सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

प्रस्ताव क्र. 2 - वर्तमान वैश्विक संकट का समाधान : एकात्म मानव दर्शन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल,भाग्यनगर (तेलंगाणा)

क्र. 2 - वर्तमान वैश्विक संकट का समाधान : एकात्म मानव दर्शन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल,भाग्यनगर (तेलंगाणा)

आश्विन कृष्ण 8-10  युगाब्द 5118 (23-25 अक्तूबर 2016)

विश्व के सम्मुख उभरती वर्तमान चुनौतियों के सन्दर्भ में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल का सुविचारित मत है कि पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय द्वारा शाश्वत भारतीय चिंतन के आधार पर प्रतिपादित “एकात्म मानव दर्शन” के अनुसरण से ही इन सबका सहज समाधान संभव है। चर-अचर सहित समग्र सृष्टि के प्रति लोक-मंगल की प्रेरक एकात्म दृष्टि के साथ सम्पूर्ण जगत के पोषण का भाव ही इसका आधार है।
     आज विश्व में बढ़ रही आर्थिक विषमता, पर्यावरण-असंतुलन और आतंकवाद विश्व मानवता के लिए गंभीर चुनौती का कारण बन रहे हैं। अनियंत्रित पूँजीवाद व वर्ग-संघर्ष की साम्यवादी विचारधाराओं को अपनाने के कारण ही आज विश्वभर में बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण के साथ-साथ विविध देशों में बढ़ते आर्थिक संकट और विश्व के दो-तिहाई से अधिक उत्पादन पर चंद देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आधिपत्य आदि समस्याएँ अत्यन्त चिंताजनक हैं। भौतिक आवश्यकताओं पर ही केन्द्रित जीवनदृष्टि के कारण परिवारों में विघटन व मनोविकार-जन्य रोग तीव्र गति से बढ़ रहे हैं। प्रकृति के अनियंत्रित शोषण से बढ़ते तापमान के कारण उभरती प्राकृतिक आपदाएँ, समुद्र के जल स्तर में निरंतर वृद्धि, वायु-जल-मिट्टी का बढ़ता प्रदूषण, जल संकट, उपजाऊ भूमि का बंजर होते चले जाना और अनेक जीव-प्रजातियों का विलोपन आदि चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। आज संपूर्ण विश्व में मजहबी कट्टरता एवं अतिवादी राजनैतिक विचारधाराओं से प्रेरित आतंकवाद विकराल रूप धारण कर चुका है। परिणामत: आबाल-वृद्ध व महिलाओं की क्रूरतापूर्ण हत्याएँ निर्बाध गति से बढ़ रही हैं। इन सबके प्रति कार्यकारी मण्डल गहरी चिंता व्यक्त करता है। इन सबका निवारण एकात्म मानव दर्शन के चिंतन के अनुरूप व्यक्ति से विश्व पर्यंत संपूर्ण जीव सृष्टि व उसके पारिस्थितिकी-तंत्र में पारस्परिक समन्वय से संभव है। व्यक्ति, परिवार, समाज, विश्व, समग्र जीव-सृष्टि व परमेष्ठी अर्थात् संपूर्ण ब्रह्माण्ड के बीच अंगांगी भाव से ही सभी व्यक्तियों, समुदायों व राष्ट्रों में संघर्ष व अनुचित स्पर्धा को समाप्त कर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के साथ सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।
     सन् 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा रियो डी जेनेरियो में आयोजित पृथ्वी सम्मलेन में 172 राष्ट्रों ने विश्व शांति, धारणक्षम विकास व पर्यावरण-संरक्षण के लक्ष्यों से स्वयं को प्रतिबद्ध किया था। दुर्भाग्यवश, विश्व आज उन लक्ष्यों से सतत दूर होता जा रहा है | एक बार पुन: 2015 के पेरिस सम्मलेन में विश्व के अधिकांश राष्ट्रों ने वैश्विक तापमान में वृद्धि पर नियंत्रण के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध किया है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सभी राष्ट्र एकात्म विश्व के अंग के रूप में साधनों के मर्यादित उपभोग के साथ सबके सामूहिक विकास का प्रयास करें और सभी नागरिक इसी अंगांगी भाव से परिवार, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्यपूर्ण व्यवहार करें तब ही विश्व में बिना संघर्ष व टकराव के स्थायी सौहार्द स्थापित हो सकेगा।
     यह वर्ष पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय की जन्मशताब्दी एवं उनके द्वारा शाश्वत भारतीय  चिंतन के युगानुकूल प्रतिपादन - एकात्म मानव दर्शन का 51वाँ वर्ष है। इस वर्ष को इस विचार की क्रियान्विति का समीचीन अवसर मानकर अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल स्वयंसेवकों सहित समस्त नागरिकों, केंद्र व विभिन्न राज्य सरकारों तथा विश्व के प्रबुद्ध विचारकों का आवाहन करता है कि समग्र प्रकृति सहित वैश्विक संरचना के सभी घटकों के बीच सामंजस्य हेतु सभी प्रकार के संभव प्रयास करें। इस हेतु उपयुक्त प्रतिरूप (मॉडल) के विकास के साथ ही इस विचार के क्रियान्वयन के लिए समुचित प्रयोग भी करने होंगे। इससे सम्पूर्ण विश्व में प्राणी-मात्र के सुखमय जीवन और लोक-मंगल के लक्ष्य की प्राप्ति होगी।

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित