शनिवार, 13 अप्रैल 2013

परम पूज्यनीय सरसंघचालक मोहनरावजी भागवत का परमहंस आश्रम, इंदौर में व्याख्यान

  परम पूज्यनीय सरसंघचालक मोहनरावजी भागवत का परमहंस आश्रम, इंदौर  में व्याख्यान
राजस्थान पत्रिका के ११ अप्रैल के अंक में "बेशर्म शीर्ष "  नामक आलेख में लेखक श्री गुलाब कोठारी ने परम पूजनीय सरसंघचालक मोहन जी भागवत के इंदौर में दिए उध्बोधन को गलत रूप से उद्वत किया है.  परम पूजनीय सरसंघचालक जी के इंदौर में दिए उध्बोधन को आपके अध्ययन हेतु  दिया जा रहा है जिससे स्पष्ट हो जायेगा की  परम पूजनीय सरसंघचालक जी के वक्तव्य का संदर्भ क्या था और लेखक क्या लिख रहे है.

परम श्रद्धेय आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी परमानंद जी महाराज, श्रद्धेय स्वामी ओमानन्दजी महाराज, सामने वाले मंच पर बैठे सभी परम श्रद्धेय मान्यवर उपस्थित नागरिक सज्जन, माता बहनों।
सर्वे भवंतो सुखिन, सर्वे संतु निरायमया।
 ये केवल हमारी प्रार्थना नहीं है यह मानव मात्र की सनातन इच्छा है। मनुष्य यही चाहता है सामान्य मनुष्य भी यही चाहता है।  किसी की बुराई किसी की खराबी सोचने का मनुष्य का स्वभाव नहीं है। तो अगर किसी को पूछा जाए कि दुनिया के बारे में तुम्हारी इच्छा क्या है तो वह कहेगा कि सबका भला हो। किसी प्रकार का अमर्ष किसी के मन में ना रहे। किसी को कोई दुख का भागी न होना पड़े लेकिन ये हो कैसे? इच्छा तो है। इच्छा करने से नहीं होता है। होने की पद्धति क्या है? उसी श्लोक में है सर्वे भद्राणी पश्यंतु, सब एक दूसरे को अच्छी नजर अच्छी दृष्टि से देखें। और सबसे कठिन काम यही है। क्योंकि आखिर मनुष्य को स्वार्थ है। निस्वार्थी मनुष्य को भी अपनी देह की रक्षा का तो स्वार्थ है ही।.. और उस स्वार्थ को लेकर जो व्यापार शुरू हो जाते हैं वो रुकते नहीं चलते रहते हैं। और फिर भाई भाई भी बैरी हो जाते हैं , ये कहानियां चलती रहती हैं। आजकल दुनिया में दुख बढ़े हैं ऐसा बहुत लोग कहते हैं। ऐसा भी कहने वाले बहुत लोग हैं कि दुख बढ़े नहीं पहले से थे। अभी उजागर हो रहे हैं। संचार माध्यम बढ़े हैं जानकारी बहुत जल्दी मिलती है, बहुत ज्यादा मिलती है । सब सही नहीं मिलती लेकिन बहुत सही  मिलती होगी भी पता नहीं। पहले जानकारी भी नहीं मिलती होगी अभी जानकारी मिलती है इसलिए लगता है कि दुख बढ़े हैं।  लेकिन दुख बढ़े है या दुख उजागर हुए हैं, दुख और हैं ये दो शब्द हैं।  उसका निवारण कैसे हो ये चिंता सबको रहती है लेकिन उसके लिए प्रयास करने वाले थोड़े रहते हैं लगता सबको है लेंकिन ये लगता है कि दूसरों का दुख दूर होने के लिए मुझे कष्ट ना करना पड़े.. मुझे दुख ना झेलना पड़े। तो सामान्य मनुष्य ऐसा होता है कि अपना स्वार्थ मार नहीं खाता हो तो फिर वो लोक सेवा करने में लजाता नहीं ऐसे नर राक्षस बहुत कम रहते हैं कि जो अपना जीवन भी बिगाड़े और दूसरों का जीवन भी। सामान्य लोग यहीं सोचते हैं कि अपना घर ठीक रहे और दुनिया भी ठीक रहे। लेकिन दुनिया या तुम्हारा घर इसमे क्या ठीक रहे? ऐसा पूछेंगे तो सामान्य जन मन से अगर सही उत्तर देगा तो कहेगा कि मेरा घर ठीक रहे। इसलिए अपने घर की परवाह न करते हुए दुनिया का दुख दूर करने के लिए प्रयास करने वाले महापुरुषों की बच्चों को हम कहानियां तो जरुर बताते हैं लेकिन बच्चों को वैसा होने नहीं देते।
शिवाजी महाराज की कहानी, विवेकानंद की कहानी। सब कहानियां बताते हैं लेकिन अगर कोई शिवाजी महाराज बनने निकले अपने घर का बच्चा या विवेकानंद होने के लिए चले तो हम उसे रोकते हैं। हम कहते हैं पहले पढ़ाई  ठीक करो बाद में सब। परिवार का दायित्व है ना । तुमहे  इतना बड़ा इंजीनियर बनाया दस लाख रुपया खर्चा हो गया कहां से आएगा। तब हम हिसाब वगैरह बताने लगते हैं। .. हमारे मन में ये नहीं रहता कि वह ऐसा न बने लेकिन वो अपने स्वार्थ की कीमत पर ऐसा न बने.. और दुख का मूल इसी में है। अभी दुनिया में जो सिखाया जाता है  जो जीवन दृष्टि सिखाई जाती है वो ऐसी ही सिखाई जाती है।  सामान्यत: उसके मूल में विचार यही है। भारत में भी सिखाया जाता है दुनिया में भी सिखाया जाता है। २५०-३०० साल पहले भारत में भी यह नहीं सिखाया जाता था २५०-३०० साल पहले दुनिया में भी यह नहीं सिखाया जाता था। ये तीन साल पहले मनुष्य अपने विचारों के अहंकार में विचार करता गया करता गया। जो मैं कहता हूं वहीं सत्य है ऐसा मानता गया। अंहकार इतना बढ़ गया उसका कि उसने कहा कि अगर परमेश्वर भी है तो उसे मेरे पेस्ट्रिब में उपस्थित होने पड़ेगा तभी मानूंगा। ऐसी जब स्थिति आई तो फिर ये विचार निकला कि दुनिया क्या है.. भगवान वगैरह कुछ है नहीं ..आत्मा परमात्मा बेकार की बात है सब कुछ जड़ का खेल है। एक हिक्स बोसन है वो कणों को वस्तुमान प्रधान करता है दो कण आपस में टकराते हैं कुछ मिल जाते हैं कुछ बिछड़  जाते हैं उसमें से ऊर्जा भी उत्पन्न होती है उसमें से पदार्थ भी बनते हैं। सब कुछ ऐसा ही है। और इसका नियम.. नियम कुछ नहीं है इसका कुछ संबंध ही नहीं है. . . एक कण का दूसरे कण से कोई संबंध नहीं है इसलिए सृष्टि में किसी का किसी से संबंध नहीं है। लाखों वर्षों से चली है ये दुनिया तो कहते हैं कि वह संबंध की बात नहीं है स्वार्थ की बात है। ये एक सौदा है. . . थ्योरी ऑफ कांट्रेक्ट ..थ्योरी ऑफ सोशल कान्ट्रेक्ट. . .  पत्नी से पति का ये सौदा तय हुआ है इसको आप लोग विवाह संस्कार कहते  है ..कहते होंगे लेकिन वो एक सौदा है।  कि तुम मेरा घर संभालो मुझे सुख दो मैं तुम्हारे पेट पालन की व्यवस्था ठीक करुंगा और तुमको सुरक्षित रखूंगा।  और इसलिए वो इस पर चलता है जब तक पत्नी ऐसी है तब तक पति कान्ट्रेक्ट पूर्ति के लिए उसको रखता है यदि कान्ट्रेक्ट पूर्ण नहीं कर सकती उसको छोड़ दो। किसी कारण पति कान्ट्रेक्ट पूर्ण नहीं कर सकता तो उसको छोड़ दो । दूसरा.. दूसरा कान्ट्रेक्ट खोज लो .. ऐसे ही चलता है। सब बातों में सौदा है। अपने विनाश के भय के कारण दूसरों की रक्षा करना.. पर्यावरण को शुद्ध रखो नही तो क्या होगा? मनुष्य का विनाश हो जाएगा। मनुष्य का विनाश नहीं होता है तो फिर पर्यावरण.. .. तो करो कुछ भी। इसलिए एक तरफ वृक्षारोपण कार्यक्रम का रहना और दूसरी तरफ फैक्ट्री का मैला नदी में छोडऩा दोनो एक साथ चलता है। .. दोनों एक साथ चलता है। यहां का पर्यावरणवादी कल कहीं जाकर बैठ गया तो वहां वह विकासवादी हो जाता है और वहां विकासवादी नीचे उतरा तो पर्यावरणवादी हो जाता है। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ आंदोलन करते हैं। ये जो चमत्कार दिखते हैं स्रष्टि  में उसका कारण क्या है कि उसकी दृष्टि स्वार्थ की है। सर्वे भद्राणी पश्यंतु क्यों .. ..  क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ ना तो बहुत संहार होगा .. ..  डर के मारे।अब डर ज्यादा चलता नहीं। इतना बड़ा सर्व समर्थ कम्यूनिस्ट रशिया था . .. कितने साल तक उसका डर चला? उसके अपने देश में उसका ७० साल तक चला उसके बाद लोगों ने डरना छोड़ दिया। मरी हुयी  मुर्गी आग पर क्यों डाली जाती है? मरी हुई मुर्गी को डरने का कोई कारण नहीं.. .. मार खा-खाकर जब लोगों का जीवन मृतवत हो जाता है तो वो डरना छोड़ देते हैं। और इसलिए वो जो भय-पूर्वक जो वैभव का दृश्य उत्पन्न किया जाता है वो टिकता नहीं है. .. . और जिसने कभी अन्न का स्वाद नहीं लिया उसको खाने को नहीं मिला तो उसको ज्यादा दुख नहीं होता है। जो पंच पकवानों का भोजन करने का आदि है उसको अगर भूखा एक बार भी रहना पड़ा तो उसको बहुत खलता है। मनुष्य का सुख का स्वाद मिला है इसलिए उसे दुख सहन नहीं  होता। जिनको पहले की स्वतंत्रता की आदत है या पहले के वैभव की आदत है उनको बाद की ये निराशा और  खलती है। ऐसा चलता है।
तीन सौ साल के पहले सारी दुनिया पर जिन विचारों का प्रभाव था उनका मूल भारत में है। .. उनका मूल भारत में है। और भारत के विचार क्या कहते हैं इस मामले में? वो कहते हैं ऐसा नहीं भाई ये दुनिया संबंधों पर आधारित है। अलग नहीं है दिखता अलग है सब .. .. लेकिन सब एक है बल्कि यूं कहो कि एक ही अनेक रूपों में प्रकट हुआ है इसलिए सब एक-दूसरे से जुड़ा है। विश्व में कहीं पर घटित होने वाली छोटी-सी अर्थहीन घटना भी सारे विश्व के व्यापार पर कुछ न कुछ परिणाम करती है। अच्छी बातें हो गई अच्छे परिणाम होंगे, नही हुई तो नहीं होंगे। तुम्हारा विनाश नहीं होगा किसी विनाश हो रहा है वो तुम्हारा ही विनाश है। क्योंकि तुम उसी से जुड़े हो.. .. तुम उसी के अंग हो। मनुष्यों तुम सृष्टि के बाहर नहीं हो तुम सृष्टि के अंग हो। तुमको ये जो विकार वासना का घेरा पड़ा है और तुम जो एक भ्रम में पड़े हो उसके कारण तुमको ध्यान में नहीं आता लेकिन थोड़े जाग जाओ, अनुभव करो। ये अनुभव तुम कर लोगे तो दुख तुमको स्पर्श नहीं करेगा। .. .. और इसलिए सुख के लिए मनुष्य का सारा जीवन है पूरी सृष्टि सुख के लिए भागती है। कभी न समाप्त होने वाला, कभी जिसको आदमी उब नहीं सकता ऐसा शाश्वत चिरंतन सुख प्राप्त करना है को वो करना पड़ेगा इसलिए तुम्हारा जीवन लक्ष्य है सर्वे भद्राणी पश्यंतु ये तुम्हारा अनुभव होना चाहिए कि तुम सबको अपना मानकर देखो। और इसके ग्रंथ बाद में आए लोगों ने जीकर देखा और बताया । ..........
काशी की गंगा रामेश्वरम को ले जाते हुए एकनाथ महाराज को दोपहर की तपती धूप की आग में तड़पता एक गधा मिला .. .. वो मरने वाला था .. लोग जमा हो गए थे .. अरे पानी पिलाओं .. पानी है नहीं महाराज अकाल है इसलिए तो ये तड़प रहा है हम भी प्यासे हैं क्या करें? दया आती है लेकिन देने के लिए पानी नहीं..  कहां से लाए? एकनाथ महाराज ने जो गंगा लाई थी वो गंगा उसके मुंह में उड़ेल दी। लोगों ने कहा .. ..अरे ये गंगा तो रामेश्वरम .. तो वे बोले इसके अंदर कौन है? ये तो सिखाया न हमने घट-घट में राम हैं इसके अंदर भी वही रामेश्वर हैं मैं रामेश्वर पर ही ये गंगा डाल रहा हूं। सबमें एक.. .. .. सबमे स्वंय को देखो अनुभव करो. . .जो एकता का सूत्र है इससे जुड़ो। इसलिए योग का पहला .. .. पतंजलि योग का दूसरा सूत्र योगानुशासनम प्रारंभ होता है ऐसा कहने के बाद योगस्य चित्त वृत्ति विरोध:। ये सब विकार क्रिया प्रतिक्रिया के जाल में अपना चित्त फंसा है वैसी ही विचार करने की आदत बनी है उससे बाहर निकलो पहले। इसको अनुभव करना ये वास्तविक शिक्षा है। शिक्षा क्या है? और शिक्षा किसलिए है?     जैसी दृष्टि बनती है वैसी ही शिक्षा बनती है। अगर दृष्टि यहय है कि सबकुछ अलग है.. .. अलग है तो सबको फिर क्या चाहिए सुख और सब अलग है। इसका मतलब है कि स्पर्धा है कॉम्पिटिशन है। क्योंकि मुझे मिलने से .. .. आप अलग हैं तो आपको अलग से चाहिए। और चाहिए वह बाहर है और बाहर का फिर पुरता नहीं है। आग में घी डालो तो आग भडक़ती है। न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्, धर्मे त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो:। नित्यो धर्म: सुखदु:खे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:।। तो उसको पाना है तो पाना ही है . .. . अपने ही लिए पाना है ज्यादा से ज्यादा पाना है। बने तो सबकुछ पाना है। सबकुछ पाना है इसलिए दूसरों को ना मिले। दूसरों को इतना ही मिवले जिससे वे जीवित रहकर मेरी सेवा कर सकें। मैं सर्वप्रभु बनंू।  दुनिया में अस्तित्व के लिए संघर्ष है स्र्टगल फॉर एक्जिस्टेंस है। उसमे जीतना है तो बलशाली बनना पड़ेगा सरवाइवल ऑफ दि फिटेस्ट .. .. .. अगर यदि ऐसी दृष्टि है तो हम दूसरों क्या सिखाएंगे? जैसे तैसे कमाओ जैसे-तैसे पाओ.. .. तुम्हारे कमाने में तुम्हारे पाने में किसी के गले पर किसी के पेट पर तुम्हारा पैर पड़ता है चिंता मत करो दौड़ों.. .. दौड़ते रहो । उसमें दुख है उसमें  कष्टता है।  उसका हम अनुभव करते हैं, लेकिन यदि दृष्टि यह है कि वह भी मैं ही हूं  .. .. तो फिर मां कैसे कहती है ? .. घर कोई मीठा पदार्थ बनता है बच्चों को बहुत अच्छा लगता है . .. .. अब खत्म होने को आया तो बच्चों को भान आता है अरे एक ही रसगुल्ला बांकी है तो बड़ा बच्चा कहता है कि अरे माताजी आपका ही भोजन बाकी है आपके लिए कुछ नहीं है तो मां कहती है नहीं तुम खा लो। तुमने खाया तो मेरा पेट भर गया। अब तुमने खाया तो मेरा पेट भर गया ये कहने के लिए अपनी जड़ भौतिकीय दृष्टि से साबित हो जाती है . . ये  तर्क के विरुद्ध है मेरा पेट अलग है भाई .. .. मैने खाया तो मेरा पेट भरा तुम्हारा कैसे भरा? लेकिन भरता है ये अनुभूति है। जिसको हम अपना मानते हैं उसके सुख से अपना सुख बढ़ता है ये अमुभूति है। इसको बढ़ाओ आप जिसको अपना मानते हैं वो अपने को सुख देते हैं। जिसको हम अपना नहीं मानते वो दुखदायी हो सकता है। तुम ऐसा करो तुम सबको अपना मानो तो तुम्हारे लिए कुछ दुखदायी होगा ही नहीं। अपनत्व का दायरा बढ़ाओ लेकिन बढ़ाओ यानी कैसे भाई? इसको अनुभव करना पड़ता है और अनुभव करने के लिए जो एक है उससे जुडऩा पड़ता है। जुडऩे को कहते हैं योग।
 अपने चित्तवृत्ति के विरोधों के द्वारा अभ्यासपूर्वक धीरे-धीरे उससे समझना, जुडऩा .. ..  जुडक़र उसके साथ ही रहने का अभ्यास करना और उसके साथ ही रहना। ऐसा व्यक्ति जो जुडऩे का अभ्यास करता है थोड़ा बहुत जुड़ता है उसको ध्यान में आता है कि सब मेरा ही है सब मैं ही हूं तो फिर कौनसा कर्म कैसे करना? इसमें वो कुशल बन जाता है इसलिए गीता में कहा गया है कि योग कर्मसु कौशलम। वो अपना जीवन भी सुखमय बनाता है लोगों का जीवन भी सुखमय बनाता है। अपने विकास से सारी दुनिया का विकास करता है सारी दुनिया के विकास में अपना विकास देखता है। दुनिया में कोई संघर्ष नहीं रहता दुनिया में कोई तृष्णा नहीं रही । दुनिया के दुख का परिहार हो जाता है। अपने यहां भारत में से जितनी सारी विचारधाराएं निकली हैं उन्होंने सबने यही बताया है शब्द अलग हैं। एकता के सूत्र को क्या मानना उसका वर्णन अलग-अलग है लेकिन बात यही बताई गई है। इसलिए अध्यात्मिक जो तत्व ज्ञान है उसका निवेदन हर एक का अलग-अलग लगता है लेकिन इस बारे में जीवन कैसा जीना इसके बारे में सबका उपदेश लगभग समान है . .. बिलकुल समान है। वो मनुष्य का सुखी जीवन है ऐसा जीवन हमारे देश के नेतृत्व में सारी दुनिया मे साकार किया था।
३००० वर्ष तक ऐसी ही दुनिया चली। बाद में फिर मनुष्य का मन संकुचित हो गया क्या हो गया या सृष्टि का चक्र व क्रम ऐसे ही चलता है उसका भी ये नियम है दिन के बाद रात व रात के बाद दिन ऐसा ही चलता है ऐसा मानो लेकिन हुआ ये कि लोग कट्टर बन गए और ये सारी विचार प्रणाली थी वो धुंधली पड़ गई और एक के बाद एक लोग दुखी होते गए। भारत में हर चार साल बाद दुनिया के प्राचीन परंपरा के लोग इकट्ठा आते हैं। इतिहास ये जो न्यात इतिहास है उसके पहले के .. .. और वो लोग यह कहते हैं कि हमारी जो मान्यता हैं उस परंपरा से चलती आई है  जिनको लेकर हम आज जीने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन जी नहीं पा रहे हैं हम पर अत्याचार है हम पर दबाव है। उन परंपराओं और विचारों को आज भी जब हम देखते हैं तो हमको लगता है कि आज भी एक देश है  जिसमे ंआज भी उन मूल्यों के आधार पर चलने वाला जीवन हम देख सकते हैं और वो देश हिंदुस्तान है। ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान ही हमारा रैन बसेरा है अभी अतिहास की रात्री चल रही है तो हम विश्राम के लिए कहां जाए , आश्रय के लिए कहां जाए तो हम हिंदुस्तान के पास जाए क्योंकि यह अपना है। दुनियाभर में एक समय था सब लोग ऐसा सोचते थे इसको सोचना बंद कर दिया तो सब प्रकार की समस्याएं मेरे जीवन में खड़ी हुई मेरे परिवार के जीवन में खड़ी हुई मेरे देश के जीवन में खड़ी हो गई मेरी दुनिया के जीवन में खड़ी हो गई। उनसे मुक्ति पाना है तो दूसरा उपाय नहीं शुरू यहीं से करना पड़ेगा। शिक्षा बच्चों को देनी है तो इस दृष्टि के साथ देनी पड़ेगी। नहीं तो शिक्षा का प्रयोजन क्या है? आहार निद्रा भय मैथुन च.. पशु के जैसा .. पशु संबंधों को समझता है .. एक मर्यादित मात्रा में समझता है। इसलिए  वो पशु का मानव नहीं बनता कभी भी  या पशु का कोई जड़ या राक्षस ऐसा भी नहीं बनता उसका उन्नयन भी नहीं होता आद्यपाद भी नहीं होता, जैसे भगवान ने जन्म दिया वैसे वो जीता है। एक दो अपवाद छोड़ दिए तो आत्महत्या करने वाले पशु नहीं मिलते। पशु आत्महत्या कभी करते नहीं क्योंकि उनके जीवन में निराशा नहीं है। उनको भूख लगती है तो उनको खाना चाहिए सामने हैं तो खा लेंगे, दूसरे की थाली में है तो दबोच लेंगे, पेट भर गया सामने खाना पड़ा है देखेंगे भी नहीं। दूसरा आकर ले जाएगा उससे झगड़ा नहीं करेंगे.. .. मेरा पेट भर गया है। फिर से भूख लगेगी तो खोजेंगे। बैल घास खाता है कभी आपने सुना कि बैल कल के लिए गट्ठर बांधकर ले गया? ऐसा नहीं होता, ये मानव करता है। ये बुद्धि है, गर्त मे ले जाने वाली बुद्धि हिमालय के शिखर पर खड़ा करने वाली बुद्धि, दोनों मानव के पास है। बुद्धि एक ही है  दृष्टि अलग-अलग हो गई। नर का पशु भी बन सकता है नर का नारायण भी बन सकता है। शिक्षा क्या देनी है? नारायण बनने की शिक्षा देनी है। जीवन का विकास हो तो शिक्षा है ना? दो-तीन बातें इधर-उधर की कर सके, कला कौशल दिखा सके ये तो सर्कस के पशु भी ट्रेनिंग के बाद करते हैं, इसमें कौन सी बड़ी बात है?
 रामकृष्ण परमहंस की कहानी आपने सुनी होगी कि उनके पास एरक सज्जन आए, पूछा उन्होंने कि सुना है कि आप बहुत पहुंचे हुए व्यक्ति हैं और बहुत दिनों से साधना में रहे हैं। क्या मिला आपको साधना से कौनसी शक्ति है आपके पास? उन्होंने कहा मैं तो बताउंगा ही लेकिन आप भी साधना करने वाले हैं आपको क्या मिला? जानते हैं आप १२ साल साधना करके पानी पर चलने की विद्या मैने कमाई। देखो सामने दत्रिणेश्वर गंगा है तो चले गए गंगा पर चलकर, पानी पर चलकर उधर गए और उधर से चलकर वापस आ गए। बोले देखों ये सिद्धि मैने प्राप्त की, तुमने क्या किया? तो रामकृष्ण परमहंस हंसने लगे। तो वे बोले हसते क्यों हो? महाराज गंगा पर जो इधर से उस पार जाना है ना वो हम नौका वाले को दो पैसे देकर कर लेंगे। आपने १२ साल इसमें गुजारे। चार चमत्कार करना, चार पैसे कमाना चार सत्ता के पद पाना ये तो कोई भी कर लेगा। राकेट में बैठकर चंद्रमा पर केवल आदमी ही जाता है क्या, लाइका नाम की कुत्ती भी जाती है। रशिया भेजता है उसको, जाती है वो। ये भी ठीक है भौतिक विकास का आयाम है उसकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। आखिर मनुष्य को भी पेट भरना है मनुष्य को भी आगे जाना है लेकिन वो अंतिम नहीं है इसके परे जाना है। इसको सीखो, इसको भी सीखो क्योंकि ये भी साधन है मृत्यु पर विजय पाने का। लेकिन आगे भी  सीखो और अमृत प्राप्त करो। अपनी परंपरा का यही आदेश है किसी सिरे पर मत जाओ.. .. एक्सट्रीमिज्म मना है, मध्यम मार्ग धर्म है। अविद्याम मृत्यु तीर्तत्व विद्याम अमृतत्व , दोनों प्राप्त करो। जड़वादी कहते हैं कि यहां रुक जाओ इसके आगे कुछ नहीं है, क्योंकि हमको दिखता है। अरे तुमको दिखता नहीं ऐसी बहुत बातें हैं लेकिन हैं। तुम मानों ना मानो वो हैं। ये कोई नई बात नहीं, अहंकार होता है। शिक्षा के जरिए ही ये अंहकार कम होगा। जीवन को देखने की दृष्टि बदले, स्वयं के लिए जीने की खुदगर्जी मिटे, अपने देश में तो कितनी आवश्यकता है। अपने देश में अगर सब में संवेदना उत्पन्न हो जाए सब में कि ये सब मेरे हैं। बड़े छोटे, दूर के पासे के सब मेरे हैं, इनके सुख में मेरा सुख है, मेरे सुख के लिए ये नहीं है। इनके सुख की व्यवस्था करने के लिए मैं हूं। ये अगर भाव आ जाए, जैसा पहले कभी था और तब जो प्रवासी दुनिया से भारत में आए उन्होनें लिख रखा कि यहां दरवाजे का केवल कुंडा लगाकर सालो साल यात्रा पर निकल जाते हैं घर की रस्सी का टुकड़ा भी कहीं जाता नहीं। जामुन बैर बेचते हैं जैसे रास्ते पर ढ़ेर बनाकर रखते हैं वैसे चद्दर पर रखकर हीरे मोती बेचे जाते हैं और एक हीरा, एख मोती चोरी नहीं जाता। ऐसे यहां के लोग हैं, यहां भिखारी नहीं, चोर नहीं।  ये लिखकर रखा है ये कोई कल्पना की उड़ान नहीं है। ये आत्म अभिमान नहीं है ये यात्रियों ने लिखकर कर रखा है। ऐसा जब था तो हमारा देश ऐसा था आज ऐसा क्यों हैं? आज ऐसा इसलिए है कि आज हमने उस दृष्टि को छोड़ दिया। दृष्टि को छोड़दिया तो वृत्ति बदल गई, वृत्ति बदल गई तो संस्कार बदल गए, संस्कार बदल गए तो फिर बाकी सारी बातें काम नहीं करती। मनुष्य जो स्वयं देखता है स्वयं निर्णय करता है उसका परिणाम होता है। वैसे तो मनुष्य स्वतंत्र है ही। कौन दबा सकता है ? कोई नहीं दबा सकता, जैसा चाहता है वैसा करता है। चाहता ठीक हो तो ठीक है नहीं तो एक ही बात के बारे में अलग विचार करने वाले लोग रहते हैं। शराब बंदी की सभा में गए, देहात में, शराबियों का ही गांव था, वहां बहुत जोर से बताया कि शराब पीना खराब है और अधिक  जोर से उनके ध्यान में आए इसके लिए एक प्रयोग किया। एर गिलास में कीड़े डाल दिए और फिर शराब डाल दी कीड़े तड़प-तड़पकर मर गए। देेखा क्या होता है शराब पीने से? एक शराबी उठकर खड़ा हो गए और कहने लगा कि हम शराब पीएंगे तो हमारे पेट के कीड़े भी ऐसे ही तड़प-तड़पकर मर जाएंगे। तो आप सिखाओ कुछ भी, क्या सीखना है ये तो तय आदमी को करना है। कोई ये सिखाने वाला कॉलेज या स्कूल नहीं है कि चोरी करो, भ्रष्टाचार करो, बलात्कार करो, है क्या कोई? नहीं है, फिर क्यों ये बढ़ता है? सभी स्कूल कॉलेज यही सिखाते हैं कि सदा सत्य बोलो, कानू पर चलो, ये करना खराब है ये करना अच्छा है, सब सिखाते हैं पर मनुष्य वही सीखता है जो उसको सीखना है, मनुष्य वही देखता है जो उसको देखना है। मनुष्य क्या देखे क्या सीखे इसकी उसकी वृत्ति सत्प्रवृत्ति बनाने वाली बात, संस्कारो की, वो इस योग से निकलती है। क्योंकि योग भान देता है कि हम सब एक है जुड़े हैं, युक्त हैं। और इसलिए सारी दुनिया का हित ये मेरा कत्र्तव्य है, सारी दुनिया का दुख मेरी समस्या है। हां मेरा दायरा कम अधिक है। आज इस योग विश्वविद्यालय का लोकार्पण कहा है लोकार्पण यानी क्या ? आप लोग जो समझेंगे वो है लेकिन मैं अर्थ क्या करता हूं उसका, ये योग की विद्या विश्व में फैले इसलिए ये पवित्र कार्य अपने भी हाथ में आया है.. .. अपने भी हाथ में आया है। इस कार्य के लिए जो मदद कर सकते हैं वो करनी चाहिए और उसमें एक बात सब कर सकते हैं वो करनी ही चाहिए। वो ये है कि हम भी अपना आचरण योगयुक्त बनावें। अभी आपको आसन पता नही होंगे ठीक है बाद मे सिखिएगा लेकिन ये तो शुरू ही कर सकते हो ना आप । मेरा जितना चलता है अधिकार, मेरा जितना कत्र्तव्य का दायरा है, मेरे कत्र्तव्य के दायरे में जो-जो कुछ है, उन सबको मैं सुखी रखूंगा, एक छोटा पौधा जो मेरे आंगन में है उसको पानी नियमित मिलेगा, कुत्ता हमारे आंगन में सोता है उसको रोटी रोज मिलेगी, मेरे अहाते में झोपड़ी है उसके बच्चों को विद्यालय में जाने के लिए पर्याप्त अर्थ सहाय नहीं हैं, मैं करुंगा, मैं जुटाउंगा। आपकी संवेदना का और उसके सामथ्र्य का, आपके अधिकार का दायरा जहां तक है, वहां आप सब से जुड़ जाओं, ये मेरे अपने हैं, ये मेरा परिवार है, ये मेरे आत्मीय हैं। ये करना हम शुरू कर देंगे और साथ-साथ अपने इस इंदौर शहर में यह योग विश्वविद्यालय है उसको बढ़ाना है उसके लिए भी जो करना है वो करेंगे। उससे .ये विश्वविद्यालय तो बढ़ेगा ही उसके साथ-साथ आप कल्पना करें कि इंदौर शहर से प्रारंभ होकर सारे देश में वातावरण कैसे बनेगा? योग का उद्देश्य भगवान की इच्छा से संपूर्ण जड़ चेतन सृष्टि में व्यक्ति, समूह, प्रकृति में अर्थ काम के व्यापारों के साथ मोक्ष लेकर जीवन में, ये परिवर्तन लाने का उद्देश्य है। ये भगवान की इच्छा है। वो तो सब पर प्रेम करता है, क्योंकि उसके सब अपने हैं, उसी से निकले हैं और इसलिए वो चाहता है कि सब सुखी रहें। लेकिन उसने एक स्वतंत्रता उसने ले रखी है वो हमने ही ली है, हमने ली है इसलिए हम अलग हुए नहीं तो हम जुड़े रहते। हमने कहा हमारा खेल हमको खेलना है भाई। तो ठीक है तुम खेलो एक मर्यादा में तुम को पूरी स्वतंतत्रता है। मैं दुनिया गेता हूं उसको चलाओ, उसको तुम बिगाड़ो कुछ भी करो। मैं इतना आश्वासन देता हूं कि बिगाड़ोगे तो मैं आकर सब ठीक करुंगा।  यदा यदा ही धर्मस्य गलानी भवति भारत:, अभ्युथानम अधर्मस्य, तदात्मानम सृजानमहं। लेकिन वो बनाना-बिगाडऩा या बनाए रखना ये तुम्हारा काम है तुम करो। तुम करो तुम भोगो। तुम्हारा कर्म है तुम भोगो। प्रेम से बुलाओगे, आर्तता से बुलाओगे मैं दौडूंगा, उद्धार करुंगा तुम्हारा। लेकिन वो पुकार भी तुम्हारी होनी चाहिए। और ये पुकार वैसी होती है, ये पुकार जैसे शब्दों से बाहर निकलती है वैसे संवेदना से बाहर निकलती है, कृति से निकलती है। वो कृति हम प्रारंभ कर दें। इस विश्वविद्यालय को लेकर भी, और अपने संवेदना व अधिकार क्षेत्र को लेकर भी। तो यहां से प्रारंभ होकर पूरे भारत में, प्रत्येक भारतवासी योगयुक्त बनकर नई सुखी, सुंदर दुनिया रचने के लिए सारी दुनिया का पथ प्रदर्शक भारत खड़ा करेगा। योगेश्वर कृष्ण, योग चक्रवर्ती तथागत बुद्ध इनको अवतार इसलिए कहते हैं इसके आधार पर उन्होंने बिगड़ रहा था उसको ठीक बना दिया। आगे हजारों साल तक अच्छा रहेगा। वो आकर अच्छा करके जाते हैं हम लोग फिर बिगाड़ते हैं। अब अच्छा करने की जरुरत है लेकिन अभी तो भगवान ने बताया कि देखो भाई अनेक युग में आता हूं, एक-एक युग में एक-एक शक्ति होती है। कलियुग में संघ की शक्ति है यानी समूह की शक्ति है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नहीं कह रहा हूं। संघ भी एक अलग संगठन है। सारे समाज को संगठित करना। भारत को फिर से दुनिया का पथ प्रदर्शक बनकर खड़ा रहना पड़ेगा, क्योंकि सनातन धर्म का उत्थान हो यह भगवान की इच्छा है, ऐसा योगी अरविंद ने कह रखा है उत्तर पारा के भाषण में। उनकी वाणी सत्य करने का दायित्व हमारा है। आज ये जो लोकार्पण हुआ है, तो ये हमारा दायित्व बढ़ाने वाला लोकार्पण है। हमको प्रॉपर्टी नहीं मिली है, हमको एस्टेट्स नहीं मिली है, हमको क्रेडिट नहीं मिला है , हमको एक रिस्पांसबिलिटी मिली है। जिसको हमको पूर्ण करना है। और वो बाहर इस विश्वविद्यालय को मदद करने जैसा है वैसा अपने जीवन में अपने जीवन में अपने संवेदना और प्रभाव क्षेत्र के अघिकार के दायरे में हम योगयुक्त आचरण करेंगे यह भी है। दोनों दायित्व ठीक से निभाने की बुद्धि व शक्ति मेरे सहित हम सबको प्रभु प्रदान करे इस प्रार्थना और मंगलकामना के साथ मेरे चार शब्द धन्यवाद देता हूं।


 

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित