बुधवार, 13 अप्रैल 2016

आलेखवंचितों को राष्ट्रजीवन में सहभागी बनाना अतुलनीय





जाति-भेद छुआछूत के धधकते अग्निकुंड में स्वयं को तपाने वाले बाबासाहेब ने सामाजिक न्याय पर आधारित और संविधानमूलक
लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की न केवल संकल्पना रखी, उसे साकार भी किया

रमेश पतंगे

 भारतरत्न पूज्य डॉ. बाबसाहेब आंबेडकर के इस 125वें जयंती वर्ष में यह स्मरण करना समीचीन होगा कि राष्ट्र
निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में उन्होंने कितना अधिक योगदान दिया है। उनका एक सूत्र यह है कि जब तक समाज के निचले तबके का मनुष्य आत्मगौरव से खड़ा नहीं हो पाएगा, तब तक यह देश भी खड़ा नहीं होगा। इस दृष्टि से देखें तो डॉ. बाबासाहेब के अविस्मरणीय योगदान को दो भागों में देखा जा सकता है। पहला, समाज और देश के लिए वे कैसे जिए? और दूसरा, देश की एकता, विकास, देश के प्राकृतिक संसाधनों और देश की सुरक्षा का विचार उन्होंने कैसे किया? पूज्य बाबासाहेब ने एक धधकते अग्निकुंड में स्वयं को तपाया। आम आदमी को अगर ऊपर उठाना है तो शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है। इसलिए बाबासाहेब जब कहते थे 'सीखो', तब यह उनका कोरा उपदेश नहीं होता था। उन्होंने एम.ए., पी.एचडी., एम.एससी., डी.एससी., बैरिस्टर ऑफ लॉ, एल.एल.डी. आदि उपाधियां अर्जित कीं। मेरी दृष्टि में डॉ. बाबासाहेब का राष्ट्रनिर्माण में सबसे बड़ा योगदान तो है यही कि उन्होंने समाज के निचले तबके के मनुष्य को जगाया।

हजारों सालों से हिंदू समाज में पिछड़ी मानी गई जातियों को सामान्य नागरिक अधिकार, सामाजिक अधिकार, राजनीतिक अधिकार तक न थे। वे सामाजिक दासता में जी रहे थे। इस दासता के पीछे धर्म का अधिष्ठान खड़ा किया गया था। इस कारण यह दासता धिार्मक दृष्टि से भी अपरिवर्तनीय बन गई थी। विषमता का शास्र खड़ा किया गया। अस्पृश्यता सामाजिक पाप है, इस बात की बाबासाहेब के जन्म के पूर्व अस्पृश्य समाज को कोई अनुभूति न थी।

भारत पर मुस्लिम आक्रमणों और गुलामी के कारणों पर डॉ. बाबासाहेब की अलग मीमांसा है। उन्होंने कहा था,
''अस्पृश्यों के हाथों से अगर शस्त्र नहीं निकाले गए होते तो यह देश कभी गुलाम नहीं हो पाता।'' अस्पृश्य जाति में जन्मा मनुष्य राष्ट्रजीवन से तोड़ा गया और वह मुस्लिम आक्रमण का शिकार बन गया। इस समाज से कई लोग तो
अपनी इच्छा से परधर्म में चले गए। देश के निर्माण में मेरा भी सहभाग होना चाहिए, ऐसा उन्हें नहीं लगता था।

ऐसा सहभाग निर्माण करने योग्य परिस्थिति समाज में नहीं थी। डॉ. बाबासाहेब का सार्वजनिक जीवन में उदय होने से पूर्व साधारणत: ऐसी परिस्थिति थी। सामाजिक दासता में जीने वाले मनुष्य को सैकड़ों सालों की सामाजिक दासता की बेडि़यां तोड़ने हेतु प्रेरित करना, उसे संघर्ष के लिए खड़ा करना, यह साधारण बात नहीं है। बाबासाहेब की यह सबसे बड़ी राष्ट्रसेवा है। बाबसाहेब ने जो किया उसे संक्षेप में इस प्रकार बताया जा सकता है-
उन्होंने निचले तबके के मनुष्य को सोचने के लिए प्रवृत्त किया, विद्रोही बनाया।

आत्मसम्मान की ज्योति जगाई। इज्जत रक्षा की प्रेरणा जगाई और मूल्यों के लिए जीना-मरना सिखाया।
1920 से पहले राष्ट्रजीवन में यह बात कहीं भी नहीं थी कि समाज के निचले तबके और जाति-व्यवस्था के अंतिम पायदान पर खड़े मनुष्य को राष्ट्रनिर्माण में सहभागी बनाना चाहिए। ऐसा कोई नहीं चाहता था। करीब सौ साल बाद 2015 में समाज में मूलगामी परिवर्तन आया। आज वंचित समाज का व्यक्ति राष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्री बन सकता है। विश्वविद्यालय का कुलपति बन सकता है। उद्योग क्षेत्र में उद्योजक बन सम्मानूपर्वक खड़ा हो सकता है। साहित्य, संगीत, कला, सिनेमा, नाट्य, आर्थिक संस्था, विदेश में राजदूत आदि क्षेत्रों में निचले तबके के व्यक्ति पहुंच हुई है। राष्ट्रनिर्माण के संदर्भ में इसका क्या महत्व है? क्या यह कोई विशिष्ट जाति की उन्नति का ही प्रश्न है अथवा राष्ट्रीय समस्या है? राष्ट्र से वंचित करोड़ों लोगों को डॉ. बाबासाहेब ने राष्ट्रजीवन में सहभागी बनाने की व्यवस्था बनाकर जो राष्ट्रसेवा की है, उसका कोई मोल नहीं है।

उस समय देश राजनीतिक दासता में जकड़ा हुआ था। विदेशी शासन समाप्त कर स्वदेशी शासन लाने हेतु स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था। लेकिन विदेशी अंग्रेजों की राजनीतिक दासता की ही तरह हमारे हिंदू समाज की सारी अस्पृश्य मानी जाने वालीं जातियां, घुमन्तु-विमुक्त, वनवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग सामाजिक दासता में जी रहे थे। इस सारे वंचित वर्ग को सामाजिक दासता से मुक्ति दिलाने का आंदोलन डॉ. बाबासाहेब ने छेड़ा था।

'ॲनाहिलेशन ऑफ कास्ट' (जातिनिर्मूलन)-में उन्होंने जो कहा है उसका सार इस प्रकार है-
  हिंदू समाज की रचना क्रमित विषमता पर आधारित है।  जाति जन्म से निश्चित होती है और उसे कोई नहीं बदल सकता है।  जाति के कारण श्रम विभाजन ही नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन भी हो गया है।  जाति रचना का आर्थिक आयाम है। अत्यंत कनिष्ठ और हेय व्यवसाय निचले तबके के जिम्मे सौंप दिए गए थे।

 व्यवसाय चयन की स्वतंत्रता नहीं थी।
 इन सारी चीजों के लिए धार्मिक मान्यता का अधिष्ठान खड़ा किया गया था।  वर्णव्यवस्था ईश्वरनिर्मित है और इसीलिए अपरिवर्तनीय है, ऐसा माना गया था। बाबसाहेब का दो टूक शब्दों में यह सवाल था कि कांग्रेस राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग उठाती है, यह ठीक है लेकिन हमारी स्वतंत्रता का क्या? जो अधिकार आम हिन्दुओं को हैं, वे सारे नागरिक अधिकार क्या हमें मिलेंगे? बाबासाहेब कांग्रेस को हिंदू कांग्रेस मानते थे जिसके नेता महात्मा गांधी थे। महात्मा गांधी सनातनी हिंदू थे। चातुर्वर्ण्य, जातिप्रथा, जातिनिष्ठ व्यवसाय उनको मान्य थे। इसका मतलब यह नहीं कि महात्मा गांधी को अस्पृश्यता मान्य थी।अस्पृश्यता के विरोध में उन्होंने बहुत बड़ा संघर्ष किया। आंबेडकर इतने से संतुष्ट नहीं थे। उनका आक्षेप सैद्धांतिक भूमिका के बारे में था।

सिद्धांतत: चातुर्वर्ण्य को मान्यता देकर, जातिव्यवस्था को मान्यता देकर और जातिनिष्ठ व्यवसाय का समर्थन करते हुए समताधिष्ठित समाज कैसे खड़ा हो पाएगा? यह बाबासाहेब का सीधा सवाल था।बाबासाहेब ने अपने जीवन में कई बारसामाजिक दासता का कटु अनुभव किया था। उनके जैसी ऊंची पढ़ाई पढ़ने वालेव्यक्ति की ऐसी दशा थी तो देहातों में बिखरे, धन, ज्ञान, सामाजिक दर्जे से दुर्बल मनुष्य की दशा कैसी रही होगी? उनकी गुलामी की वेदना कैसी होगी और उसका निराकरण कौन करेगा? महात्मा गांधी से बाबासाहेब ने कहा था, ''गांधीजी,मेरे पास तो मातृभूमि ही नहीं है!'' इन शब्दों से सदियों से चलती आई गुलामी की कहानी और वेदना जाहिर होती है।
बाबासाहेब के सामाजिक स्वतंत्रता संघर्ष का महत्व जानने के लिए थोड़ा विश्व इतिहास देखना आवश्यक है। अमेरिका में 1860 में 40 लाख गुलाम थे। उनको मुक्ति दिलाने हेतु अमेरिका में दक्षिण बनाम उत्तर का गृहयुद्ध छिड़ा था। अमेरिकी भूमि पर लड़ा गया वह सबसे भयानक संघर्ष था। उस युद्ध में 6.20 लाख अमेरिकी सैनिक मारे गए। उतने ही घायल हुए होंगे। युद्ध में आहत होने वाले नागरिकों की संख्या थी 13 लाख। फ्रांस में राज्यक्रांति हुई। इस विद्रोह का उद्देश्य राजनीतिक गुलामी से मुक्ति पाना था। फ्रांस हमारे देश के किसी राज्य से भी छोटा होगा, लेकिन इसमें 1793 से 1794 के बीच 40,000 लोग मारे गए। स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के लिए  इतना प्रचंड मूल्य चुकाना पड़ा था।

डॉ. बाबासाहेब ने सशक्त युक्तिवाद से यह दिखाया कि भारत में रही गुलामी उन दोनों देशों में रही गुलामियों से बहुत बदतर थी। ''गुलाम को गुलामी की अनुभूति करा दो, वह विद्रोह कर उठेगा'' यह वचन प्रसिद्ध है। बाबासाहेब ने गुलामों को गुलामी की अनुभूति दिलाई और संघर्ष के लिए खड़ा किया। कैसा चमत्कार! उन्होंने कोई हिंसक संघर्ष नहीं किया। महाड में मार्च 1927 में सत्याग्रहियों के भोजन मंडप पर सवर्ण समाज ने हिंसक हमला किया। सत्याग्रही इस हमले का प्रतिकार कर सकते थे। उनमें से कई लोग पूर्व सैनिक थे। एक मनुष्य दस पर भारी था। मगर उन्होंने प्रतिकार नहीं किया, क्योंकि बाबासाहेब का वैसा ही आदेश था।

बाबासाहेब ने इस देश में ऐसी अहिंसक सामाजिक क्रांति कर दिखाई। बाबासाहेब के इस सामाजिक संघर्ष में खून अवश्य बहा, मगर कोई जानलेवा हिंसा नहीं हो पाई। हम महात्मा गांधी को अहिंसक राजनीतिक संघर्ष का श्रेय देते हैं। मगर वे भी सत्याग्रह में हिंसा नहीं रोक पाए थे। बाबासाहेब के सामाजिक स्वतंत्रता आंदोलन की एक और विशेषता पर गौर करना चाहिए। महाड में सत्याग्रहियों पर लाठियां बरसाने वाले सवर्ण हिंदू थे और सत्याग्रह में सहभागी होने वाले चित्रे, सहस्रबुद्धे, टिपणिस भी सवर्ण ही थे। पर्वति, कालाराम और अमरावती सत्याग्रह में ब्राह्मण भी सहभागी हुए थे।

छात्र जीवन में बाबासाहेब को प्यार से अपने डिब्बे से भोजन खिलाने वाले पेंडसे गुरुजी भी सवर्ण ही थे। हिंसा अपनी प्रवृत्ति नहीं है। दूसरी विशेषता यह है कि जो महापुरुष दिलोजान से, माता की सी ममता से, पिता के से अनुशासन से और गुरु के से ज्ञान से समाज के लिए प्रयास करता है, उसी को कालांतर में समाज स्वीकार करता है। बाबासाहेब को स्वीकार करने की प्रक्रिया उनके जीवनकाल में ही आरंभ हो चुकी थी। उनको मुंबई विधानसभा से संविधान सभा में भेजने का आदेश देने वाला पत्र सरदार पटेल ने ही लिखा था। प्रारूप समिति में उनको लेकर संविधान लिखने का काम उनको सौंपना चाहिए, यह महात्मा गांधी ने ही सुझाया था। संविधान सभा में हिंदू सदस्य ज्यादा संख्या में थे और उन्होंने बाबासाहेब का अधिकार माना था। इन बातों को देखें तो बाबासाहेब की सामाजिक क्रांति की व्यापकता साफ हो जाती है।

उनके जीवन के स्वाभाविक रूप से जो चार कालखंड बनते हैं, उसका भी उल्लेख करना आवश्यक है। उनके जीवन का प्रथम कालखंड सामान्यत: 1920 से 1935 तक माना जाता है। इस कालखंड की प्रमुख घटनाएं हैं-महाड, कालाराम मंदिर, पर्वति सत्याग्रह, गोलमेज परिषद, साइमन कमीशन के आगे निवेदन और पुणे पैक्ट। इस कालखंड में बाबासाहेब की वैचारिक भूमिका—अस्पृश्यता की समाप्ति, हिंदू समाज में जातिनिर्मूलन और
स्वतंत्रता, समता और बंधुता—इन तत्वत्रयी पर समाज की पुनर्रचना की रही है।

महाड चवदार तालाब सत्याग्रह के समय उन्होंने जो घोषणापत्र प्रकाशित किया था, उसका शीर्षक था-'हिन्दूमात्र के जन्मसिद्ध अधिकारों का घोषणापत्र'।
गोलमेज परिषद के समय के उनके घोषणापत्र का भी बहुत सा हिस्सा संविधान में है। साइमन कमीशन के सामने गवाही देते समय उन्होंने कुछ बातें कहीं थीं, जैसे 'हम हिंदू समाज का अंग नहीं हैं, हमें आप प्रोटेस्टेंट हिंदू अथवा नॉन कॉन्फार्मिस्ट हिंदू कहिए'। उनके इस कथन को हमें ठीक से समझना चाहिए।

उनके जीवन का दूसरा कालखंड 1935 से 1947 तक का था। 1935 में उन्होंने येवला में घोषणा की थी, 'मैं हिंदू के रूप में जन्मा अवश्य हूं लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।' इसी कालखंड में उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की। 1942 में उसे बर्खास्त करके शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन की स्थापना की। कारण था कि भारत की आजादी निकट आ रही थी। क्रिप्स कमीशन भारत से लौट गया था। संविधान सभा निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हो गई थी। मुसलमानों को पाकिस्तान और हिंदुओं को खंडित भारत मिलने वाला था। बनने वाला हिन्दुस्थान एक मायने में हिंदू राज्य ही होना था यानी बहुसंख्यक हिंदुओं का राज्य। लेकिन ध्यान रहे, बाबासाहेब वैसा नहीं मानते थे।

देश की राजनीतिक परिस्थिति में तेजी से आते बदलाव को ध्यान में रखकर ही बाबासाहेब ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की स्थापना की। केवल अनुसूचित जातियों का दल बाबासाहेब को इसीलिए स्थापित करना पड़ा क्योंकि उस दल के बिना इस वर्ग का स्वतंत्र प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता। नागपुर में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेस की परिषद हुई। इसमें 70,000 प्रतिनिधि आए। तीन प्रस्ताव पारित हुए। बाबासाहेब का मानना था, मुसलमानों की तरह अनुसूचित जातियों को भी अल्पसंख्यक मानकर उनको अलग और संरक्षित राजनीतिक अधिकार मिलने चाहिए। उनके जीवन का तीसरा कालखंड संविधान निर्माण का कालखंड था। चौथा कालखंड 1949 से 1956 का है।

 राष्ट्र का विचार अर्थात् जन का विचार, भूमि का विचार, संस्कृति का विचार है। इस संदर्भ में डॉ. बाबासाहेब का
योगदान क्या है? जन का विचार करते समय बाबासाहेब ने 'शूद्र पहले कौन थे?'

नामक पुुस्तक में आर्य आक्रमण सिद्धांत को अस्वीकृत किया है। बाबासाहेब लिखते हैं, ''ऋग्वेद में अर्य और आर्य, ऐसे दो शब्द आते हैं। अर्य शब्द 88 स्थानों पर आया है, इसका अर्थ है-1. शत्रु, 2. माननीय पुरुष, 3. देश का नाम, 4. मालिक। आर्य शब्द 31 स्थानों पर आया है, परंतु जाति के अर्थ में नहीं। अत: आर्य शब्द से मानव की जाति विशेष निश्चित नहीं होती।'' लोकमान्य तिलक का सिद्धांत भी उन्होंने अस्वीकृत किया है। उन्होंने लिखा है, ''अश्व वैदिक आर्यों का पसंदीदा जानवर है... लेकिन क्या आर्टिक प्रदेश में अश्व थे? इस प्रश्न का उत्तर अगर ना में आता है तो  तिलक का यह सिद्धांत कि आर्यों का मूलस्थान आर्टिक प्रदेश में था, पंगु बन जाता है।' बाबासाहेब ने
बताया है, ''वैदिक आर्यों का मूलस्थान हिन्दुस्थान में ही होगा, इस बात के सबूत वैदिक साहित्य में ही प्राप्त होते हैं।'' डॉ. बाबासाहेब का यह प्रतिपादन भारतीय राष्ट्रवाद के संदर्भ में अत्यंत मौलिक है।
जाति के बारे में बाबासाहेब के विचार ठीक से समझ लेना आवश्यक है। यह मत उन्होंने 'कास्ट इन इंडिया' नामक प्रबंध में भी प्रस्तुत किया है। हिंदू समाज अनगिनत जातियों से बना है, यह बात सही है। यूरोपीय इतिहासकार, समाजशास्त्री इन जातियों को विभिन्न वंश बताते हैं, लेकिन यह सत्य नहीं है, ऐसा बाबसाहेब का
मत था। बाबासाहेब स्पष्ट कहते हैं, ''हम सारे एक संस्कृति के सूत्र में बंधे हुए हैं।''  बाबासाहेब ने एक अलग संदर्भ में हिंदू संस्कृति की कड़ी आलोचना भी की है। नागपुर में दीक्षा भूमि पर बौद्ध धम्म स्वीकार करते समय उन्होंने कहा था, ''मैंने गांधीजी को वचन दिया था कि हिंदू धर्म छोड़ते समय और नए धर्म को स्वीकार करते समय मैं इस देश की संस्कृति को कम से कम आहत करने वाला मार्ग चुनूंगा। आज मैं उस वचन को निभा रहा हूं। इतिहास में मुझे विध्वंसक के नाते पहचाना जाए, ऐसी मेरी इच्छा नहीं है।''

सांस्कृतिक एकता कायम रखने का कार्य धर्म, समाज की मूल्य व्यवस्था, जीवनशैली और भाषा करती है। डॉ. बाबासाहेब अधर्मी नहीं थे, निधर्मी नहीं थे और नास्तिक भी नहीं थे। ईश्वर कोई है, यह बात वे नहीं मानते थे। लेकिन विश्व का संचालन करने वाली और उसे नियमबद्ध करने वाली एक शक्ति है, इस पर उनका विश्वास था।
दीक्षा भूमि पर दिए भाषण में उन्होंने कहा था, ''धर्म की मनुष्य को रोटी जितनी ही आवश्यकता है क्योंकि धर्म मनुष्य को आशावादी बनाता है। धर्म का काम ईश्वर और मनुष्य के बीच का संबंध निश्चित करना नहीं बल्कि मनुष्य और मनुष्य के बीच का संबंध निश्चित करना है।'' रिलिजन व्यक्तिगत होता है और धम्म सामाजिक। अगर एक ही व्यक्ति है तो उसे धम्म की कोई आवश्यकता नहीं है।

लेकिन जब दो व्यक्ति साथ में आते हैं तब धम्म का कार्य आरंभ हो जाता है।धम्म का कार्य मनुष्यों के बीच के व्यवहार के नियम निश्चित करना है। वह धम्म कैसा होना चाहिए, इसका विस्तृत विवेचन 'भगवान गौतम बुद्ध और उनका धम्म'शीर्षक पुस्तक में किया               गया है।
धम्म अथवा धर्म के बिना भारतीय राष्ट्रवाद पूरा नहीं हो सकता। उसके अर्थ के बारे में विद्वानों में बहुत मतभिन्नता है। मनुष्य को नीतिमान, चारित्र्यसंपन्न बनाने का काम धम्म ही कर सकता है। इसीलिए बाबासाहेब जैसे संविधान के शिल्पकार हैं वैसे ही वे भारतीय परंपरा के महान धर्मपुरुष हैं। बाबासाहेब ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। गौतम बुद्ध का मत भारतीय चिंतन परंपरा का मत है। भगवान बुद्ध ने समाज को सुरक्षित रखने वाले नागरिक कानून नहीं बदले, विवाह कानून नहीं बदले और संपत्ति की विरासत के कानून नहीं बदले। उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए अलग कानून संहिता लागू नहीं की थी।

हिंदू कोड बिल का विषय जब चल रहा था तब 'केवल हिंदुओं के लिए नागरिक संहिता क्यों? भारत में मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और पारसी भी रहते हैं। फिर सभी के लिए समान नागरिक संहिता क्यों नहीं चाहिए?', ऐसा सवाल खड़ा हुआ था। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को मूलभूत अधिकार देता है। इन मूलभूत अधिकारों और विभिन्न नागरिक कानूनों के बीच संघर्ष की डॉ. बाबासाहेब को पूरी कल्पना थी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बाबासाहेब को मंजूर नहीं था, वे तो समान नागरिक कानून के पक्षधर थे। उनका स्पष्ट मत था कि सेक्युलर राज्य में व्यक्ति के जीवन पर सब प्रकार का नियंत्रण रखने का अधिकार रिलिजन को नहीं दिया जा सकता। पर्सनल लॉ मज़हब पर आधारित नहीं होना चाहिए।

बाबासाहब ने जन की संस्कृति की ही तरह इस भूमि का भी विचार किया है। 'एनिशिएंट इंडियन कॉमर्स' लेख में भारत का वर्णन उनके ही शब्दों में इस प्रकार है- ''भारतभूमि समृद्ध भूमि थी। इसीलिए वह अनेक आक्रांताओं के हमलों की शिकार बन गई।'' प्राकृतिक संसाधनों के बारे में बाबासाहेब का स्वतंत्र दृष्टिकोण था। खेती का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। उस पर निजी अधिकार समाप्त करने चाहिए। खेती की उत्पादकता उसके आकार पर नहीं बल्कि उर्वरक, मानव संसाधन, जन आदि पर निर्भर करती है। खेती पर निर्भर अतिरिक्त संख्या को कम करने हेतु भारत का तेजी से उद्योगीकरण करना आवश्यक है। अतिरिक्त मानव संसाधन उद्योग में लगाना चाहिए, ऐसा उनका मानना था।
डॉ. आंबेडकर वायसराय के कार्यकारी मंडल में 1942 से 1946 तक श्रम मंत्री थे। जलसंपदा विभाग का कार्यभार भी उन पर था। बाबासाहेब जब केंद्रीय मंत्री बने तब उनके कार्यकाल में दामोदर नदी पर हीराकुंड  बांध परियोजना शुरू हुई थी। उनका कहना था, पानी का अभाव दूर करना है तो उसे जमा करना चाहिए। सबसे पहले बाबासाहेब ने ही 'नदी जोड़' विषय रखा था। आज हम नदी जोड़ परियोजना पर बहस करते हैं लेकिन इस बात को भूल जाते हैं कि यह अवधारणा बाबासाहेब ने 1944 में ही रखी थी। जन, भूमि, संस्कृति ये राष्ट्र के तीन घटकहोते हैं मगर इस देश में रहने वाला बहुसंख्य हिंदू राष्ट्र बन सकता है?

इसलिए बाबासाहेब का मत अत्यंत सटीक है। उनके शब्दों में यह है: ''किसी को भी हिंदुत्व के बारे में अनुभूति नहीं है। हिंदू को एकता के बारे में जो कुछ अनुभूति है वह उसकी खुद की जाति को लेकर ही है। हिंदू एक समाज अथवा एक राष्ट्र नहीं है, ऐसा इसी कारण कहा जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि ऊपरी भिन्नता के नीचे हिंदू समाज में मूलभूत एकता दिखाई देती है। हिंदू समाज के लोगों की आदतें, रूढि़यां, आस्था, विचार सारे भारत में एक जैसी पाई जाती हैं। यह बात सही है; मगर इससे हिंदू एक राष्ट्र है, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।'' वे कहते हैं, ''सर्वसाधारण स्वामित्व की कुछ चीजें किसी समाज में होंगी तो ही वह समाज एक राष्ट्र बनता है....परस्पर संबंध, व्यवहार के बिना राष्ट्र का राष्ट्रीयत्व नहीं टिक पाएगा। हर मनुष्य का किसी भी कार्य में सभी के बराबर सहभाग लेना आवश्यक है। यह भावना ही मनुष्य को एक राष्ट्रीयत्व में बांधकर रखने का कारण बनती है। जातिसंस्था व्यक्ति को एक राष्ट्र बनने से वंचित करती है।''
25 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा के आखिरी भाषण में उन्होंने कहा, ''जातियां राष्ट्र विघातक हैं। जल्दी हमें उनसे मुक्त होना चाहिए।'' एक अन्य भाषण में उन्होंने कहा, ''मेरे विचार में जाति-रहित संघ बनकर हिंदू समाज आत्मरक्षा हेतु अधिक शक्तिशाली बन जाता है तो ही उससे कुछ आशा कर सकते हैं। अन्यथा हिन्दुओं का स्वराज गुलामी के गर्त में उतरने का एक पायदान सिद्ध होगा।''

एक राष्ट्र की भावना कैसी निर्मित हो पाएगी, यह डॉ. बाबासाहेब के चिंतन का अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू था। बाबासाहेब के शब्दों में बताएं तो, इससे 'सह अस्तित्व की भावना' निर्मित नहीं होती है। एक तरफ सांस्कृतिक एकता है। भौगोलिक अखंडता है। इसके साथ ही यहां लोगों को एक-दूसरे से विभक्त करने वाले वंश और पंथ हैं। जन, भूमि और संस्कृति, ये तीन घटक राष्ट्रवाद की जगमान्य त्रिमिति हैं। मगर उनसे ही राष्ट्र नहीं बनता है। यह बाबासाहेब ने अलग तरीके से समझाया है। चौथी मिति है सर्वत्र बंधुभाव। हम सब एक ही परमात्मा की संतान हैं अथवा एक ही आत्मतत्व हम सबमें विद्यमान है, इस तरह का भाव।

बाबासाहब लोकतंत्रवादी थे। उनकी लोकतंत्र की अवधारणा तीन तत्वों पर आधारित थी-स्वतंत्रता, समता और बंधुता। नेहरू ने संविधान सभा में जो प्रस्ताव रखा था उसमें स्वतंत्रता, समता और सामाजिक न्याय का उल्लेख था मगर बंधुभावना का उल्लेख नहीं था।
बाबासाहेब पाश्चात्य विद्वानों द्वारा दी गई लोकतंत्र की किसी भी परिभाषा को प्रमाण नहीं मानते। उनका कहना है कि वे भारतीय समाज जीवन पर लागू नहीं होती हैं। पाश्चात्य विचारक लोकतंत्र का विचार एक राजनीतिक रचना के संदर्भ में करते हैं। बाबासाहेब को लोकतंत्र की यह राजनीतिक परिभाषा मंजूर नहीं थी। उनकी परिभाषा है, ''लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में रक्तहीन मार्ग से मूलगामी परिवर्तन लाने वाली व्यवस्था ही लोकतंत्र है।'' लोकतांत्रिक राज्यव्यवस्था को सामाजिक और आर्थिक विषमता दूर करनी चाहिए। वे आदर्श समाज की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। ऐसा समाज जहां जातिभेद न हों, हरेक व्यक्ति को अपना सुख खोजने का अधिकार हो, विचार की स्वतंत्रता हो, सार्वजनिक जीवन में सभी का समान सहभाग हो और परस्पर मैत्री भावना से समाज घटक परस्पर जुड़े हुए हों। बाबासाहब सभी के प्रतिनिधित्व और सभी की सहभागिता का उपाय सुझाते हैं, जिसे हमारे यहां आरक्षण कहा गया है।
इस विषय को लेकर अत्यंत गलत तरीके से बहस चलती है। सभी की सहभागिता के लिए राजनीतिक आरक्षण और प्रशासकीय आरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उसके बिना सर्वसमावेशी लोकतंत्र निर्मित नहीं हो पाएगा और क्योंकि हम राष्ट्रीयता के संदर्भ में बाबासाहेब का विचार कर रहे हैं, इसीलिए इसके बिना एक राष्ट्रीयत्व की भावना भी निर्माण नहीं हो सकती है। बाबासाहेब के सामने समस्या थी कि संविधान में अनुसूचित जाति की आशाओं-आकांक्षाओं और अधिकारों की सुरक्षा किस तरह होनी चाहिए, इसलिए उनका संविधान सभा में रहना आवश्यक
था। उनका कहना था कि अनुसूचित जाति और जनजातियों की समस्या संवैधानिक तरीके से सुलझाई जाए। भारत जब आजाद हो रहा था तब 565 रजवाड़ों को भारत में शामिल करने का अत्यंत कठिन कार्य सरदार पटेल ने कर दिखाया। यह एक राज्य-एक राष्ट्र की अवधारणा थी। कठिन कार्य था भारत को 'नेशन-स्टेट' अर्थात् 'राष्ट्र-राज्य' के रूप में खड़ा करना। बाबासाहेब ने मूर्त रूप में राष्ट्र-राज्य की अवधारणा रखी। बाबासाहेब हमारे सामने सामाजिक न्याय पर आधारित संविधानमूलक लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की संकल्पना रखते हैं।

राष्ट्रनिर्माण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का यह योगदान अलौकिक है। (समरसता साहित्य परिषद, महाराष्ट्र द्वारा 30 और 31 जनवरी, 2016 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर साहित्य नगरी, कोलसेवाड़ी, कल्याण (पूर्व) में आयोजित सत्रहवें समरसता साहित्य सम्मेलन में श्री रमेश पतंगे द्वारा दिए गए अध्यक्षीय भाषण के हिंदी भावानुवाद का संपादित अंश)

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित