्रति दिए वकतव्य के बारे में मिडिया को शायद दिखाई और सुनाई  नहीं देता। वर्ना यह तो ऐसा इश्यु है कई कई दिन का मसाला टी आर पी के लिए मिल जाता। शायद तुष्टिकरण का असर इन पर भी हावी हो गया है।
संघ भी है की इनकी परवाह किये बिना निरंतर अपने उधेश्य की और आगे बढ़ने में लगा है
मीडिया के लिए बहुत कुछ करने को है  इस देश में। देशभक्ति का ज्वार  उठा सकती है मीडिया। पॉजिटिव एनर्जी लगनी चाहिए अपने कार्यक्रमों में .  

मिडिया से करबद्ध आग्रह कि  आप भी भारत के बनो इण्डिया के नहीं। भावो को समझो और समझाओ बिगाड़ो नहीं।

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित