मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

चीन तक संघर्ष की आवाज पहुंचाने का राष्ट्रीय अनुष्ठान



भारत-तिब्बत सहयोग मंच ने शुरू  तवांग यात्राकी

चीन तक संघर्ष की आवाज पहुंचाने का राष्ट्रीय अनुष्ठान

भारत-तिब्बत सहयोग मंच ने इस वर्ष से तवांग यात्रा की शुरुआत की है। यात्रा का उद्देश्य तिब्बत की आजादी के संघर्ष तथा भारतभूमि को मुक्त कराने के लिए हो रहे संघर्ष की आवाज चीन के कानों तक पहुंचाना है।
पहली तवांग यात्रा विगत 10 अक्तूबर को गुवाहाटी पहुंची। देशभर से आये यात्री भुरलुमुख में नारायणनगर के हरियाणा भवन से चलकर विष्णु निर्मला भवन पहुंचे। यात्रा में शिलांग से अनेक तिब्बती नौजवान भी शामिल हुये। यात्रियों को सम्बोधित करते हुये रा.स्व.संघ के अ.भा.कार्यकारी मंडल के सदस्य तथा भारत तिब्बत सहयोग मंच के संरक्षक श्री इन्द्रेश कुमार ने कहा कि अब यह यात्रा प्रतिवर्ष आयोजित होगी। उन्होंने कहा कि चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत पर आक्रमण किया था। चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने के उपरान्त उसका दूसरा शिकार भारत हुआ। तिब्बत अभी तक अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा है और भारत के लोग भी चीन के कब्जे में गई भारतभूमि को मुक्त कराने के लिये संघर्षशील हैं। भारत और तिब्बत के इस संयुक्त संकल्प को चीन सरकार के कानों तक पहुंचाने के लिये तवांग यात्रा एक नया राष्ट्रीय अनुष्ठान है।
श्री इन्द्रेश कुमार ने कहा कि यह यात्रा 1962 में देश की रक्षा करते हुए शहीद हुए शहीदों की याद में तवांग में बने शहीद स्मारक पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुये भारत-तिब्बत के सीमांत बुमला तक जायेगी। उन्होंने कहा कि आज जब चीन भारत की घेराबन्दी करने में लगा हुआ है तो भी भारत सरकार उसी पुरानी तुष्टीकरण की नीति पर चल रही है, जिस पर चलकर जवाहर लाल नेहरू देश का अपमान करा चुके हैं। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी नीति राष्ट्रीय हितों के अनुकूल बनानी चाहिये और चीन के विस्तारवादी इरादों से डरे हुये देशों को आश्वासन देना चाहिये कि वह संकट के काल में उनके साथ ही नहीं होगा, बल्कि उनकी रक्षा करने में सक्षम भी है।
भारत-तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि यह यात्रा इस बात की प्रतीक है कि अब भारत की जनता तिब्बत की सीमा पर खड़े होकर तिब्बती स्वतंत्रता संग्राम में हर संभव सहायता का वचन देती है। साथ ही चीन को यह संदेश देती है कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है।
गुवाहाटी से यात्रा तेजपुर पहुंची, जहां मंच के स्थानीय संयोजक श्री जय प्रकाश अग्रवाल के नेतृत्व में यात्रा का स्वागत किया गया। 11 अक्तूबर को 1962 के युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों का सम्मान श्री इन्द्रेश कुमार ने किया। तेजपुर में ही यात्रियों का स्वागत करने के लिये तिब्बती प्रतिभागी पहुंचे हुये थे। अरुणाचल प्रदेश के प्रवेश द्वार भालुकपौंग पर निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रतिनिधियों ने यात्रियों का स्वागत किया। टेंगा में अरुणाचल सरकार के पूर्व मंत्री श्री नरेश गलो ने यात्रा का स्वागत किया। रात्रि को यात्रा बोमडीला पहुंची, यहां सबने विश्राम किया। दूसरे दिन यात्री बोमडीला से तवांग के लिये रवाना हुये। तवांग पहुंचने पर स्थानीय लोगों ने यात्रियों का स्वागत किया गया।
13 अक्तूबर की सुबह यात्रा भारत-तिब्बत के सीमान्त बुमला की ओर रवाना हुई। पूरे दल में चालीस भारतीयों के अलावा 30 तिब्बती भी शामिल थे। बुमला में सेना के जवानों ने यात्रियों का स्वागत किया। श्री इन्द्रेश कुमार ने सीमा पर गंगाजल छिड़का और वहां की मिट्टी से तिलक किया। तिब्बती यात्रियों ने सीमा पर पूजा-अर्चना की। यहां का दृश्य अत्यन्त भावुक था। सामने तिब्बती क्षेत्र में पर्वत शिखर पर चट्टानों से बना शिवलिंग दिखाई दे रहा था। बुमला में भारतमाता की जय और तिब्बत की आजादी का संकल्प लेते हुए यात्री तवांग की ओर रवाना हुये। तवांग पहुंचकर 1962 के शहीदों की याद में बने शहीद स्मारक पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुये बौद्ध मठ में गुरु रिम्पोछे के दर्शन किये। 14 अक्तूबर को प्रात तवांग चौक में स्थानीय लोगों की ओर से सभी को भावभीनी विदाई दी गई। 
source:http://panchjanya.com

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित