बुधवार, 5 नवंबर 2014

संघ, सत्ता और मीडिया

संघ, सत्ता और मीडिया 
मीडिया इस समय उलझन में ही चमत्कृत है कि भाजपा के माध्यम से राजनीतिज्ञों की ऐसी खेप सामने आ रही है जो युवा तो है ही पर जिस पर बाल्यकाल से संघ के संस्कारों की छाप रही है।

देवेन्द्र स्वरूप

आज के टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर एक शीर्षक देखा, 'केन्द्र में नरेन्द्र, महाराष्ट्र में देवेन्द्र।' मैं सोचने लगा,यह शीर्षक क्यों दिया गया होगा? क्या केवल नाम साम्य के कारण? इसके अलावा इन दोनों में और क्या समानता है? टाइम्स ऑफ इंडिया को कभी आशा नहीं थी कि नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे और 44 वर्षीय देवेन्द्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, क्योंकि टाइम्स आफ इंडिया की गणना के अनुसार महाराष्ट्र में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरने वाली नहीं थी और यदि कोई गठबंधन सरकार बनी और उसमें भाजपा का मुख्यमंत्री बना तो वह वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी ही होंगे। उसके लिए गडकरी के बार-बार कहे इन शब्दों का कोई मूल्य नहीं था कि 'पार्टी ने मुझे दिल्ली भेजा है, मैं दिल्ली में अपने दायित्व से प्रसन्न हूं और उसे पूरा करने में लगा हूं। उसे छोड़कर मैं महाराष्ट्र वापस जाने की नहीं सोचता। महाराष्ट्र में जो भी मुख्यमंत्री बनेगा उसे हम सबका पूरा सहयोग रहेगा।' मीडिया को लगता था कि यह महत्वाकांक्षा को परदे में छिपाए रखने की भारतीय राजनेताओं की पुरानी चाल है। जब विदर्भ के चालीस विधायकों ने नागपुर में गडकरी के घर पर जाकर उनको मुख्यमंत्री बनाने का नारा लगाया तो मीडिया ने कहा, 'हमारी बात सही निकली। यह प्रदर्शन गडकरी ने स्वयं आयोजित कराया है। वे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।' मीडिया शायद यह भूल गया कि गडकरी और देवेन्द्र फड़णवीस दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साधना भट्टी में से तपकर निकले हैं और गडकरी देवेन्द्र के पिता स्व. गंगाधर राव को अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं।

मीडिया इस समय उलझन में ही चमत्कृत है कि भाजपा के माध्यम से राजनीतिज्ञों की ऐसी खेप सामने आ रही है जो युवा तो है ही पर जिस पर बाल्यकाल से संघ के संस्कारों की छाप रही है। जिन्होंने संघ में नि:स्वार्थ राष्ट्रभक्ति का मंत्र पाया है, जिनके लिए राजनीति सत्ता की सीढ़ी नहीं राष्ट्र निर्माण का माध्यम है, ये लोग धनी प्रभावशाली परिवारों के कंधों पर बैठकर राजनीति में उच्च स्थानों पर नहीं पहुंचे, बल्कि अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करके, उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रत्यक्ष समाज कार्य करके एक-एक सीढ़ी ऊपर उठे हैं।
निष्ठावान कार्यकर्ता
मीडिया की अपेक्षा के विपरीत जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद पर पहुंच गए तो सभी अखबारों और टी.वी. चैनलों ने उनकी जीवनयात्रा को खंगालना शुरू किया। वे यह देखकर चमत्कृत रह गए कि पिछले बारह वर्षों से जिस व्यक्ति पर मुस्लिम विरोधी छवि थोपते आ रहे थे, मुसलमानों का 'नरमेध रचाने वाला राक्षस' बता रहे थे, उसके मुख्यमंत्री काल में गुजरात के विकास को 'उद्योगपतियों की खैरात' बता रहे थे, वह व्यक्ति बचपन में स्टेशन पर चाय बेचकर परिवार का गुजारा करता रहा है, वह संघ का प्रचारक है और संघ की योजना से राजनीतिक क्षेत्र में वर्षों तक मंच के पीछे रहकर संगठन का कार्य करता रहा है। जो विवाह के मंडप से भागा राष्ट्र की सेवा के लिए। 'इस दीपावली पर लगभग साढ़े चार सौ मीडिया-कर्मियों को मोदी ने स्मरण दिलाया कि एक समय मैं आपके लिए कुर्सियां बिछाया करता था, आतुरता से आपके आगमन की प्रतीक्षा करता था।' मीडिया यह विश्वास नहीं कर पा रहा है कि भारत के प्रधानमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति स्वयं दिन में अठारह घंटे काम करता है, वह भी अपने लिए नहीं, राष्ट्र के लिए।

यह निष्ठा, यह लगन केवल नरेन्द्र मोदी तक सीमित नहीं है, भाजपा के जितने भी चेहरे इस समय उभर रहे हैं उन सबके जीवन में झांकने पर मीडिया को यही गुण सम्पदा दिखायी दे रही है। अब देखिए, हरियाणा में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बना तो उसने किसे चुना? मनोहरलाल खट्टर को। हरियाणा की चुनावी राजनीति अब तक जाट वोटों के ईद-गिर्द घूमती रही है। इस समय यह कल्पना ही नहीं हो सकती थी कि कोई गैर जाट मुख्यमंत्री बन सकता है। पर यह चमत्कार हुआ। भाजपा ने एक अनजाने पंजाबी चेहरे मनोहरलाल खट्टर को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया, जबकि भाजपा विधायक दल में कई कद्दावर चेहरे हैं। चार बार निर्वाचित रामविलास शर्मा हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष हैं और ब्राह्मण समाज के नेता माने जाते हैं। जाट नेताओं में कैप्टन अभिमन्यु हैं, हार्वर्ड से पढ़े, सेना से निवृत्त, भाजपा के श्रेष्ठ प्रवक्ता के रूप में सर्व परिचित। ओमप्रकाश धनकड़ हैं, वीरेन्द्र सिंह की पत्नी प्रेमलता हैं। इनमें से प्रत्येक नाम मुख्यमंत्री पद के लिए योग्य है, किंतु मुख्यमंत्री की कुर्सी पर तो कोई एक ही बैठ सकता था, फिर, हरियाणा को आज तक चली आ रही जाति और क्षेत्रवाद के आधार पर भेदभाव की राजनीति से बाहर निकालना था। इसलिए पहली बार चुने गए, सत्ता राजनीति से पूर्णतया अलिप्त मनोहरलाल खट्टर को सामने लाया गया। देश विभाजन के फलस्वरूप पंजाब से उजड़ा उनका परिवार रोहतक जिले के एक गांव में बसा। वहीं खट्टर का जन्म हुआ। बहुत कठिनाइयों में शिक्षा पाई, जीविका और उच्च शिक्षा की खोज में दिल्ली आए। अपने रिश्तेदारों के यहां आश्रय लिया। कैनवास बेचने की छोटी सी दुकान की। बी.ए., एल.एल.बी. पास किया, 1980 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक निकले। 1994 में हरियाणा में भाजपा के संगठन मंत्री बनाए गए। उन्हीं दिनों प्रभारी नरेन्द्र मोदी के सम्पर्क में आए। दोनों ने एक-दूसरे की संगठन क्षमता व कौशल को पहचाना, सादगी की प्रतिमूर्त्िा मनोहरलाल ने राजनीति की पेचीदगियों को जाना, जो काम सौंपा गया, उसे पूरा करके दिखाया, अपने को कभी सामने नहीं आने दिया। पद की दौड़ में वे कभी सम्मिलित नहीं हुए। इसीलिए हरियाणा की विखंडित राजनीति को राष्ट्रवाद के गोंद से जोड़ने की चुनौती उन्होंने स्वीकार की। जिन नामों को मुख्यमंत्री पद के लिए प्रतिस्पर्धी बताया जा रहा था उन सबको मंत्रिमंडल में सम्मिलित करके टीम भावना से हरियाणा के विकास का पथ प्रशस्त किया।

संघ के सांचे में ढले नेता
देवेन्द्र फड़णवीस बी.ए., एल.एल.बी. और एम.बी.ए. की शिक्षा प्राप्त कर केवल 22 वर्ष की उम्र में नागपुर शहर के महापौर बने। मनोहर जोशी के बाद वे पहले ब्राह्मण मुख्यमंत्री हैं जो महाराष्ट्र को प्राप्त हुए। शायद यही कहानी भाजपा के अधिकांश सांसदों व मंत्रियों की है। केन्द्रीय पर्यटन व संस्कृति मंत्री शरद येस्सो नाईक का जीवन-वृत्त केरल से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक दि वीक (2 नवम्बर, 2014) में छपा है। वीक ने नाईक की धार्मिक प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए लिखा कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सांचे में ढले हैं। प्रात: 5.30 बजे अपनी दिनचर्या आरंभ करते हैं। उन्होंने राजनीतिक दायित्व का निर्वाह करने के लिए एल.एल.बी. और एम.बी.ए. की पढ़ाई को अधूरा छोड़ दिया। उन्होंने सरपंच से अपनी राजनीतिक यात्रा आरंभ की। वे लगातार चार बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं और हर बार पहले से अधिक अंतर के साथ। अपने परिवार में सबसे बड़ा होने के कारण परिवार के भरण-पोषण के लिए रात में माण्डवी नदी से रेत निकालते और दिन में 15 किलोमीटर साइकिल चलाकर कॉलेज जाते।

'दि वीक' लिखता है कि उनकी जीवन-शैली बहुत सादी है, वे शुद्ध शाकाहारी हंै और घर में बना भोजन खाना पसंद करते हैं। उनके घर में विलासिता की कोई सुविधा नहीं है। संघ परंपरा का सच्चा साक्षात्कार होता है। पन्द्रह वर्ष पूर्व उन्हें खान मार्केट के सामने जो छोटा मकान आवंटित हुआ था, वे बड़े मकान के अधिकारी होते हुए भी उसी में रह रहे हैं। उनके एक सहयोगी आर्पेकर ने बताया कि उनके दरवाजे हरेक के लिए दिन-रात खुले हैं। उनके चुनाव क्षेत्र के नागरिक रात को साढ़े बारह बजे भी उन्हें मिल सकते हैं। 

संस्कारों से रचा- पगा नेतृत्व

ऐसे कुछ उदाहरण देने का अभिप्राय केवल इतना है कि भारतीय राजनीति में एक ऐसा नेतृत्व उभर रहा है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कारों में रचा-पगा है, जो जाति, क्षेत्र और पंथ की संकीर्ण निष्ठाओं से ऊपर उठकर आसेतु हिमाचल पूरे राष्ट्र के बारे में सोचता है। 2014 के चुनावों के बाद संघ 'रिमोट कंट्रोल' की मीडिया आरोपित छवि से बाहर निकलकर राजनीति के केन्द्र में आ गया है। मीडिया ने मान लिया है कि 2014 के सत्ता परिवर्तन में मोदी के नेतृत्व के पीछे संघ परिवार की विशाल कर्मशक्ति की मुख्य भूमिका है। जिस संघ को अब तक अछूत माना जाता था वह अब मीडिया में चर्चित विषय बन गया है। अब मीडिया बहस कर रहा है कि मोदी सरकार की नीतियों में संघ परिवार की क्या प्रतिक्रिया है। इकानॉमिक टाइम्स ने लिखा है कि संघ परिवार की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सरकार और संघ के बीच विचार विनिमय का तंत्र बनाया जा रहा है। कृषि, जी.एम. फसल, श्रम सुधार और खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के बारे में भारतीय मजदूर संघ व स्वदेशी जागरण मंच आदि संघ परिवार के घटकों की शंकाओं का निवारण करके केन्द्रीय मंत्रियों एवं इन संगठनों के नेताओं के बीच गहरा विचार मंथन हुआ। यह एक स्वस्थ प्रक्रिया है। संघ परिवार अपनी अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं के द्वारा जमीनी स्तर पर समाज से जुड़ा हुआ है अत: वह सरकार और समाज के बीच सम्पर्क पुल की भूमिका निभा रहा है। संघ अपनी इस भूमिका के बारे में पूरी तरह जागरूक है। संघ समझता है कि यह सत्ता परिवर्तन राष्ट्र निर्माण का एक अभूतपूर्व अवसर प्रदान करता है। पिछले 67 वर्षों में हम अपने स्वाधीनता आंदोलन की मुख्य प्रेरणाओं से भटक गए थे। हमने राष्ट्र जीवन के किसी भी क्षेत्र में उन प्रेरणाओं के अनुरूप रचना की कोई भी नई पगडंडियां तैयार नहीं कीं। यह अवसर है कि जब सरकार और समाज को मिलकर नई दिशाओं को खोजना है। मीडिया को समझना है कि संघ राष्ट्र के लिए समर्पित एक रचनात्मक संगठन प्रक्रिया है। उसे अपने लिए सत्ता की तनिक भी चाह नहीं है। संघ भी बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप अपने चिंतन और संगठन प्रक्रिया में परिवर्तन ला रहा है। संघ जानता है कि यदि इस समय भारतीय राजनीति के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन न हुआ तो फिर कभी नहीं हो पाएगा। इसलिए संघ राष्ट्र यज्ञ में अपनी पूरी पूंजी को झोंकने के लिए कृत संकल्प है। संघ की शक्ति वर्तमान दैनिक शाखा तंत्र और परिवार की संस्थाओं के संगठन से कहीं आगे पूरे समाज में बिखरी हुई है। संघ की 90 वर्ष लम्बी संगठन साधना में से जो विशाल स्वयंसेवक वर्ग खड़ा हुआ है उसकी पहली पीढ़ी तो शायद हमारे बीच नहीं है। पर बाद की पीढि़यों के भी अधिकांश स्वयंसेवक आयु अथवा अन्य बाधाओं के कारण दैनिक शाखा तंत्र का अंग नहीं है। पर वे जहां भी हैं संघ विचारधारा के प्रति पूरी तरह निष्ठावान हैं। इनमें से अनेक स्वयंसेवकों ने किसी न किसी क्षेत्र में लम्बा अनुभव अर्जित किया है। अपने-अपने विषय में विशेषज्ञता अर्जित की है। उनकी विशेषज्ञता का लाभ राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में हो सके इसके लिए उपयुक्त कार्य पद्धति की खोज संघ के भीतर चल रही है। संघ की संगठन प्रक्रिया अखबारी प्रचार के बजाए व्यक्तिगत सम्पर्क पर आधारित रही है। पहले प्रचारक स्वयं को पीछे रखकर शाखा पद्धति के माध्यम से गटनायक व गण प्रमुख से आगे विभाग प्रमुख, भाग प्रमुख, नगर कार्यवाह, प्रांत कार्यवाह तक का तंत्र खड़ा करता था जो सम्पर्क कार्य में जुटा रहता था। पर आज इन सब का पूरा भार प्रचारक वर्ग पर आ पड़ा है। उसकी सीमाएं हैं। प्रचारक की दृष्टि उन्हीं लोगों पर जा सकती है जो उनके सम्पर्क में आते हैं। अत: विशाल एवं क्षमतावान स्वयंसेवक वर्ग उसके सम्पर्क में आ पाता, संघ अपनी इस विशाल पूंजी को बटोरने के प्रयास में जुटा हुआ है। इसके लिए वह सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी सहारा ले रहा है।

पर्याप्त नहीं भावुक श्रद्धा
संघ अनुभव कर रहा है कि केवल भावुक श्रद्धा पर्याप्त नहीं है। राष्ट्र निर्माण के प्रत्येक क्षेत्र के लिए विशेषज्ञों की टीम खड़ी करना आवश्यक है। इस प्रकार के प्रकोष्ठों के माध्यम से शाखा तंत्र से अलग अनुभवी स्वयंसेवकों को एकत्र लाना संभव होगा। मीडिया इसमें सहायक हो सकता है। इसके लिए मीडिया को अपनी नकारात्मक भूमिका और वामपंथियों एवं नेहरूवादियों की मार्क्सवादी शब्दावली को छोड़कर भारतीय परंपरा में अवगाहन कर परंपरा प्रदत्त शब्दावली को अपनाना होगा और विज्ञान तथा टैकनालॉजी के प्रकाश में परंपरागत ज्ञान की युगानुकूल व्याख्या करनी होगी।

सरसंघचालक श्री मोहन राव भागवत के विजयादशमी संबोधन में यह प्रयास बहुत स्पष्ट था, किंतु इने-गिने संघ विरोधियों की पहल पर मीडिया ने उस भाषण में प्रस्तुत तात्विक बिन्दुओं पर चर्चा करने के बजाए अपनी पूरी शक्ति इस बात पर लगायी कि डीडी न्यूज ने उस भाषण का सीधा प्रसारण क्यों किया? क्या मीडिया सचमुच नहीं समझता कि विचारों के प्रसारण को प्रतिबंधित करना लोकतंत्र की भावना के सर्वथा विरुद्ध है। इस मंगलवार को मध्य प्रदेश भवन में श्री सुरेश सोनी और डॉ. कृष्ण गोपाल की उपस्थिति में भारतीय मजदूर संघ, किसान संघ व स्वदेशी जागरण मंच के नेताओं का चार केन्द्रीय मंत्रियों (राधा मोहन सिंह, पीयूष गोयल, नरेन्द्र सिंह तोमर व प्रकाश जावड़ेकर) के साथ राष्ट्रीय नीतियों के बारे में विचार-विमर्श को एक रचनात्मक प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।

साभार:पाञ्चजन्य  

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित