सोमवार, 7 सितंबर 2009

भारतीय सीमा में घुसकर लिख दिया चीन


लेह [जागरण न्यूज नेटवर्क]। बदनीयत पड़ोसी की एक और नापाक कोशिश। पहले चीन की सेना के हेलीकाप्टरों ने भारतीय हवाई सीमा का उल्लंघन किया था। लेकिन अब जो मामला सामने आया है, वह भारतीय क्षेत्र पर दावा जताने का है। चीन की सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन कर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की है। लद्दाख क्षेत्र में माउंट ग्या की निकटवर्ती चट्टानों और पत्थरों को अपने रंग में रंग दिया है। हर ओर 'चीन' लिख दिया है।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया है कि चीन की फौज ने माउंट ग्या के निकट भारतीय क्षेत्र में करीब 1.5 किलोमीटर तक घुसपैठ की है। क्षेत्र के पत्थरों और चट्टानों को लाल स्प्रे पेंट से रंग दिया है। जाहिर हो कि माउंट ग्या को भारत और चीन ने अंतरराष्ट्रीय सीमा की मान्यता दे रखी है। जिस क्षेत्र में घुसपैठ हुई है, उसे आमतौर पर चुमार सेक्टर के नाम से जाना जाता है। लेह से पूरब में स्थित चुमार सेक्टर में चीन की फौज ने पत्थरों और चट्टानों को लाल रंग से रंगने के साथ-साथ जगह-जगह 'चीन' लिख दिया है।

चीन की इस नापाक हरकत की जानकारी 31 अगस्त को सीमा पर गश्त के दौरान हुई। गश्ती दल ने देखा कि जुलुंग ला पास के बोल्डरों और चट्टानों को लाल रंग से रंगा गया है। उन पर जगह-जगह 'चीन' लिखा गया है। इस संबंध में जानकारी की कोशिश पर सेना के प्रवक्ता ने सामरिक मुद्दा बताते हुए कुछ भी कहने से इन्कार कर दिया। लेकिन सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि सेना के तीन जनरल इस समय बीजिंग और ल्हासा में है इसलिए मामले को कम महत्व दिया जा रहा है।

बहरहाल इस मुद्दे को बेहद गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि आजादी के बाद पहली बार चीन ने इस तरह की कोई हरकत की है। भारतीय सीमा में 1.5 से लेकर 1.7 किलोमीटर अंदर तक के पत्थरों को अपने रंग में रंग दिया है। सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों ने जब इस संबंध में लद्दाख और स्पीति के ग्रामीणों से बात की। पता लगा कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने घुसपैठ की है। पत्थरों रंगने का काम उसी ने किया है। यह वही क्षेत्र है, जहां तिब्बत से निकलकर पराछू नदी हिमाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। पराछू की बाढ़ से हिमाचल में तबाही का खतरा बराबर मंडराता रहता है।

जहां-जहां है ड्रैगन की नजर

लाइन आफ एक्चुअल कंट्रोल यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर बातचीत के दौरान भारत और चीन ने वर्ष 2002 में नक्शों का आदान प्रदान किया था। पश्चिमी सेक्टर [पूर्वी जम्मू-कश्मीर] स्थित समर लंगपा क्षेत्र को चीन ने विवादास्पद बनाने की कोशिश की। यह क्षेत्र काराकोरम दर्रा और चिपचाप नदी के बीच स्थित है। चीन के नक्शे में लाइन आफ एक्चुअल कंट्रोल को समर लंगपा के दक्षिण दर्शाया गया था। समर लंगपा सीमा का सुदूर उत्तरी हिस्सा है, जो लेह से काफी उत्तर तक जाता है।

चिपचाप नदी के दक्षिण दो 5495 और 5459 फिट की ऊंचाई वाली दो पहाड़ियां हैं। यहां चीन की फौजों का निर्बाध आना-जाना है। यहां तक उन्होंने चोटियों का नामकरण तक कर रखा है मसलन-'प्वाइंट 5459' और 'मानशेन हिल'। दोनों पहाड़ियों के दक्षिण पूर्व में स्थित देपसांग रिज पर भी चीन नजर गड़ाए हुए है।

सिक्किम-तिब्बत और पश्चिम बंगाल सीमा का ट्राईजंक्शन, सुमदोरांग चू, त्वांग के उत्तर येमेन चू और नियामजियांग के बीच असाफी ला के पास दोनों तरफ से सीमा के अधिकांश भागों पर निगरानी रहती है। लेकिन पांच या छह स्थान ऐसे हैं जहां वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति को लेकर मतभेद हैं।

माउंट ग्या: फेयर

प्रिंसेस आफ स्नो

22,420 फिट की ऊंचाई वाले माउंट ग्या को सेना ने 'फेयर प्रिंसेस आफ स्नो' नाम भी दे रखा है। माउंट ग्या एक ऐसा तिमुहाना है, जो जम्मू-कश्मीर के लद्दाख, हिमाचल के लाहुल स्पीति और तिब्बत से लगता है। यह हद अंग्रेजी हुकूमत के दौर से कायम है। भारत और चीन ने भी इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा का दर्ज दे रखा है।

आदत से बाज नहीं आता

30 अगस्त, 09: दो चीनी एमआई हेलीकाप्टरों द्वारा भारतीय वायुसीमा उल्लंघन का मामला सामने आया। दोनों हेलीकाप्टर पांच मिनट तक भारतीय सीमा में रहने के साथ ही कुछ खाद्य सामग्री भी नीचे गिराई।

लाल सेना ने पार की हद

जून 2009- 26 मामले

जुलाई 2009- 21 मामले

अगस्त 2009 26 मामले

2008- 223 मामले

क्यों होती है घुसपैठ

सिक्किम-तिब्बत सीमा को छोड़कर भारत-चीन की पूरी सीमा विवादित है।

-वास्तविक नियंत्रण रेखा [एलएसी]: 4056 किमी।

-अक्साई चीन: भारत का दावा लेकिन चीन के नियंत्रण में।

-अरुणाचल प्रदेश: चीन का दावा लेकिन भारतीय कब्जे में




फिर चीन की घुसपैठ

लेह । भारतीय वायु क्षेत्र में अवैध रूप से हेलीकॉप्टर लेकर आ धमकने के बाद चीन ने एक बार फिर घुसपैठ की है। अबकी बार चीनी सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन कर जम्मू-कश्मीर के लद्दाख इलाके में 1.5 से 1.7 किमी तक घुस कर अपनी कारगुजारी को अंजाम दिया।
आजादी के बाद इस क्षेत्र में चीन की ओर से हुई इस पहली घुसपैठ में लाल सेना ने इलाके के पत्थरों और चट्टानों को लाल रंग से रंग दिया है और उस पर चीनी भाषा "कैंटोनीस" में "चीन" लिख दिया है। सीमा पर गस्ती दल को गत 31 जुलाई को मामले का पता चला।

ब्रिटिश काल से मान्य

"माउंट ग्या" को भारत और चीन ने अंतरराष्ट्रीय सीमा माना है। सेना के बीच "फेयर प्रिंसेज ऑफ स्नो" के तौर पर पहचान पाने वाला माउंट ग्या 22420 फीट ऊंचाई पर स्थित है। यह जम्मू-कश्मीर में लद्दाख, हिमाचल प्रदेश में स्पीति और तिब्बत को जोड़ने वाले तिराहे पर स्थित है। ब्रिटिश काल में इसकी सीमा चिन्हित की गई थी और दोनों देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा के तौर पर मान्यता दी थी।

इससे पहले चीनी हेलीकॉप्टरों ने जून में ही चूमर क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल) के आसपास भारतीय वायु क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश किया था और कुछ खराब हो चुका भोजन भी गिराया था।

31 जुलाई को पता चला

सीमा पर गश्त करने वाले दल को 31 जुलाई को पता लगा कि "जुलुंग ला" दर्रे के आसपास अनेक चट्टानों और पत्थरों पर लाल रंग के निशान थे और चीनी इलाके में घुस आए थे एवं सभी जगह "चीन" लिख दिया था। सैन्य प्रवक्ता ने इस बाबत कुछ भी कहने से मान करते हुए कहा कि यह परिचालन से जुड़ा मामला है।

हालांकि सेना के अधिकारियों ने कहा कि सेना के तीन जनरल इस समय एक विनिमय कार्यक्रम के तहत बीजिंग और लहासा में है, इसलिए मामले को कम महत्व दिया जा रहा है। सीमा बलों ने लद्दाख और स्पीति में स्थानीय लोगों से बातचीत कर यहां चीन की लाल सेना के प्रवेश के बारे में जानकारी ली।

अरूणाचल पर दावा

चीन का दावा है कि अरूणाचल प्रदेश उसका इलाका है और भारत ने इस पर कब्जा कर रखा है। चीन ने कहा कि राज्य के तवांग व तकसिन क्षेत्र तिब्बत के हिस्से हैं। हाल ही में चीन ने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष में अरूणाचल में विकास के लिए कर्ज के भारतीय आग्रह का विरोध किया था।

एलएसी विवाद

2002 में दोनों देशों ने अपने-अपने नक्शों का विनिमय किया था। पश्चिमी सेक्टर (पूर्वी जम्मू-कश्मीर) में काराकोरम और चिपचाप नदी के बीच का समार लुंग्पा इलाके को लेकर चीन विवाद खड़ा कर रहा है। चीनी नक्शों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) समार लुंग्पा के दक्षिण में बताई है।


270 बार अंतरराष्ट्रीय सरहद का उल्लंघन पिछले साल
2300 बार सीमा पर लाल सेना की आक्रामक चहलकदमी

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित