मंगलवार, 11 सितंबर 2012

प.पू. सरसंघचालक मा. मोहनजी भागवत का उदबोधन

Source: VSK- GUJRAT      Date: 9/11/2012 12:22:10 PM
$img_titleवडोदरा (गुजरात), दि. ८ सितंबर २०१२ : बौद्धिक वर्ग व सभा में अंतर है| सभा में श्रोता को सुनने का बंधन नहीं होता| मन में आया तब सुना| बौद्धिक वर्ग में ऐसा नहीं है| बौद्धिक वर्ग में आकर, पूरा समय पंक्तिबद्ध होकर बैठते हैं, सुनते हैं| और केवल सुनते नहीं हैं, वरन उसमें बताए गये विषय को आचरण में उतारने का, व्यवहार में लाने का प्रयत्न करते हैं|

संघ का एक ही विषय है- राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाना| आज भारत का व्यक्ति कितना सुरक्षित है... जितना भारत सुरक्षित है| मै ठीक रहूँ, मेरा परिवार ठीक रहे| परंतु चित्र ऐसा नहीं है| व्यक्ति सुरक्षित नहीं है| समाज सुरक्षित नहीं है| बेरोजगारी है| शिक्षा का अभाव है| किस तरह पढ- लिख लिए, तो नौकरी नहीं है| क्यों नहीं है? उसके लिए मै तो जिम्मेदार नहीं हूँ| परंतु देश की स्थिती ऐसी है| अपने निजी जीवन का विचार करते हैं, तो भी देश का विचार करना पडता है| मनुष्य को सुखी करने के लिए पिछले साठ- सत्तर, सौ वर्ष में जितने प्रयत्न हुए, वे विफल हो गये| विज्ञान के आधार पर बडी प्रगति हुई, किन्तु प्रगति के साधन शक्तिशाली लोगों के हाथ में केंद्रित हो गये|

एक भारत वर्ष है जिसने प्राचीन काल में समस्त मानव जाति को सुख-शांति प्रदान की थी| आज भी सारा विश्‍व भारत की ओर एकटकी लगाकर देख रहा है| परंतु भारत की वर्तमान स्थिती कैसी है- नाऊ गव्हर्नमेंट पनिश्ड सिटीझन्स हू फायटिंग फॉरेन इन्ट्रुडर्स|(now government punished citizens who fighting foreign intruders.) देश का आर्थिक सलाहकार प्रशासन पंगु हो गया है| समाज को देखेंगे तो समाज में कितने भेद है| अपने स्वार्थ के लिये जाति, प्रांत के भेदों को उभारकर स्वार्थ सिद्ध करना, पानी को लेकर झगडा, नदियों को लेकर झगडा| आज नैराश्य की स्थिती है| इस परिस्थिती में हमारा कर्तव्य क्या है?

परिस्थिती को लेकर काफी चर्चा होती है| अनेक प्रकार की समस्याएँ हैं- सुरक्षा, सामाजिक समरसता, बेरोजगारी| अपने देश में पिछले देड सौ- दो सौ वर्षों में अनेक महापुरुष हुए| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पू. डॉ. हेडगेवारजी ने कहा, जब तक देश सुखी नहीं बनता, तब तक अपने सुख का विचार नहीं करना| उनके समकालीन जितने भी नेता थे- लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, वीर सावरकर आदि सभी के यही विचार थे|

 देश में कुछ मूलभूत कमियॉं घुस गयी हैं| सामान्य समाज की गुणवत्ता और एकता के आधार पर सब समस्याओं का समाधान है|अनेक वर्षों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि प्रत्येक राष्ट्र का एक प्रयोजन होता है| हमारा देश कभी मिट नहीं सकता| भूतकाल में अनेक देश समाप्त हो गये| हमारा देश हजारों वर्षों से- कई आक्रमण सहन करते हुए भी, खडा है| क्या है हमारे देस की पहचान? भारत की भारतीयता हिन्दु है| सर्वोच्च न्यायालय ने भी यही कहा है| मन से सारे स्वार्थ मिटाकर, भेद मिटाकर, सारे समाज को आत्मीयता के आधार पर संगठित करना है| हमारी जो दुर्बलता है, उसको दूर कर, समाप्त कर, संगठित होना है|

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उसका उपाय है- रोज की शाखा| यह जो सीधे, साधे, सरल दिखने वाले कार्यक्रम किये जाते हैं, उससे उत्कृष्ट व्यक्ति निर्माण होता है| इसके लिए शाखा में जाना होता है| तथा संस्कार न बदले इसके लिए नित्य जाना होता है| नित्य साधना से मनुष्य डिगता नहीं| भटकता नहीं| सामर्थ्यवान बनता है| सौभाग्य से हमारे पास साधन है- शाखा| समाज का धैर्य और विश्‍वास कैसे बना रहे यह चिंता हमें करनी है| हमें सेवा के लिए तत्पर रहना है| समाज में इस प्रकार का वातावरण बनाना है, कि हर गॉंव में, हर बस्ती में शाखा होनी चाहिए| हम अपने घर को अच्छा हिंदू घर बनाएँ| संस्कार से संस्कृति बचती है| आज शिक्षा, संस्कार  जहॉं से मिलने चाहिए वहॉं मिल नहीं रहे| राजनीति, क्रिकेट, सिनेमा को छोडकर शेष समाज के विषय पर चर्चा करनी चाहिए| चिंतन करना चाहिए| स्वयं की साधना को तीव्र रखें| नित्य रखें| अपनी इस मूल्यवान संस्कृति का व्यवहार अपने परिवार में, समाज में करें, यही अपेक्षा है|
source: http://www.vskbharat.com
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विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित