रविवार, 23 फ़रवरी 2014

देश को क्रान्ति नहीं, संक्रान्ति की आवश्यकता : सरसंघचालक

देश को क्रान्ति नहीं, संक्रान्ति की आवश्यकता : सरसंघचालक

भोपाल, 20 फरवरी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन राव भागवत ने कहा है कि देश को क्रान्ति की नहीं संक्रान्ति की आवश्यकता है. संक्रांति को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि इसका आशय समाज में सकारात्मक परिवर्तन से है. इसके लिये प्रबोधन के माध्यम से समाज का जागरण करना होगा. डा. भागवत ने सावधान करते हुए कहा कि क्रान्ति के माध्यम से कुछ समय के लिये आंशिक उथल-पुथल हो सकती हैकिंतु इसके साथ स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों से नहीं बचा जा सकता. डा. भागवत 20 फरवरी को एलएनसीटी परिसर में आयोजित संघ के मध्यक्षेत्र की तीन दिवसीय बैठक के अन्तर्गत विविध क्षेत्रों के स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे.

देश के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का उल्लेख करते हुए डा. भागवत ने कहा कि हमारे देश की राष्ट्रीय पहचान हिन्दू पहचान है. जो इस पहचान से दूर होगावह मतांतरण का शिकार होगा. उन्होंने कहा कि गौरवशाली अतीत का धनी हिन्दू समाज लंबे पराधीनताकाल के कारण आत्मविस्मृति का शिकार है. संघ इसका पुनर्स्मरण कराने के साथ हिंदुत्व के आधार पर समाज को एक सूत्र में पिरोना युगधर्म मानता है. इसीलिये वह इस कार्य में निरंतर जुटा है. उसकी लंबी साधना एवं तपस्या के कारण समाज की दृष्टि में भी संघ को अब सकारात्मक परिवर्तन के संवाहक के रूप में देखा जा रहा है. आवश्यकता इस बात की है कि तदनुरूप हम अपने आचरण एवं व्यवहार से निर्णायक बल प्राप्त करें.

सरसंघचालक ने कहा कि आज देश को मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता हैपरन्तु यह तभी संभव होगा जब हम सब व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह को दूर रखते हुये समाज में एक सकारात्मक वातावरण निर्मित करें. तीन सत्रों में चली इस बैठक में स्वयंसेवकों ने अपनी जिज्ञासायें भी रखींजिनका समाधान उन्होंने किया. पूर्व सरसंघचालक स्वर्गीय के.एस.सुदर्शन की स्मृति में 600 पृष्ठीय सुदर्शन स्मृति ग्रन्थ’ सहित 'स्वास्थ्य चेतना' पुस्तक का भी विमोचन उन्होंने किया. इस अवसर पर क्षेत्र संघचालक श्री श्रीकृष्ण माहेश्वरी एवं क्षेत्र कार्यवाह श्री माधव विद्वांस उनके साथ मंचासीन थे. बैठक में 48 संगठनों के 410 स्वयंसेवक उपस्थित थे.
Source: VSK-ENG      

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित