शुक्रवार, 25 जून 2010

अमूल्य निधि है स्वयंसेवक का समर्पण

भगवा ध्वज के समक्ष नियुध, दण्ड युद्ध तथा घोष का प्रदर्शन करते स्वयंसेवक और राष्टï्र की नीधि और संघ की संस्कार निर्माण में भूमिका पर विचार प्रकट करते वक्ता। अवसर था राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ के संघ शिक्षा वर्ष द्वितीय वर्ष के समापन कार्यक्रम का। कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि स्वयंसेवक का त्याग एवं समर्पण तथा संघ की कार्य पद्धति राष्टï्र की अमूल्य निधि है। ज्ञान चरित्र और शौर्य के बल पर ही भारत दुबारा से विश्व गुरु के पद पर आरूढ़ होगा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अखिल भारतीय गो सेवा प्रमुख शंकरलाल ने राष्टï्र की वर्तमान अस्थिर स्थिति के लिए राजनीतिज्ञों की तुष्किरण नीति और आमजन मानस में उत्पन्न अस्थिर भाव को बताया।उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में ही विश्व का कल्याण निहित है। कार्यक्रम की अध्यक्षता ठोस एवं भौतिकी प्रयोगशाला, रक्षा एवं अनुसंधान केन्द्र के पूर्व निदेशक हनुमानप्रसाद व्यास ने स्वयंसेवकों से कर्तव्य पथ पर अडिग रहने तथा राष्टï्रीय स्वयं सेवक के उद्देश्यों को पूरा करने की बात कही। संघ के जोधपुर के प्रांत कार्यवाह जसवंत खत्री ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में सुबोधगिरिजी महाराज सहित बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने भाग लिया। इस मौके पर स्वयंसेवकों ने सुरक्षा अभ्यास भी किया।217 प्रतिभागियों ने लिया प्रशिक्षणसंघ शिक्षा वर्ग द्वितीय वर्ष में कुल 161 स्थानों से आए 217 प्रतिभागियों ने विविध प्रशिक्षण लिए। 20 दिन की अवधि तक चले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान वर्ग के सर्वाधिकारी प्रो। मनोहरलाल कालरा, पूर्व कुलपति कोटा विश्वविद्यालय रहे।

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित