शनिवार, 11 अप्रैल 2015

कर्तव्य व पूजा भाव से कार्यरत सेवा साधकों का समन्वय'




कर्तव्य व पूजा भाव से कार्यरत सेवा साधकों का समन्वय

स्रोत: न्यूज़ भारती हिंदी     





समाज में कोई भी व्यक्ति दु:खी, पीड़ित,वंचित तथा अभावग्रस्त न रहे, तो ही समाज का समग्रता से संगठन करना संभव है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (रा. स्व. संघ) को हिंदू समाज का संगठन इसीआधारपर अपेक्षित है। इन दु:खी, पीड़ित, वंचित तथा अभावग्रस्तों की सेवा करने के लिए अनेकानेक सेवा कार्य संघ की प्रेरणा से शुरू हो चुके हैं।
सेवा कार्य (सोशल प्रोजेक्ट्स) करने वालों की संख्या भारत में कम नही है। लेकिन ऐसा पाया जाता है, ये सेवा
कार्य किसी ना किसी स्वार्थ-पूर्ति हेतु चलाये जाते है। संघप्रेरित सेवा कार्य किसी निहित स्वार्थरहित रहते हैं।सेवा कर्तव्य भाव व पूजा भाव से करनीचाहिए, यहीं हमारे श्रेष्ठ पूर्वजों ने हमें सिखाया है। रामकृष्ण परमहंस नेकहा है- शिव भाव से जीव सेवा।’ स्वामी विवेकानंद ने समाज के ऐसेदु:खित-पीड़ित जनों को ईश्‍वर के रूप में देखा है। वे कहते थे- ‘मैं उसप्रभु का सेवक हूँ, जिसे अज्ञानवश लोग मनुष्य कहते हैं।’ यही कारण है कि आजभी अपने देश में लाखों बंधु-भगिनी ऐसे हैं जो अपने समाज के ऐसे‘प्रभुजनों’ की सेवा इसी श्रेष्ठ और पवित्र भाव से तथा प्रचार-प्रसिद्धि वसम्मान से दूर रहते हुए कर रहे हैं। वे व्यक्तिगत-पारिवारिक स्तर पर तथासंस्थाओं के द्वारा सेवा कर रहे हैं। किन्तु आज हमारे प्रचार माध्यमोंद्वारा ऐसे श्रेष्ठ-पवित्र सेवा कार्यों का प्रचार कम मात्रा में होता हैऔर दुर्भाग्यवश समाज के दोष-विकृतियों का प्रचार अधिक मात्रा में हो रहा है।
प्रत्यक्ष समाज में जाकर यदि कोई अध्ययन करें तो ध्यान में आयेगा कि आज भी समाज में दुर्जनशक्ति से सज्जनशक्ति अधिक है। स्वार्थी-भ्रष्टाचारी से नि:स्वार्थ समाज सेवक जनों की संख्या अधिक है। यह सत्य सभी के सामने न आने के कारण ही समाज में एक प्रकार से निराशा, हताशा, उसके कारण उदासीनता, नकारात्मक भाव आता है और मन में निष्क्रियता बढ़ती है।
ऐसे समय में समाज में इस प्रकार के सेवाभावी कार्यकर्ताओं को एक साथ लाना, आपसी परिचय और एक दूसरे के कार्य की जानकारी का आदान-प्रदान करने से सभी के मन का आत्मविश्‍वास और बढ़ाकर, समाज को सही दिशा में परिवर्तन करते हुए समाज को समतायुक्त, शोषणमुक्त, निर्दोष और सुखी बनाने का निश्‍चय अधिक दृढ़ करने का प्रयास भी संघ की प्रेरणा से होता है।
सेवा संगम
देश के सभी प्रान्तों में ग्राम, खण्ड, जिला स्तर पर 600 से अधिक सेवा संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की
प्रेरणा से 1 लाख 35 हजार से अधि क सेवाकार्य चल रहे हैं। समाज में और भी अनेक संस्थायें सेवाकार्य कर रहीं हैं। ये सारी सेवा सरिताएँ अपने सेवा के पवित्र जल से इस समाज की भूमि को सुजलाम्-सुफलाम्-उर्वरा बनाने का सफल प्रयास कर रही हैं। प्रान्त-प्रान्त के ऐसे सभी सेवा कार्यों के प्रतिनिधियों का एकत्रीकरण ‘सेवा संगम’ में होता है। यह सेवा संगम राष्ट्रीय सेवा भारती के तत्त्वावधान में संपन्न होता है। राष्ट्रीय सेवा भारती देश के विभिन्न प्रान्तों में प्रान्त, जिला, नगर, ग्राम स्तर पर सेवा करने वाली सेवा संस्थाओं की शिखर संस्था (अम्ब्रेला ऑर्गनायझेशन) है। अभी तक 600 से अधिक सेवा संस्थाओं के साथ राष्ट्रीय सेवा भारती संलग्नित हुई है।
इस सेवा संगम में विभिन्न स्थानों पर चलने वाले सफल सेवा कार्यों की जानकारी तथा उपलब्धियॉं दर्शाने वाली प्रदर्शनी लगायी जाती है। समाज के श्रेष्ठ सेवा भावी पूज्य संत और अनुभवी विशेष महानुभावों का मार्गदर्शन सभी प्रतिनिधियों को मिलता है।
इस सेवा संगम के पवित्र वायुमंडल से, सम्मिलित सभी प्रतिनिधि अपने सेवाभाव को और अपने सेवा संकल्प को और अधिक दृढ़ बनाते हुए अपने-अपने क्षेत्र में सेवाकार्य का और भी विस्तार करने की योजना बनाते हैं।
राष्ट्रीय सेवा भारती
स्वैच्छिक संस्थाओं और समर्पित कार्यकर्ताओं के सामूहिक प्रयास द्वारा देश के पिछड़े, पीड़ित और अभावग्रस्त
बंधुओं को शिक्षित, स्वावलंबी और सशक्त कर सुदृढ़ तथा समरस समाज का निर्माण करना, यह राष्ट्रीय सेवा भारती की संकल्पना है।
अपने साथ संलग्नित स्वैच्छिक संस्थाओं को राष्ट्रीय मंच प्रदान कर सामूहिकता का भाव जागृत कर जागरण, सहयोग, प्रकाशन, प्रशिक्षण एवं अध्ययन द्वारा उनका कौशल बढ़ाना, राष्ट्रीय सेवा भारती का उद्देश्य है।
पारदर्शिता, समर्पण, राष्ट्रीय एकता और देश के वैधानिक नियमों का अनुपालन इन मूल्यों पर राष्ट्रीय सेवा भारती कार्य करती है।
राष्ट्रीय सेवा भारती की रचना कुछ इस प्रकार है-
-17 न्यासी और 21 प्रबन्धन समिति के सदस्य
-11 क्षेत्रीय संयोजक (क्षेत्रीय स्तर पर कार्य की देख-रेख के लिए)
-41 प्रान्तों में प्रत्येक में एक
प्रतिनिधि संस्था (जो अपने प्रान्त में कार्यरत स्वैच्छिक संस्थाओं को राष्ट्रीय सेवा भारती से संलग्न करने और नामित प्रतिनिधियों द्वारा प्रान्त की संस्थाओं में समन्वय और उनके कार्य की देख-रेख करने के लिए)
दृष्टिक्षेप में सेवा कार्य
शिक्षा
(बालवाडी से आश्रम शाला तक अलग अलग 17 प्रकार के कुल 79 हजार शिक्षा के कार्य चल रहे हैं।)
गरीबी तथा घर की अन्यान्य कठिनाईयों के कारण, विद्यालय में जा नहीं सकते... ऐसे बालक, बालिकाओं के लिए छात्रावास, आवासी विद्यालय चल रहे हैं।
अतिदुर्गम वन-पहाड़ों में बसे गॉंवों से विद्यालय तक पहुँचना ही मुश्किल... ऐसे स्थानों पर एकल विद्यालय चल रहे हैं।
झुग्गी झोपड़ी के घरों में शांतता-प्रकाश युक्त स्थान ही नहीं... ऐसे बालकों को पढ़ाई के लिए अच्छी जगह मिले इस हेतु नगरों/महानगरों में अभ्यासिकाएँ चल रही हैं।
स्वास्थ्य
(आरोग्य मित्र से रुग्णालय तक अलग अलग 15 प्रकार के कुल 19 हजार 500 स्वास्थ्य रक्षा के कार्य चल रहे हैं।)
छोटे छोटे गॉंवों में सड़क तो पहुँची, लेकिन डॉक्टर नहीं... मरीज को उठाकर शहर ले जाना संभव नहीं... ऐसे स्थानों पर चल चिकित्सालय, साप्ताहिक चिकित्सा केंद्र चल रहे हैं।
पहाड़ों में, अतिदुर्गम, कम आबादी के स्थानों पर स्वास्थ्य रक्षा के लिए आरोग्य रक्षक योजना कार्यान्वित हुई है।
रक्तदान जीवनदान है। इस विषय का जागरण करते करते रक्तपेढियों और नेत्रपेढियों की बड़ी शृंखला विकसित हुई है।
सामाजिक
(बालकल्याण केंद्र से नशा मुक्ति केंद्र तक अलग अलग 16 प्रकार के कुल 18 हजार सामाजिक उत्थान के कार्य चल रहे हैं।)
जन्म से ही माता-पिता की गोद से वंचित रहे अनाथ बालकों के लिए मातृछाया प्रकल्प चल रहे हैं।किशोरवयीन लड़कियों के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य एवं समुपदेशन के लिए किशोरी विकास प्रकल्प प्रारंभ हुए हैं।
जीवनयापन के लिए अपार श्रम करने के बाद दिन ढ़लते ही कदम नशाघर की ओर बढ़ते हैं उसको भुलाने में स्थान-स्थान पर चल रही भजन मंडली सफल साबित हुई हैं।
स्वावलंबन
(सिलाई केंद्र से संगणक शिक्षा तक अलग अलग 8 प्रकार के कुल 23 हजार 500 आर्थिक विकास के कार्य चल रहे हैं।)
महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन के लिए हजारों स्व-सहायता समूहों का विशाल जाल देशभर विकसित हुआ है।
वैसे ही उनके स्वयंरोजगार के लिए सिलाई, कढाई, बुनाई, हस्तकला, पाककला आदि के प्रशिक्षण वर्ग चल रहे हैं।
स्थानिक कृषि-वन उपज के आधारपर प्रक्रिया उद्योगों का प्रशिक्षण वर्ग शुरू हुआ है... जैसे-फलप्रक्रिया,
बांबू उद्योग, बायोगैस, वनौषधि, पंचगव्य औषधी, जैविक कृषि आदि।
ग्रामविकास
(सभी प्रान्तों में करीब 250 गॉंवों ने अपने अपने खण्डों-तहसिलों में ग्रामविकास के नमूनेदार उदाहरण खड़े किए हैं।)
भारत गॉंवों का देश है। आज भी 60 प्रतिशत अधिक लोग गॉंवो-कस्बों में रहते हैं। ग्रामों के उत्थान-विकास में ही भारत का उत्थान-विकास है।
इस सोच को लेकर देश की हजारों ग्रामीण शाखाओं ने अपने गॉंवों में लोकोपयोगी कार्य शुरू किये... जैविक कृषि, गौ-पालन, जल संधारण, प्रक्रिया उद्योग, सौर ऊर्जा, मंदिर निर्माण, ग्रामोत्सव ऐसे अनेक विध उपक्रमों के साथ।
आपदा प्रबंधन
आपदा प्राकृतिक हो या मनुष्य निर्मित... ऐसी संकट की घड़ी में प्रशासन, अन्यान्य संस्थाएँ इन सबसे आगे... सर्व
प्रथम उस स्थानपर पहुँचकर राहत कार्य शुरू करते हैं, संघ के स्वयंसेवक... यह अब अधोरेखित हो चुका है। बहते हुए पानी में, टूटी हुई डगर की खाईयों में, लाशों के ढेर में साहस से-निर्भयता से स्वयं को झोंक कर विस्थापितों को सहायता का हाथ बढ़ाते है संघ के स्वयंसेवक... आंध्र का चक्रवात, तमिलनाडु की त्सुनामी, किल्लारी-भुज के भूकंप, ओडिशा की फायलीन... ऐसे सभी प्रसंगों में स्वयंसेवकों ने समर्पित सेवा के कीर्तिमान खड़े किए हैं।

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित