सोमवार, 7 जनवरी 2013

शिक्षा के संग जीवन मूल्यों की शिक्षा देने से ही हम समाज को सुशिक्षित बना सकते है- भय्या जी

सरकार्यवाह माननीय सुरेश जी जोशी माँ सरस्वती को माल्यार्पण करते हुए 

मंच का एक दृश्य 

भय्या जी उद्बोधन देते हुए 



जोधपुर 7 जनवरी 2013 . राजस्थान विश्वविधालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ (राष्ट्रीय ) का दो दिवसीय 51 वां  प्रांतीय अधिवेशन का उद्घाटन एम .बी. एम  इंजीनियरिंग कॉलेज के सभागार में हुआ।  माँ सरस्वती एवं स्वामी विवेकानंद के चित्रों पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलन  एवं  सरस्वती वंदना से क्रायक्रम का शुभारम्भ हुआ।
आयोजन समिति के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर ए . के . गुप्ता ने स्वागत भाषण दिया तत्पश्चात महामंत्री  एम  एम  रंगा  ने अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा अध्यक्ष  डा ग्यारसीलाल जाट  ने शिक्षक संघ के संगटन एवं रचनात्मक पहलुओ पर चर्चा की।
अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के अध्यक्ष डा विमल प्रसाद अग्रवाल ने अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए महासंघ के बारे में जानकारी दी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय सुरेश जी जोशी "भय्या जी जोशी" ने अपने उद्बोधन में कहा की परिवर्तन अच्छा और बुरा दोनों तरह का होता है , सकारात्मक परिवर्तन जहाँ  उत्थान की और ले जाता है वही नकारात्मक परिवर्तन पतन की और। हमें शिक्षा में सकारात्मक परिवर्तन करना होगा।
भेय्या  जी ने  शिक्षा नीति  की चर्चा करते हुए प्रश्न किया की इस देश की शिक्षा  नीति मनुष्य को मनुष्य बनाने में पहल करती है या फिर सिर्फ आजीविका की मशीन बनाने की। सिर्फ भिन्न भिन्न डिग्रियों को हासिल करना ही शिक्षित होना नहीं है हमें सुशिक्षित बनाने के ओर पहल करनी होगी।

भ्रस्टाचार  की चर्चा करते हुए सुरेश जी जोशी ने कहा की भ्रस्टाचार की और कौन ले जा रहा है ? पढ़ा लिखा या फिर अनपढ़। अनपढ़ तो भ्रस्टाचार  नहीं कर रहा। ऊँचे पदों पर बैठे लोग जो की शिक्षित है वहां भ्रस्टाचार  हो रहा है ? इसका कारण ढूँढना होगा. हमें यह सोचना होगा की ऐसी कैसी शिक्षा  थी की यह लोग गलत मार्ग को  अपना रहे है।  शिक्षा के संग  जीवन मूल्यों की शिक्षा देने से ही हम समाज को सुशिक्षित बना सकते है।
आज की शिक्षा का पैटर्न जानकारी उपलब्ध करवाने वाली है। रोजगारन्मुखी शिक्षा होनी चाहिए मगर सिर्फ रोजगार उपलब्ध करवाना ही काफी नहीं है उसे ज्ञानी  तथा मनुष्य भी बनाये जो समाज और राष्ट्र की भी सोचता हो।
भय्या जी ने अपने उद्बोधन में आगे कहा की आधुनिकता के नाम पर हम क्या परोस रहे है उस बारे में भी सोचे। हम आधुनिकता के विरोधी नहीं है . आधुनिकता जो पशुता की और ले जाती है वह स्वीकार्य नहीं है उसका विरोध है मगर जो देवत्व की और ले जाये वह इस समाज और राष्ट्र को स्वीकार्य है।
संस्कारो के वर्धन की जगह विकारो का वर्धन हो तो ऐसी शिक्षा बेकार है। नीतियों से ही सिर्फ परिवर्तन संभव नहीं है , नीतियों का क्रियान्वन सही ढंग से होना आवश्यक है। मनुष्य को मनुष्य और देवत्व की और ले जाने वाली शिक्षा चाहिए सिर्फ भोगवाद की और ले जाने वाली नहीं।
सुरेश जी ने कहा की दिशा  दर्शन देने वाले वाक्य हम दोहराते आये है। शिक्षा में हम कोई निर्माण नहीं कर रहे, जो सुप्त अवस्था में  है उसे ही जाग्रत करना है। विद्या के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा की विद्या का दान होता है इसे व्यवसाय के रूप में नहीं देखन चाहिए . दुर्भाग्य से कहना  पड़ता है कि  शिक्षा व्यवसायिक रूप ले चुकी है। व्यापार  का क्षेत्र बनने से शिक्षा में विकृति आने की भी सम्भावना बन जाती है। आपका संघटन सिर्फ अपने बारे में ही नहीं शिक्षा के बारे में भी सोचने वाला होना चाहिए।
शिक्षा के पुराने स्वरुप की चर्चा करते हुए भय्या जी ने कहा कि पहले घर,मंदिर तथा विद्यालय में बालक को शिक्षा मिलती थी , गुरुकुल पद्वति थी, कुछ जगह अभी भी है।
माता पिता शिक्षा का मूल केंद्र है वहां अब समस्या है। जीवन शैली में बदलाव आया है उसका असर भी दिखने लगा है। माता पिता ने अपना दायित्व सीमित  कर लिया है। साधन  उपलब्ध करवाना ही सब कुछ हो गया है। जीविकोपार्जन के कारण जीवन शैली में आये परिवर्तन से खेलने और माता पिता के मध्य रहने की उम्र में बच्चो  को दुसरो के हाथो  में छोड़ना पड रहा है। ढाई तीन वर्ष की उम्र में विद्यालय में भेजना शुरू कर रहे है। पश्चिमी देशों  में जो चल रहा है उसका प्रभाव हमारे यहाँ भी है। परिवारों में व्यवस्थाओ से बंधन लाने वाले क़ानूनी प्रावधानों के प्रति आगाह किया।
कार्यक्रम के अंत में आयोजन सचिव सुनील कुमार परिहार ने धन्यवाद ज्ञापित किया। संस्कार भारती के राकेश श्रीवास्तव के वन्देमातरम से उद्घाटन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

अधिवेशन के दुसरे सत्र में देराश्री स्मृति व्याख्यान माला में पूर्व मुख्य न्यायाधीश तथा पूर्व राज्यपाल वी  एस कोकजे ने दशा एवं दिशा , शिक्षा में गुणवत्ता की चुनौती विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में कहा की भौतिक प्रगति ज्यादा हुई है मगर कही न कही यह अधूरी है। शिक्षा के क्षेत्र में समाज के क्षेत्र शिक्षा एक जिज्ञाशा  शांत करने का एक साधन होता था। जीविका सञ्चालन का साधन गुरु शिष्य परंपरा थी। अंग्रेजो ने शिक्षा का व्यावसायिक उपयोग प्रारंभ किया। शिक्षा में गुरु गौण हो गया और संस्था प्रमुख हो गयी। स्वतंत्रता के बाद यह अंतर आया है की शिक्षा पहले सीमित  हुआ करती थी अब उनका विस्तार हो गया है। अच्छे  नागरिक बनने  के लिए शिक्षा की उप्योगित्ता है।
गुरु शिष्य का अनुपात परिवर्तित हो गया है साधन बढे परन्तु शिक्षा का स्तर  संख्यात्मक  द्रष्टि से तो बढ़ा  मगर स्तर  घटा . इस  व्याख्यान माला के विशिष्ट अथिथि के रूप में डाक्टर भोमेश्वर देराश्री और सिंडिकेट सदस्य डा अखिल रंजन गर्ग थे। अध्यक्षता श्री कैलाश भंसाली विधायक जोधपुर ने की। 



विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित