गुरुवार, 22 जुलाई 2010

गुरू पूर्णिमा - गुरु से बड़ा संसार में कोई तत्व नहीं है


आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। यह पूर्णिमा गुरु पूजन का पर्व है। वर्ष की अन्य सभी पूर्णिमाओं में इस पूर्णिमा का महत्व सबसे अधिक है। भारतीय संस्कृति में ‘आचार्य देवो भव’ कहकर गुरु को शिष्य द्वारा असीम आदर एवं श्रद्धा का पात्र माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य के तीन प्रत्यक्ष देव हैं - 1. माता 2. पिता 3. गुरु। इन्हें ब्रह्मण, विष्णु, महेश की उपाधि दी गई है। मां जन्म देती है, जीवन की रचयिता है इसीलिए ब्रह्म हैं। पिता जीवन के पालनकर्ता हैं, इसीलिए विष्णु का रूप माने जाते हैं। गुरु माया, मोह और अंधकार का नाश करता है.इसलिए वे महेश के रूप में माने जाते हैं .
गुरु पूर्णिमा का दिवस केवल गुरु पूजा का दिवस नहीं है, बल्कि यह दिवस प्रत्येक शिष्य के अपने-अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति का दिवस है। प्राचीन ऋषियों ने हमारे जीवन को चार भागों में बांटा था - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुलों में जाकर विद्याध्ययन किया करते थे। उन्हें तपोमय जीवन व्यतीत करने और संयम तथा चारित्रिक दृढ़ता का उपदेश अपने गुरुजनों से प्राप्त होता था. वे अपनी पूरी श्रद्धा गुरुजनों के प्रति रखते थे, आज समय बदल गया है। आज न तो तपोवन हैं, न गुरुकुल। जीवन दिन प्रतिदिन जटिल होता जा रहा है। शिक्षा के हर क्षेत्र में व्यापारीकरण हावी हो चुका है. ज्ञान का वितरण अब धन के आधार पर होने लगा .
आज पाश्चात्य प्रभाव ज्ञान का वितरण सामान्य से लेकर आध्यात्म तक में सम्पन्नता का आधार हो चुका है . ऐसे में हमें यह जानना एक बार फिर आवश्यक हो गया है कि हर कार्य को सिखाने वाले गुरु ही हैं।यही साधना शरीर के अंदर निहित शक्तियों का परिचय कराने, शरीर में चेतन्यता प्रदान करने तथा उचित भोग और मोक्ष का रास्ता दिखलाने की विशिष्ट एवं उच्चतम क्रिया है।
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
इसे में वह जीवन के अंधकार को अपनी दीक्षा रूपी रोशनी से रोशन करते हैं, अज्ञान से निवृति दिलाने में सक्षम होते हैं, दो अक्षर का यह सामान्य सा प्रतीत होने वाला शब्द अपने आप में संपूर्णता को समेटे हुए है। आजकल के व्यस्त जीवन में व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार हो जाता है।
मूलतः यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन है। व संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गुरु पूजा का विधान है।
गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं।ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं।
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सदगुरू की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

शास्त्र कहता हैं -
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो
गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥


कबीर ने गुरू कृपा पर सटीक लिखा है -
गुरु की सेवा चाकरि करिये मन चित लाय ।

कहै कबीर निज तरन को नाहीं और उपाय ॥
सुमिरन मारग सहज का सतगुरु दिया बताय ।

स्वाँस स्वाँस सुमिरन करो एक दिन मिलिहैं आय ॥
बलिहारी गुर आपणैं, द्यौंहाड़ी कै बार ।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार ॥4॥
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,काके लागूं पायं ।
बलिहारी गुरु आपणे, जिन गोविन्द दिया दिखाय ॥5॥
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुर मिलै, तो भी सस्ता जान
महेश्वरः।शिव जी का कथन है कि त्रिलोक में जो बड़े-बड़े देव, नाग, राक्षस, किन्नर, ऋषी, मनुष्य, विद्याधर हैं, उनको गुरु प्रसाद ही प्राप्त हुआ है। गु अक्षर सत, रज, तम माया का आकार है। रू अक्षर ब्रह्मा का आकार है, जो समस्त मायाओं का नाशक है। गुरू गीता में भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा है कि हे पार्वती तुम निश्चित जानो की गुरु से बड़ा संसार में कोई तत्व नहीं है .
भारत भर में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।
आध्यात्म के क्षैत्र में विशाल आयोजन होते हैं , लगभग प्रत्येक आश्रम किसी न किसी प्रकार का आयोजन जरुर रखता है.
गुरु निंदा कभी न करें -
स्कन्ध पुराण में गुरु के अपमान से होने वाली हानी का रोचक दृष्टान्त है, जगदगुरु बृहस्पति, इंद्र के राज दरवार में पहुचें उस समय कोई नृत्य चल रहा था , दरवार में मोजूद अन्य दरवारियों ने उठ कर यथा योग्य प्रणाम जगदगुरु बृहस्पति से किया, इंद्र के द्वारा उन्हें नजर अंदाज कर दिए जाने से वे कुपित हो अंतर-ध्यान हो गये, नारद जी ने इंद्र का ध्यान आकर्षित किया कि आपने गुरुदेव को अपमानित कर दिया, तब इंद्र ने उन्हें काफी तलाशा और मनाने कि कोशिश कि मगर तब तक वे उसे श्रीहीन कर चुके थे . इसका फायदा उठा कर दैत्यराज महाराजा बली ने इंद्र पर आक्रमण कर उनसे इंद्र - लोक जीत लिया , इस पराजय के परिणाम स्वरूप समुद्र मंथन हुआ . कुल मिला कर गुरु के अपमान के कारण इंद्र को राज्य और सम्मान खोना पड़ा . भगवान शंकर यह व्यवस्था देते हैं कि गुरु की निंदा कभी न करें , अपमान तिरिस्कार भी कभी नहीं करें . गुरु के श्राप को ईश्वर भी माफ़ी में नही बदल सकता .
गुरु का सबसे अधिक महत्व आध्यात्म में है-
एक साधक को गुरु का विश्वास जीतने में दसियों वर्ष लग जाते हैं .
संत चरणदास जी महाराज की शिष्या सहजो बाई ने लिखा है -
राम तजुं पर गुरु न विसारूं,
चरण दास पर तन मन वारूँ
हरी ने जन्म दियो जग माहीं
गुरु ने आवागमन छुड़ाई.
हरी नें पाँच चोर दिए साथा ,
गुरु ने छुडाय लई अनाथा
हरी ने माया जाल में गेरी
गुरु ने काटी ममता बेडी .

गुरु-शिष्य परम्परा आध्यात्मिक प्रज्ञा का नई पीढियों तक पहुंचाने का सोपान।
जप के लिए मंत्र

ॐ गुरूभ्यो नमः।
ॐ श्री सदगुरू परमात्मने नमः।
ॐ श्री गुरवे नमः।
ॐ श्री सच्चिदानन्द गुरवे नमः।
ॐ श्री गुरु शरणं मम।

सदगुरू की महिमा अनंत,
अनंत कियो उपकार

अनंत लोचन उघडिया,
अनंत दिखावनहार

राम कृष्ण से कौन बडा,
तिन्ह ने भि गुरु किन्ह ।

तीन लोक के है धनी,
गुरु आगे आधीन


- अरविन्द सीसोदिया

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित