सोमवार, 11 जून 2012

फूट डालो , राज करो

लगता है कि केन्द्र की यूपीए सरकार भी आजादी पूर्व की ब्रिटिश सरकार के नक्शे-कदम पर चलने लगी है। ब्रिटिश सरकार की "फूट डालो-राज करो" नीति उसे इतनी पसन्द आ रही है कि स्वतंत्रता मिलने के 64 साल बाद कांग्रेसनीत सरकार ने उसे फिर आजमाना शुरू कर दिया है। इस नीति पर चलने का ताजा प्रमाण है, हाल ही में दिया गया वह निर्णय जिसमें कहा गया है कि देश के मुस्लिम बहुल इलाकों के थानों में कम से कम एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी तैनात किया जाए।

जब दुनिया भर के देश जाति, सम्प्रदाय, भाषा के बंधनों से मुक्त होकर लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले कदमों की ओर बढ़ रहे हैं, ऎसे में केन्द्र सरकार का यह निर्णय समझ से बाहर है। इसका सीधा सा अर्थ हुआ कि सरकार यह सुनिश्चित करने में लगी है कि कहीं मुस्लिम समुदाय देश की मुख्य धारा में मिल नहीं जाए।

जब कभी भी देश में सौहार्द्र का माहौल बनने लगता है, सरकार कोई न कोई ऎसा कदम उठा लेती है कि कड़वाहट न सिर्फ बनी रहे, बल्कि फिर बढ़ जाए। पुलिस विभाग जैसे संवेदनशील महकमे में तो ऎसे प्रयोग बिल्कुल नहीं किए जाने चाहिए। देश का संविधान यह कहता है कि नागरिकों में धर्म, भाषा, जाति के आधार पर कोई भेद नहीं किया जाएगा, लेकिन सरकार ऎसे कदम उठाती जाती है जो भेदभाव बढ़ाने वाले हो। जातिगत आरक्षण की व्यवस्था के बाद धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर पुलिस अधिकारियों की नियुक्तिका निर्णय ऎसा ही प्रतिगामी कदम है।

यह निर्णय कोढ़ में खाज हो जाएगा। केन्द्र सरकार ने यह निर्देश तो जारी कर दिया, लेकिन यह आदेश यह नहीं कहता कि हिन्दू इलाके में हिन्दू तथा सिख इलाके में सिख को लगाया जाए। अनुसूचित जाति, जनजाति क्षेत्रों में उनके भी अधिकारी लगाए जाएं। इस आदेश को भ्रष्टमति का आदेश भी कह सकते हैं, क्योंकि यह शहर के मोहल्लों को साम्प्रदायिकता के आधार पर बांटने का दु:साहस करता है। ऎसे आदेश जारी करने वालों को अपने पद पर बैठने का अधिकार ही नहीं मिलना चाहिए। बल्कि इनको तो बर्खास्त करना ही उचित होगा। ऎसा आदेश लागू हो गया तो अन्य सम्प्रदायों से इस आधार पर नियुक्ति की मांग नहीं उठेगी?

क्या मुस्लिम इलाकों में कानून के जोर से मुस्लिम पुलिस अधिकारी लगाने से हिन्दू-मुस्लिम पुलिस अधिकारियों के बीच खाई नहीं पैदा हो जाएगी। प्रश्न यह भी है कि जितने भी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र हैं उतने मुस्लिम अधिकारी भी हैं क्या?

क्या केन्द्र सरकार ने यह भी विचार किया कि गैर मुस्लिम अधिकारियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? वरिष्ठ अधिकारियों के सामने कैसी-कैसी जटिल समस्याएं उत्पन्न होंगी। आज देश के सभी आदिवासी क्षेत्र सर्वाधिक असुरक्षित हैं। वहां एक-एक आदिवासी अधिकारी क्यों नहीं? इस कानून या आदेश का और कुछ प्रभाव पड़े या न पड़े, साम्प्रदायिकता की सोच को बढ़ावा अवश्य ही मिलेगा। केन्द्र सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपना कर शेष भारत को समय-समय पर विमुख ही किया है। यह आदेश भी उसी आग में, मानसिक रूप में, घी का काम ही करेगा। लोगों के मन में अनावश्यक शंकाएं भी पैदा करेगा। कांग्रेस की सांसें फूल रही हैं। ऎसे आदेश से तो कांग्रेस हांफने लग जाएगी।

भुवनेश जैन
साभार: राजस्थान पत्रिका
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विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित