शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

विश्व मंगल गोऊ ग्राम यात्रा







मंगल संकल्प
गाय बनेगी विश्व एकता का साझा सूत्र




६२ वर्ष पहले हमारा देश विदेशी शासन से स्वतंत्र हुआ । विडंबना देखिए, यद्यपि हम स्वयं अपने स्वामी बन गये पर पश्चिमी चकाचोंध के अवांछनीय प्रभावों के दास भी हो गये । तब से अपनी यात्रा के प्रत्येक पड़ाव पर हम अपनी मौलिकता और स्वाभिमान खोते गये ।




आज की वास्तविकता भयावह है । हम जानते हुए भी विषैल भोजन करते है । हमारे अपने स्वास्थ्यकर भोजन के उत्पादन में हमारी दिलचस्पी समाप्त हो गई है । परिणामतः बाहरवालों पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है ।
यदि मनुष्यों की यह दुःखद स्थिति है, तो पशु-पक्षियों की गति बदतर है ।
विद्वान लोग एक कारण बताते है – मानव जाति भूमंडल पर एक लाख वर्षों से है । इस काल में हमारे पर्यावरण को पिछले १०० वर्षों से हुई क्षति उसके पहले के ९९,९०० वर्षों में हुई क्षति के बराबर है । स्पष्टतः इसका कारण है मनुष्य द्वारा हर वस्तु पर नियंत्रण का लोभ । यह संभव भी नहीं है और यही दुष्प्रयास हमारे घोर कष्टों का कारण भी है ।

भारतीय संदर्भ में इस बंधन से निकलने का एक मात्र मार्ग है – हमारे देश में एक समय में फलते-फूलते गौ केंद्रित ग्राम की तरफ वापसी ।

इसी पृष्ठ भूमि में श्री रामचंद्रापुर मठ के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्री राघवेश्वर भारती स्वामीजी" पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्री राघवेश्वर भारती स्वामीजी ने विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा अभियान प्रारंभ किया है जिसका उद्देश्य लोगों को गौ केंद्रित ग्रामों तक वापस ले जाना है ।
यह सर्वविदित है कि श्री स्वामीजी ने अपना जीवन गौ कल्याण के लिये समर्पित किया है । इस यात्रा के माध्यम से उनका प्रयास है हमारे राष्ट्र और समस्त विश्व को गाय रूपी एक डोर में बांधना । इसके साथ ही जुडा है प्रत्येक आत्मा में प्रकृति प्रेम जगाना ।


अनिवार्यता
क्या यह यात्रा अपरिहार्य है ?

हाँ, यह कोरी काल्पनिक आवश्यकता नहीं है । यह आवश्यकता है करो या मरो की स्थिति तक पहुँचे एक राष्ट्र की । आधुनिक मानव विपरीत ध्रुवों और विरोधाभासों के मध्य फंसा है ।
शांति बनाम आनंद, प्राकृतिक बनाम यांत्रिक, समानुभूति बनाम स्वार्थ, प्रकृति बनाम पुरुष, दूर दृष्टि बनाम अदूरदर्शिता, सर्वांगीण लाभ बनाम वित्तीय लाभ, कृषि बनाम उद्योग, गौ आधारित कृषि बनाम यांत्रिक कृषि, ग्राम बनाम नगर, गुणवत्ता बनाम संख्या, स्वास्थ्यकारी भोजन बनाम जंक फूड, गहरी नींद बनाम द्रव्यजनित तंद्रा – ऐसे संधर्षों की तुलना में बाह्य आतंकवाद नगण्य है ।


किसान चेष्टा कर रहा है भूमि का सार तत्व खींच लेने की । उसकी दृष्टि में देशी बीज, गायें और खाद बेकार है । वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों से संकर बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरण लेने को प्रस्तुत है । कुछ वर्षों तक बेहतर फसल और अधिक आय के भ्रमजाल को वह समृद्धि समझ बैठता । अपने बच्चों को शहरों में पढ़ा कर उन्हें वह गांवों और खेती से दूर करता है । कालांतर में कृषि के गलत तरीके उसकी भूमि का उपजाऊपन क्रमशः कम कर देते हैं । पैदावार घट जाती है और ऋण और कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं और वह आत्मा हत्या जैसे चरम कदम उठा बैठता है ।
यह एक अपवाद स्वरूप कहानी नहीं है । बल्कि हमारी जनसंख्या का ७०% माने जाने वाले आम किसानों की नियति है ।
एक और दृष्टि से मनुष्यों की स्थिति बेहतर है ।
वन्यप्राणी जो कि पहले हजारों कि संख्या में थे, अब सैंकड़ों कि संख्या में आ गये हैं ।
भूमि की सतह बंजर होती जा रही है, यह आश्चर्य की बात है कि कुछ जंगल अभी भी बचे हुए हैं ।
गौ परिवार जो कि किसान का जीवन आधार है, घटता जा रहा है ।
भारतीय गायों की ७० प्रजातियों में से केवल ३३ वची हैं । इन बची हुई नस्लों में भी कुछ में तो सिर्फ १० या २० गायें ही मौजूद हैं ।
६० वर्षों में वधशालओं की संख्या ३०० से ३६,००० हो गई है ।
स्वाधीनता से अब तक देश, अपनी ८०% गौ संख्या खो चुका है ।
इस दुःखद स्थिति का एक स्थायी समाधान आज की आवश्यकता और चुनौती है । हमारे लिये गौ केंद्रित ग्रामीण जीवन ही श्रेष्ठ विकल्प है । पारस्परिक निर्भरता, देख-भाल, सम्मान और सब जीवों के हित के प्रति चिंता इस विचारधारा का मध्य बिंदु है । जीवन के प्रत्येक पल में यह सत्य परिलक्षित होता है ।
विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा इन पवित्र संदेशों को भारत के कोने-कोने तक पहुँचायेगी । कृपया इसके महत्व पर गौर करें ।


सच्चा स्वतंत्रता संग्राम
यह सच्चा स्वाधीनता आंदोलन अंतिम हो


प्रत्येक व्यक्ति को अपनी स्वाधीनता प्रिय है और वह उसे बनाये रखने की चेष्टा करता है । १८५७ में हुआ भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास में एक सीमा चिन्ह है । बंदूकों की गोलियों पर गाय या सुअर के मांस की चर्बी चढ़ी होने की अफवाहों ने आंदोलन को चिंगारी दिखाई । लेकिन देश की स्वाधीनता की आशा प्रज्वलित होकर बुझ गई ।

महात्मा गांधी द्वारा हमारे स्वाधीनता आंदोलन के विचारों और प्रयासों को सघन करते तक छिटपुट संघर्ष, विरोध, लडाइयों और हत्यायें होती रहीं । लोगों के मन में ठोस ढांचे वाले स्वतंत्र राष्ट्र की कल्पना नहीं थी । महात्मा गांधी ने जीवन के विभिन्न क्षेत्र के भारतीयों के स्वप्नों और महत्वाकांक्षाओं को दृढ़ करने वाले एक ढ़ांचे की परिकल्पना दी । किसान, उद्योगपति, कलाकार, पत्रकार और आम नागरिक सभी ने यह जाना कि उनका ईमानदारी और समर्पित होकर किया गया कार्य भी स्वतंत्रता संग्राम का भाग था । अंततः १५ अगस्त, १९४७ को हमें आजादी मिली ।
इस आनंद के साथ ही मोह भी भंग हुआ । राष्ट्रपिता गांधीजी ने समृद्ध कृषि, पशु फार्म और हस्तशिल्प रामराज्य का स्वप्न देखा था जिसमें ग्राम आत्मनिर्भर और स्वतंत्र हों । उन्होंने हमारे लोगों की अलग पहचान का सपना देखा जिसमें बाहरी लोगों की नकल नहीं करनी थी । यद्यपि उनका चिंतन ठोस और यथार्थवादी था, पर वह एक सपना मात्र रहा ।
स्वतंत्रता के साथ देश का विभाजन भी हुआ और हमारी उपजाऊ भूमि का एक बड़ा भाग पाकिस्तान को चला गया । बांग्लादेश के निर्माण के कारण वहाँ के कष्टों और आस्थिरता का कुछ प्रभाव हम पर भी पड़ा । इसके अतिरिक्त समय-समय पर पड़ने वाले सूखे और बाढ़ द्वारा उत्पन्न संकटों ने हमारे देश को उन वर्षों में तात्कालिक समाधानों के लिये विवश किया ।
संकट की उस घड़ी में हमें बाहरी तकनीक और विधियों में आशा की किरण दिखाई दी । हमने जोतने के लिए ट्रैक्टर और फसल काटने के लिये टिलर अपनाये । हमने संकर बीज बोये, पौधों को कृत्रिम खाद दी और रासायनिक कीटनाशकों द्वारा उनकी रक्षा की । विशाल बांधो के जल द्वारा सिंचाई कर हमने वर्ष में तीन फसलें उगाईं । बाजार में जल्द बिकने वाली फसलों पर जोर दिया गया, परिणामतः खाद्यान्न उगाने वाले खेत नकद फसलों में, बगीचों में बदल गये । कर्ज पर निर्भरता बढ़ी । बैल और बूढ़ी गायों को वधशालाओं में भेज दिया गया । जर्सी और एच.एफ. गायों ने अधिकांश घरों में भारतीय नस्लों का स्थान ले लिया । कुछ वर्षों में हरित क्रांति और श्वेत क्रांति पर ध्यान केंद्रित हो गया और गुणवत्ता का स्थान परिमाण ने ले लिया ।
आगे जाकर औद्योगिक प्रगति और सूचना प्रौद्योगिकी सामने आईं । इन सब बदलावों के कारण लोग गांवों से शहरों की तरफ आकर्षित हुए । शहरों में युवा पीढ़ी के लिये नये उभरने वाले व्यवसायों में लाभप्रद रोजगार के अवसर मिलने लगे । आज की पीढ़ी अपने बच्चे को जन्म से ही शहर भेजने की तैयारी करती है । यह पीढ़ी गाँव, खेती, पशुधन, ग्राम, घर और यहाँ तक कि माता-पिता का भी नहीं सोचती । यदि बाजार में सभी आवश्यकतायें पूर्ण हो जायें तो साधन की क्या चिंता ? जब आपको पाउच में दूध मिले तो फिर गाय की क्या परवाह ?
हम सोचते हैं विदेशी कृषि विधियों से हानि हुई है, किसान फंस गया है । भूमि का महत्व घट रहा है और किसान बीज, खाद और कृषि उपकरणों के लिये बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर है । किसान असह्य ऋण के बोझ से टूट रहा है । यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं है तो किसान आत्महत्या की ओर बढ़ता है ।
शहरों में हालात भी अच्छे नहीं है । शहरों की ओर अबाधित, अमर्यादित व स्थानांतरण से ढ़ाचागत सुविधायें अपर्याप्त हो गई है, जिससे नागरिकों का दम घुटता है । नौकरियों पर निर्भरता निराशाकारक है । गाँव और शहर दोनों बाहरी समाधानों की प्रतीक्षा में हैं ।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने अपने चर्खे को प्रतीक बनाकर सारे देश को एक सूत्र में पिरोया । लेकिन हमें सच्ची आजादी नहीं मिली । हमारा यह स्वतंत्रता संघर्ष अंतिम हो । स्वाधीनता के इस दूसरे संघर्ष में, पवित्र गाय हमारा नेतृत्व करेगी । गाय जो हमारी माताओं तक को दूध पिलाती हैं, हमारी आशा की ज्योति है । विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के माध्यम से गाय एकता क संदेश सारे देश पहुँचायेगी । हमें प्रसन्नता है कि इस सत्कार्य में सभी गो भक्त संगठित हो रहे हैं ।


यात्रा की रूपरेखा
विषय वस्तु : गाय संसार की माता है ।
संकल्प : गाय की रक्षा मेरा पवित्र कर्तव्य है ।
नारा : जो गाय को बचाये, गाय उसे बचाये ।
लक्ष्य : गो भक्ति से ग्राम प्रगति करें, ग्रामों की प्रगति से राष्ट्र की प्रगति हो, जिससे संसार की प्रगति हो ।
माध्यम : गाय
संदेश : चलें गाँव की ओर । चलें गाय की ओर चलें प्रकृति की ओर ।
मंगल संकल्प : पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्री श्री राघवेश्वर भारती स्वामीजी, श्री रामचंद्रापुर मठ
मंगल प्रेरणा : पूज्य गोऋषि श्री श्री स्वामी दत्तशरणानंदजी महाराज, पथमेडा
प्रवर्तक : पूज्य श्री श्री रविशंकरजी, पूज्य श्री श्री रामदेवजी बाबा, पूज्य श्री श्री माता अमृतानंदमयीजी, पूज्य आचार्य श्री श्री विद्यासागरजी, पूज्य आचार्य श्री श्री महाप्रज्ञजी, पूज्य आचार्य श्री श्री विजय रत्नसुंदर सुरीश्वरजी, पूज्य श्री श्री स्वामी दयानंद सरस्वतीजी, पूज्य श्री श्री मुरारी बापूजी महाराज, पूज्य श्री श्री सद्गुरु जगजीत सिंहजी महाराज, पूज्य श्री श्री सयामडांग रिनपोचेजी
संघटन : पूज्य डा. प्रणव पंड्याजी के गौरवाध्यक्षता में राष्ट्रीय समिति, राज्य और जिला स्तर पर समितियाँ
समर्थन : सभी गो भक्तों का
यात्रा शुभारंभ : कुरुक्षेत्र, विजयदशमी, ३० सितंबर, २००९
अवधि : १०८ दिन
आयोजन : गाय को प्रार्थना, संदेश, जुलूस, सांस्कृतिक कार्यक्रम, पर्व का माहौल
कुल मार्ग : २०,००० कि.मी
सहयात्रायें : १५,००० (जिला तालूका – ग्राम केंद्रों से)
सहयात्रा मार्ग : १० लाख कि.मी
समापन : नागपुर, मकर संक्रांति, १७ जनवरी, २०१०
हस्ताक्षर अभियान : गो के प्रति हिंसा रोकने के लिए और गाय को राष्ट्रीय प्राणि का दर्जा दिलाने के लिए करोडों के संख्या मे हस्ताक्षर संग्रह होगा ।
भारत के राष्ट्रपति को प्रस्तावना : २९ जनवरी, २०१० को करोड़ों हस्ताक्षरों के साथ

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित