शनिवार, 24 दिसंबर 2016

नोट बन्दी कुछ परेशानी पूर्ण तो है परन्तु लम्बी अवधि के लिए यह अवश्य फायदेमंद-डाॅ. अश्विनी महाजन


उद्यमियों के देश में गरीबों पर अधिक हावी हो रहा है ग्लोबलाइजेशन-   डाॅ. अश्विनी महाजन

नोट बन्दी कुछ परेशानी पूर्ण तो है परन्तु लम्बी अवधि के लिए यह अवश्य फायदेमंद-डाॅ. अश्विनी महाजन
 
स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक एवं देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डाॅ. अश्विनी महाजन उध्बोधन देते हुए 
 
जोधपुर:- 23 दिसम्बर 2016 .भारत देश उद्यमियों का देश है जहाँ किसी युवा को सौ रूपये दिए जाए तो वह इन सौ रूपयों से कितनी जल्दी हजार, लाख और दस लाख बना लेता है यह आश्चर्यचकित करने की बजाय आशान्वित होने की बात है। क्योंकि भारत देश में उद्यमिता नैसर्गिंक रूप से रची बसी है। अमेरिका जैसे देश में तैयार की गई ग्लोबलाईजेशन की नितियों ने भारतीय पर गरीबों अधिक प्रभाव डाला है। इसी का कारण है कि ग्लोबलाईजशन गरीबों पर अधिक हावी हुआ है। 25 वर्षो से भारत मंे लागु हुई आर्थिक नितियों का आंकलन यही बताता है कि भारत के गरीब और अधिक गरीब होते जा रहे है तथा अमिर और अधिक अमिर होते जा रहे है। यह विचार स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक एवं देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डाॅ. अश्विनी महाजन ने स्वदेशी जागरण मंच जोधपुर महानगर इकाई द्वारा शुक्रवार को जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय वाणिज्य संकाय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित स्वदेशी स्टडी सर्कल में बतौर मुख्य वक्ता बोलते हुए कहा।

महाजन ने कहा कि ग्लोबलाईजशन से पहले मजदूरों की मजदूरी एवं अन्य खर्चों पर 78 प्रतिशत खर्च होता था एवं उद्योग मालिको को 19 प्रतिशत लाभ मिलता था वहीं वैश्वीकरण के पश्चात आज उल्टा हो गया जहां मजदूरों की मजदूरी व अन्य खर्चों पर 41 प्रतिशत वहीं उद्योग मालिकों का लाभ 51 प्रतिशत हो गया है। लघु उद्योंग धंधों पर इसका विपरित प्रभाव पड़ा है। वे धीरे-धीरे बन्द होते जा रहे जा रहे है। ग्लोबलाईजेशन से  भारत में बी पी ओ आदि सर्विस से उत्पन्न रोजगार सेवाएं अमेरिका के गले नहीं उतर रही है। वैश्विक दबाव के चलते 2005 में हमारे पेटेन्ट कानूनों में किए गए बदलाव से दवाईयों व अन्य वस्तुओं को मंहगा एवं आम जन की पँहुच से दूर किया है। भारतीय पेटेन्ट कानून में डाली गई 3 डी धारा आज भी वैश्विक कम्पनियों के अंधे शोषण के विरूद्ध एक बड़ा हथियार साबित हो रही है। लगातार बढ़ रहे आयत से हमारी आर्थिक प्रगति प्रभावित हो रही है। भारतीय कृषि सक्षम है परन्तु इसको सरकारों द्वारा हासिए पर डाल देने से हमारी खाद्यान आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। 

वर्तमान में लागू की गई नोट बन्दी कुछ परेशानी पूर्ण तो है परन्तु लम्बी अवधि के लिए यह अवश्य फायदेमंद रहेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए यह निर्णय कारगर सिद्ध होगा। 

इस अवसर पर अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. बी. के. शर्मा ने कहा कि वैश्वीकरण से बाजारीय प्रतिस्पर्दा बढ़ी है। जिससे संसाधनों एवं सामानों की उपलब्धता ज्यादा हुई है। इसकी तुलना में रोजगार सृजन व प्रतिव्यक्ति आय तथा निम्न व माध्यम वर्गीय लोगों के जीवन स्तर में बढ़ोतरी नहीं हो सकी है। 

स्वदेशी जागरण मंच के महानगर संयोजक अनिल माहेश्वरी ने बताया कि मंच द्वारा स्वदेशी स्टडी सर्कल में वैश्विकरण के 25 वर्ष एवं नोट बन्दी पर संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्ष वाणिज्य एवं प्रबन्ध अध्ययन संकाय के डाॅ. वी. के. शर्मा ने की। स्वदेशी जागरण मंच के प्रदेश संयोजक धर्मेन्द्र दुबे मुख्य अतिथि व डाॅ. रमन दवे, डाॅ. आर. सी. एस. राजपुरोहित एवं कृष्णगोपाल वैष्णव विशिष्ठ अतिथि थे। डाॅ. अमित व्यास, अनिल वर्मा, महेश जांगिड़, थानसिंह परिहार, जितेन्द्र मेहरा, विनोद जैन, हंसराज, हरीश सोनी, राजेन्द्र मेहरा, डाॅ. ओमप्रकाश भाटी एवं सत्येन्द्र प्रजापति ने विचार व्यक्त किए। 

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित