शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

अमेरिकी संसद में सेंध कि तैयारी कर रहा था फई


अमेरिकी संसद में सेंध कि तैयारी कर रहा था फई

ठ्ठएरिक लिप्टन, वॉशिंगटन अमेरिका में गिरफ्तार आइएसआइ एजेंट सैयद गुलाम नबी फई ने अमेरिकी नीति निर्माताओं को अपने जाल में फंसाकर भारत को कश्मीर मुद्दे पर अलग-थलग करने की पूरी तैयारी कर ली थी। इसके लिए फई ने वॉशिंगटन की पिछली गर्मियों में अमेरिका के लगभग आधा दर्जन नीति निर्माताओं की एक पाकिस्तानी-अमेरिकी गुट और कुछ विदेशी लोगों के साथ कैपिटल हिल में बैठक आयोजित कराई थी। इसका एजेंडा कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए वार्ता को आगे बढ़ाना था। इस दौरान सभी ने कश्मीरी-अमेरिकी परिषद के साथ मिलकर कश्मीर के मुद्दे पर अमेरिकी प्रशासन के साथ ही भारत-पाक पर दबाव बनाने की हामी भरी थी। बैठक में शामिल रिपब्लिकन-डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रतिनिधि अमेरिकी संसद में एक प्रस्ताव लाने को भी राजी हो गए थे। इस प्रस्ताव की रूपरेखा कश्मीरी-अमेरिकी परिषद ने ही सुझाई थी। नीति निर्माता चाहते थे कि कश्मीर मसले पर व्हाइट हाउस की ओर से और अधिक दबाव बनाया जाए। इसके लिए उन्होंने इस मसले पर एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करने की योजना भी बनाई थी। इस कवायद के बीच अमेरिकी प्रतिनिधि इस बात से अनजान थे कि ये सारी चीजें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ की साजिश का हिस्सा थीं। कैपिटल हिल में बैठक का आयोजन भी आइएसआइ के इशारे पर ही हुआ था। कश्मीर पर जिस प्रस्ताव को अमेरिकी संसद में लाने की तैयारी थी उसे भी कश्मीरी-अमेरिकी परिषद के जरिये आइएसआइ ने ही तैयार कराया था। दो दशकों से रची जा रही इस साजिश का एकमात्र लक्ष्य अमेरिकी संसद और व्हाइट हाउस को प्रभावित करके कश्मीर को भारत के हाथ से छीनना था। फई ने करवाई कई बैठकें : कश्मीरी-अमेरिकी परिषद, जिसे कश्मीरी सेंटर के नाम से भी जाना जाता है, का कार्यकारी निदेशक फई आइएसआइ के निर्देश पर दर्जनों बार अमेरिकी नीति निर्माताओं से मिला था। इसके अलावा उसने कश्मीर मसले पर हर साल कैपिटल हिल में एक कांफ्रेंस आयोजित कराने की व्यवस्था भी कर ली थी। एफबीआइ द्वारा कोर्ट में दाखिल किए गए दस्तावेजों के अनुसार, पाक सेना हर साल एक लाख डॉलर फई के जरिये अमेरिकी नीति-निर्माताओं तक पहुंचा रही थी। अमेरिकी विशेषज्ञों की मानें तो भारत पर अमेरिकी दबाव बनवाने की आइएसआइ की साजिश ज्यादा कारगर साबित नहीं हुई। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वर्तमान में ओबामा प्रशासन समेत पिछले जितने भी अमेरिकी नीति निर्माता रहे उनका यही मानना रहा कि कश्मीर समस्या का हल भारत और पाक को मिलकर निकालना चाहिए। बुधवार को कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने कहा कि उन्हें यह कतई मालूम नहीं था कि वे आइएसआइ की साजिश का हिस्सा बन चुके हैं। कई सदस्यों को जबसे इस खुलासे के बारे में पता चला है वे बेहद नाराज हैं। पिछले साल कैपिटल हिल में आयोजित बैठक में मौजूद प्रतिनिधि जो पिट्स ने कहा, मैं इस खुलासे से बेहद दुखी हूं। अपने फायदे के लिए किसी का इस्तेमाल करना एकदम गलत है। इसी बैठक में मौजूद रिपब्लिकन पार्टी के डेन बर्टन के फई के साथ घनिष्ठ संबंध थे। बर्टन ही फई के कश्मीर एजेंडे को अमेरिकी संसद में प्रमुखता से उठाने के पक्षधर थे। उन्होंने कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले पर भारत की खिंचाई भी की थी और इस मुद्दे पर चुप रहने के लिए सितंबर में ओबामा प्रशासन को फटकार भी लगाई थी। फई का भंडाफोड़ होने के बाद बर्टन की बोलती बंद हो गई है। उन्होंने इस मामले पर सफाई देने के बजाय अपने पिछले बयान को ही दोहराया। उन्होंने कहा कि वह कश्मीरी-अमेरिकी परिषद के आइएसआइ लिंक के बारे में कुछ भी नहीं जानते। कैपिटल हिल में डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से शामिल होने वाले डेनिस जे. कुचिंछ ने भी सफाई पेश की है। उन्होंने कहा कि बैठक में विदेशियों के अलावा भारत-पाकिस्तान से भी लोग शामिल होने वाले थे। इसीलिए मुझे इसका हिस्सा बनने में कुछ भी गलत नहीं दिखाई दिया। इस मामले पर एक भारतीय अधिकारी ने कहा कि कश्मीरी सेंटर की सारी गतिविधियां बेकार साबित हुई, क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत-अमेरिका के रिश्तों में काफी सुधार हुआ है। -न्यूयॉर्क टाइम्स

source: http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-07-22&pageno=७

कश्मीर समस्या के ‘तीसरे विकल्प’(यानी कश्मीर की ‘आजादी’) के पैरोकारों का एक प्रमुख चेहरा बेनकाब हो गया है।

ये वो चेहरा है, जिसने दशकों तक अमेरिका में कश्मीर को मानवाधिकार और वहां के लोगों के ‘आत्म-निर्णय’ के अधिकार की समस्या के रूप में पेश किया, इस मसले के ‘शांतिपूर्ण’ हल की वकालत के नाम पर अमेरिकी राजनेताओं के बीच लॉबिंग की और इसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए सेमिनार, जन-सभाएं आदि आयोजित करता रहा।

उसकी इन गतिविधियों में कश्मीर के अलगाववादी नेता और देश के कई ‘मानवाधिकार’ कार्यकर्ता एवं मशहूर पत्रकार भाग लेते रहे, जिनके आने-जाने एवं अमेरिका में रहने का पूरा खर्च उसी गुलाम नबी फई की संस्था ‘कश्मीर अमेरिकन काउंसिल’ (केएसी) उठाती थी।

अब एफबीआई ने खुलासा किया है कि फई पाकिस्तान का एजेंट है, जिसे आईएसआई से पैसे मिलते थे। फई ने खुद को अमेरिका में विदेशी एजेंट के रूप में पंजीकृत करवाए बगैर लॉबिंग की, इसलिए एफबीआई ने उसे गिरफ्तार कर उस पर मुकदमा दर्ज किया है।

उसके साथ ही जहीर अहमद नाम के एक शख्स पर भी मुकदमा दर्ज हुआ है, जिस पर केएसी के लिए ऐसे फर्जी दानदाताओं की व्यवस्था करने का आरोप है, जिनकी आड़ में आईएसआई पैसा देती थी। साफ है, केएसी की सारी गतिविधियां पाक रणनीति का हिस्सा थीं।

इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि भारत से कश्मीर को अलग कर उसे हड़पना और उसकी ‘आजादी’ की वकालत- ये दोनों विकल्प पाकिस्तान की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।

इस हकीकत से सिर्फ वे ही आंख मूंद सकते हैं, जिन्हें या तो आधुनिक-सर्वसमावेशी भारत की अवधारणा से किसी वजह से बैर है या जो इस क्षेत्र की भू-राजनीतिक स्थितियों से अनजान हैं। फई के प्रकरण ने साबित किया है कि कश्मीर की ‘आजादी’ की बात करने वाले लोग दरहकीकत किसके गुलाम हैं।

स्त्रोत: http://www.bhaskar.com/article/ABH-exposed-face-2282235.html

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित