सोमवार, 24 अगस्त 2015

अपनी बात - छल-छद्म का आवरण

अपनी बात - छल-छद्म का आवरण

अपनी बात - छल-छद्म का आवरण

भारत-पाक वार्ता यानी एक ऐसी बात जिस पर दुनिया भर की निगाहें लगी हैं। सफलता या विफलता से परे इस वार्ता का महत्व इस बात में है कि यह इकलौती घटना अपने आप में भविष्य के कई घटनाक्रमों के बीज समेटे है। इसके संभावित महत्व और शक्ति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 'यदि' वार्ता सकारात्मक
रूप से संपन्न होती है तो वैश्विक व्यवस्था का क्रम बदलने तक की ताकत रखती है।

इस 'यदि' को कम मत आंकिए। क्योंकि, जहां पक्ष दो हों और उनमें भी एक पाकिस्तान हो तो सकारात्मकता को लेकर परिभाषाएं बदल जाती हैं। ऐसा पक्षकार, जिसके बारे में दुनिया में उसका कोई साझीदार कोई भी बात पूरे भरोसे से नहीं कह सकता।

विश्वसनीयता के मामले में सदा-सर्वदा संदिग्ध बने रहते हुए पाकिस्तान ने अपने लिए अनूठी पहचान अर्जित की है। लगी हों दुनिया की निगाहें...दुनिया की परवाह करता कौन है!! पाकिस्तान का यही वह नजरिया है जिसके चलते कोई उसकी बात का भरोसा नहीं करता। यही कारण है कि उसके एक वक्त के परम मित्र अमरीका ने जब तालिबानी सरगना ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद स्थित उसके घर में घुसकर मारा तब नेवी के सील दस्ते की इस कार्रवाई की जानकारी तक पाकिस्तान से साझा नहीं की गई।

निश्चित ही वार्ता द्विपक्षीय है और केवल सुरक्षा सलाहकारों के बीच है, लेकिन कुछ सवाल हैं जो इस वार्ता के वैश्विक महत्व और पाकिस्तान के रुख को स्पष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए, सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान का दृष्टिकोण। सुरक्षा के मायने भारत के लिए क्या हैं, पाकिस्तान के लिए क्या हैं और किस पक्ष के तर्क दुनिया के     हित में हैं?

पाकिस्तान से विश्व क्या व्यवहार करे और भारत जैसा पड़ोसी क्या बर्ताव रखे, अब यें बातें सिर्फ पाकिस्तान के नजरिए से तय नहीं हो सकतीं। पृथक भूखंड, जनता और शासकीय तंत्र की कसौटी पूरी करने वाला पाकिस्तान अन्य राष्ट्रों से इस मामले में अलग है कि उसकी पहचान केवल उपरोक्त राजनीतिक कारकों तक सीमित नहीं है। आज यह विश्व व्यवस्था में गड़बडि़यां फैलाने वाले आतंकी नेटवर्क के 'घर' की हैसियत रखता है। यही कारण है कि पाकिस्तान से संबंध रखने वाले हर देश के लिए हर पल इस बात पर निगाह रखना जरूरी हो जाता है कि इस संबंध की उसे क्या कीमत चुकानी होगी? ब्रिटेन के इस्लामी उन्मादी, चीन को बेचैन करते उइगुर, बच्चों को
भूनते, पत्रकारों को जिबह करते मानवता के हत्यारे...इन सबके दर्दमंद आज किसी एक देश में मिल सकते हैं तो उसका नाम पाकिस्तान है। दुनिया बेचैन होती है तो होती रहे!!

दरअसल, पाकिस्तान में सेना, आईएसआई और सरकार की गांठें आपस में ऐसी उलझी हैं कि शासन के निर्णायक सूत्र खो गए हैं।

अपनी-अपनी चिंताओं के इतने धड़े हैं कि एक जिम्मेदार राष्ट्र के तौर पर व्यवहार करने की कल्पना भी खो सी गई है। यही वह बात है जो पाकिस्तान को दुनिया का सबसे अस्थिर, अविश्वसनीय और संदिग्ध राष्ट्र बनाती है और जिसके साथ द्विपक्षीय वार्ता, चाहे वह किसी स्तर की क्यों न हो, सबसे मुश्किल कामों में से एक है।

पाकिस्तान किन मुद्दों पर राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के लिए तय सीमाएं लांघकर आतंकियों के साथ खड़ा दिखेगा, कब इस्लामी मुल्क का चोगा पहन लेगा और कब मानवाधिकारों का वकील बन जाएगा, इसके बारे में कोई भी निश्चित तौर पर कुछ कह नहीं सकता।

निश्चित ही, बहुपक्षीय परेशानियों का पर्याय बन चुके देश के साथ द्विपक्षीय वार्ता के मंच पर भारत के लिए उलझाव कुछ कम नहीं हैं।

ओसामा बिन लादेन या दाऊद इब्राहीम, पाकिस्तान के लिए दोनों विदेशी हैं मगर अपने नागरिकों की सुरक्षा चिंताओं से बढ़कर रहे हैं। विदेशी आतंकियों को पनाह देते वक्त दुनिया की चिंताओं को ताक पर रखने वाला पाकिस्तान आतंक के खात्मे को कैसे अपनी संप्रभुता पर हमले से जोड़ लेता है! मौके के मुताबिक कायांतरण और छद्म गढ़ने को अगर खूबी कहा जा सकता है तो पाकिस्तान में यह खूबी है। लेकिन यह सच है कि पाकिस्तान के इस छल-छद्म को उघाड़े और ललकारे बिना सुरक्षा के मुद्दे पर कोई वार्ता अपना उद्देश्य हासिल नहीं कर सकती।

ओसामा को निपटाने की कार्रवाई करने वाला अमरीका सही था या उसे सैन्य सूचना और सुरक्षा की छतरी तले पनाह देने वाला पाकिस्तान?

दाऊद इब्राहीम सहित तीन दर्जन से ज्यादा आतंकियों के मामले में भारत से सहयोग का संयुक्त अरब अमीरात का नजरिया सही है या उसे गुप्त ठिकानों पर रखकर शह देता पाकिस्तानी तंत्र? ये ऐसे सवाल हैं जिनका एक पक्ष पाकिस्तान है और दूसरा पक्ष भारत सहित पूरा विश्व। भारतीय डोसियरों में क्या है, ये छनकर सामने आने से पहले ही घाटी के अलगाववादियों से लेकर आतंकी हाफिज सईद तक के मोहरे बैठाने का काम पाकिस्तान शुरू कर चुका है। वार्ता की यह पाकिस्तानी शैली है। इस शैली की राह उसे वार्ता की मेज पर लाएगी या नहीं, यह इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तय नहीं हो पाया है। इस्लामाबाद से आ रहे बयानों से उसके फिर मुकरने का अंदेशा ज्यादा हो रहा है। बहरहाल, अगर बात हो, तो अब पाकिस्तान से उसी की शैली में बात करना जरूरी है। भारत के लिए, और दुनिया के लिए भी।
साभार: पाञ्चजन्य

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित