सोमवार, 13 अप्रैल 2009

खालसा पंथ स्थापना की याद में मनाई जाती है बैसाखी

दशम सिख गुरु गोबिन्दसिंह के बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना करने की याद में मनाया जाने वाला बैसाखी पर्व दरअसल एक लोक त्यौहार है जिसमें फसल कटने का उल्लास व्यापक स्तर पर होता है।
पंजाब और हरियाणा सहित कई क्षेत्रों में बैसाखी मनाने के आध्यात्मिक सहित तमाम कारण हैं। सिख धर्म के विशेषज्ञों के अनुसार पंथ के प्रथम गुरू बाबा नानक देव ने वैशाख माह की आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से काफी प्रशंसा की है। जाडा खत्म होने और गर्मी की शुरूआत के साथ ही लोगों का मन उल्लास से भर जाता है।
राजधानी के ऐतिहासिक शीशगंजगुरुद्वारे के वरिष्ठ ज्ञानी हेम सिंह के अनुसार लोकजीवनमें बैसाखी नई फसल आने का त्यौहार है। नई फसल आने के साथ ही ग्रामीण जीवन में सृमद्धिआ जाती है और लोग जाडों के बाद गर्मियों का मौसम शुरू होने की खुशी में इस त्यौहार को पूरे उल्लास के साथ मनाते हैं। उन्होंने कहा कि बैसाखी के दिन ही दशम गुरु गोबिन्दसिंह ने आनंदपुर साहिब में वर्ष 1699में खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस दिन उन्होंने खालसा पंथ पर जान न्यौछावर करने के लिए अपने अनुयायियों को आगे आने को कहा था। लेकिन जब गुरु के लिए सिर देने की बात आई तो केवल पांच शिष्य ही सामने आए।
ज्ञानी हेम सिंह के अनुसार इन्हीं पांचों शिष्यों को पंजप्यारा कहा जाता है। गुरु गोबिन्दसिंह ने इन पंजप्यारों को अमृत छका कर अपना शिष्य बनाया था और खालसा पंथ की स्थापना की थी।
ज्ञानी हेम सिंह ने कहा कि खालसा पंथ की स्थापना के दिन गुरु गोबिन्दसिंह ने पहले अपने शिष्यों को अमृत छकाया और फिर स्वयं उनके हाथों से अमृत छका। इसी लिए कहा गया है.. प्रगट्योमर्द अगमणवरियामअकेला, वाह वाह गुरु गोबिन्दआपैगुरु आपैचेला।
उन्होंने कहा कि चूंकि खालसा की स्थापना के दिन गुरु गोबिन्दसिंह ने अपने शिष्यों को अमृत छकाया था, लिहाजा बैसाखी के दिन कुछ लोग उसी घटना की याद में अमृत छकते हैं। वैसे खालसा पंथ में साल के अन्य दिनों भी अमृत छका जाता है कि लेकिन इस मामले में बैसाखी का दिन सबसे विशिष्ट होता है।
गुरुद्वारा रकाबगंज में प्रचारक शिवतेजसिंह ने बताया कि सिख धर्म में बैसाखी का आध्यात्मिक महत्व है। जीवन में हमेशा नेकी और बदी की लडाई चलती रहती है। बैसाखी के दिन गुरु गोबिन्दसिंह ने अपने शिष्यों को बुराई से दूर करते हुए नेकी की राह पर चलने की शिक्षा दी थी।
उन्होंने कहा कि खालसा पंथ में शामिल होने का आध्यात्मिक अर्थ ही नेकी की राह पर चलते हुए एक नए जीवन की शुरुआत करना है। सिंह ने बताया कि बैसाखी पर्व पर आनंदपुर गुरुद्वारे में विशिष्ट आयोजन किया जाता है। देश के अन्य गुरुद्वारों में इस दिन अखंड पाठ का आयोजन होता है। कडाह प्रसाद वितरित किया जाता है और अमृत छकाया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिन्दू पचांगके अनुसार गुरु गोबिन्दसिंह ने वैशाख माह की षष्ठी तिथि के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन चूंकि मकर संक्रांति भी थी, लिहाजा यह बैसाखी का पर्व सूर्य की तिथि के अनुसार मनाया जाने लगा। उन्होंने कहा कि सूर्य मेष राशि में प्राय: 13या 14अपै्रल को प्रवेश करता है, इसी लिए बैसाखी भी इसी दिन मनाई जाती है।
बैसाखी का भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भी विशिष्ट स्थान है। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के समीप 13अपै्रल 1919में हजारों लोग जलियांवालाबाग में एकत्र हुए थे। लोगों की भीड अंगे्रजी शासन के रालेटएक्ट के विरोध में एकत्र हुई थी।
जलियांवालाबाग में जनरल डायर ने निहत्थी भीड पर गोलियां बरसाई जिसमें करीब 1000लोग मारे गए और 2000से अधिक घायल हुए। अंगे्रजी सरकार के इस नृशंस कृत्य का पूरे देश में कडी निंदा की गई और इसने देश के स्वाधीनता आंदोलन को एक नई गति प्रदान कर दी।
जलियांवालाबाग की घटना ने बैसाखी पर्व को एक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान कर दिया। आज भी लोग जहां इस पर्व को पारंपरिक श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं वहीं वे जलियावालाबाग कांड में शहीद हुए लोगों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना भी नहीं भूलते।

विश्व संवाद केन्द्र जोधपुर द्वारा प्रकाशित