सोमवार, 22 जून 2015

संस्कृति सत्य - आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के मूल निवासी थे भारतीय

संस्कृति सत्य - आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के मूल निवासी थे भारतीय





दक्षिण पूर्वी एशिया के 20-25 देशों में आजकल भारत महोत्सव अर्थात् 'फेस्टिवल ऑफ इंडिया' जोर-शोर से मनाए जा रहे हैं। इन में से हर एक देश में वहां के निवासियों के मूलत: भारतीय होने के साक्ष्य मिलते रहे हैं। इनमें से अनेक मुस्लिम देश हैं पर फिर भी वहां बात-बात पर रामायण-महाभारत से उदाहरण दिया जाना आश्चर्यजनक नहीं है। लेकिन इस वर्ष एक नई बात देखने में आई है कि
आस्ट्रेलिया में काफी लोग अपने भारतीय मूल के होने पर शोध के लिए आगे आए हंै। ये शोधकार्य जर्मनी स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट ऑफ इवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी नामक संस्था ने किए हैं। दो वर्ष पूर्व वे पहली बार सामने आए थे। लेकिन आज यह शोधकार्य दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों, न्यूजीलैंड और
फिजी जैसे देशों, जो आस्ट्रेलिया महाद्वीप के हिस्से हैं, के लोकजीवन तक पहुंचा है। इस संस्था की शोधकर्ता इरिना पुगुच का कहना है कि भारत से आस्ट्रेलिया में बड़े पैमाने पर लोगों एवं जानवरों की आवाजाही के प्रमाण
मिले हैं। वहां के लोकप्रिय कुत्ते 'डिंगो' के भी मूलत: भारतीय नस्ल के होने के निष्कर्ष सामने आए हैं।

इस शोधकार्य के कारण आज तक के इस हिस्से का जो इतिहास बताया गया है, उसे बड़े पैमाने पर झटका लगा है। आमतौर पर आस्ट्रेलिया के लोकजीवन के विषय में दो मत स्थापित थे- एक तो यह कि लगभग 250 वर्ष पूर्व कैप्टन कुक नामक अंग्रेज नाविक सन् 1770 में वहां पहुंचा था। तब से वहां सभ्यता, शिक्षा, खेती, विकास, औद्योगिकीकरण जैसे शब्द प्रचलित हुए। उससे पूर्व वहां लोगों की बस्ती तो थी लेकिन वह 45 हजार वर्ष पूर्व वहां आए मिस्र के लोगों की थी। यह स्पष्ट हो चुका है कि वे सब लोग आदिम तौर-तरीके से ही रहते थे। लंदन के द टेलिग्राफ अखबार ने तो जर्मन संस्था के शोध के बारे में दावा किया है कि दक्षिण पूर्वी एशिया के अन्य देशों की तरह आस्ट्रेलिया में भी भारतीय लोगों का ही प्रथम प्रवेश हुआ। इस शोध के कारण दक्षिण पूर्वी एशिया से न्यू गिनी एवं न्यूजीलैंड तक के क्षेत्र में भारतीयता का भाव नए सिरे से उभरा है।

जर्मनी स्थित इस संस्था द्वारा किए शोधकार्य को प्राथमिकता देना काफी मायने रखता है। इस शोधकार्य का असर अब वहां के लोकजीवन पर दिखने लगा है। मलेशिया, इंडोनेशिया, बोर्नियो, जावा, सुमात्रा, सिंगापुर में होने वाले 'फेस्टिवल ऑफ इंडिया' में आस्ट्रेलियाई लोग उसे 'अपना उत्सव' मानकर सहभागी हो रहे हैं। उनके साथ जुड़ने में एक और उपयोगी भाग है उस हिस्से में बोली जाने वाली एस्ट्रोनेशियाई भाषा। आस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्वी एशिया में बोली जाने वाली भाषाओं की एकरूपता पुन: स्पष्ट हुई है। यह भाषा समुदाय, जिसमें 35 करोड़ लोगों की बोलने एवं ज्ञान की भाषाएं हैं, भारतीय और ताइवानी भाषा से विकसित हुआ है। वहां भी मुख्यत: बौद्ध सभ्यता ही होने के कारण भारतीयता की भावना बढ़ रही है। इस सबके मद्देनजर उतनी ही महत्वपूर्ण अन्य बातों पर गौर करना भी आवश्यक है। वह यह कि यद्यपि इस हिस्से में भारतीय भाषाओं का वर्चस्व होना चाहिए, लेकिन पिछली कुछ सदियों में शिक्षा और प्रतिदिन के व्यवहार में अरबी एवं लातीनी लिपियों का प्रयोग बढ़ा है।

फिर भी उस भाषा के मूलत: दक्षिण भारत की पल्लव लिपि से विकसित होने के कारण उसमें भारतीयता आज भी कायम है। इसमें भारतीयों की दृष्टि से ध्यान देने की बात यह है कि दक्षिण पूर्वी एशिया एवं आस्ट्रेलिया में 'इंडियन ओरिजिन' के नाम पर सब लोग जब एक हो रहे हैं, तब 125 करोड़ की जनसंख्या वाले भारत को उसकी अधिक जानकारी नहीं है। जर्मन संस्था जब वहां के समाज के मूलत: भारतीय होने पर शोध का निष्कर्ष सामने लाई तब वहां के लोगों ने महोत्सव मनाए, लेकिन भारत, जो उनका मूल देश है, से उनके स्वागत के लिए कोई नहीं पहुंचा।

आज नए सिरे से इसका उल्लेख करने का कारण यह है कि केवल दक्षिण पूर्वी एशिया और आस्ट्रेलिया ही नहीं बल्कि पिछले कुछ वषोंर् में पूरी दुनिया में 'भारत भाव' जागृत होता दिखा है। यह भारत भाव केवल भारतीय होने के गर्व तक सीमित नहीं है। विश्व के अलग-अलग हिस्सों में, कहीं दस हजार वर्ष पूर्व तो कहीं पांच हजार वर्ष पूर्व भारतीय अध्ययनकर्त्ताओं और विद्वानों ने वेदों, उपनिषदों और प्राचीन भारतीय शास्त्रों का संदेश पहुंचाया था।

आज पूरे विश्व में स्वीकारा जा रहा योग इसका एक खास उदाहरण है। अगले सप्ताह पूरे विश्व में 'अंतरराष्ट्रीय योग दिवस' मनाया जा रहा है। योग केवल कसरत नहीं है। योग प्रतिदिन काम की क्षमता बढ़ाने वाली 'ऊर्जा' का साधन मात्र नहीं है। योग के कारण अनेक असाध्य रोग ठीक होते हैं, यह प्रमाणित हुआ है। मनुष्य का सवांर्गीण विकास ही योग का उद्देश्य है। जिसे पारलौकिकता की समझ हो उसके लिए वह पारलौकिक भी है और आध्यात्मिकता जिनका विषय नहीं है, उनके लिए भी वह उतना ही परिणामकारक है। योग भारतीय जीवनशैली का एक अंग है। नैतिकता के आधार पर खुद को, परिवार और सामाजिक जीवन को प्रतिदिन अधिकाधिक समृद्ध करने वाली हजारांे वर्ष से चली आ रही परंपरा का यही संदेश अनेक शास्त्रों, कलाओं के माध्यम से इस देश के ऋषि-मुनियों ने दिया है। हजारोें वर्ष से विश्व में उनका यह संदेश प्रसारित किया जा रहा है। पिछले एक हजार वर्ष तक भारत के परतंत्र रहने के कारण हम खुद और दुनिया भी उसे भूल चुकी थी।

अब फिर से सबको उसका एहसास हो रहा है । भारतीय मूल के लोग विश्व के कोने-कोने में पहुंचे थे। इसकी जानकारी तो थी, लेकिन पिछले कुछ वषोंर् में उसका और व्यापक स्वरूप सामने आ रहा है। यूरोप का हर देश अब भारत से स्वतंत्र नाता जता सकता है। अफ्रीका से जो संवाद था वह भी स्पष्ट हो रहा है। दक्षिण पूर्वी एशिया, चीन, जापान में भी कदम-कदम पर भारतीयता स्पष्ट हो रही है। आश्चर्य की बात तो यह है कि अमरीका के अनेक देशों से संबंध भी स्पष्ट हो रहे हैं। इस सबके बीच कई बार प्रतीत होता है कि कदाचित यह एक बड़ी प्रक्रिया का आरंभ तो नहीं। लेकिन पूरे विश्व में यह भावना  भारत के हर एक व्यक्ति तक पहुंचे, तभी सब एकाकार होंगे।

एकाकार होने की यह प्रक्रिया शायद अनेक वर्ष चले लेकिन वह शीघ्रातिशीघ्र शुरू होनी चाहिए। पूरे विश्व में हमारे बंधु कहां हैं और उनकी स्थिति आज कैसी है, इसका जायजा हमें लेना होगा।

जर्मनी की संस्था द्वारा किया गया काम बारीकी से देखना चाहिए। उसने आस्ट्रेलिया की भूमि में मिले इंसानों, जीव-जंतुओं और वनस्पति के जीवाश्मों के डीएनए का अध्ययन कर उपरोक्त निष्कर्ष निकाला है। उनका कहना है कि आस्ट्रेलिया, न्यू गिनी, फिलिपींस का ममन्वा समुदाय और न्यूजीलैंड में भी भारतीय मूल वाले जीवाश्म मिले हैं। आज की जानकारी के अनुसार, आस्ट्रेलिया के 11प्रतिशत लोग भारतीय मूल के हो सकते हैं। जर्मन शोधकर्ताओं का कहना है कि उस समय भारत से बड़े पैमाने पर आस्ट्रेलिया में 'जीन फ्लो' हुआ होगा।

आस्ट्रेलिया स्थित इन भारतीय मूल के लोगों की भाषा के बारे में भी यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टन् र आस्ट्रेलिया के शोधकर्ता डॉ. जो़ डोर्च ने शोध किया है। उनका कहना है कि न्यूजीलैंड, न्यू गिनी से मलेशिया तक के हिस्से के 35 करोड़ लोग जो भाषा बोलते हैं, उस भाषा और आस्ट्रेलिया के भारतीय मूल के लोगों की भाषा का आपस में संबंध है। डॉ. डोर्च आस्ट्रेलिया में मानवशास्त्र की दृष्टि से कई विश्व मान्य शोध करने वाले वैज्ञानिक हैं।

इसलिए जर्मनी की संस्था के शोधकार्य का और एक परिणाम सामने आया है और वह यह है कि दक्षिण पूर्वी एशिया में जो भारतीय सभ्यता आज दिखती है, उससे आस्ट्रेलिया स्थित भारतीय मूल के लोग जुड़े हुए हैं। मलेशिया, आस्ट्रेलिया और ताइवान में बोली जाने वाली भाषाओं के समूह के बारे में सर्वप्रथम जर्मन विद्वान डॉ. आटो डेम्पवुल्फ ने शोध किया। उनके मत में एस्ट्रोनेशियन भाषा एक भाषा नहीं है। इस भाषा को उस हिस्से में 'बहासा' कहा जाता है। डॉ. आटो डेम्पवुल्फ नामक वैज्ञानिक 20वीं सदी के प्रारंभ में हुए थे। आज लगभग 35 करोड़ लोग इस भाषा समूह के अंतर्गत आते हैं। इस शब्द का अर्थ ही है एशिया और आस्ट्रेलिया में बोली जाने वाली 'बहासा' अर्थात् भाषा। मलय भाषा इस समुदाय की प्रमुख भाषा है। हिंदी, संस्कृत, तमिल की ही तरह ताइवानी भाषा इसकी प्रमुख घटक है। इस भाषा के 300-400 वर्ष पूर्व के आलेख पल्लव लिपि में हैं। इस लिपि की शैली भले दक्षिणी लिपि जैसी हो लेकिन उसके मूल अक्षर 'क ख ग घ ङ ' ही  हैं। भारत की प्रगत भाषाओं में 'ऋ' मूल अक्षर का प्रयोग किया जाता है, उसी तरह मलय भाषा में भी 'ऋ' का मूल अक्षर के रूप में प्रयोग किया
जाता है। आज ये भाषाएं अरबी और लातिनी लिपि में प्रयुक्त की जाती हैं।

वहां इस्लाम का प्रभाव बढ़ने के बाद अरबी लिपि आई। यूरोपीय लोगों का प्रभाव बढ़ने के बाद लातिनी लिपि का प्रभाव बढ़ा। पिछली पांच-छह सदियों में इस भाषा की लिपि 'अरबी' हुई है। इस पूरे माहौल में भारत की भूमिका बड़े भाई की होने के बाद भी एक हजार वर्ष की दासता के कारण इस देश की भूमिका छोटे भाई से भी कम ही रही है। कुछ संस्थाएं उसके लिए काम कर रही थीं लेकिन सरकारी स्तर पर पिछले 68 वषोंर् तक इसकी उपेक्षा ही हुई। इनमें भाषा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्व है ही, लेकिन सबसे महवपूर्ण तो यह है कि उन 35 करोड़ लोगों में हर एक व्यक्ति हमारा अपना है। आस्ट्रेलिया से लेकर माओरी समाज तक जो भारतीयता है वह वहां के लोगों द्वारा अत्यंत प्रतिकूल परिस्थिति में सहेजी गई भारतीयता है। आस्ट्रेलिया के युवाओं द्वारा पिछले 15-20 वर्ष में किया गया शोधकार्य देखा जाए तो दक्षिण पूर्वी एशियाई हिस्सों के सांस्कृतिक जीवन एवं जमीन के नीचे से मिले जीवाश्मों के डीएनए में भारत और आस्ट्रेलिया का असर कहां-कहां है, इस पर गौर किया जा रहा है।    - मोरेश्वर जोशी
साभार: पाञ्चजन्य

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित