शुक्रवार, 8 मई 2015

ईसा पर पश्चिम में खुलासा - न कोई इतिहास, न सबूत


सतीश पेडणेकर

'राम, कृष्ण और बुद्ध की तरह ईसा कोई पौराणिक कपोल-कल्पना की उपज नहीं हैं वरन् एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिनके चमत्कारों को कई समकालीनों ने देखा-जांचा है।' एक जेसुइट पादरी ने जाने-माने हिन्दू चिंतक सीताराम गोयल से यह कहा था। पादरियों का यह दावा कोई नया नहीं है। उनके सारे 'प्रोपेगेंडा' का आधार ही यह है कि 'राम, कृष्ण तो पौराणिक कल्पना की उपज हैं, लेकिन ईसा ऐतिहासिक पुरुष थे। उनके पैदा होने और मरने के प्रमाण मौजूद हैं। उनके चमत्कारों की गवाही मिलती है। इसलिए अपने पौराणिक भगवानों को
छोड़कर प्रभु यीशु की शरण में आ जाओ।' लेकिन ईसाई पादरियों की ऐसी डींगों में कितनी सचाई है? क्या ईसा सचमुच ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं? क्या सच में ऐसा कोई हाड़-मांस का व्यक्ति पैदा हुआ था? क्या सचमुच उनके साथ वे सारी घटनाएं घटी थीं जो उनके बारे में बताई जाती हैं? भारत के दो हिन्दू विचारकों, सीताराम गोयल और राम स्वरूप ने ईसा और ईसाइयत के बारे में बहुत गहराई से अध्ययन किया और इस बारे में काफी पुस्तकें लिखी हैं। हाल ही में सीताराम गोयल की पुस्तक 'जीसस क्राइस्ट, एन आर्टीफाइस फॉर एग्रेशन' पढ़ने का मौका मिला। इससे ईसा के बारे में जो पुरानी स्थापित धारणाएं थीं वे सब पुर्जे-पुर्जे होकर बिखर गईं। बार बार विचार करने को मजबूर होना पड़ा कि इस ईसा के बारे में तो हमें कभी बताया ही नहीं गया। सबसे बड़ा झटका यह जानकर लगा कि ईसा के होने का कोई ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है। यानी आज का ईसा कुछ और नहीं ईसाई समाज की कल्पना की उपज है।

पश्चिमी देश ही नहीं भारत में भी लोग ईसा की छवि से प्रभावित होते रहे हैं, लोगों को 'पाप से उबारने के लिए' सूली पर चढ़ने वाले से अभिभूत रहे हैं। कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हंै ईसा पर। अब तो पश्चिमी देशों में इतिहासकारों ने यह साबित कर दिया है कि इतिहास में ईसा का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ईसा के बारे में जो भी थोड़ी जानकारी उपलब्ध है वह गोस्पेल पर आधारित है और उसे ही ऐतिहासिक सत्य के तौर पर प्रचारित किया जाता है। पश्चिमी देशों में ईसा पर शोध का लंबा इतिहास रहा है जिसे 'क्राइस्टोलोजी' कहा जाता है। उसके बारे में हमारे देश के पढ़े लिखे लोग भी कम ही जानते हैं । इसलिए ईसाई मिशनरी इस अंधविश्वास का ही प्रचार करती रहती हैं तो कोई उसका खंडन भी नहीं करता। पश्चिमी देशों में हालत यह है कि पिछले दो-ढाई सौ साल में बाइबिल और ईसा के बारे में किए गए शोध कसौटी पर कसे जाने पर ईसा का ऐतिहासिक व्यक्तित्व हवा में जाने कहां विलीन हो गया। इससे सवाल पैदा हो गया है कि गोस्पेल में जिसे ईसा कहा जाता है वह इंसान क्या कभी इस जमीन पर रहता था? वह कैसा था?

ईसाई परंपरा हमें बताती है कि ईसा यहूदी थे। वे अपने जन्म के समय से मृत्यु तक 30 या 33 साल तक फिलिस्तीन में रहे। लेकिन अजीब है कि इस काल में या उसके थोड़े समय बाद भी किसी इतिहासकार को उनके और उनके द्वारा स्थापित मत के बारे में पता नहीं चला। फिलो (20 बीसी-54 एडी) ने यहूदियों का इतिहास लिखा लेकिन उसमें जीसस या ईसा का कोई जिक्र नहीं है। इसके बाद जस्टिस टिबेरिस नामक दूसरे इतिहासकार ने उसी कालखंड का इतिहास लिखा। उसमें भी ईसा का कोई उल्लेख नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि फ्लेवियस जोसेफस, जो 36 एडी से 100 एडी तक जीवित रहा, ने दो बड़ी पुस्तकें लिखीं, 77 एडी में 'द ज्यूइश वार', और बाद में 'द एंटीक्विटीज ऑफ द ज्यूज'। इस इतिहास में कहीं ईसा का नाम नहीं है। 

उसकी किताबें 66-74 एडी काल से जुड़ी हुई हैं, जब रोमन ने फिलिस्तीन में व्यापक रूप से फैले यहूदी विद्रोह को दबाया था। उस समय तक तो ईसाई मिशनरियों को काम करते 35 साल हो जाने चाहिए थे। लेकिन उसमें ईसा और उनके अनुयायियों के बारे में एक शब्द भी नहीं है। एक दो जगह 'जीसस-द वाइजमैन' और 'जीसस क्राइस्ट' शब्दों का उल्लेख मिलता है, लेकिन उसके बारे में अध्येता यह साबित कर चुके हैं कि उन्हें बाद में जोड़ा गया है। दूसरी शताब्दी और उसके बाद के वषोंर् में लिखे यहूदियों के रब्बी साहित्य में पांच जगह 'जीसस' का जिक्र है, लेकिन उनसे जीसस की ऐतिहासिकता साबित नहीं होती। 

ईसाइयों के अतिरिक्त किसी परंपरा से जीसस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। जिसे जीसस का जीवनकाल माना जाता है उस समय का ग्रीक और रोमन का लिखा काफी बड़ा ऐतिहासिक और दार्शनिक साहित्य मिलता है, लेकिन उसमें ईसा का पता नहीं चलता। एकाध किताब में 'जूडास-द गैलीलियन' का जिक्र मिलता है जिसने पहली शताब्दी के पहले दशक में रोमन के खिलाफ यहूदी विद्रोह का नेतृत्व किया था, लेकिन उसमें भी ईसा का जिक्र नहीं मिलता। 

ईसा का उल्लेख ईसाइयों के न्यू टेस्टामेंट के हिस्से गोस्पेल में ही मिलता है, जो काफी बाद में लिखे गए हैं। अंग्रेजी में एक शब्द है 'गोस्पेल ट्रुथ' यानी गोस्पेल का सत्य, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि गोस्पेल में कोई सत्य नहीं मिलता। सत्य के नाम पर जो मिलता भी है उनमें ईसा के जीवन को लेकर अलग अलग बातें कहीं गई हैं। 

जैसे,1़ विभिन्न गोस्पेल को पढ़कर ईसा के जन्म का सन् निश्चित नहीं हो पाता।
2़ गोस्पेल के आधार पर ईसा की जन्म तिथि निश्चित तौर पर पता नही चल पाती। कुछ उनकी जन्म तिथि 19 अप्रैल मानते हैं, कुछ 10 मई। पूर्व के ईसाई 6 जनवरी को उनका जन्म दिन मनाते रहे। 354 में कुछ पश्चिमी चचोंर् ने 25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्मदिन मनाना शुरू किया। कुछ जातियां तो पहले से ही इस तारीख को अविजित सूर्य के जन्मदिन के तौर पर मनाती रही हैं।
3़ ईसा के जन्मस्थान को लेकर भी गोस्पेल में मतभेद हैं। अक्सर ईसा का जन्मस्थान बेथलेहैम बताया जाता है, लेकिन इस पर भी गोस्पेल में ही मतभेद हैं। मैथ्यू और जॉन के गोस्पेल मानते हैं कि यह सही है लेकिन जॉन और मार्क का कहना है उन्होंने कभी नहीं सुना कि बेथलेहैम में ईसा का जन्म हुआ था। उनका कहना है, ईसा नाजरथ में जन्मे जो गिलेली क्षेत्र का छोटा सा शहर था।
4़ ईसा के पूर्वजों को लेकर गोस्पेल अलग अलग बातें कहते हैं। चार गोस्पेल में से मैथ्यू और ल्यूक जीसस के परिवार का पूरा इतिहास देकर साबित करते हैं कि उनका परिवार राजा डेविड और अब्राहम-आदम से जुड़ा हुआ था। लेकिन दोनों के इतिहास में काफी फर्क है। न केवल ईसा के पूर्वजों के नाम अलग हैं वरन् परिवार के बारे में भी दोनों के इतिहास में केवल तीन नाम एक जैसे हैं। यहां तक कि जोसेफ के पिता और ईसा के दादा का नाम भी एक जैसा नहीं है। एक ही अवधि में मैथ्यू ने 28 और ल्यूक ने 41 पीढि़यों का जिक्र किया है। लगता है दोनों में एक बात को छोड़कर कुछ भी एक जैसा नहीं है और वह है जीसस को राजा डेविड के वंश का बताना। सबसे बड़ी पहेली यह है कि इसके तुरंत बाद 'ईश्वर का एकमात्र बेटा' कुंवारी मां से पैदा हुआ था।
 5. कुंवारी मां के गर्भ से ईसा के जन्म लेने के कारण मैथ्यू और ल्यूक दोनों अलग अलग बताते हैं। मैथ्यू के गोस्पेल के मुताबिक जीसस की मां मेरी की जोसेफ के साथ सगाई हुई थी, लेकिन वे लोग तब साथ नहीं रह रहे थे जब जोसेफ को पता चला कि वह गर्भवती है। वह दयालु व्यक्ति था और नहीं चाहता था कि मेरी को उस समय के यहूदी कानून के तहत पत्थर मारकर मौत की सजा दी जाए। तब उसके सपने में देवदूत आया, उसने उसे
बताया कि मेरी एक पवित्र आत्मा से गर्भवती हुई है। फरिश्ते ने यह भी कहा कि मेरी का बेटा लोगों को उनके पापों से बचाएगा और उसका नाम जीसस रखा जाए। तब जोसेफ जागा और मेरी को वापस घर ले आया। उसने जीसस को जन्म दिया।दूसरी तरफ ल्यूक हमें बताता है, मेरी जब जाग रही थी तब उसे फरिश्ता मिला और उसने
घोषणा की कि उसे बेटा होगा, जिसे ईश्वर डेविड का सिंहासन देगा। तब मेरी ने इस बात पर अचरज जताया कि ऐसा कैसे संभव है, क्योंकि अभी तो वह कुंवारी है? तब फरिश्ते ने उसे आश्वस्त किया कि पवित्र आत्मा उसे मिलेगी और उसका बेटा ईश्वर का बेटा होगा। लेकिन ल्यूक ने इसके समर्थन में ओल्ड टेस्टामेंट की किसी भविष्यवाणी का हवाला नहीं दिया।

 6़ चारों गोस्पेल कहते हैं कि जूडिया के रोमन गवर्नर को सौंपने से पहले यरुशलम के यहूदी अफसरों ने ईसा पर ईशनिंदा का मुकदमा चलाया।
 7़ चारों गोस्पेल इस बात पर सहमत हैं कि जीसस को रोमन दंड के तहत सूली पर चढ़ाया गया। लेकिन इसके ब्योरों में फर्क है।
 8़  हम जीसस के जीवन के अन्य चमत्कारों की तरह उनके पुनर्जीवन को भी खारिज कर सकते हैं, लेकिन यह ईसाई मत का मर्म है।
विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक अल्बर्ट श्वाइत्जर ने अपनी सुप्रसिद्घ पुस्तक 'द क्वेस्ट फॉर हिस्टोरिकल जीसस' में क्राइस्टोलोजी के बारे में कहा था-ईसा के जीवन के अध्ययन का इतिहास बड़ा दिलचस्प है। ऐतिहासिक जीसस की खोज के लिए उसकी शुरुआत हुई थी। 

यह सोचा गया था कि जब उसे पा लेंगे तो उसे हमारे समय में सीधे एक गुरु और मुक्तिदाता के तौर पर लाया जा सकता है। लेकिन नतीजा यह निकला कि ईसा के जीवन का आलोचनात्मक अध्ययन ज्यादातर नकारात्मक ही रहा। जीसस आफ नाजरथ, जो मसीह के रूप में सबके सामने आता है, ईश्वर के राज्य की नैतिकता के बारे में
उपदेश देता है, जिसने धरती पर स्वर्ग के राज्य की नींव डाली और जो अपने काम को अंतिम रूप देते हुए मर गया, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। यह छवि टूटी ही नहीं है, मूर्त ऐतिहासिक समस्याओं के सामने आते ही टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई, विखंडित हो गई । 

दरअसल ईसा की ऐतिहासिकता की खोज यह सोच कर शुरू हुई थी ताकि उनके बारे में मिले खरे तथ्यों से अब तक केवल आस्था के कारण स्वीकार किए जाने वाले ईसा की प्रतिमा मजबूत की जाए। लेकिन यह इतिहास का दोष नहीं है कि यह खोज निरर्थक साबित हुई। इससे ईसा की प्रतिमा निखरने के बजाय पूरी तरह ढह गई। ईसा के 'सेल्समैनों' को उसे विसर्जित कर देना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि वे जानते थे कि ईसा और ईसाइयत दोनों पश्चिमी साम्राज्यवाद के लिए इतने जरूरी हैं कि इतिहास की कसौटी पर खरे न उतरने के कारण उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। जब गोस्पेल के ईसा की छवि इतिहास की कसौटी पर छिन्न विच्छिन्न हो गई तो जर्मनी के रूडोल्फ बल्टमैन ने अपना इतिहासकारों की मेहनत से स्वतंत्र पंथ- घोषणापत्र जारी किया। इसमें कहा गया था-'मत का निर्णय व्यक्तिगत है, इस कारण इतिहासकारों की मेहनत पर निर्भर नहीं हो सकता।'

जेम्स पी. मेके श्वाइत्जर की बात का समर्थन करते हैं। वे कहते हैं, केवल दो शताब्दी पहले लोग इस बात पर गर्व करने लगे थे कि अकादमिक क्राइस्टोलोजी को वैज्ञानिक तौर-तरीकांे के नजदीक लाया जा रहा है। अठारहवीं सदी से पहले यह माना जाता था लोगों ने ईसा का चित्र कई अवैज्ञानिक धारणाओं से बनाया है इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ईसाई साहित्य और भक्ति में झूठा ईसा उभरकर आया। इसलिए आश्चर्य नहीं यदि अलग अलग समय में अलग-अलग स्थानों पर और अलग-अलग ईसाई परंपराओं में अलग-अलग ईसा उभर कर आए।

ईसा के अध्ययन पर ताबूत की कील आखिरी रूडोल्फ बल्टमैन ने ठोकी।1958 में उन्होंने कहा-'मैं सोचता हूं हम अब ईसा के व्यक्तित्व और जीवन के बारे में लगभग कुछ नहीं जान सकते। ईसाई स्रोत इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाते और वे काल्पनिक हैं।' प्रोफेसर डब्ल्यू. ट्रीलिंग 1969 में इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ईसा के जीवन की एक भी तारीख को निश्चित रूप से तय नहीं किया जा सकता है। ऐसा मानने वाले विद्वानों की कमी नहीं है कि गोस्पेल के जीसस का इतिहास में अस्तित्व ही नहीं है। सीताराम गोयल कहते हैं-यह पुस्तक लिखने के पीछे मेरा मकसद यही था कि ईसा और ईसाइयत को आधुनिक पश्चिम ने ठुकरा दिया है।
लेकिन ईसाई मिशन बाकी उपभोक्ता वस्तुओं की तरह उसे पश्चिमी धन और मीडिया के जरिये तीसरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं। पश्चिम ईसा और ईसाइयत के बारे में जो असलियत जानता है उसे दुनिया के इस हिस्से (भारत को) को क्यों नहींजानना चाहिए? -
साभार:पाञ्चजन्य

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित