शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

प्राचीन भारतीय विज्ञान पर चुप्पी टूटीसौ साल बाद 

 जिज्ञासा खोज तक पहुंचाती है। गहरे समुद्र में एक विशालकाय, मांसाहारी एवं बेहद आक्रामक जीव पाया जाता है। नाम है जाइंट स्क्विड। लंबाई 30 से 40 फुट तक। कभी-कभी ये छोटी नावों पर हमला भी कर देता है। ये जीव वास्तव में कैसा होता है, यह मानव ने अभी-अभी जाना है।आज से 2400 वर्ष पूर्व अरस्तू ने जाइंट स्क्विड के बारे में कुछ इशारा किया था। समय-समय पर इसके बारे में बातें होती रहीं परंतु वास्तविक प्रमाण मिला 19वीं शताब्दी में। विज्ञान की अनेक खोजों को पूर्व में कल्पना याअंधविश्वास माना गया। बहुत सी परिकल्पनाएं सदियों बाद सिद्धांत बनीं। इन अनुभवों से मानव की वैज्ञानिक चेतना विकसित हुई। आज विज्ञान कहता है कि बिना सिद्ध किए, बिना परीक्षण किए किसी बात को मान लेना अंधविश्वास है। पर उन लोगों को क्या कहेंगे जो बिना परीक्षण किए किसी बात को नकार देते हैं?

भारतीय मूल के कैनेडियन-अमरीकन गणितज्ञ हैं 40 वर्षीय मंजुल भार्गव। गत वर्ष 2014 में उन्हें गणित के क्षेत्र का नोबल पुरस्कार कहलाने वाला फील्ड्स मेडल पुरस्कार प्रदान किया गया। मंजुल की शिक्षा-दीक्षा कुछ हटकर हुई। उन्होंने अपने नाना से संस्कृत सीखी और भारतीय गणित की प्राचीन परंपरा का गहरा अध्ययन किया। कुछ माह पहले दिए गए एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, 'जब मैं बड़ा हो रहा था तो मुझे महान गुरुओं को पढ़ने का अवसर मिला। इनमें पाणिनी, पिंगल और हेमचंद्र जैसे महान भाषा वैज्ञानिक और कवि तथा आर्यभट्ट, भास्कर और ब्रह्मगुप्त जैसे महान गणितज्ञ शामिल हैं। इनके काम में गणित की महान खोजें छिपी हुई हैं, जिन्होंने मुझ जैसे युवा गणितज्ञ को गहराई से प्रभावित किया। पिंगल, हेमचंद्र और ब्रह्मगुप्त का प्रभाव मेरे काम में देखा जा सकता है। अपने नाना से मैने जाना कि किस प्रकार वे महान गणितज्ञ स्वयं को गणितशास्त्री न मान कर कवि समझते थे।' मंजुल ने आधुनिक गणित को काफी कुछ दिया है। साथ ही जर्मन गणितज्ञ कार्ल फैड्रिक गौस के काम से सामने आई दो सौ साल पुरानी गणितीय उलझन को सुलझाया है। लेकिन मंजुल का कहना है कि उन्हें
इसकी दिशा 628 ई. के भारतीय गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त के संस्कृत ग्रंथ से मिली है। अर्थात् परंपरा ने प्रतिभा को राह दिखाई।

लेकिन सबकी समझ मंजुल भार्गव की तरह नहीं होती। कुछ लोगों की समझ पर पूर्वाग्रहों के ताले जड़े होते हैं। मैंने एक भिखारी के बारे में सुना था जिसके मरने पर जब उस स्थान को खोदा गया जहां बैठ कर वह भीख मांगता था तो वहां से बहुत सारा धन निकला।
कुछ लोगों को अपने घर का कुंआ नहीं पड़ोस का पोखर ही ज्यादा अच्छा लगता है और कुछ लोग सत्य को अपने वाद के जंगले में कैद रखना चाहते हैं। 3 जनवरी, 2015 को 102वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मेक इन इंडिया' पर अपने विचार रखे और पे्ररणा स्वरूप प्राचीन भारतीय विज्ञान के कुछ प्रसंगों, परिकल्पनाओं पर प्रकाश डाला।

आयोजन के दूसरे दिन कुछ विषय विशेषज्ञों ने प्राचीन भारतीय विज्ञान पर अपनी  प्रस्तुतियां दीं। इस आयोजन के एक सदी पुराने इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था। बस फिर क्या था, सेकुलर खेमा हवा में तलवारें भांजने लगा। इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस ने बयान पढ़ डाला कि प्रधानमंत्री 'नए मिथक' न गढ़ें।

इतिहासकार कहलाने वाले एक 'सेकुलर' बुद्धिजीवी, जो विज्ञान तो निश्चित रूप से नहीं जानते, और इतिहास जान-बूझकर जानना नहीं चाहते, ने ट्वीट किया कि 'इंडियन साइंस कांग्रेस ने पागल संघियों को मौका कैसे दे दिया?'
इतिहासकार कहलाने वाले वे, विज्ञान पर ये सब टिप्पणियां कर रहे थे। जानना दिलचस्प रहेगा कि वैज्ञानिक क्या कह रहे थे। सुपर कंप्यूटर परम के रचनाकार डॉ़ विजय भाटकर ने कहा कि 'भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 102 साल के इतिहास में पहली बार प्राचीन भारतीय विज्ञान पर चर्चा हुई है। हमें ऐसा करने में सौ साल क्यों लग गए? हमें यह समझने में सौ साल क्यों लग गए कि ये (प्राचीन भारतीय विज्ञान) विज्ञान का एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसे हर विज्ञान मंच का अभिन्न अंग होना चाहिए।' आगे उन्हांेने कहा 'गूगल एक सर्च इंजन है, यह शुद्घ गणित और कलन विधि (एलगारिथ्म) है। आज जब मैं अपने कंप्यूटर को कोई आज्ञा देता हूं तो मेरे कंप्यूटर, सर्वर और क्लाऊड्स को इसे ठीक तरह समझना होगा और प्राकृतिक भाषा में सही उत्तर देना होगा। ये एक चुनौती है। यदि इसे कुशलतापूर्वक और एकदम ठीक ढंग से सुलझाना है तो मेरा मानना है कि आपको संस्कृत सीखनी होगी। हम चाहते हैं कि सभी बड़े कंप्यूटर विज्ञानी संस्कृत पढ़ें।' रॉयल सोसाइटी, लंदन के अध्यक्ष और नोबल पुरस्कार विजेता सर पॉल मैक्सिम नर्स बड़े गौर से प्राचीन भारतीय विज्ञान संबंधित प्रस्तुतियों को सुनते रहे।

भारत के प्राचीन ज्ञान से प्रेरणा लेने का ये इकलौता उदाहरण नहीं है। भारतीय मिसाइल के जनक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम मानते हैं कि मिसाइल की प्रथम खोज वैदिक भारत में हुई थी, तब इन्हें अस्त्र कहा
जाता था। डॉ. कलाम कहते हैं कि उन्हीं प्राचीन अस्त्रों से उन्हें आधुनिक मिसाइल की प्रेरणा मिली। भारत के मंगलयान की गौरवगाथा लिखने वाले डॉ़ अरुणन का कहना है कि प्राचीन भारत में विज्ञान की परंपरा थी ये सब मान चुके हैं।

हमारे पूर्वजों ने ग्रहों का निरीक्षण न किया होता तो हम आज यहां न पहुंच पाते। अपने उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री ने यजुर्वेद के तैत्तरीय अरण्यक में से एक पंक्ति कही- 'सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्'। यजुर्वेद के रचनाकार सत्य अथवा ज्ञान की इस खोज में आगे जिन साधनों की चर्चा करते हैं वे हैं श्रद्धा, मेधा, मनीषा, मानस अथवा मन, चित्त (चेतना की उच्च अवस्था), शांति, स्मृति, स्मरण और विज्ञान (ज्ञान को कर्म में बदलने की क्षमता)। यही वह स्तंभ है जिनपर हमारे पूर्वजों ने ज्ञान और विज्ञान के नए प्रतिमान स्थापित किए। आज देर से सही लेकिन उचित समय पर इसका स्मरण किया गया है। लेकिन ये पहल सबको पसंद नही आई। इस महान धरोहर को अनेक बुद्धिजीवी नामधारियों ने छद्म विज्ञान कह कर उसका मजाक उड़ाया और प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि 'विज्ञान और मिथक को मिलाया न जाए।'

4 जनवरी को हुए 'संस्कृत के माध्यम से प्राचीन विज्ञान' नामक सत्र में प्राचीन भारत के तकनीकी, तंत्रिका विज्ञान, वैमानिकी, शल्य चिकित्सा, सिविल इंजीनियरिंग, विज्ञान और आध्यात्मिकता वनस्पति शास्त्र आदि विषयों पर प्रस्तुतियां हुईं। कैप्टन आनंद ने विमान शास्त्र और डॉ़ अश्विन सावंत ने प्राचीन चिकित्सा शास्त्र पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि सुश्रुत पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हृदय के शरीर की रक्त परिवहन व्यवस्था का केंद्र होने के बारे में बतलाया। इसके पहले केन्द्रीय विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने कहा कि पायथागोरस के जन्म से सदियों पूर्व भारत में यह ज्ञान बोधायन प्रमेय के नाम से प्रचलित था। इन सारी प्रस्तुतियों पर आलोचनात्मक एवं लगभग एकतरफा मीडिया बहस हुई। जिन्हें जिम्मेदारी से इस विषय पर चर्चा करनी थी उनमें से अधिकांश ने इस विषय को बहुत हल्के में उड़ा दिया।

जब हम अपने विज्ञान की बात करते हैं तो इस चर्चा को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है। एक हिस्सा वो जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जैसे सुश्रुत आदि का चिकित्सा विज्ञान, वैदिक गणित की उपलब्धियां, रसायन शास्त्र और भौतिकी के बारे में उपलब्ध संस्कृत साहित्य और पुरातात्विक प्रमाण आदि। दूसरा वह हिस्सा जिसे हम अब तक आधुनिक विधियों से प्रमाणित नहीं कर पाए हैं और उन्हे प्रतीकों अथवा परिकल्पनाओं के रूप में संस्कृत साहित्य में पाते हैं, जैसे रक्तबीज से क्लोनिंग की प्रेरणा मिलना अथवा ब्रह्मास्त्र आदि अस्त्रों के नाम से आधुनिक अस्त्रों का इशारा मिलना या विमान शास्त्र के वचनों का व्यवहारिक उपयोग संभव न हो पाना। विज्ञान में जो सिद्ध हो जाता है वह सिद्धांत बनता है, लेकिन परिकल्पनाओं का भी अपना महत्व है। लियोनार्दो द विंची की प्रतिष्ठा इंजीनियर के रूप में भी थी। मिलान के ड्यूक ल्यूडोविको मारिया स्फोज़र को लिखे पत्र में विंची ने दावा किया है कि वह शहर की रक्षा करने वाले और किसी शत्रु शहर पर आक्रमण कर सकने वाले दोनों प्रकार के यंत्र बना
सकता है। लियोनार्दो ने कागज पर बहुत प्रकार के यंत्रों के खाके खींचे जिनमें से कुछ व्यावहारिक सिद्ध हुए और कुछ अव्यावहारिक। इससे लियोनादार्े का सम्मान कम नहीं हुआ, बल्कि उसकी कल्पनाशीलता ने सम्मान पाया, हम भी प्रेरणाओं और परिकल्पनाओं (जब तक हम उन्हे सिद्ध न कर सकें) के लिए अपनेपूर्वजों के प्रति कृतज्ञ तो हो ही सकते हैं, और प्रेरणा ले सकते हैं।

इस संदर्भ में दूसरा पहलू दृष्टिकोण का है। बरट्रेंड रसेल ने आइनस्टीन के सापेक्षता सिद्घांत को समझाने के लिए एक किताब लिखी 'दि एबीसी ऑफ रिलेटिविटी'। इस पुस्तक के प्रारंभिक पृष्ठों में रसेल ने मानवीय समझ के विरोधाभासों को बतलाया है। वह कहते हैं कि मनुष्य आम तौर पर अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियों में से आंख पर सबसे अधिक विश्वास करता प्रतीत होता है, परंतु जब वह किसी चीज़ के बारे में सुनिश्चित धारणा बनाना चाहता है जिसे हम चलती भाषा में कहते हैं पक्का करना, तब वह स्पर्श करके अंतिम निर्णय करता है। रसेल का कहना है कि हमारी इसी प्रवृत्ति में से मापन की इकाइयां इंच, फुट, मीटर आदि निकली है। ये स्पर्शेंद्रिय का विस्तार है। अब यहां से मैं अपनी कल्पना जोड़ता हूं। प्रकृति के ऐसे जीव जिनके सूंघने की क्षमता मनुष्य से कई सौ गुना अधिक है यदि वे सोच-विचार में सक्षम हों तो क्या बिल्कुल अलग प्रकार की मापन प्रणाली विकसित नहीं करेंगे? क्योंकि उनकी घ्राण शक्ति एक पैमाना बन जाएगी। ऐसे जीव जिनकी सुनने की क्षमता प्रबल है क्या वे किसी बिल्कुल भिन्न आयाम में विकास नहीं करेंगे? यदि ये सत्य है तो क्या आप हजारों साल में बदलते मानव मन और चेतना से केवल और केवल आज कल के ही तौर-तरीकों की अपेक्षा करेंगे? हम विषय को किस दृष्टिकोण से देखते हैं और
कहां से शुरुआत करते हैं इससे सारी निष्पत्तियां बदल जाती हैं। न्यूटन ने बल की जो व्याख्या की उसी के आधार पर भौतिकी के बहुत सारे सिद्धांतों और यंत्रों का विकास हुआ। बल की उस प्रथम व्याख्या को यदि किसी दूसरे ढंग से विकसित कर दिया जाए तो हो सकता है सारा विज्ञान शीर्षासन करने लगे। आज विज्ञान और विज्ञान की पढ़ाई का जिस तेजी से सभी दिशाओं में विस्तार हो रहा है उससे इस बात की प्रबल संभावना है कि भविष्य में हमें नए तरीकों और नई व्याख्याओं की आवश्यकता पड़े। हमें नए और पुराने दोनों के लिए अपने दरवाजे खुले रखने होंगे। सोशल मीडिया में किसी ने एक अच्छा सवाल उठाया कि विमान उड़ाने वालों को घोड़ों पर आए हमलावरों ने कैसे परास्त किया? उसका उत्तर तलाशा जाना चाहिए। पहली बात, आज से दो हजार साल पहले (यूनानियों का आक्रमण ईसा पूर्व) जब विदेशियों के आक्रमण शुरू हुए उस काल में वैमानिकी शाखा लुप्त दिखती है। जनसामान्य को लग सकता है कि इतनी बड़ी उपलब्धि का लुप्त हो जाना कैसे संभव है, लेकिन विज्ञान केवल ज्ञान नहीं है, अपितु संस्था भी है। विज्ञान संस्थाएं ही विज्ञान के विकास एवं शिक्षा का आधार हैं। संस्था के नष्ट हो जाने से विज्ञान भी गाथा बनकर रह जाता है। आधुनिक काल में व्यापारिक गतिविधियों से बहुत सारी तकनीक जनसामान्य तक पहुंची है, और स्थाई हुई है। यदि आज किसी कारण से नाभिकीय ऊर्जा पर काम करने वाले संस्थान नष्ट हो जाए तो कुछ ही दशकों में परमाणु ऊर्जा कथा-कहानी बनकर रह जाएगी। हम उसे अगली पीढ़ी को बताएंगे लेकिन सिद्ध नहीं कर पाएंगे। कई विद्वानों का मत है, कि महाभारत युद्घ के बाद भारत की वैज्ञानिक संस्थाएं नष्ट हुईं एवं महाविनाश की प्रतिक्रिया में शस्त्रों से भारत का मोहभंग हुआ।

दूसरा, भारत में ज्ञान की शक्ति को गलत हाथों में जाने से बचाने के लिए उसे केवल चुने हुए योग्य लोगों को ही प्रदान करने की प्राचीन परंपरा रही है। स्वाभाविक रूप से विशेष ज्ञान की बातें कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित रहीं। ऐसे में किसी परिस्थिति विशेष या आघात में किन्ही परंपराओं का लुप्त हो जाना आश्चर्य की बात नहीं है। एक और सहज सवाल है कि शास्त्रों में कई सिद्धांतों का उल्लेख भर है, जबकि उसके व्यावहारिक पक्ष, विधि तकनीक का वर्णन नहीं मिलता। ध्यान से देखंेगे तो इसका उत्तर हमारे आस-पास ही मिल जाएगा। आज जब कोई विज्ञान समाचार आता है, तो सामान्य पाठकों के लिए समाचार माध्यमों मेंे उसकी संक्षिप्त चर्चा होती है, जब कि उस आविष्कार के गूढ़ तकनीकी पक्ष विषय-विशेषज्ञों के लिए प्रकाशित विशेष प्रकाशनों में उपलब्ध होते हैं। कहने का आशय मात्र इतना है, कि जिस प्रकार परीक्षण किए बिना किसी बात को मान लेना अवैज्ञानिक है, उसी प्रकार बिना परीक्षण नकार देना भी उतनी ही अवैज्ञानिक बात है। स्वीकार और नकार के बीच हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि समय के साथ वैदिक कालीन लुप्त सरस्वती नदी के अस्तित्व के वैज्ञानिक प्रमाण सामने आ चुके हैं। खंभात की खाड़ी में महाभारत में वर्णित स्थान पर द्वारिका के अवशेष खोजे जा चुके हैं, और रामायण में वर्णित रामसेतु आज भी अस्तित्व में है।

उपनिवेशवादी मानसिकता और निहित स्वार्थ
क्या कारण है, कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस में प्राचीन भारतीय विज्ञान का विषय आने पर इतना बतंगड़ बनाया गया? मजाक क्यों उड़ाया गया? इसके स्थान पर गंभीर चर्चा हो सकती थी। संजीदगी से सवाल पूछे जा सकते थे। आखिरकार एक विचार सामने रखा गया था। विद्यालयों से छात्रों को खदेड़ कर किसी प्राचीन शिक्षा तंत्र में धकेल देने का प्रस्ताव तो नहीं लाया गया था। इसके पीछे कुछ तो वे लोग हैं जिनके इस व्यवस्था और भ्रमपूर्ण वातावरण में निहित स्वार्थ हैं।

दूसरे वे है जिनपर उस उपनिवेशवादी शिक्षा का प्रभाव है, जो हर अच्छी बात की जड़ें देश के बाहर दिखाती हैं। इस परंपरा में, प्राचीन इतिहास को मिथक, उपलब्धियों को गप्प और नायकों का बौना कर दिखाया जाता है। इन कपटपूर्ण व्यवस्थाओं के अनेक पैरोकार हैं। इन पैरोकारों में वामपंथियों की बहुसंख्या है, जिनके लिए भारत का गौरवशाली अतीत काल्पनिक उपन्सास मात्र है। इस भ्रम को बनाए रखने के लिए इन लोगों द्वारा इतिहास के पृष्ठों पर कालिख मलने का प्रयास किया जाता रहा है, और गढ़े गए झूठों की प्राणपण से रक्षा की जाती रही है। यही कारण है, कि जिस आर्यों के आक्रमण के सिद्धांत को दुनिया भर के विशेषज्ञों ने नकार दिया है, उसे भारत के वामपंथी इतिहासकार आज भी सीने से लगाए घूमते हैं।

प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों पर उनकी किताबें मौन रहती हैं और ज्ञान विज्ञान तथा सार्वजनिक जीवन के महानायकों का कुछ पंक्तियों में निपटा दिया जाता हैं उनके मत से बाहर जाने वाला हर विचार अप्रासंगिक, बेतुका और कपटपूर्ण घोषित कर दिया जाता है। इसीलिए आज भारत के इतिहास की पुनखार्ेज और पुनर्लेखन की आवश्यक्ता है। 100 साल पुरानी हो चुकी भारतीय विज्ञान कांग्रेस करोड़ों रुपए की वार्षिक खुराक पर पल रही है। ये सफेद हाथी भारतीय विज्ञान का कितना भला कर रहा है, ये मूल्यांकन का विषय है। यहां ऐसी अनेक प्रवृत्तियां हैं, जो देश में विज्ञान के ठहराव के लिए जिम्मेदार हैं। इन प्रवृत्तियों में तीन प्रमुख बातें हैं - पहला, ये संस्था, इसके आयोजन सामान्य भारतीय से बहुत दूर हैं और मौलिक प्रतिभाओं की खोज का कोई वास्तविक प्रयास या उनके लिए कोई स्थान नहीं है। दूसरा, वार्ता का माध्यम केवल अंग्रेजी है, भारतीय भाषाओं से विज्ञान का कोई सरोकार बनाने का विचार तक नहीं है, और तीसरा, पे्ररणा देने वाले, नयी संभावनाएं पैदा करने वाले प्राचीन भारतीय विज्ञान का यहां कोई स्थान नहीं है। 15 अगस्त 1947 के बाद भारतीय शिक्षा का उपनिवेशवादी चलन पहले जैसा बना रहा । आजादी के बाद नवनिर्माण की आशाओं पर तुषारापात हुआ। दुष्यंत कुमार कह उठे 'बरसात आ गई तो दरकने लगी जमीन, सूखा मचा रही ये बारिश तो देखिए।'

राज-काज और भाषा की बंदिशों ने हमारी सोच को पंगु बना छोडा़ है। भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा पर पड़ी ये बंदिशें हटेंगी तो विज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियों का विस्फोट होकर रहेगा। हाल ही में एक अमरीकी फिल्म 'ग्रेविटी' की चर्चा रही।
अंतरिक्ष विज्ञान विषय पर बनी ये फिल्म वास्तव में दर्शनीय है। विश्व के अनेक देशों में विज्ञान विषयों पर बेहद सफल फिल्में बन रही हैं। यदि दर्शक इन्हें देखने उमड़ रहे हैं, तो एक बात तय है, कि उस समाज में विज्ञान की
सोच प्रवेश कर गई हैै। प्रतीक्षा है उस दिन की, जब भारत में भी कला और साहित्य में विज्ञान का प्रवेश होगा। विज्ञान आधारित फिल्में बनेंगी और बॉक्स ऑफिस पर हिट रहेंगी।

समय के पन्नों पर अमिट लिखावट

प्राचीन भारतीय विज्ञान की वे उपलब्धियां जो समयसिद्ध, तर्कसिद्ध और प्रमाण सिद्ध हैं उन्हें हमें जानना चाहिए और दुनिया को उनके बारे में बताना चाहिए। सुश्रुत संहिता में 1120 बीमारियों, 700 औषधीय वनस्पतियों के बारे में बतलाया गया है। साथ ही खनिजों अथवा लवणों से बनने वाली 64 और जीव जंतुओें से मिलने वाली 57 दवाओं का वर्णन है। इसमें अनेक प्रकार की जटिल शल्य चिकित्सा, भू्रण विकास, अस्थि विभाग आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। आंखों की बीमारियों के बारे में और मोतियाबिंद की शल्यचिकित्सा का भी वर्णन है। हृतशूल के नाम से एनजाइना पेक्टोरिस, मधुमेह, रक्त संचरण तंत्र, हाइपरटेंशन, कुष्ठरोग, पथरी आदि की व्याख्या और इलाज बतलाया गया। प्लास्टिक सर्जरी का भी वर्णन मिलता है। सुश्रुत संहिता का 8वीं शताब्दी में किताब-ए-सुस्रुद् नाम से अरबी में भाषांतर हुआ। यहां से यह ज्ञान इटली होते हुए यूरोप पहुंचा। 1794 में लंदन की 'जेंटलमैन्स मैगज़ीन' में कुमार वैद्य नामक भारतीय की नाक का पुनर्निर्माण (प्लास्टिक सर्जरी) विषय पर रिपोर्ट छपी। आज से 200 साल पहले ब्रिटिश सर्जन जोसेफ कॉन्स्टेन्टाइन कार्प ने 20 वषार्ें तक भारतीय प्लास्टिक सर्जरी का अध्ययन किया और 1815 में पश्चिमी जगत की पहली प्लास्टिक सर्जरी की। औजार वही थे जो सुश्रुत संहिता में बतलाए गए थे। टीपू सुल्तान और ब्रिटिश फौजों के बीच 1792 में हुई मैसूर की लड़ाई में टीपू सुल्तान द्वारा बंधकों के नाक और हाथ काटने का वर्णन आता है। बाद में भारतीय वैद्यों ने उनमें से अनेक की नाक का पुनर्निर्माण कर दिया। दो ब्रिटिश डॉक्टर थॉमस क्रूसो और जेम्स फिंडले इस घटना के गवाह बने। मद्रास गज़ेट ने इस घटना को फोटो फीचर के साथ छापा। बाद में यही रिपोर्ट जेंटलमैन मैगजीन में प्रकाशित हुई।
प्रसिद्घ इतिहासकार विल ड्यूरान्ट ने द स्टोरी ऑफ सिविलाइजे़शन नामक पुस्तक में 'अवर ओरिएंटल हेरिटेज' नामक अध्याय में भारत के धातु विज्ञान के बारे में इन शब्दों में लिखा- 'गुप्त साम्राज्य के दौरान भारत में रसायन और कास्ट आयरन सहित उच्च औद्योगिक विकास हुआ, जिसके कारण रोम साम्राज्य भी भारत को रसायन उद्योग जैसे रंगाई, टैनिंग, साबुन निर्माण, कांच और सीमेंट आदि के उत्पादन में सबसे कुशल राष्ट्र मानता था।

छठवीं शताब्दी में हिंदू यूरोप के रसायन उद्योग से मीलों आगे थे। वे कैल्सिनेशन, डिस्टिलेशन, सब्लिमेशन, स्टीमिंग, फिक्सेशन, बिना ऊष्मा के प्रकाश उत्पन्न करना, धात्विक लवणों, रसायनों और मिश्र धातुओं के निर्माण
के उस्ताद थे। स्टील निर्माण में भी वे पूर्णता हासिल कर चुके थे। इसी प्रकार गणित में भारत के योगदान को बताते हुए प्रो़ सी.के. राजू अपनी किताब 'कल्चरल फाउंडेशन्स ऑफ मैथेमेटिक्स (पीयर्सन लॉन्गमैन, 2007) में लिखते हैं कि कलन (कैलकुलस) भारत से यूरोप पहुंचा। भारतीय गणितज्ञों माधव, नीलकंठ और ज्येष्ठदेव के कार्य का लाभ यूरोपीय गणितज्ञों ने उठाया। परंतु किसी ने भारत के इस योगदान का अध्ययन करने का प्रयास नहीं किया।

ऋषि कणाद
2500 वर्ष पूर्व ऋषि कणाद ने वेदों में लिखे सूत्रों के आधार पर परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। भारतीय इतिहास में ऋषि कणाद को परमाणुशास्त्र का जनक माना जाता है। आचार्य कणाद ने बताया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं।

ऋषि भारद्वाज
राइट बंधुओं से 2500 वर्ष पूर्व वायुयान की खोज भारद्वाज ऋषि ने कर ली थी। पुष्पक विमान का उल्लेख इस बात
का प्रमाण है। ऋषि भारद्वाज ने 600 ईसा पूर्व इस पर एक विस्तृत शास्त्र लिखा था। जिसे विमान शास्त्र के नाम से जाना जाता है।

ऋषि बोधायन
बोधायन भारत के प्राचीन गणितज्ञ और शुल्ब सूत्र तथा श्रौतसूत्र के रचयिता हैं। पाइथागोरस के सिद्धांत से पूर्व ही बोधायन ने ज्यामिति के सूत्र रचे थे। उन्होंने 2800 वर्ष पूर्व रेखागणित, ज्यामिति के महत्वपूर्ण नियमों की खोज
की थी।   

-प्रशांत बाजपेई
स्त्रोत: पाञ्चजन्य

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित